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उन मां-बाप के नाम, जिनकी बेटियां घरों से नहीं भागीं

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आप,

जी हां आप. 50-60 की उम्र में पहुंच चुके वो मां-बाप, जो कभी अपनी करीब आती रिटायरमेंट देखते हैं और कभी बड़ी होती बेटी. हर महीने पास बुक में एंट्री करवाते हुए सोचते हैं, क्या उसकी शादी के लिए इतने पैसे काफी रहेंगे. और बड़ी की शादी के बाद छोटी को कैसे निपटाएंगे. जाने कैसे होगा सब. तो ये चिट्ठी, ये बातें आपके लिए है.

आप कोई कसर नहीं छोड़ते. पेट काट-काट पैसे जुटाते हैं. अपनी इच्छाओं का गला घोंटते हैं. ऊपरी कमाई की कोशिश में लगे रहते हैं. घर का पिछला कमरा किराए पर उठा देते हैं. और ये सब कुछ करते हुए आप सोचते हैं कि ये आप उसी के लिए तो कर रहे हैं.

फिर यूं होता है कि आपकी बेटी को किसी से प्यार हो जाता है. आपको लगता है सब कुछ ख़त्म हो गया. बेटी को कोसते हैं. अपनी किस्मत को कोसते हैं. ब्लड प्रेशर का मरीज होने की वजह से अस्पताल में भर्ती होना पड़ता है. लेकिन प्यार में दीवानी हुई आपकी बेटी भाग जाती है. कुल में आपकी नाक कट जाती है. आपका मान गिर जाता है. लेकिन वो ‘खुदगर्ज़’ लड़की भाग जाती है.

पर कुछ लड़कियां होती हैं, जो नहीं भागतीं.

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निख़त ऐसी ही लड़की थी. वो खुदगर्ज़ नहीं थी. घर की इज्जत का खूब ख़याल था उसे. इतना, कि गर्ल्स हॉस्टल में, जहां 45 डिग्री की गर्मी में लड़कियां न के बराबर कपड़े पहनती हैं, वहां वो पूरी बाजू के कुरते और शलवार पहनकर रहती. न लैपटॉप चाहिए था, न इंटरनेट. न नए-नए टच स्क्रीन वाले फ़ोन. हमेशा मेस में खाती, जिसके पैसे फीस में शामिल थे. 500 में पूरा महीना चल जाता. तब मेरा जेब खर्च 3 हजार था. और इंटरनेट, फ़ोन रीचार्ज के पैसे अलग से आते थे. मेरे पिताजी कोई धन्ना सेठ नहीं थे. आमतौर पर हॉस्टल की लड़कियों को इतना ही जेबखर्च मिलता. वो कभी बाहर नहीं जातीं. और शौक के नाम पर बस एक ही चीज पसंद थी उसे. 10 रुपये वाले ड्रीम-क्रीम बिस्किट. वो साल में एक ही बार घर जाती. और एक ही बार शॉपिंग करती, घर जाने के पहले. जिसमें मैंने उसे अपने लिए कुछ भी लेते नहीं देखा.

मुझे नहीं मालूम कि दूसरी लड़कियों को देखकर उसका मन मचलता था या नहीं. उसके शौक थे ही नहीं, या वो उन्हें दबा ले जाती थी. बस इतना मालूम था कि उसकी दो और बहनें थीं. और अब्बा रिटायर हो चुके थे. मैं उसकी सीनियर थी. और उसका चेहरा इतना भोला था कि देखते ही ममता जागती थी. गोल चेहरा, बड़ी आंखें, बिल्कुल मछलियों जैसी. जैसी हम बचपन में ड्रॉइंग शीट पर बनाया करते. पहली बार उन आंखों में आंसू तब देखे, जब एक शाम अम्मा-अब्बा दोनों को फ़ोन नहीं लग रहा था. दोनों से आधे-आधे घंटे रोज़ बात होती थी उसकी. और दूसरी बार तब आंसू देखे, जब उसके लिए रिश्ता आया. तब वो 18 की थी.

थोड़ी बहस के बाद वो रिश्ता टल गया. वो खुश हो गई. अब्बा की तारीफ़ करती रही. रिश्तेदारों को रिश्ते भेजने के लिए कोसती रही.

मैं सीनियर थी, पहले पास आउट हो गई. हॉस्टल छोड़ दिया. और अगले एक साल जो हुआ, उसके बारे में मुझे मालूम नहीं पड़ा.

बाद में पता चला, वो प्यार में पड़ गई थी. मुझे विश्वास ही नहीं हुआ. दो महीने फ़ोन पर इश्क चला, ख़त्म हो गया. ये इस उम्र में आम बात होती है. पर उसके लिए आम नहीं थी. उसका दिल टूटा था. उसे संभलने में कई महीने लगे.

एक साल बाद पोस्टग्रेजुएशन में वो फिर से मेरी जूनियर हो चुकी थी. मालूम पड़ा कि उसकी ‘कॉन्जरवेटिव’ और ‘बोरिंग’ लाइफस्टाइल की वजह से उसके सभी दोस्त छूट गए थे. प्यार तो छूट ही गया था. उसने मुझसे कहा, ‘मैं दूसरी लड़कियों की तरह जीना चाहती हूं.’ पहले प्यार की मौत उसे बदल चुकी थी.

फिर धीरे-धीरे उसकी जुबान पर गालियां चढ़ीं. शरीर से कपड़े घटे. सलवारें जींस में, और जींस शॉर्ट्स में बदली. अपने ‘मोटे’ शरीर पर उसे कॉन्फिडेंस आने लगा. वो दोस्तों के साथ बाहर जाने लगी. और 6 महीने में एक बार खुद के लिए शॉपिंग कर लेती. मुझे मालूम पड़ा कि उसे मोमोज और ट्रैफिक जाम (दिल्ली की जूस की दुकानों में मिलने वाली एक ख़ास तरह की आइस-क्रीम) पसंद है. घूमना शुरू किया, तो घर पर एकाध-बार झूठ भी बोला.

एक दिन उसने मुझसे कहा, ‘मुझे लाल रंग की ब्रा खरीदनी है’. मैंने मजाक करते हुए पूछा, ‘हनीमून के मूड में हो. कोई सीन है क्या?’ उसने जवाब दिया, ‘न, मैं बस खुद को अच्छी दिखना चाहती हूं.’

उसका फ्रेंड सर्कल पहले से चार गुना बड़ा हो गया था. लोग चाहते थे वो हर पार्टी में आए. घर वाले उसके नए रूप से बेखबर थे.

उसके सीनियर्स के फेयरवेल के दिन उसके सीनियर ने उसके साथ एक तस्वीर फेसबुक पर लगाई. सीनियर लड़का था. और निख़त के कंधे पर हाथ रखे हुए था. किसी ‘भले’ रिश्तेदार ने उसकी वो तस्वीर उसके घर भेज दी. फिर उसकी अम्मी ने जाने उसे फ़ोन कर क्या कहा. लेकिन अगले 15 दिनों तक वो फेसबुक से गायब रही. वापस आई तो वो सीनियर उसकी फ्रेंड लिस्ट से गायब हो चुका था. उसे लगा, रिश्तेदारों ने मिर्ची लगाई है. लेकिन अगले साल तक निख़त के लिए रिश्ता हाजिर था. इस फरमान के साथ कि इसको ‘ना’ कहना कोई विकल्प नहीं है. लेकिन उसने रिश्ता ठुकराया. और बात दब गई.

दो महीने बाद लड़के वाले आकर उसकी अंगूठी और चप्पलों का नाप ले गए.

लड़का परदेस में रहता था. फेसबुक पर तस्वीर और बायो-डाटा के अलावा उसके बारे में कोई जानकारी नहीं थी. शादी तक दोनों को मिलने और बात करने की परमिशन नहीं थी.

निख़त की मां उसकी पढ़ाई पूरी होने तक उसके साथ दिल्ली आकर रहने लगीं. वो शादी के लिए मना करती, तो कहतीं, ‘तुम इतनी मोटी हो. इतना ख़राब जिस्म है. इस रिश्ते को ठुकराओगी तो तुमसे कौन शादी करेगा.’ मानो शादी जिस्म का सौदा हो.

उसकी मां कहतीं, ‘दिल्ली बुरा शहर है.’ निखत जवाब में मां को वापस जाने को कहती. तो मां कहती, ‘तुम तो यही चाहती हो कि मैं जाऊं और तुम अपने आवारा दोस्तों के साथ रंडीबाजी करो.’ ‘रंडीबाजी’. यही  शब्द कहे थे उन्होंने.

मां से हुई हर बहस के साथ वो टूटती जाती. कमज़ोर पड़ती जाती. खाना छूट गया. मोमोज और ट्रैफिक जाम भी. वो रो-रो कर आधी होती जाती. फिर एक दिन उसने फ़ोन कर कहा, मुझसे मिल लो. मेरी मां मुझे पागल कर देगी. उस मुलाकात में वो बुझी हुई थी. मुस्कुराना भूल गई थी. और अगली मुलाकात में पागलों की तरह हंस रही थी. मानो इतना टूट गई हो, कि खुद से उम्मीद ही छोड़ दी हो. बार-बार कहती, ‘मैंने शराब नहीं पी. सिगरेट नहीं पी. सेक्स नहीं किया. क्या मेरा मन नहीं किया? लेकिन मां-बाप का ख़याल करती रही. अब तो ये लगता है ये सब कर लिया होता. कम से कम ये अफ़सोस तो न रहता कि लाइफ में कुछ किया नहीं.’

मैंने उससे कहा, ‘भाग जाओ.’ उसने कहा, ‘मेरी मां कैंसर की मरीज है. मर जाएगी.’ मैंने कहा, ‘थोड़ा ड्रामा करो. सुसाइड की एक्टिंग.’ उसने कहा, ‘अब हिम्मत नहीं पड़ती. न अभिनय की. न असल में मरने की.’

वो रोज एक बार बाप से कहती, ‘अब्बा, रिश्ता तोड़ दो.’ अब्बा कहते, ‘जुबान दे दी है. शरीफ लोग जुबान नहीं तोड़ा करते.’

आप, आप लोग जो जुबान नहीं तोड़ते, कितनी आसानी से अपनी बेटियों का आत्मविश्वास तोड़ते हैं. उन्हें पढ़ाकर अच्छे मां-बाप होने का ढोंग करते हैं. उन्हें बचपन से सिखाते हैं कि वो घर की इज्जत हैं. उन्हें ससुराल जाकर घर का मान बढ़ाना है. क्योंकि बहू को देखकर ही तो दुनिया समझती है कि उसका मायका कैसा होगा. उसके मां-बाप किस तरह के लोग होंगे. आप उन्हें बचपन से सिखाते हैं कि समाज में किस तरह के कपड़े पहने. आप उसके दिमाग में ये भरते रहते हैं कि आपका हर फैसला आपकी बेटी की भलाई के लिए है. कि आपने उसे पढ़ा-लिखाकर काबिल बनाया है, उसके लिए.

पर नहीं, असल में आप ये अपने लिए कर रहे होते हैं. अपने मान के लिए. रिश्तेदारों और पड़ोसियों में अपने नाम के लिए. आप उसके लिए काबिल पति चाहते हैं, ऐसा आप उसे महसूस करवाते हैं. पर असल में आप समाज में उस लड़के से अपनी लड़की का नाम जोड़ अपनी इज्जत बढ़ाना चाहते हैं. प्यार और संस्कार के नाम पर आप अपनी सारी इच्छाएं उसके कंधों पर लाद देते हैं. जो आप अपना पेट काट-काट फिक्स्ड डिपॉजिट बनाते हैं न, वो आपकी बेटी के लिए नहीं, आपकी खुद की इज्जत और स्टेटस मेंटेन करने के लिए होता है.

माफ़ कीजिए, लेकिन अगर आप अपने बच्चों से प्यार करते, उनकी परवाह करते, तो उन्हें उनकी इच्छा के खिलाफ अनजान लोगों के बिस्तरों पर न छोड़ते. मान बढ़ाने के लिए उनका सौदा न करते. दहेज देख बेटों की बोली न लगाते. ‘शराफत’ के लिहाफ में अपनी खुदगर्जी न छिपाते.

निख़त का फ़ोन जब्त कर लिया था उसके बाप ने. ईद के बाद उसकी सगाई थी. मुझे नहीं मालूम वो कहां है. कैसी है. बस उसकी वो आवाज याद है, जो पिछली बार फोन पर सुनी थी. फफक-फफक कर रोई थी. मां ने दवाइयां खानी बंद कर दी थी, अस्पताल में भर्ती हो गई. निख़त ने मां की बिगड़ती सेहत का दोष खुद को दिया. मां-बाप के उस एहसान तले दब गई, जो उन्होंने उसे पढ़ा-लिखाकर किया. और उसने तय किया वो घर छोड़ नहीं भागेगी.

मैंने कहा, पुलिस केस करूंगी. उसने कहा, ये शादी मेरी मर्ज़ी से हो रही है.

इस ईद पर उसकी कुर्बानी हुई होगी.

खुदगर्ज़ भागी हुई बेटियां हैं, या आप, ये आप तय करें. लेकिन ये जरूर जान लें, आप बुरे मां-बाप ही नहीं, बुरे इंसान भी हैं.

-आपकी बेटी जैसी,
‘शादी की उम्र’ की ओर बढ़ती एक बेटी


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