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महात्मा गांधी का मिशन चुपके-चुपके पूरा कर रहे राहुल

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महात्मा गांधी चाहते थे कि आजादी मिलने के बाद कांग्रेस चुनावी राजनीति न करे. ये महान प्रयोग देशवासियों को ब्रिटिश दासता से मुक्ति का जरिया था. और 15 अगस्त 1947 के बाद इस संगठन को लोगों में लोकतांत्रिक चेतना फैलाने का काम करना चाहिए. न कि सत्ता की चेरी बनने के लिए रस्साकशी.

मगर जब गांधी ने ये चाहा, तब तक कांग्रेस पर उनका नियंत्रण खत्म सा हो गया था. इसीलिए जब नेहरू अपने साथियों के साथ सत्ता की हिस्सेदार में व्यस्त थे, गांधी सुदूर बंगाल के नोआखली में पदयात्रा कर रहे थे. हिंदू मुस्लिम दंगों को रोकने के लिए.

मगर अब कांग्रेस के बनने के 131 बरस बाद एक और गांधी महात्मा के सपने को पूरा करने की तरफ तेजी से बढ़ रहा है. राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस लगातार छीजती जा रही है. और 19 मई 2016 को इसके रिपोर्ट कार्ड में एक और निल बटे सन्नाटा दर्ज हो गया है.

पार्टी पं. बंगाल में अपनी पुरानी कार्यकर्ता ममता बनर्जी को जमींदोज करने के लिए सब कुछ करने को तैयार थी. उसे ये बर्दाश्त ही नहीं हो रहा था कि जिस कांग्रेस झंडे के तले ममता ने सियासत की शुरुआती सीढ़ियां चढ़ीं. जिस कांग्रेस के सहयोग से ममता बनर्जी ने लेफ्ट का किला ढहाया और 2011 में पहली बार राइटर्स बिल्डिंग में बतौर सीएम एंट्री पाई, वही उनको ठेंगा दिखा दे. बदला लेने के लिए कांग्रेस लेफ्ट के साथ रणनीतिक सहयोग पर उतर आई. राहुल गांधी और बुद्धदेव भट्टाचार्य खीसें निपोरते हुए एक ही मंच पर दिखाई दिए. और सियासी अजगर भी अचरज से आंख मिचमिचाने लगे. क्योंकि कुछ ही दिनों बाद यही दोनों नेता केरल में थे. एक दूसरे को आंखें तरेरते. क्योंकि यहां पर सीपीएम के नेतृत्व वाला लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट राज्य की सत्ता में वापसी की बिसात बिछा रहा था. और इसके लिए उसे कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट को चारों खाने चित्त करना था. जबकि कांग्रेस को अपना ढहता किला बचाना था.

तमिलनाडु: ‘करुणा या जय’ का कंफ्यूजन

तमिलनाडु में भी यही हुआ. कांग्रेस कभी यहां देश के बाकी हिस्सों की तरह सत्ता की सीधी दावेदार हुआ करती थी. मगर ये बाबा के जमाने की बात है. जब दिल्ली में तमिलनाडु से आए कांग्रेस के नेता के कामराज ये तय करते थे कि प्रधानमंत्री कौन बनेगा. या कौन नहीं बनेगा. मोरारजी देसाई से पूछिए. इंदिरा गांधी से पूछिए. इतना ही नहीं, कामराज ये भी तय करते थे कि कब कद्दावर कांग्रेसी नेताओं को कैबिनेट छोड़ संगठन में आ जाना चाहिए. पर ये इतिहास है. सिर्फ अपनी सोच के लिहाफ में ही गर्माहट देता है. बाहर के मौसम नहीं बदलता. द्रमुक मूवमेंट की आंधी में जो कांग्रेस उखड़ी तो अरसे तक हाशिये की तरफ बढ़ती रही. बीच बीच में कुछ फौरी चमत्कार भी हुए. मसलन 1996 में नरसिम्हा राव ने तय किया कि कांग्रेस करुणानिधि के नेतृत्व वाली डीएमके के साथ गलबहियां करेगी. लोकल यूनिट में बगावत हो गई. जीके मूपनार और पी चिदंबरम के नेतृत्व में नई पार्टी बन गई. तमिल मनीला कांग्रेस यानी की टीएमसी. 17 सीटें जीतकर पार्टी केंद्र की संयुक्त मोर्चा सरकार में हिस्सेदार भी हो गई. नौबत तो यहां तक आई कि एक समय मूपनार पीएम पद के दावेदार भी हो गए. और कांग्रेस, वह यही तय करने में खर्च होती रही कि उसे करुणा दिखानी है या जय पानी है.

ऐसा नहीं है कि तमिलनाडु में नए प्लेयर्स के लिए गुंजाइश नहीं है. एक खास कम्युनिटी के वोटों के सहारे अंबुमणि रामदौस की पार्टी जमने की कोशिशों में लगी रही. उग्र तमिलवाद के सहारे वाइको ने पहचान बनाई. और अब विजयकांत की डीएमडीके भी नई फसल के लिए कुदाल मारने में लगी है. कांग्रेस की धुर विरोधी बीजेपी भी ‘एकला चलो’ के दम पर लोकसभा में खाता खोल ले गई. और लगातार कोशिशें कर रही है.

असम: विश्वास टूटा, बिस्वास बागी हुए

फिर केरल लौटेंगे मगर अब फ्लाइट पकड़ते हैं गुवाहाटी की. यहां भी कांग्रेस की कलई पुतने के लिए राहुल गांधी जिम्मेदार हैं. कैसे. इसे कुछ तसल्ली से समझते हैं. साल 2001 में कांग्रेस असम में सत्ता पर आई. प्रफुल्ल कुमार महंत के नेतृ्त्व में पांच साल चली एजीपी-बीजेपी सरकार ने बहुत गंध मचाई थी. पब्लिक उकता गई थी. चरमपंथ भी नए सिरे से पसर रहा था. गोगोई गवर्नमेंट की वापसी के नारे के साथ आए. मगर उनके पहले ही कार्यकाल के आखिरी में आ गया आईएमडीटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला. ये एक्ट असम में अवैध रूप से बसे बांग्लादेशी नागरिकों की पहचान और उन्हें वापस भेजने से जुड़ा था. रिट दायर की थी उस वक्त ऑल असम स्टूडेंट यूनियन के नेता रहे और अब अगले मुख्यमंत्री बनने की तैयारियों के दौरान लड्डू खा रहे सर्वानंद सोनावाल ने.

कोर्ट के फैसले के बाद असम में बसे मुसलमानों में असुरक्षा और आशंका का भाव आ गया. और इसे दुहने के लिए सामने आई इत्र कारोबारी बदरुद्दीन अजमल. उन्होंने एआईयूडीएफ बनाई और कांग्रेस के विनिंग कॉम्बिनेशन में दरारें पड़ने लगीं. मगर गोगोई पर्याप्त लचीले थे. कभी कहते थे. ये अजमल है कौन. और कुछ बरसों में उन्हीं अजमल के सहारे सरकार चलाते दिखे. सत्ता के रास्ते में सब जायज हो गया. गोगोई ने लगातार तीन चुनाव जीते. इसमें बिलाशक उनके पॉलिटिकल मैनेजमेंट की करामात थी. मगर एक फायदा ये भी रहा कि मुख्य विपक्षी दल असम गण परिषद बुरी तरह से छितरा चुका था. उसका सपोर्ट बेस, उसके नेताओं के सियासी चाल चलन चरित्र पर उठते सवाल. सब कुछ डांवाडोल कर रहा था उन्हें. और कांग्रेस की धुर विरोधी बीजेपी तब यहां जूनियर पार्टनर से ऊपर उठने की तैयारियों में जुटी थी. इस काम में अगुवाई कर रहा था उसका पितृ संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ. संघ असम की हिंदू पहचान, अल्पसंख्यकों के चलते उनकी जमीन के बदलते चरित्र पर फोकस कर रहा था. अपने तमाम अनुषांगिक संगठनों के जरिए. उधर तरुण गोगोई अपने सपूत को राजनीतिक विरासत सौंपने की तैयारियों में जुटे थे.

विदेश में पढ़े, टेक्नोक्रेट से चपल और स्मार्ट गौरव गोगोई का असम की राजनीति में पदार्पण होता है. और इससे सबसे ज्यादा बिदकते हैं गोगोई सरकार के परफॉर्मेंस के हिसाब से सबसे अच्छे मंत्री हेमंत बिस्वास सरमा. बतौर शिक्षा मंत्री सरमा राज्य में अपने सुधारवादी कदमों के चलते बहुत लोकप्रिय हुए.

सरमा सिर्फ मंत्री ही अच्छे नहीं थे. उन्हें 2011 तक गोगोई का युवा चाणक्य माना जाता था. जिसे हर सीट के आंकड़े और स्थिति पता थी. जिसे ये भी पता था कि कहां क्या करना है, जीत के वास्ते. पर सत्ता मिलने के बाद तरुण और हेमंत के बीच अविश्वास पनपने लगा. हेमंत की अगुवाई में कांग्रेसी विधायकों का एक बड़ा धड़ा सोनिया दरबार पहुंचा. सोनिया गांधी तरुण की विदाई के लिए राजी थीं. मगर तभी दखल होता है राहुल गांधी का. और वह इस विरोध को खारिज कर देते हैं. हेमंत बिस्वास कांग्रेस का हाथ छोड़ कमल सूंघने लगते हैं. और 2016 का चुनाव उनके लिए पॉलिटिकल से ज्यादा पर्सनल हो जाता है.

और बड़ी बात ये कि असम में कांग्रेस की वापसी के फिलहाल कोई आसार भी नहीं नजर आ रहे. बीजेपी के पास युवा चेहरे हैं. कांग्रेस के पास तरुण गोगोई के बाद कोई नजर नहीं आ रहा. और मुस्लिम अब एआईयूडीफ के जमावड़े में गोलबंद होते जा रहे हैं.

बीजेपी की पॉलिटिक्स असमिया पहचान के इर्द गिर्द होगी. इसमें डिवेलपमेंट का तड़का भी लगे. दिल्ली से इमदाद भी भरपूर आएगी. तो कांग्रेस के पास क्लेम करने को ज्यादा कुछ रह नहीं जाएगा. तो बीजेपी के कांग्रेस मुक्त भारत अभियान की तरफ एक कदम बढ़ा असम की हार के साथ.

केरल: सोलर पैनल स्कैम का दाग

और आखिर में बात केरल की. यहां भी कांग्रेस सत्तारूढ़ थी. ओमान चांडी के नेतृत्व में. जिन पर सूरज की किरणों के बहाने माल बनाने के इल्जाम लगे. हम बात कर रहे हैं सोलर पैनल घोटाले की. इल्जाम की जद में खुद मुख्यमंत्री थे. मुख्य आरोपी सरिता नायर ने चांडी पर सनसनीखेज आरोप लगाए. मगर कांग्रेस आलाकमान यानी कि सोनिया-राहुल यहां भी चांडी को चेंज करने की दम न दिखा पाए. नतीजा. हंसिया हथौड़ा को इस देश में नए सिरे से पॉलिटिकल ऑक्सीजन मिल गई. जबकि घर उनका भी बंटा था. लोकप्रिय नेता थे अच्युतानंद. और संगठन पर इस्पाती शिकंजा था उनके विरोधी पिनराई विजयन का. मगर सीपीएम का करात युग अब बीत चुका है. गोपालन भवन में अब येचुरी की रिट चलती है. और उन्होंने विजयन को स्पष्ट कर दिया. कि अच्युतानंद के नेतृत्व में ही सत्ता में वापसी मुमकिन है. तो आप अब कायदे से हो जाओ. ज्यादा फैंटम न बनो.

केरल में कांग्रेस की चिंता सिर्फ सत्ता से विदाई भर नहीं है. उसे यह भी सोचना होगा कि बीजेपी जिस तेजी से काडर मजबूत कर यहां उभर रही है, वैसे में उसका हाल कांसे सा न हो जाए. लोग जल्दी में हैं. विनर को याद रखते हैं. बहुत हुए तो रनरअप पूछ लेते हैं. तीसरे की कोई पूछ नहीं है. जब तक कि वो बाकी दो के गेम प्लान में फिट न बैठे.

मगर हारे को हरिनाम. केरल कांग्रेस उस दिन की सोचकर भी तसल्ली कर सकती है. जिस दिन बंगाल में दोनों विरोधी सांप्रदायिकता और ममतावाद को हराने के लिए एक हुआ. सियासत उन्हें ऐसा ही एक मुहावरा अगले कुछ दशकों में केरल भी उपलब्ध करा सकती है. जब दोनों मिल बीजेपी के नेतृत्व वाले किसी मोर्चे को चुनौती देंगे.

और अब बात फिर राहुल गांधी की, उनके कमांडरों की

राहुल को लगा उन्हें प्रशांत किशोर न मिले, सत्यनारायण की कथा का परसाद मिल गया. जिसमें हर कथा के आखिर में आता है. जैसे उनके दिन बहुरे, सबके बहुरें. लकड़हारा राजा बन जाता है, व्यापारी स्वर्ग लोक चला जाता है…पीके ने बिहार में नीतीश की जीत में भूमिका निभाई. मगर वहां पर नीतीश की अपनी गुड गवर्नेंस की पॉलिटिकल करंसी थी. टटकी हुई. लालू और नीतीश का जातिगत समीकरण था. और अहं की मारी गुटों में बंटी बीजेपी थी. कांग्रेस ने भी जब छीका फूटा तो भरपूर मलाई पाई. पर उसका योगदान बस इतना था कि उन्होंने नीतीश के साथ खड़े होकर लालू को गठबंधन के लिए विवश कर दिया.

पर उसके बाद क्या. बिहार अब बीत चुका है. नीतीश कुमार पीएम बनने के लिए तैयारियों में जुट गए हैं. और जैसा कि अरुण जेटली ने चंद रोज पहले कहा था, कांग्रेस जहां सत्ता में है भी, वहां सिर्फ अति जूनियर पार्टनर के रूप में है. उसी में खुश हो ले.

ये कौन लोग हैं जो राहुल गांधी का राजनीतिक रोडमैप तय कर रहे हैं. वे उन्हें बताते क्यों नहीं. कि पब्लिक बांहें चढ़ाए युवराज से उकता चुकी है. उसे सॉलिड खाका चाहिए. बीजेपी बांटती है. लेफ्ट गुंडई करता है. जयललिता खास लोगों से घिरी हुई हैं. असम में हमने चहुंओर विकास किया है. ये बहुत ही घिसे हुए नारे लगे. आप बताइए. आप मेरे प्यारे भारतवासियों. आप जो राजनीति ओढ़ते बिछाते हैं. क्या इन विधानसभा चुनावों के दौरान आपको राहुल गांधी का कोई धारदार भाषण सुनाई दिया. जिसमें वह भविष्य की बात कर रहे हों. जिसमें वह बीजेपी का रोना रोने के बजाय अपने राजनीतिक कार्यक्रम की सुष्पष्ट व्याख्या कर रहे हों. जिसमें वह अपनी राज्य सरकारों की सफलताओं को सफलतापूर्वक बता रहे हों. मुझे तो ऐसा नहीं दिखा.

इसलिए तमाम गांधीवादियों के लिए समय आ गया है, कि वह राहुल गांधी को शुक्रिया का पोस्टकार्ड लिखना शुरू कर दें. क्योंकि बीजेपी ने जो बात अपनी सियासत के लिए मुफीद मान कही थी, उसमें खुद कांग्रेस का ये नेता अपना योगदान दे रहा है. कांग्रेस के क्षेत्रीय छत्रप कलप रहे हैं. आलाकमान मन की कर रहा है. सब लोग संसद की कार्यवाही रोककर मगन हैं. लेकिन राज्य, जहां से कांग्रेस अपने बुरे से बुरे काल में भी वापसी की ताकत पाती रही, वहां जमीन तेजी से सरक रही है.

कुछ दिनों बाद कांग्रेस के सामने एक और बड़ी राजनीतिक चुनौती आनी है. पंजाब चुनावों की, उत्तर प्रदेश चुनावों की. पंजाब में कांग्रेस के पास कैप्टन अमरिंदर सिंह हैं. जो पिछले पांच साल में साढ़े चार साल पार्टी आलाकमान से रूठे रहे. यहां भी राहुल गांधी कभी सुनील जाखड़ तो कभी प्रताप सिंह बाजवा को आगे करते रहे. आखिर में मम्मी ने हस्तक्षेप किया. पहले अमरिंदर ने अपना कद अमृतरसर में अरुण जेटली को हरा कर दिखाया. और अब संगठन में बतौर अध्यक्ष वापसी की. मगर यहां भी राहुल गांधी कट मार रहे हैं. प्रशांत किशोर को तैनात कर दिया है. आलम ये है कि अमरिंदर सिंह को बाकायदा कैप्स लॉक में मीडिया में बयान जारी करना पड़ता है. कि कैंडिडेट प्रशांत नहीं मैं तय करूंगा. रणनीति प्रशांत नहीं मैं बनाऊंगा. ये सिर्फ बयान भर नहीं हैं. ये कांग्रेस की पूरी राम कहानी है. और इसी रवैये के चलते पंजाब में अकाली दल-बीजेपी के बुरे शासन के बावजूद लोग कांग्रेस नहीं आम आदमी पार्टी की तरफ आस भरी नजर से देख रहे हैं. ये सिर्फ हम नहीं कह रहे. पोल भी कह रहे हैं. पब्लिक भी कह रही है.

कांग्रेस का कुछ ऐसा है कि जहां किसी को पता ही नहीं कि हो क्या रहा है. करना क्या है. बस इस पर सब मसट्ट मारे एकमत हैं कि जो होना है गांधी जी के इर्द गिर्द होना है. सोनिया जी, राहुल जी और जब इनसे भी काम न चले तो प्रियंका जी. मगर प्रियंका जी आएंगी तो दामाद जी भी आएंगे. उनके डोले, उनकी लैंड डील भी आएंगी. और मुश्किलें बेसरम के पेड़ सी फिर हरियाएंगी.

आस बड़ी बलवान. तो कांग्रेसी कहेंगे कि हार के बाद जीत है. पहले भी कांग्रेस बुरी तरह हारी है, मगर फिर वापसी की है. वे भूल जाते हैं. जब पहले ऐसा हुआ था तब कांग्रेस की धुरी इंदिरा गांधी और राजीव गांधी थे. जो प्रधानमंत्री का पद कम से कम पांच साल संभाल चुके थे. तब कांग्रेस केंद्र में भले ही सत्ता से बेदखल हुई थी, मगर कई राज्यों में उसकी सरकार थी. और उसी संजीवना के बूते वह फिर से मूर्छा तोड़ जागी थी. और अब. कांग्रेस के पास लोकसभा में 44 सांसद हैं. राज्यसभा में एक बरस में ढलान पर पहिये रपटने लगेंगे. और ठीकठाक नंबर और संसाधन के पैमाने पर बस कर्नाटक बचा है. वहां भी सिद्धारमैया आलाकमान के लोगों से जूझ रहे हैं. क्योंकि वह खुद जनता दल से कांग्रेस में आए हैं. तो उन्हें कई लोग आउटसाइडर मानते हैं. उधर मुकाबले में रही बीजेपी नए सिरे से अपने को संगठित कर रही है. उसने करप्शन के मुद्दे को किनारे कर दिया है. और येदियुरप्पा को वापस पार्टी की कमान सौंप दी है.

पर भाइयों बहनों. कांग्रेस बड़ी पार्टी है. बहुत बड़ी. इत्ती बड़ी कि इसे समझ ही नहीं आ रहा कि कहां से जाला हटाना साफ करे. और बड़े से याद आया. सबसे बड़ा सूबा. उत्तर प्रदेश. यहां भी कांग्रेस को राहुल जी चला रहे हैं. उनके प्रशांत किशोर चला रहे हैं. ब्लॉक से लेकर जिला और प्रदेश तक, सब नेताओं और दावेदारों की मीटिंग ले रहे हैं. उनमें सफेद कुर्ता कलफ लगा पहन बैठ रहे हैं. और झुनझुना दे रहे हैं. कि ऐसा करो तो सीधे राहुल गांधी से मिलाऊंगा. कह रहे हैं कि अरे भइया राहुल गांधी के नाम पर तो वोट मिलेगा न.

गजब सेंस ऑफ ह्यूमर है भाई. राहुल गांधी के नाम पर वोट मिलना होता तो 2014 क्या बुरा था. 2015 क्या बुरा था. 2016 क्या बुरा था.

पर आदमी को बुरी चीजें नहीं देखनी चाहिए. अच्छे को एकटक निहारना चाहिए. अच्छी बात है. कि नेहरू का पड़नाती. इंदिरा का पोता, राजीव का बेटा, अपने दत्तक पितृ पुरुष मोहनदास करमचंद गांधी के सपने को पूरा कर रहा है. हिंदू धर्म शास्त्रों में लिखा है कि अनजाने में भी कोई हरि नाम ले ले तो तर जाता है. तो अनजाने में ही सही गांधी का सपना पूरा होता दिख रहा है.

क्या ये देश के लिए अच्छा है. नहीं. किसी भी राजनीतिक विचार या दल का खत्म होना अच्छा नहीं है. मगर इसके लिए देश का क्या करे. करे तो दल करे. अपने विचारों को निथारे. आकलन करे. और एक ही परिवार की चाकरी बंद करे. क्योंकि खानदान तो अशोक और अकबर के भी नहीं बचे. बाकियों की तो बिसात ही क्या.

कही सुनी कुछ बुरी लगी हो तो माफ न करना. गुस्सा जाना. मगर जब ताजिए ठंडे हो जाएं तो विचार करना. कि कांग्रेस कांख क्यों रही है.

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