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खुला खत: 'हर तरह का फैन एक दिन गुंडा बन जाता है'

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nikhil sachanये खुला खत निखिल सचान ने लिखा है. अपने, आपके और हम सबके नाम. निखिल सचान आईआईटी बीएचयू, IIM से पढ़े हुए हैं. मस्त  लिखते हैं. इससे पहले ‘दी लल्लनटॉप’ पर आप निखिल की कहानी ‘मुगालतें’ पढ़ चुके हैं. अभी जो देश में चल रिया है. निखिल अपने इस खत में उसी पर बात करते हैं. इंट्रो देने के चक्कर में हम ज्यादा फुटेज नहीं खाएंगे. बस आपको पढ़ाए देते हैं निखिल का लिखा खुला खत.


 

सरहदों पर बहुत तनाव है क्या
कुछ पता करो चुनाव है क्या
खौफ़ बिखरा है दोनों सम्तों में
तीसरी सम्त का दबाव है क्या- राहत इंदौरी

मैं ये खुला खत किसी एक चुनावी पार्टी या फिर किसी व्यक्ति विशेष से जवाबदेही मांगने के लिए नहीं लिख रहा हूं. क्योंकि आज की तारीख़ में उससे अधिक फ़ालतू की बहस संभव ही नहीं है. मुझे मालूम है कि आजकल जब मेरे और आपके फेवरिट नेता या पार्टी पर उंगली उठती है तो हम सब लोग बिलबिला जाते हैं और अपने-अपने तर्क-कुतर्क के पैने हथियार निकालकर पिल पड़ते है. तर्क में हार जाएं तो ऐसे तिलमिला जाते हैं जैसे किसी कॉकरोच को पलट कर औंधा गिरा दिया हो और वो पेट के बल सीधा होने के लिए छटपटा रहा हो.

पहले पॉलिटिक्स में हमें घंटा इंट्रेस्ट नहीं था. अख़बार भी हम पीछे के पेज से पढ़ना शुरू करते थे. जहां खेल की तस्वीरें होती थीं और रंग बिरंगा रंगायन होता था. माधुरी दीक्षित, दिव्या भारती और श्रीदेवी की तस्वीर होती थी. लेकिन सनम आज की बात कुछ और है.

आज आप देश में बढ़ते कम्यूनलिज़्म पर सवाल उठा लीजिए, तो सुब्रमण्यम स्वामी जैसे लोगों को लंबे अरसे से फॉलो करने वाले लोग मोटे ताज़े स्टैटिस्टिक्स के साथ आपको सिक्युलर साबित करने के पीछे पड़ जाएंगे. आप किसी के परम मोदी भक्त होने पर सवाल उठा लीजिए, लोग दो मिनट में आपको आपटार्ड साबित कर देंगे. आप क्रॉनिक कैपिटलिज़्म पर वाज़िब चिंता जताइए, आवाज़ आएगी कि गुरु तुम मार्क्सवादी हो. अपना झोला दाढ़ी लेकर वापस जाओ. आप इनटॉलरेंस पर चिंता जताइए, लोग वाया फेसबुक कांग्रेस राज में हुए दंगों की लिस्ट लेके घूरते मिलेंगे. पूछेंगे, अबे तुम किसी अरब देश क्यूं नहीं चले जाते. अकल आ जाएगी.

इसलिए मैं किसी नेता या चुनावी पार्टी का बात नहीं करूंगा. मेरे दोस्त! मैं, मेरी और तुम्हारी बात करना चाहता हूं. तुम्हारे बगल में खड़ा होकर आईने में झांकना चाहता हूं.

मेरे और तुम्हारे पड़ोसी और उनके दोस्तों की बात करना चाहता हूं. उनकी, जिन्हें पहले राजनीति से कोई मतलब-सरोकार नहीं था. और जो आज इसके नाम पर लड़ने-भिड़ने को तैयार हैं. उनकी बात करना चाहता हूं जो एक पढ़े-लिखे तबके से ताल्लुक़ रखते हैं लेकिन अब सिर्फ ‘भक्त’ रह गए हैं . बराबर पाला चुनते हैं. उनकी बात भी जो कुछ साल पहले वोट भी देने नहीं जाते थे क्योंकि वोटिंग के दिन की छुट्टी में गर्ल फ्रेंड का घुमाना या दो-चार बियर लगाना सुक़ून देता था. उनकी बात जो आज अचानक से देश के नाम पर इतना कंसर्न रखने लगे हैं कि अब हर छोटी बड़ी न्यूज़ पर जां-निसार होने से लेकर विरोधी पार्टी को देश से उखाड़ फेंकने का झंडा बुलंद कर लेते हैं.

मैं उन सबकी, आपकी और मेरी बात इसलिए करना चाहता हूं, क्योंकि मुझे चुनावी पार्टियों से कहीं अधिक आपसे मतलब है . चुनावी पार्टी का तो काम ही होता है आपको गुमराह करना, उकसाना और अपने दिखाए रस्ते परेड करवाना. वो हमेशा से यही करते आए हैं और आगे भी यही करेंगे. लेकिन मुझे फासीवादी नेता या फासीवादी पार्टी से उतना डर नहीं लगता जितना कि विवेक और लॉजिक खोकर भक्त होती जा रही भीड़ से लगता है. यक़ीन मानिए ! हिटलर जैसे लोग ख़ुद कुछ नहीं होते. उन्हें ताक़तवर हम बनाते हैं, अपने फैनबॉइज़्म से .

आपको कन्हैया कुमार (अगर वो ख़तरनाक है भी) से उतना खतरा नहीं है, जितना कि उनसे है जो पिछले कुछ हफ़्तों से उसकी फ़ेसबुक वॉल पर मां-बहन-भौजाई की गालियां तौल रहे हैं. उसे मारने पीटने और टट्टी-पेशाब कराने, औक़ात दिखाने की बात कर रहे हैं. आपको देश को इनटॉलेरेंट बोलकर अवॉर्ड लौटाने वालों से उतना खतरा नहीं है जितना कि उनके चेहरे पर कालिख पोतने, स्याही-कीचड फेंकने वालों से है. आपको आमिर खान से उतना ख़तरा नहीं है जितना कि उसे पाकिस्तान भेजने वालों से. और उससे जुड़े हर ब्रांड का भट्टा बैठाने की कोशिश करने वालों से है.

आपको और आपके देश को एक अदनी सी यूनिवर्सिटी के लेफ्टिस्ट लड़कों से उतना खतरा नहीं है, जितना यूनिवर्सिटी में कॉन्डम के पैकेट गिनने वालों से है. आपको राष्ट्रगान पे खड़ा न होने वालों से उतना खतरा नहीं है, जितना कि खड़े न होने वालों को मार पीट कर भगा देने वालो से है. आपको सड़क पर चूमने वालों से उतना खतरा नहीं जितना कि उन्हें बालों से घसीट कर ‘हर-हर-महादेव’ का नारा लगाने वालों से है. सिर्फ रिटोरिक, ड्रामा और वीर रस से भरे भाषण देकर गुमराह करने वालों से आपको उतना ख़तरा नहीं है जितना कि उनके भाषण पर ‘गागा’ हो रहे यूथ से है.

आपको और मुझे बेवज़ह बेइंतहा मूर्ख फैन होने की संभावना से सबसे अधिक ख़तरा है. फैनाटिक होने से खतरा है. ऐसा फैन मत बनिए. इस तरह का फैन एक दिन गुंडा बन जाता है और उसे पता भी नहीं चलता. फैन भावुक होता है. तर्क नहीं करता. अपने आइडल की हरेक बात को सच मान लेता है.

ऑफेंड होने को अपना नेशनल स्पोर्ट बना लेता है. भक्त ख़ाली काला और सफ़ेद तय करते हैं और उन्हें बाकी के वो सारे रंग दिखना बंद हो जाते हैं जो बहुत खूबसूरत हैं. हरे, नीले, पीले, बैंगनी, नारंगी जैसे रंग. भक्त और फैन खाली पाले चुनते हैं. उनके लिए दुनिया बस दो हिस्सों में बटी होती है. एक वो जो उनके भगवान की तरफ है और एक वो जो उसके दूसरी तरफ है.

मुझे ख़ुद को और आपको पोलराइज़ होते देख तकलीफ होती है. समझ नहीं आता कि हम उस तस्वीर का हिस्सा क्यूं हो रहे हैं जो डॉक्टर्ड है. बेवज़ह बनाई गई है, पॉलिटिकल पार्टियों के द्वारा. मीडिया के द्वारा. झूठ मूठ की आइडियोलॉजी के द्वारा. अगर इस दुनिया की असल तस्वीर वो है, जो टीवी के प्राइम-टाइम और अख़बार की हेडलाइन में दिखती है, तो वो क्या था जो रात में नानी के घर की छत से, मच्छरदानी के जाल के उस पार, तारे-तरैयों में टिमटिमाता दिखता था ?

ये जो ट्विटर पर हैशटैग की खूंटियों में क्राइस्ट की तरह क्रूसीफाइड है. जो फेसबुक की दीवार पर कॉमेंट और शेयर के बीच उधड़ रही है. अगर वही इस दुनिया की असल सूरत है, तो सनम वो खूबसूरत सा जहां क्या था, जो झांक कर देखने से तुम्हारी हरी चूड़ी के उस पार दिखता था? ये कौन सी जगह हैं जहां बंटी, पिंकी, सोनू, अंकित टीटू या मोनू जैसे, तरह-तरह के रंगबिरंगे लोग नहीं हैं. जहां या तो राष्ट्रवादी हैं या राष्ट्रद्रोही. जहां या तो कैपटलिस्ट हैं या तो मार्क्सवादी. जहां या तो भक्त हैं या फिर टार्ड. जहां या तो लेफ्ट हैं या तो राइट. जहां या तो सेक्युलर हैं या तो सिक्यूलर?

ये कौन लोग हैं? क्या ये लोग छुट्टियों में नानी के घर नहीं जाते? क्या इन लोगों की माशूक़ा नहीं होतीं? क्या इन लोग के गोल-मटोल बुद्धू से दोस्त नहीं होते जो ये लोग इतनी नफरत मन में सालों-साल पाल ले जाते हैं?

आप ऐसे देश का हिस्सा मत बनिए जो कल तक नेशनलिज़्म की अफ़ीम फांक कर उसके नशे में दिन-रात आंय-बांय-सांय बक रहा था कि हम सबकुछ बर्दाश्त कर सकते हैं लेकिन एक टेररिस्ट का साथ देने वाले को नहीं छोड़ेंगे. और अब संजय दत्त के जेल से छूटने पर ‘चिकन संजू बाबा’ खाके उसे सेलिब्रेट कर रहा है .

जो कल रो रहा था कि उसके टैक्स का पैसा जेएनयू में झर-झर जल के बर्बाद हो रहा है और अब दिन-दिन भर ये इन्क्वारी करेगा कि संजू बाबा माथा कहां टेकेंगे. नरगिस की कब्र पहले जाएंगे या फिर सिद्धिविनायक. बच्चों को गले लगाएंगे या फिर बीवी को?

आप उस देश का हिस्सा मत बनिए. जिधर अगर कश्मीर, पाकिस्तान, झंडा, सैनिक और राष्ट्रगान जैसे सिंबल न होते तो हमें अपनी देशभक्ति मनाने के लिए बस इस बात का वेट करना पड़ता कि ग़दर और बॉर्डर का सीक्वेल कब आएगा. सनी देओल हैंड पंप कब उखाड़ेगा. और छब्बीस जनवरी की परेड के दिन डीपी कैसे चेंज होगी .

‘राष्ट्र’ या ‘देश’ का सही अर्थ समझिए. जैसे बाबा टैगोर कहते हैं. जिन्होंने अपना राष्ट्रगान लिखा था:

‘भारत ने कभी भी राष्ट्रीयता का सही अर्थ समझा ही नहीं. बचपन से ये सिखाए जाने के बावज़ूद कि देश की पूजा भगवान और इंसानियत की पूजा से भी बेहतर है. मुझे लगता है कि मैं इस सीख से ऊपर उठ चुका हूं. और ये मेरा मानना है कि मेरे देशवासी भी अपने भारत को उस सीख से लड़कर पाएंगे. जो ये सिखाती है कि एक देश इंसानियत के आदर्शों से बड़ा होता है. नेशनलिज्म एक बहुत बड़ा ख़तरा है. ये वो एक ख़ास चीज़ है जो तमाम सालों से भारत की समस्याओं की मूल वजह रही है.’


 

आखिर में पाश की ये कविता पढ़िए:

यदि देश की सुरक्षा यही होती है
कि बिना जमीर होना ज़िंदगी के लिए शर्त बन जाए
आंख की पुतली में हां के सिवाय कोई भी शब्द
अश्लील हो
और मन बदकार पलों के सामने दण्डवत झुका रहे
तो हमें देश की सुरक्षा से ख़तरा है.

हम तो देश को समझे थे घर-जैसी पवित्र चीज़
जिसमें उमस नहीं होती
आदमी बरसते मेंह की गूंज की तरह गलियों में बहता है
गेहूं की बालियों की तरह खेतों में झूमता है
और आसमान की विशालता को अर्थ देता है

हम तो देश को समझे थे आलिंगन-जैसे एक एहसास का नाम
हम तो देश को समझते थे काम-जैसा कोई नशा
हम तो देश को समझते थे कुरबानी-सी वफ़ा
लेकिन गर देश
आत्मा की बेगार का कोई कारख़ाना है
गर देश उल्लू बनने की प्रयोगशाला है
तो हमें उससे ख़तरा है

गर देश का अमन ऐसा होता है
कि कर्ज़ के पहाड़ों से फिसलते पत्थरों की तरह
टूटता रहे अस्तित्व हमारा
और तनख़्वाहों के मुंह पर थूकती रहे
क़ीमतों की बेशर्म हंसी
कि अपने रक्त में नहाना ही तीर्थ का पुण्य हो
तो हमें अमन से ख़तरा है

ग़र देश की सुरक्षा को कुचल कर अमन को रंग चढ़ेगा
कि वीरता बस सरहदों पर मर कर परवान चढ़ेगी
कला का फूल बस राजा की खिड़की में ही खिलेगा
अक़्ल, हुक्म के कुएं पर रहट की तरह ही धरती सींचेगी
तो हमें देश की सुरक्षा से ख़तरा है.

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