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राजीव गांधी का वो दस्तखत जिसने जलते असम को शांत कर दिया था

31 जुलाई, 2018 को भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह राज्यसभा में NRC यानी नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजंस पर बोलने के लिए खड़े हुए. अमित शाह ने एक ऐसी बात कही कि NRC के ड्राफ्ट का विरोध कर रही कांग्रेस फंसती नज़र आई. अमित शाह ने कहा- NRC कोई हमारी योजना नहीं है. पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने 1985 में असम समझौते पर दस्तखत किए और ये उसी समझौते के आगे की कार्रवाई है. आप लोग इसे करने कि हिम्मत नहीं दिखा सके पर हमने कर दिखाया.

भाजपा NRC के बचाव में इंदिरा गांधी के एक बयान को कोट करने लगी. 1971 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने कहा था-

”द रेफ्यूजीज़ ऑफ ऑल रिलीजंस मस्ट गो बैक. वी आर नॉट गोइंग टू एब्सॉर्ब दैम इन अवर पॉपुलेशन”

मतलब सभी धर्मों के शरणार्थी को वापस जाना ही होगा. हम इन लोगों को अपनी जनसंख्या में शामिल नहीं करने वाले.

लेकिन ये शरणार्थी थे कौन और असम में आए कहां से? और ये असम समझौता क्या है जिसने NRC बनवाया? और अब ऐसी नौबत क्यों आई है कि 40 लाख लोगों की नागरिकता खतरे में आ गई है. सब समझते हैं विस्तार से-

पहले क्लास असम की हिस्ट्री की

असम का ज़िक्र महाभारत काल में भी मिलता है. तब इसका नाम ‘प्रागज्योतिषपुर’ था जो कामरूप की राजधानी थी. सन 1228 में बर्मा के एक राजा चाउ लुंग सिउ का फा, जो कि चीनी मूल का था, ने इस पर अपना अधिकार कर लिया. वह ‘अहोम’ वंश का था. इसी वजह से राज्य का नाम असम हो गया. असमिया भाषा में असम को असोम बोला जाता है जो अहोम का अपभ्रंश मतलब घिस-घिसकर बना शब्द है.

असम पर तब तक अहोम वंश का ही राज चलता रहा जब तक अंग्रेजों की नज़र इस पर नहीं पड़ी थी. 1826 में अंग्रेजों ने असम जीत लिया और यंही से वो बीज डला जो अब NRC की वजह बना है. 1874 में संयुक्त असम, जिसमें आज के नागालैंड, मेघालय, मिजोरम और अरुणाचल भी शामिल थे, पर अंग्रेज़ चीफ कमिश्नर का राज शुरू हो गया.

असम में कैसे आए बाहरी लोग

असम के एक तरफ पूर्वी बंगाल (फिलहाल बांग्लादेश) था और दूसरी तरफ था पश्चिम बंगाल (1905 में हुए बंटवारे तक बंगाल एक ही था). और असम से थोड़ी दूर चलने पर था बिहार. अंग्रेजों ने असम के पहाड़ों की ढलान पर चाय के बागान लगाना शुरू कर दिया. इन बागानों में काम करने के लिए मजदूरों की जरूरत थी. ये मजदूर आए बंगाल (पूर्वी प्लस पश्चिमी दोनों) और बिहार से. इनमें हिंदू भी थे और मुसलमान भी. उस समय तक सांप्रदायिक विभाजन ज्यादा नहीं था क्योंकि धर्म के आधार पर देश का बंटवारा तब तक नहीं हुआ था. चाय के बागानों की मजदूरी करने के लिए आने वाले मजदूरों की संख्या बढ़ती रही. ये मजदूर असम में ही बसने लगे.

1947 में अंग्रेज भारत छोड़कर चले गए. लेकिन उन्होंने सिर्फ भारत पीछे नहीं छोड़ा था एक और देश था जो दो हिस्सों में बंटा था पाकिस्तान. इसका एक हिस्सा भारत के पश्चिम में था जो आज पाकिस्तान के नाम से जाना जाता है और जो पूर्व में था वो अब बांग्लादेश के नाम से जाना जाता है.

अब आजादी के बाद की कहानी

ये समझने के लिए पहले आज की तारीख का असम का यह नक्शा देखिए.

आज की तारीख का असम जो पूर्वोत्तर का सबसे बड़ा राज्य है. (क्रेडिट- मैप ऑफ इंडिया)
आज की तारीख का असम जो पूर्वोत्तर का सबसे बड़ा राज्य है. (क्रेडिट- मैप ऑफ इंडिया)

असम के बस तीन जिले आज के बांग्लादेश की सीमा से लगते हैं लेकिन फिर भी असम में बांग्लादेशियों की एक बड़ी संख्या रहती है. इसके लिए 1947 के बाद की परिस्थितियों पर वापस चलते हैं. बंटवारे के दौरान और फिर उसके बाद लगातार लोग ईस्ट पाकिस्तान से आकर असम में बसते गए. आज़ादी के बाद पहले और दूसरे दशक में असम की आबादी 36 और 35 फीसदी बढ़ी. बाकी हिंदुस्तान के औसत से 10-12 फीसदी ज़्यादा. इससे असम के मूल निवासियों के मन में अपनी ज़मीन पर ही अल्पसंख्यक बनने का डर पैदा हो गया.

1972 तक सिक्किम और त्रिपुरा के अलावा नॉर्थ-ईस्ट के सभी राज्य असम का हिस्सा थे. ऐसे में असम की पूरी सीमा तब के पूर्वी पाकिस्तान से लगती थी जो 1971 में बांग्लादेश बना. भारत और पाकिस्तान के बनने के कुछ समय बाद ही पूर्वी पाकिस्तान ने आज़ादी का राग अलापना शुरू कर दिया. इसके चलते वहां पर हिंसा होने लगी. हिंसा और दूसरी परेशानियों के चलते वहां के लोगों ने भारत का रुख किया. भारत में भी मुख्य रूप से संयुक्त असम, त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल में ये आकर बसने लगे. लेकिन संयुक्त असम के और हिस्सों, (जो बाद में अलग राज्य बन गए) में ये ज़्यादा दिन टिक न सके.

इसके दो प्रमुख कारण थे. पहला – इन इलाकों की भौगोलिक स्थितियां बहुत विषम थीं. वहां जीवनयापन के तरीके काफी मेहनत मांगते हैं. और दूसरा- ये इलाके जनजातीय क्षेत्र हैं. ये जनजातियां अपने इलाके में किसी भी तरह की घुसपैठ को लेकर संवेदनशील रहती हैं. ऐसे में ज़्यादातर बांग्लादेशियों ने बंगाल, त्रिपुरा और असम में बसना पसंद किया.

बांग्लादेश में भी अच्छी खासी संख्या में हिंदू थे जो भारत में आ गए.
बांग्लादेश में भी अच्छी खासी संख्या में हिंदू थे जो भारत में आ गए.

1970 से पूर्वी पाकिस्तान में आज़ादी का आंदोलन तेज़ हुआ. पाकिस्तानी फौज ने तब बड़ा कत्लेआम मचाया वहां. जान बचाकर 1 करोड़ से ज़्यादा बांग्लादेशी भारत आ गए. भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद बांग्लादेश अलग देश बना. लेकिन लड़ाई खत्म होने के बाद सारे बांग्लादेशी लौटे नहीं. 10 लाख से ज़्यादा बांग्लादेशी भारत में ही रुक गए. सिर्फ इतना ही नहीं हुआ, धीरे-धीरे बांग्लादेशियों ने दोबारा असम, बंगाल और त्रिपुरा का रुख करना शुरू किया. इनमें वो हिंदू परिवार भी थे, जो बांग्लादेश में धार्मिक कट्टरता बढ़ने से असुरक्षित महसूस करने लगे थे.

धीरे-धीरे बांग्लादेश से लगे असम के कई इलाकों में बांग्लादेशियों की संख्या इतनी हो गई कि वो वहां के मूल निवासियों पर हावी होने लगे. 1972 में असम का विभाजन कर 4 नए राज्य बने. इसने असमिया जनता को नाराज़ किया. फिर असम में मूल निवासियों और घुसपैठियों में छिटपुट हिंसा भी होने लगी जिससे असमिया जनता के गुस्से का बम फटने की उलटी गिनती करने लगा.

और फिर असम ने धीरज खो दिया

इमरजेंसी के बाद 1977 में देश में आम चुनाव हुए. असम की एक सीट मंगलडोई से भारतीय लोकदल के हीरालाल पटोवारी चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंचे. लेकिन 1978 में उनका निधन हो गया. सीट खाली हुई तो फिर से चुनाव की घोषणा हुई. लेकिन चुनाव आयोग ने बताया कि इस सीट पर एक साल में करीब 70,000 वोटर्स बढ़ गए हैं. जांच करने पर पता लगा कि इनमें अधिकतर बांग्लादेशी थे. तभी सरकार ने ऐलान कर दिया कि इन लोगों को भी वोट डालने का अधिकार होगा.

इस बात ने असम की जनता का धीरज तोड़ दिया. राज्य में बाहरियों-विदेशियों के खिलाफ हिंसक आंदोलन शुरू हो गया. दो संगठन – आसू मतलब ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन और ऑल असम गण संग्राम परिषद ने इस आंदोलन को लीड किया. आसू पहले एक स्टूडेंट यूनियन थी जो अंग्रेजों के टाइम ‘अहोम छात्र सम्मिलन’ था. 1940 में इसमें दो धड़े हो गए. एक का नाम ऑल असम स्टूडेंट फेडरेशन और दूसरे का नाम ऑल असम स्टूडेंट कांग्रेस रखा गया. 1967 में दोनों धड़े एक हो गए और नया नाम ऑल असम स्टूडेंट यूनियन रखा.

ऑल असम गण संग्राम परिषद असम के दूसरे कई संगठनों जिसमें असम साहित्य सभा, असम कर्मचारी परिषद, असम जातिवादी युवा छात्र परिषद, असम युवक समाज, असम केंद्रीय कर्मचारी संगठन और कुछ छोटी पार्टियां जैसे असोम जातियाबादी दल और पूर्वांचल लोक परिषद से मिलकर बनी थी. इन दोनों की खास बात यह थी कि दोनों का ही नेतृत्व युवा कर रहे थे. आसू के लीडर प्रफुल्ल कुमार महंता थे तो गण परिषद का नेतृत्व बिरज कुमार शर्मा कर रहे थे. दोनों ने मांग की कि 1961 के बाद असम में आए बांग्लादेशी लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हटाए जाएं और इनको यहां से बाहर खदेड़ा जाए. इनका आंदोलन असम आंदोलन कहलाया.

असम आंदोलन की पूरी कवायद असमिया पहचान को लेकर थी. इसीलिए उनके निशाने पर वो सब थे जो असमिया नहीं थे. असम के संदर्भ में ये थे बंगाली. क्योंकि बंगाल से आने वाले लोग भी बंगाली थे और बांग्लादेशी भी. तो मामला असमिया पहचान बनाम बांग्ला पहचान का होने लगा. असम आंदोलन का ज़ोर हमेशा इस बात पर रहा कि वो मुसलमानों के खिलाफ नहीं हैं. वो हर उस विदेशी के खिलाफ हैं जो बांग्लादेश से आया था. इनमें बांग्लादेशी हिंदू भी थे. उनके अलावा बिहार और यूपी से गए लोगों को भी असम आंदोलन बाहरी ही मानता था. लेकिन ये भारतीय थे, तो उनके खिलाफ गुस्सा कुछ कम था.

पीके महंत उस समय के केंद्रीय गृह सचिव के साथ. असम मूवमेंट के सबसे बड़े नायक महंत ही थे.
पीके महंता उस समय के केंद्रीय गृह सचिव के साथ. असम मूवमेंट के सबसे बड़े नायक महंता ही थे.

और असम पटरी से उतरने लगा

1979 से असम आंदोलन तेज़ हो गया. सरकार चाहकर भी मंगलडोई सीट पर चुनाव नहीं करवा सकी. राज्य में जनता पार्टी की मिलीजुली सरकार थी. वो इस आंदोलन पर अंकुश नहीं लगा सकी. सीएम गोलप बरबोरा अपनी गद्दी नहीं बचा पाए और उनकी ही पार्टी के जोगेंद्रनाथ हज़ारिका ने सितंबर, 1979 में कांग्रेस के साथ मिलकर नई सरकार बना ली. लेकिन ये नई सरकार भी ज्यादा टिक न सकी और दिसंबर, 1979 में ही गिर गई. साल भर तक राष्ट्रपति शासन लगा रहा. इंदिरा की सरकार आने के बाद जनता दल के बहुत से विधायक कांग्रेस में आ गए और कांग्रेस की अनवरा तैमूर असम की मुख्यमंत्री बनीं. ये रिकॉर्ड था क्योंकि वो देश की पहली मुस्लिम महिला मुख्यमंत्री बनीं. लेकिन यह सरकार भी ज्यादा नहीं चल सकी. जून, 1981 में फिर से राष्ट्रपति शासन लगा. जनवरी, 1982 में दो महीने के लिए केसब चंद्र गोगोई सीएम रहे और फिर से प्रेसीडेंट रूल आ गया. इसके बाद नए सिरे से चुनाव हुए.

अनवरा तैमूर से हितेश्वर सैकिया तक कोई भी असम के हालात नहीं सुधार सका.
अनवरा तैमूर से हितेश्वर सैकिया तक कोई भी असम के हालात नहीं सुधार सका.

ये राजनीतिक उथल-पुथल आपको इसलिए बताई कि आप असम में अशांति का हाल समझ सकें. एक स्थायी सरकार न होने से राज्य में अशांति बढ़ती ही रही. असम आंदोलन में खूब हिंसा हुई जिनमें सैंकड़ों लोग मारे गए.

1983 में राज्य में नए सिरे से चुनावों की घोषणा हुई. असम आंदोलन चला रहे सभी दलों ने इस चुनाव के बहिष्कार का ऐलान किया. वो चाहते थे कि सरकार पहले घुसपैठियों के नाम वोटर लिस्ट से निकाले. लेकिन सरकार नहीं मानी. तो चुनाव के दौरान जमकर हिंसा हुई. असम में इस तरह की राय बन गई थी कि बांग्लादेशियों ने चुनाव बहिष्कार के ऐलान के बावजूद जमकर वोटिंग की है. नतीजे में हुआ एक बड़ा नरसंहार. 18 फरवरी, 1983 को असम के नेली में 14 गांवों को घेरकर करीब 2,000 मुसलमानों की हत्या कर दी गई. इसके पीछे असम आंदोलन के लोगों का नाम आया. असम में और भी जगह हिंसा हुई.

ऐसे माहौल में राज्य की 126 में से 109 सीटों पर ही वोट पड़ सके. वोटिंग का कुल आंकड़ा रहा 32 फीसदी. लेकिन कांग्रेस ने 91 सीटों के दम पर सरकार बना ली. हितेश्वर सैकिया सूबे के नए सीएम बन गए. लेकिन उनका रास्ते में पर्याप्त मुश्किलें थीं. अब तक इस पूरे मामले में हिंदू-मुस्लिम एंगल नहीं तलाशा गया था. असम आंदोलन के दौर में एक इल्ज़ाम ये भी लगा कि कांग्रेस जानबूझ कर बांग्लादेशियों को असम में बसने दे रही है क्योंकि इससे उसका वोटबैंक बढ़ रहा था.

नेली नरसंहार के बाद ये ज़रूरत महसूस हुई कि बाहरी माने जाने वाले लोगों के हितों की भी पूरी रक्षा हो. किसी को भी बाहरी बताकर राज्य से बेदखल न किया जाए. यही ध्यान में रखकर इंदिरा गांधी की सरकार ने 1983 में एक और कानून बनाया जो फसाद का कारण बना.

नेली नरसंहार को उस वक्त तक भारत का सबसे बड़ा नरसंघार माना गया था.
नेली नरसंहार को उस वक्त तक भारत का सबसे बड़ा नरसंहार माना गया था.

ये कानून था इल्लीगल माइग्रेंट्स (डिटरमिनेशन बाय ट्राइब्यूनल) एक्ट (IMDT). ये एक्ट था तो विदेशियों को असम से बाहर भेजने के लिए, लेकिन इसके ज़्यादातर प्रावधान असम के मूल निवासियों को नागवार थे. जैसे-

#. जब किसी विदेशी के खिलाफ शिकायत की जाएगी तो शिकायतकर्ता को ही प्रूव करना होगा कि आरोपी विदेशी है. अगर वो साबित भी कर देता है तो सरकार आरोपी को अपनी नागरिकता साबित करने का मौका देगी. इसके लिए उसे बस अपना राशन कार्ड देना होगा जिससे उसकी नागरिकता बनी रहेगी.

#. साथ ही शिकायतकर्ता और आरोपी के घर तीन किलोमीटर के दायरे में होने चाहिए. नहीं तो शिकायत मान्य ही नहीं होगी.

इसने किसी भी विदेशी को असम से बाहर भेजना बहुत मुश्किल कर दिया. इस ऐक्ट के बाद असम में जो उथल-पुथल मची वो इंदिरा के रहते शांत नहीं हुई. उनके जाने के बाद राजीव आए और उन्हें असम में अशांति विरासत में मिली. राजीव गांधी की सरकार ने असम आंदोलनकारियों से कई दौर की बातचीत की और सरकार से एक लिखित समझौते के लिए मना लिया. इस वक्त तक आंदोलन को छह साल हो चुके थे और 855 लोग मारे गए थे (नेली दंगे के अलावा).

14 अगस्त, 1985 को असम समझौते का ड्राफ्ट फाइनल हुआ. आसू के प्रेसीडेंट पीके महंता, महासचिव बीके फुकान और ऑल असम संग्राम गण परिषद ने भारत सरकार के साथ समझौते पर दस्तखत किए. 15 अगस्त, 1985 को लाल किले से राजीव गांधी ने इसका आधिकारिक ऐलान किया.

असम अकॉर्ड क्या है?

#. ऐसे विदेशी लोग जो पहले असम से बाहर निकाल दिए गए लेकिन फिर से वापस आ गए. उन्हें बाहर निकाला जाएगा.

#. जो लोग 1 जनवरी, 1966 से 24 मार्च 1971 की मध्यरात्रि तक असम में आए, इन लोगों को विदेशी माना जाएगा. इन लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हटाए जाएंगे. ऐसे लोगों को रजिस्ट्रेशन ऑफ फोरेनर रूल,1939 के तहत खुद को विदेशी नागरिक की तरह जिला पंजीकरण ऑफिस में रजिस्टर कराना होगा. इस पूरी प्रक्रिया में भारत सरकार असम सरकार की मदद करेगी. वोटर लिस्ट से हटाए गए इन नामों को दस साल बाद वापस वोटर लिस्ट में जोड़ दिया जाएगा.

#. विदेशी नागरिकों की पहचान और उन्हें देश से बाहर निकालने की कार्रवाई के लिए बेस ईयर 1 जनवरी 1966 लिया जाएगा. इसका मतलब यह था कि 1 जनवरी 1966 से पहले असम में आए विदेशी नागरिक, जिनके नाम 1967 में हुए आम चुनाव की वोटर लिस्ट में था वो भारत के नागरिक माने जाएंगे.

#. 25 मार्च, 1971 के बाद जो भी विदेशी असम में आए हैं उनकी पहचान कर असम से बाहर निकाला जाएगा. अवैध प्रवासियों को बाहर निकालने की समस्याओं को दूर करने में भारत सरकार राज्य सरकार को मदद करेगी.

#. असम राज्य की सांस्कृतिक, सामाजिक और भाषाई पहचान को बचाए रखने के लिए भारत सरकार संवैधानिक और प्रशासनिक मदद देगी.

#. भारत सरकार असम के विकास के लिए स्पेशल पैकेज देगी. इससे शिक्षा, विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में असम को विकास करने में मदद मिलेगी.

#. भारत सरकार ही सिटीजनशिप सर्टिफिकेट बांट सकेंगी.

फिर क्या हुआ?

असम अकॉर्ड के अलावा असम आंदोलन के लोगों की एक और मांग थी. वो ये कि असम के मुख्यमंत्री इस्तीफा दें और नए सिरे से चुनाव हों क्योंकि असम के लोगों ने तो चुनाव में हिस्सा ही नहीं लिया था. सरकार ने मुख्यमंत्री के इस्तीफे की बात भी मान ली और सीएम हितेश्वर सैकिया ने इस्तीफा दे दिया. नए सिरे से हुए चुनाव में कांग्रेस के सामने एक नई पार्टी खड़ी थी. 13-14 अक्टूबर, 1985 को गोलघाट में आसू और असम गण संग्राम परिषद ने मिलकर एक पॉलिटिकल पार्टी लॉन्च की जिसका नाम था असम गण परिषद. चुनाव हुए तो 126 में से 92 निर्दलीय और कांग्रेस के 25 उम्मीदवार चुनाव जीते. ये निर्दलीय असम गण परिषद के समर्थन से जीते थे. असम के नए मुख्यमंत्री बने आसू के प्रेसीडेंट रहे प्रफुल्ल कुमार महंता. ये फिर से एक रिकॉर्ड था क्योंकि महंता देश के सबसे युवा सीएम बने. तब वो महज 32 साल के थे.

इस चुनाव में कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो गया और पीके महंता नए सीएम बने.
इस चुनाव में कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो गया और पीके महंता नए सीएम बने.

लेकिन सरकार ने जो वादा किया वो निभाया नहीं. क्योंकि बांग्लादेशी लोगों को वापस भेजने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया. कांग्रेस की सरकार भी वापस आकर चली गई. पी.के.महंता फिर से 5 साल सीएम रह गए लेकिन समस्या चलती रही. पी.के.महंता पर अपने राजनीतिक विरोधियों की हत्या करवाने और अवैध संबंधों की खबरें चलने लगीं. इस वजह से उनका राजनीतिक पतन भी शुरू हो गया. ऐसे में असम गण परिषद के एक नए नेता उभरने लगे. नाम था सर्बानंद सोनोवाल.

तब असम गण परिषद के सर्बानंद आज भाजपा की तरफ से असम के सीएम बन चुके हैं.
तब असम गण परिषद के सर्बानंद आज भाजपा की तरफ से असम के सीएम बन चुके हैं.

सर्बानंद ने असम में विदेशियों के मामले को पूरे जोर-शोर से उठाना शुरू किया. वो इस मामले को सुप्रीम कोर्ट में लेकर गए. IMDT एक्ट को चुनौती दी. सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने 2005 में दिए अपने फैसले में इस एक्ट को असंवैधानिक बताते हुए निरस्त कर दिया. इसके बाद फिर से यह मामला तूल पकड़ता गया. असम में विदेशियों के मामले पर फिर से सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई शुरू हुई. सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि 1951 में शुरू हुआ काम पूरा हो – माने एक रजिस्टर बने जिसमें असम में रहने वाले भारतीय नागरिकों की पहचान दर्ज हो. जिसका नाम न हो, वो विदेशी माना जाए. यही NRC है. 2015 से NRC का काम सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में चल रहा है. इसके दो ड्राफ्ट आ गए हैं जिसमें करीब 40 लाख लोगों के नाम नहीं हैं. अभी इस साल के लास्ट तक ही पता चल सकेगा कि इन लोगों का क्या होगा. फिलहाल इस पर राजनीति चल रही है जो आगे भी चलती रहेगी.

और सर्बानंद सोनोवाल, वो 2011 में असम गण परिषद को छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए. 2014 में असम के लखीमपुर से सांसद बने, 2016 में असम के सीएम. NRC से होने वाला सियासी फायदा उन्हें ही मिलने वाला है.


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