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मार्टिन लूथर ने कहा,'आज मेरा एक सपना है', पूरा अमेरिका उनके पीछे चल पड़ा

आज मार्टिन लूथर किंग जूनियर (15 जनवरी, 1929 – 4 अप्रैल, 1968) की डेथ ऐनिवर्सरी है

अमरीका. वो देश, जहां का राष्ट्रपति खुद को ‘लीडर ऑफ द फ्री वर्ल्ड’ कहकर इतराता है. लेकिन एक वक्त था जब अमरीका के अपने लोग फ्री नहीं थे. वहां गुलामी की प्रथा थी. और जब अब्राहम लिंकन ने इस प्रथा को बंद करना चाहा, तो वहां गृहयुद्ध छिड़ गया था. दक्षिण के राज्यों ने कहा कि जो कन्ना है कल्लो, हम तो काली चमड़ी के लोगों को गुलाम बनाकर ही रखेंगे. लड़ाई खत्म हुई तो गुलामी की प्रथा चाहने वाले राज्य हार गए थे. बावजूद इसके, अफ्रीकी अमेरिकी लोगों की ज़िंदगी दूभर ही रही. वो दोयम दर्जे के नागरिक बने रहे.

तो अमरिका में सिविल राइट्स के लिए एक बड़ा आंदोलन खड़ा हुआ. इसके सबसे बड़े हीरो थे मार्टिन लूथर किंग जूनियर. 1963 में अफ्रीकी अमेरिकी समुदाय के लिए हकों की मांग के साथ वॉशिंगटन सिविल राइट्स मार्च बुलाया गया. मार्च के दौरान 28, अगस्त 1963 को उन्होंने अब्राहम लिंकन मेमोरियल की सीढ़ियों पर खड़े होकर एक भाषण दिया था, ‘I Have a Dream’ (मेरा एक सपना है) नाम से. इस भाषण को अमरीकी सिविल राइट्स आंदोलन के सबसे खास लम्हों में गिना जाता है. इस भाषण और मार्च के चलते किंग उस साल टाइम्स पर्सन ऑफ द इयर बने. 1964 में वो सबसे छोटी उम्र में नोबेल प्राइज़ जीतने वाले इंसान भी बने.

किंग का ये यादगार भाषण पहली बार 1983 में द वॉशिंगटन पोस्ट में छपा था. हम उस भाषण का हिंदी अनुवाद आपको पढ़वा रहे हैं.


I have a Dream

मैं आज इस मौके पर आपके साथ शामिल होकर खुश हूं. ये (मार्च) इस देश की तारीख़ में आज़ादी के लिए किए गई अब तक की सबसे बड़ी कवायद के तौर पर दर्ज होगा.

आज से सौ साल पहले एक महान अमरिकी (अब्राहम लिंकन), जिनकी छांव में हम सभी खड़े हैं, ने एक आज़ादी के एक दस्तावेज़ (Emancipation Proclamation) पर दस्तखत किए थे. इस महत्त्वपूर्ण फैसले ने अन्याय की आग में जल रहे लाखों गुलाम नीग्रो लोगों के मन में उम्मीद की एक किरण जगा दी. ये वैसा ही था जैसे लम्बे समय तक अंधेरे की कैद में रहने के बाद सुबह के उजाले की आहट हो.

 

I have a Dream भाषण लिंकन मेमोरियल की सीढ़ियों पर से दिया गया था
I have a Dream भाषण लिंकन मेमोरियल की सीढ़ियों पर से दिया गया था

 

लेकिन उस ऐलान के सौ साल बाद भी, नीग्रो आज़ाद नहीं हैं. सौ साल बाद भी, नीग्रो अलगाव की हथकड़ी और भेद-भाव की बेड़ियों में जकड़ा हुआ है. सौ साल बाद भी, नीग्रो समृद्धि के एक विशाल समंदर के बीच गरीबी के जज़ीरे पर रहता है. सौ साल बाद भी नीग्रो अमेरिकी समाज में हाशिए पर सड़ रहा है. वो अपने ही देश में खुद को निर्वासित पाता है. इसलिए आज हम सभी यहां इस शर्मनाक हालात को दुनिया के सामने रखने के लिए इकठ्ठा हुए हैं.

एक तरह से हम अपने देश की राजधानी में एक चेक कैश करने आए हैं. जब हमारे गणतंत्र को गढ़ने वाले Constitution (संविधान) और Declaration of Independence (आज़ादी का घोषणापत्र) बड़े-बड़े शब्दों में लिख रहे थे, तो उन्होंने एक promissory note (वचन-पत्र) पर हस्ताक्षर किए. हर अमेरिकी उस promissory note का वारिस होने वाला था.

ये एक वादा था कि सभी लोग चाहे वो काले हों या गोरे, ज़िंदा, आज़ाद और खुश रहने के बराबर के हकदार होंगे.

आज ये साफ है कि अमरिका अपने अश्वेत नागरिकों से यह वादा निभाने में चूक गया है. इस पवित्र ज़िम्मेदारी को निभाने के बजाए, अमेरिका ने नीग्रो लोगों को एक खोटा चेक पकड़ा दिया है. एक ऐसा चेक, जो हमारी कौम को “insufficient funds” लिखकर वापस कर दिया गया है.

लेकिन हम यह मानने से इंकार करते हैं कि इंसाफ का बैंक दिवालिया हो चुका है. हम यह मानने से भी इनकार करते हैं कि इस देश में अवसरों का खज़ाना खाली हो चुका है. इसलिए हम इस चेक को कैश कराने आए हैं. इसके बदले में हमें आजादी और न्याय की सुरक्षा चाहिए.

इस मांग को लेकर हम इस पवित्र स्थान (लिंकन मेमोरियल) पर इसलिए भी आए हैं कि हम अमरिका को मौके की नज़ाकत से रूबरू करा सकें, ये बता सकें कि अब और देर नहीं. ‘शांत’ हो जाने या सही वक्त का इंतज़ार करने की सहूलियत अब हमारे पास नहीं है.

ये वक्त लोकतंत्र के वादे को निभाने का वक़्त है. ये वक़्त है अंधेरी और निर्जन घाटी से निकलकर नस्लीय न्याय (racial justice) के उजले रास्ते पर चलने का. ये वक़्त है अपने देश को नस्लीय अन्याय के दलदल से निकाल कर भाई-चारे की ठोस चट्टान पर खड़ा करने का. ये वक़्त है नस्लीय न्याय को ईश्वर की सभी संतानों के लिए एक सच्चाई बनाने का.

 

वॉशिंगटन सिविल राइट्स मार्च के दौरान मार्टिन लूथर किंग
वॉशिंगटन सिविल राइट्स मार्च के दौरान मार्टिन लूथर किंग

इस नाज़ुक मौके की अनदेखी करना हमारे देश के लिए घातक सिद्ध हो सकता है. नीग्रो समुदाय के वैध असंतोष की चुभती गर्मी तब तक खत्म नहीं होगी जब तक आज़ादी और समानता का ठंडा मौसम नहीं आ जाता. 1963 एक अंत नहीं बल्कि एक शुरुआत है. जो ये आशा रखते हैं कि नीग्रो अपना क्रोध दिखाकर फिर शांत हो जाएंगे, देश फिर पुराने ढर्रे पर चलने लगेगा जैसे कुछ हुआ ही नहीं, उन्हें एक भयानक सुनामी का सामना करना पड़ेगा. अमेरिका में तब तक शांति नहीं होगी जब तक नीग्रो समुदाय को नागरिकता का अधिकार नहीं मिल जाता. विद्रोह का बवंडर तब तक हमारे देश की नींव हिलाता रहेगा जब तक न्याय का सुनहरा युग नहीं आ जाता.

लेकिन मैं न्याय के मन्दिर की दहलीज़ पर खड़े अपने लोगों से कुछ ज़रूर कुछ कहना चाहूंगा. अपना हक पाने कि प्रक्रिया में हमें कोई गलत काम करने का दोषी नहीं बनना है. हमें अपनी आज़ादी की प्यास घृणा और कड़वाहट का प्याला पी कर नहीं बुझानी है. हमें अपना संघर्ष हमेशा अनुशासन और मर्यादा में रहकर करना होगा. हमें कभी भी अपने रचनात्मक विरोध को हिंसा में नहीं बदलना है. हमें खुद को इतना ऊपर उठाना है कि हिंसा का सामना आत्मा की शक्ति से कर सकें.

नीग्रो समुदाय में जिस तरह का उग्रवाद पनपा है, उसे हमें श्वेत लोगों में अविश्वास की वजह बनने से रोकना है. खासकर इसलिए, कि हमारे कई श्वेत बंधू इस बात को समझने लगे हैं की उनका भाग्य हमारे भाग्य से जुड़ा हुआ है. और इसीलिए वो आज यहां मौजूद भी हैं. वो इस बात को जान चुके हैं कि उनकी और हमारी स्वतंत्रता एक दूसरे से जुड़ी हुई है. हम अकेले नहीं चल सकते.

और हम जैसे भी चलें, इस बात का प्रण करें कि हम हमेशा आगे ही बढ़ेंगे. हम कभी वापस नहीं मुड़ेंगे. कुछ ऐसे लोग भी हैं जो, सिविल राइट्स आंदोलन चलाने वालों से पूछ रहे हैं,

“आखिर तुम कब संतुष्ट होगे?”

हम तब तक संतुष्ट नहीं होंगे जब तक एक नीग्रो पुलिस की अकथनीय दहशत और बर्बरता का शिकार होता रहेगा.

हम तब तक संतुष्ट नहीं होंगे, जब तक किसी सफर की थकान से चूर होने के बावजूद हमें हाइवे और शहरों के होटलों से लौटाना बंद नहीं होगा.

हम तब तक संतुष्ट नहीं होंगे, जब तक, एक नीग्रो एक छोटी सी बस्ती की सड़ांध से निकल कर एक अच्छे माहौल में नहीं चला जाता.

हम तब तक संतुष्ट नहीं होंगे, जब तक ”केवल गोरों के लिए” के बोर्ड लगाकर हमारे बच्चों को नीचा दिखाना, उनकी गरिमा को ठेस पहुंचाना बंद नहीं होगा.

हम तब तक संतुष्ट नहीं होंगे, जब तक मिसीसिपी में रहने वाला नीग्रो वोट नहीं डाल सकता और जब तक न्यूयॉर्क में रहने वाले नीग्रो को लगता रहेगा कि उसके पास कोई विकल्प ही नहीं जिसके लिए वो वोट करे.

नहीं, नहीं, हम संतुष्ट नहीं हैं और हम तब तक संतुष्ट नहीं होंगे जब तक न्याय पानी की तरह और सच्चाई एक तेज नदी की तरह बहने नहीं लगते.

मैं इस बात से अनजान नहीं हूं कि आप में से कई लोग बहुत सारे कष्ट सह कर यहां तक आए हैं. आपमें से कुछ तो अभी-अभी जेल की तंग काल-कोठरियों से निकल कर आए हैं. कुछ लोग ऐसी जगहों से आए हैं, जहां उन्हें आज़ादी की तलाश में अत्याचार के थपेड़ों और पुलिस बर्बरता से पस्त होना पड़ा. आपक रचनात्मक प्रतिरोध के सिपाही हैं, आपने पीड़ा और दुख को खूब समझा है. इस विश्वास के साथ आगे भी अपना काम करते रहिए कि आपको आपकी पीड़ा का फल अवश्य मिलेगा.

वॉशिंगटन मेमोरियल की सीढ़ियों पर I Have a Dream भाषण की याद में लिखी इबारत

वॉशिंगटन मेमोरियल की सीढ़ियों पर ‘I Have a Dream’ भाषण की याद में लिखी इबारत

मिसीसिपी वापस जाओ, एलाबामा वापस जाओ, साउथ कैरोलाइना वापस जाओ, जॉर्जिया वापस जाओ, लुईज़ीआना वापस जाओ, उत्तर के शहरों की झोंपड़पट्टियों और गंदी बस्तियों में वापस जाओ – ये जानते हुए कि किसी न किसी तरह ये स्थिती बदलेगी, इसे बदलना ही पड़ेगा. अब हमें निराशा की घाटी में पड़े नहीं रहना है.

मैं आपसे एक बात कहना चाहता हूं कि आज और आने वाले कल की कठिनाइयों से घिरे होते हुए भी मैंने एक सपना देखा है. ये सपना ‘अमेरिकन ड्रीम’ से गहरे तक जुड़ा हुआ है.

मेरा सपना है कि एक दिन यह देश ऊपर उठेगा और सही मायने में अपने सिद्धांतों को अपनाएगाः ”हम इस सत्य को स्वत: प्रमाणित मानते हैं कि धरती पर पैदा हुए सभी इंसान बराबर हैं”

मेरा सपना है कि एक दिन जॉर्जिया के लाल पहाड़ों पर पूर्व गुलामों के बच्चे और पूर्व गुलाम मालिकों के बच्चे भाईचारे की मेज पर एक साथ बैठ सकेंगे.

मेरा सपना है कि एक दिन मिसीसिपी राज्य भी, जो अन्याय और अत्याचार की आग में जल रहा है, आज़ादी और न्याय के सोते में बदल जाएगा.

मेरा सपना है कि एक दिन मेरे चारों बच्चे एक ऐसे देश में रहेंगे जहां उनकी पहचान उनकी चमड़ी के रंग से नहीं बल्कि उनके चरित्र से होगी.

आज मेरा एक सपना है !

मेरा सपना है कि एक दिन, अलबामा में, जहां क्रूर नस्लवादी हैं, जहां के गवर्नर के मुंह से बीच-बचाव और कानून को निष्प्रभावी करने वाले शब्द निकलते हैं, एक दिन उसी अलबामा में, अश्वेत लड़के-लड़कियां और श्वेत लड़के-लड़कियां भाई-बहन की तरह हाथ से हाथ मिलाकर साथ चलेंगे.

आज मेरा एक सपना है !

मेरा सपना है कि एक दिन हर एक घाटी भर जाएगी, हर एक पहाड़ बौना हो जाएगा और ऊबड़-खाबड़ बीहड़ सपाट हो जाएंगे. तब ईश्वर की महिमा प्रकट होगी और सभी इंसान उसे एक साथ देखेंगे.

यही हमारी आशा है. इसी विश्वास के साथ मैं दक्षिण वापस जाऊंगा. इसी विश्वास से कि हम निराशा के पर्वत को तराशकर आशा का पत्थर निकाल पाएंगे. इसी विश्वास से कि हम झगड़े के शोर को भाईचारे के संगीत में बदल पाएंगे. इसी विश्वास से कि हम एक साथ काम कर पाएंगे, पूजा कर पाएंगे, संघर्ष कर पाएंगे, साथ जेल जा पाएंगे, स्वतंत्रता के लिए साथ-साथ खड़े हो पाएंगे, ये जानते हुए कि हम एक दिन आज़ाद हो जाएंगे.

ये एक ऐसा दिन होगा जब ईश्वर की सभी संतानें एक नए अर्थ के साथ गा सकेंगी :

“My country ’tis of thee, sweet land of liberty, of thee I sing. Land where my fathers died, land of the Pilgrims’ pride, from every mountainside, let freedom ring.”

( ‘स्टार स्प्रैंगल्ड बैनर’ से पहले ये अमेरिका का राष्ट्रगान था.)

 

सिविल राइट्स एक्टिविस्टस के साथ अमेरिकी राष्ट्रपति कैनेडी
सिविल राइट्स एक्टिविस्टस के साथ अमेरिकी राष्ट्रपति कैनेडी

यदि अमेरिका को एक महान देश बनना है, इसे सत्य होना ही होगा. और इसके लिए न्यू हैम्पशायर के की चोटियों से आज़ादी का संगीत बजना चाहिए. न्यू यॉर्क के विशाल पहाड़ों से आज़ादी का संगीत बजना चाहिए. पेंसिलवेनिया की अलेगेनीज़ की ऊंचाईयों से आज़ादी का संगीत बजना चाहिए.

बर्फ से ढंकी कोलेराडो की रॉकीज़ चट्टानों से आज़ादी का संगीत बजना चाहिए.

कैलिफोर्निया की घुमावदार ढलानों से आज़ादी का संगीत बजना चाहिए.

केवल यहीं नहीं, जॉर्जिया के स्टोन माउंटेन से आज़ादी का संगीत बजना चाहिए.

टेनेसी के लुकआउट माउंटेन से आज़ादी का संगीत बजना चाहिए.

मिसीसिपी की पहाड़ियों से आज़ादी का संगीत बजना चाहिए. हर एक पर्वत से आज़ादी का संगीत बजना चाहिए.

और जब ऐसा होगा, जब हम हर गांव, हर बस्ती, हर राज्य और हर शहर से आज़ादी का संगीत बजने देंगे, तब हम उस दिन तक पहुंच सकेंगे जब ईश्वर की सभी संतानें – श्वेत और अश्वेत, यहूदी और गैर-यहूदी, प्रोटेस्टेंट और कैथलिक – सभी हाथ से हाथ मिलाकर नीग्रो समुदाय का आध्यात्मिक गाना गा सकेंगे :

“Free at last! free at last! Thank God Almighty, we are free at last!”

आखिर हम आज़ाद हैं ! शुक्रिया मेरे ईश्वर, आखिर हम आज़ाद हैं !

— मार्टिन लूथर किंग (Martin Luther King)

28 अगस्त, 1963

वॉशिंगटन.


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