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जो आंख ही से न टपका तो JNU क्या है!

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एक बार की बात है. जेएनयू के हॉस्टल में एक चोर पकड़ा गया. कायदे से तो लड़कों को चोर को ढंग से पेल देना चाहिए था. लेकिन ये जेएनयू था. तो चार अलग-अलग पार्टियों के लड़के ये बहस करने लगे कि चोर के साथ क्या किया जाए. इन सज्जनों में एक राइट, एक लेफ्ट, एक अल्ट्रा लेफ्ट के और एक फ्री थिंकर थे.

बहस शुरू हुई और फिर थम गई क्योंकि सबको चाय की तलब लगी थी. आगे-पीछे लौंडे, बीच में चोर. सब निकल पड़े. चोर को भी चाय दी गई. सवाल उठा कि पुलिस बुलाई जाए या नहीं. किसी ने कहा कि समाज को पुलिस को जरूरत क्यों पड़ती है. पुलिस का चरित्र क्या है? क्या पुलिस चोर को उसके आर्थिक सामाजिक हालत ध्यान में रखकर दंड देगी? क्या वहां चोर के मानवाधिकारों के संरक्षण की पर्याप्त व्यवस्था है?

फिर चर्चा यहां पहुंची कि आखिर कोई चोर बनता क्यों है. राइट वाले ने कहा कि यह पूर्व जन्मों के पाप और इस जन्म के कुसंस्कारों का फल है. फ्री थिंकर बोला चोर एक जरूरी किस्म की अराजकता है जो अपने बनैले और बिगड़ैलेपन से सृष्टि में सौंदर्य लाता है. अल्ट्रा लेफ्ट ने कहा कि ये चोर नहीं, ये बुर्जुआ का सताया सर्वहारा है, जो हजार साल की नींद से जागा है और अब संसाधनों पर कब्जा करने आ गया है. राइट वाला फिर लपक कर बोला कि ये कांग्रेस की ‘गरीबी हटाओ’ नीतियों की नाकामी का जीता-जागता प्रमाण है.

तो कैसे तय हो कि चोर क्या है? चोर से पूछा गया कि तुम कौन हो. वो बोला कि मैं तो चोर हूं. उससे कहा गया कि तुमको अपनी सामाजिक राजनीतिक अवस्था का ज्ञान नहीं है. लेकिन फिक्र न करो, नियति तुम्हें ज्ञान के केंद्र जेएनयू ले आई है.

तो ये तय हुआ ये कि यूनिवर्सिटी की जीबीएम (जनरल बॉडी मीटिंग) बुलाई जाए. गंगा ढाबा के बगल में केसी मार्केट के बाहर जेबीएम शुरू हुई. चोर को बैठाया गया. वक्ताओं को तीन-तीन मिनट का समय दिया गया.

इस बीच चोर को खिलाया-पिलाया गया. शौच आदि के लिए हॉस्टल ले जाया गया. जीबीएम जारी रही. एक साथी बोले कि मुझे यहां से हड़प्पा के अपने वे भाई नजर आ रहे हैं, जिनको आर्यों ने अपने हथियारों के दम पर खदेड़ दिया था. दूसरा बोला मुझे महान हिंदू संस्कृति के अवशेष नजर आ रहे हैं जिन्हें मुस्लिम और अंग्रेज आक्रांताओं ने पैदा किया है. किसी ने कहा कि चोर गांव का है, इसलिए यह भारत माता ग्रामवासिनी का अपमान है. किसी ने आशंका जाहिर की कि कहीं ये रूस का एजेंट तो नहीं.

चोर का धीरज जवाब दे गया. गिड़गिड़ाने लगा कि भैया हमको पुलिस में दे दो. एक बाबा खैनी रगड़ते हुए बोले, अहा कैसा सुंदर दृश्य है. हमने इस चोर के भीतर का अंधकार उसी प्रकार दूर करा दिया, जिस प्रकार प्राचीन भारत में तोते शिशुओं का संस्कृत उच्चारण शुद्ध कराते थे.

फिर आखिरकार भारी शोर शराबे, तालियों और डफलियों के बीच एक रेजोल्यूशन पास हुआ कि रोटी की चोरी चोरी नहीं होती. चोर को खिला-पिलाकर छोड़ दिया गया.

तो ये जेएनयू है जनाब. आधी हकीकत, आधा फसाना. थोड़ा सा बौद्धिक, थोड़ा सा चाट. लेकिन हर बात को तर्क की कसौटी पर कसने वाला. यहां हंसी पर भी विमर्श है और विमर्श की भी खिल्ली उड़ाई जाती है.

राम राज्य में पता नहीं शेर और भेड़ एक घाट पर पानी पीते थे या नहीं. लेकिन जेएनयू के हॉस्टलों में संघी और कॉमरेड एक टेबल पर बैठकर खाते हैं, हंसी-मजाक करते हैं, भिड़ते हैं और फिर अपनी पतलूनों में हाथ पोंछकर कमरे पर चले जाते हैं, अगले दिन की तैयारी के लिए. ये जेएनयू किसी का लोड नहीं लेता. पर आज कल जेएनयू की मुस्कान कुछ फीकी हो रखी है, क्योंकि देश ने लोड ले रखा है.

इस लोड से वे सब दुखी हैं जो जेएनयू को जानते हैं. मैं सौरभ हूं. जेएनयू का स्टूडेंट रहा. हमेशा ही रहूंगा. जेएनयू वो गोदना है, जो मरकर ही मिटता है.

इससे पहले कि कुकुरमुत्तों से उग आए कुछ कथित देशभक्त मुझे गद्दार कहें. उनकी जानकारी के लिए मैं आरएसएस के स्कूल का भी स्टूडेंट रहा. इन दोनों ने मिलकर मुझे बनाया. तो संकर हूं मैं. शुद्धता के लिए आसक्त दौर में एक मिलावटी इंसान. इस देश के दर्शन और संस्कार की तरह कई धाराओं का मेल.

अपने घर में सुबह सोकर उठता हूं तो बिस्तर के दाईं तरफ ऋग्वेद की ऋचा पेंटिंग की शक्ल में टंगी है:

आओ शुभ सुंदर
प्रभात लेकर स्वर्गीय छटा

RigvED

बाईं तरफ बाबा नागार्जुन की कविता है:

ये विशाल भूखंड आज जो दमक रहा है.
मेरी भी आभा है इसमें.

Nagarjuna

मगर मेरा भूखंड आज कारोंच में लिसड़ रहा है. इसकी तख्ती कुछ कम पढ़ने में आ रही है. पटियाला हाउस कोर्ट जैसा कुछ लिखा बता रहे हैं लोग. काले कोट पहनी हुई भीड़ का गुस्सा बरस रहा है. एक आदमी पर. जिसके लिए पुलिस कह रही है कि अब ये ठीक हो गया है. अब ये देशभक्त हो गया है. इसने लिखकर दे दिया है. हमने ट्वीट कर दिया है. अब इसकी जमानत का विरोध नहीं होगा.

या कि ये जेएनयू है. जहां नारे लगते थे. कई कुप्रथाओं के खिलाफ. जला दो मिटा दो के. अब देश उन्हीं को जलाने पर आमादा है. जेएनयू को ध्वस्त करने की बात कर रहा है. इसे नई बाबरी बता रहा है.

मगर इससे ज्यादा बर्बर सरलीकरण कुछ नहीं हो सकता.

ये जो भूखंड है. जो सावरकर की परिभाषा के हिसाब से मेरी पुण्यभूमि और पितृभूमि है, क्योंकि मैं जन्म से हिंदू हूं. मगर मेरे लिए मातृभूमि है. क्योंकि इसने मुझे पाला पोसा है. इस टाइम और स्पेस में एक पहचान दी है. जिसे लेकर न तो मेरे अंदर कोई शर्म है, न ही ‘अतिरिक्त’ गर्व. कृतज्ञता भरपूर है. कारण. कोई बच्चा अपनी कोख नहीं चुनता. मगर उसकी जो मां होती है. उससे चाहे जितने भी विरोध हों. झगड़े हों. वह मां रहती है. आप मां को नहीं बदल सकते. न ही उसकी सेवा का कर्ज उतार सकते हैं. और हमारे यहां तो बचपन से ही देवी मां की आरती सुनते गुनते आ रहे हैं.

अंबे तू है जगदंबे काली.
जय दुर्गे खप्पर वाली
तेरे ही गुण गाएं
भारती
ओ मैया
हम सब उतारें तेरी आरती.

अब आरती नहीं गाता. कोई गा रहा होता है तो उसकी खिल्ली भी नहीं उड़ाता. पर इस आरती की एक पंक्ति आंखों में आंसू लाती है. मां बेटे का है इस जग में बड़ा ही निर्मल नाता. पूत कपूत सुने हैं पर न माता सुनी कुमाता.

कपूत से याद आता. एक साहेबान हैं. उमर खालिद नाम के. फरार हैं. उन पर भी आएंगे. मगर पहले आपको अपनी दूसरी मां से मिला दूं.

इस मां ने मुझे कोख में नहीं, कैंपस में पाला है. पहले इसका नाम कानपुर का पंडित दीनदयाल उपाध्याय विद्यालय था. संघियों का मॉडल स्कूल. यहां मुझे देश की सभ्यता, संस्कृति से परिचित होने का मौका मिला. दक्षिणपंथ की दीक्षा मिली. फिर कैंपस का पालना मिला जेएनयू में. यहां मुझे वामपंथ के नजारे दिखे. दोनों ही पंथ एक बाड़े हैं. जाहे कितने ही बड़े या छोटे क्यों न हों. और कितने ही ताजी हरी घास से भरपूर भी क्यों न. इसलिए तोड़कर बाहर आ गया. छुट्टे सांड़ की तरह.

इसलिए परवाह नहीं करनी पड़ती कि किसका खेत चरना है. आखिर में तो अपना जमीर साथ लेकर ही मरना है.

मरने से पहले कुछ बातें सीखीं, समझीं. मसलन, आदमी और औरत बराबर हैं. मनसा वाचा कर्मणा. जाति और धर्म के भेद नहीं मानने. कोई वैचारिक रूप से कितना भी विरोधी हो, उसके साथ संवाद बनाए रखना है. बातों को बातों से तौलना है, घूंसों और लातों से नहीं. किसी को देशभक्ति या गद्दारी का सर्टिफिकेट नहीं बांटना. अपना काम ईमानदारी से करना है. दूसरों को उपदेश नहीं देने हैं. 

तो मैं बात कर रहा था उमर खालिद की. जेएनयू के ताप्ती हॉस्टल में रहते हैं. हिस्ट्री में पीएचडी कर रहे हैं. छोटा नागपुर के आदिवासियों पर. साथ में एक माओवादी छात्र संगठन डीएसयू के मेंबर रहे हैं. ये डीएसयू उसी वक्त बना था, जब हम जेएनयू में पढ़ते थे. अति क्रांतिकारी लोग. भयानक रेडिकल स्टैंड लेते. भारतीय स्टेट को चुनौती देते. कोर्ट की खिल्ली उड़ाते. नक्सलवादियों का खुलकर समर्थन करते. झोला लटकाए, नाखून बढ़ाए पोस्टर चिपकाते रहते. अफजल, बस्तर पर बात करते.

ये सब मुमकिन था. क्योंकि जेएनयू की आत्मा में उजास था. अब भी है. एक खुलापन है. यहां किसी को किसी के विचार से खतरा नहीं लगता. शराफत के साथ सबको अपनी बात कहने का मौका दिया जाता है. विचारों की रस्साकशी होती है.

मगर 9 जनवरी को साबरमती ढाबे पर जो हुआ. वह रस्साकसी नहीं थी. उकसावे की कार्रवाई थी. वैसी है, जैसी साध्वी प्राची, ओवैसी जैसे लोग करते हैं. भड़काऊ बातें. कानून के बेंत खाने वाली बातें. आप अफजल गुरु की फांसी पर बहस करें. सुप्रीम कोर्ट के फैसले की आलोचना करें. मगर नीयत बात करने की हो. अपमान करने की नहीं.

डेमोक्रेसी के नाम पर आप मेरे मुल्क के टुकड़े करने की कसमें खाएंगे, आजादी के खोल में हमारे संविधान की खिल्ली उड़ाएंगे. तो उसी संविधान के इस्ट्रूमेंट आपको अंग्रेजी का आठ बना देंगे.

और आपको क्या लगता है. मुंह पर कपड़े बांधकर नारा लगाने से आजादी मिलेगी. इतने बाघ बहादुर थे खालिद साहब आपके साथी तो चेहरे पर रूमाल क्यों बांध रखे थे? फेशियल तो खराब होने का डर नहीं था न. और एक नारा और था. अफजल हम शर्मिंदा हैं. तुम्हारे कातिल जिंदा हैं. कमाल है यार. अभी कह रहे हो कि अफजल को न्यायिक सिस्टम ने मारा. और तुम बदले में और भी बर्बर असभ्य ढंग से उसकी मौत का बदला लेना चाहते हो. कंगारू कोर्ट बिठाओगे क्या? और कातिलों का नाम कैसे तय करोगे. कैसे मारोगे उन्हें. और जब ये सब करोगे. तब वो क्या कैंडी क्रश के प्वाइंट जुटाने में बिजी होंगे.

टीवी कैमरों के सामने आप लोकतंत्र की दुहाई दे रहे थे. मगर जब नारे लग रहे थे, तब खीसें निपोर रहे थे. जैसे जैसे बवाल बढ़ रहा था. तुम्हारा चमनपना भी बढ़ रहा था.

और हां. जुझारू कॉमरेड. अब भागे भागे काहे घूम रहे हो. पुलिस का सामना करो. भगत सिंह की तरह कोर्ट रूम को इंकलाब की मशाल जलाने का एक जरिया बना दो. बहस करो. राष्ट्रवाद को नए सिरे से पारिभाषित करो. पर वो तुमसे नहीं हो पाएगा. क्योंकि उसके लिए जबानी जमाखर्च नहीं जिगरा चाहिए.

तुमको कोई अंदाजा है. तुम्हारी इस हरकत से मेरे देश के करोड़ों मुसलमान भाइयों-बहनों पर क्या गुजरेगी. उन्हें जबरन नए सिरे से देशभक्ति का लिट्मस टेस्ट देना होगा. जैसे कि ‘मोदीफाइड’ भारत में उनकी दिक्कतें वैसे ही कम हैं.

और वैसे भी, नए सिरे से देश को प्यार करने वाले बहुसंख्यकों को तुम्हारी जरूरत नहीं अपना दमखम दिखाने के लिए. भीड़ है. रोम है. दादरी में हिंदू हैं. मालदा में मुसलमान हैं. सब संख्या से तय होगा. भाजी खाजा सब तुलेगा.

अब मेरे कॉमरेड साथियों को याद करते हैं. मगर उसके पहले अपना स्टैंड क्लियर करते हैं. कॉमरेड कन्हैया कुमार की गिरफ्तारी जल्दबाजी में और सत्ता के अहंकार में की गई. अगर पुख्ता सबूत होते, तो आज बस्सी ये न कहते. जमानत का विरोध न करेंगे. और पटियाला हाउस कोर्ट में जो हो रहा है दो दिनों से. उसके शिकार आप भी हुए. और हम भी. मार पीट. मेक इन इंडिया. क्यों. क्योंकि पब्लिक गुस्से में है. तालिबान हो गई है. पीटेगी. दुत्कारेगी. नजीबुल्ला की तरह पिलर पर टांग देगी. फैसला ऑन द स्पॉट. समय सलमान हुआ जाता है. ग्लैडिएटर का ये डायलॉग याद आता है.

“That is power, the mob is Rome. And while Commodus controls them he controls everything.”

तो इन हरकतों की तो हर पढ़ा लिखा और बंधुआ न हुआ आदमी प्रतिकार कर रहा है. करेगा. तब भी, जब बहुसंख्यक एक नजले में सीटी बजाए जा रहा है. तब भी जब कुछ भी कहना चिप्पी पाने की तरफ बढ़ाया गया एक कदम है. उस वक्त भी, जब एक कोर्ट रोजाना टीवी चैनलों में बैठती है. जहां चीख चीखकर अपनी ही आवाज को सुनने का अजब स्खलित सुख मिलता है नवयुग स्वनियुक्त न्यायाधीशों को.

पर कॉमरेड. एक बात तो बताना. कन्हैया की गिरफ्तारी से पहले तक. शोर कहां गुम था. या कि सिर्फ एबीवीपी, संघ, मोदी की डिजाइन नजर आ रही थी इसमें भी. कि परिषद के लोग ही मुंह पर मुसीका बांध नारे लगा गए. आपमें से कई की वॉल पर उस खबर का लिंक दिखा. जहां कुछ लोगों ने दक्षिण भारत में इसलिए पाकिस्तान का झंडा फहराया ताकि सांप्रदायिक तनाव हो सके. कई ने बाद के दिनों में एक बेसिर पैर का वीडियो शेयर किया. जिसमें ये साबित करने की फूहड़ कोशिश की गई कि पाकिस्तान जिंदाबाद का नारा उमर खालिद के साथी नहीं बल्कि संघी गुंडे लगा रहे थे.

बीजेपी के लिबरल प्रो जीडीपी धड़े का बुरा हाल है. वो मोदी के गवर्नेंस एजेंडा को डिफेंड करना चाहते हैं. मगर तभी योगी आदित्यनाथ, कैलाश विजयवर्गीय या संगीत सोम कुछ सुर बिखेर देते हैं. मास्टर जी पतलून काटे तो कहां से काटें. फिर साध्वी प्राची भी हैं. जिन्हें न संघ अपना बताता है, न वीएचपी. फिर भी मीडिया में हमेशा उन्हें ऐसे पेश किया जाता है, जैसे बोलने का रुक्का सीधे महामहिम मोदी से हासिल कर आई हैं.

पर कॉमरेड. आपको भी अपने पाले की साध्वी प्राचियों, ओवैसियों को अलगाना होगा. वे सब धान बाइस पसेरी तुलवा रहे हैं. आप में से कई मेरे दोस्त हैं. आपकी व्यक्तिगत ईमानदारी और उसूलों का मैं फैन हूं. इज्जत तो खैर करता ही हूं. पर ये कौन है जो बारिश में आपकी छतरी ओढ़कर खड़ा है और उसी बारिश में पेट्रोल मूत रहा है. मुल्क में जेएनयू जो बदनाम किया जा रहा है. उसमें 10 पइसा आपकी नींद का भी योगदान है.

प्रगतिशीलों की भी जिम्मेदारी है कि वे अपने भीतर उन लोगों को पहचानें जो बोलने की आजादी के लिए उनकी छतरी के नीचे आते हैं, लेकिन उसी आजादी के इस्तेमाल से कट्टरपंथी मजहबी नारे बुलंद करते हैं. उन्हें आश्रय देना, उनका बचाव करना भी छोड़ना होगा.

अल्पसंख्यकों के हित की बात करना अशिक्षा, बेरोजगारी और उनके साथ होने वाले भेदभाव की बात करना है. मुख्यधारा में उनकी स्वीकार्यता की बात करना है. ‘अल्लाह हू अकबर’ कोई प्रगतिशील नारा नहीं है, कॉमरेड.

जेएनयू आज जैसा है. उसमें सबसे बड़ा योगदान लेफ्ट कल्चर का है. सबके लिए खुले दरवाजे. कोई रैगिंग नहीं. सिर्फ करियर बनाने की चिंता नहीं. बदले में समाज को देने की सनक भी. मशाल जुलूस. क्रांतिकारी कविताएं. लड़कियों के लिए सुरक्षित या कहें कि बराबरी वाला जिंदा कैंपस. जमकर बहस. गरीब से गरीब छात्र के लिए दाखिला. जाति और लिंग को लेकर सेंसिटिविटी. डिबेट डिस्कोर्स. सस्ती शिक्षा. सुविधाएं. क्या लिखूं.

गालिब याद आ रहे हैं.

रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं काइल
जब आंख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है

जेएनयू भी लहू की तरह हमारी आंखों से टपकता है. आज तलक संघर्ष के दिनों की याद दिलाता है. मगर एक जेएनयू और भी है. जहां कई डिपार्टमेंट्स में सिर्फ वामपंथ वाली पर्ची कटाना ही बड़ी काबिलियत माना जाता है. जहां कई स्टूडेंट्स को एमफिल इंटरव्यू में या उसके आगे पीछे इसलिए सफर करना पड़ता है कि वे लाल सलाम नहीं जय श्री राम कहते हैं. जहां हर विरोधी विचारधारा वाले को शक की नजर से देखा जाता है. उस पर भी बात करनी होगी. मगर आज नहीं. शांति काल में. आज तो जेएनयू को बचाने की जंग जारी है.

वयं पंचादि शतकम्. युधिष्ठिर ने कहा था, जब कौरवों की पत्नियों को यक्ष उठा ले गए थे. यानी हमारा आपस का झगड़ा जो हो, बाहर वालों के लिए हम 105 हैं. जो लोग शट डाउन जेएनयू को हैश टैग बना रहे हैं, उनके खिलाफ हमें साथ खड़ा होना होगा. इसलिए तुम लड़ो साथी और हम भी लड़ें. अलग अलग झंडों के तले. लाल, हरा, भगवा. सीना अड़ाकर. ऐड़ी जमाकर. उदास मौसमों के खिलाफ. हमारे बीच घुस आए किसी भी पंथ के बदमाशों के खिलाफ. फरेबियों के खिलाफ. सत्ता तंत्र की क्रूर ताकत के खिलाफ. असहिष्णुता के खिलाफ. खौफ के खिलाफ. गरीबी के खिलाफ. जाति और धर्म के भेदभाव के खिलाफ. पिछड़ेपन के खिलाफ. धार्मिक कट्टरता के खिलाफ. किसी के भी खिलाफ हुए जुल्म के खिलाफ. और हां. इस लिस्ट में कश्मीरी पंडित भी शामिल हों. मालदा में भीड़ की हिंसा का शिकार हुए लोग भी शामिल हों. ये सनद रहे. चुनी हुई चुप्पियों का अंधेरा एक ईमानदार कोशिश को पलीता लगा देता है.

वैसे भी मेरा पेशा पत्रकार है. और हम जेएनयू वाले तो हवा पानी मिट्टी से आलोचक हैं. तो हमें हमेशा राजतंत्र से दूरी बनाकर रखनी होगी. ताकि हम उसके मोहपाश में न फंसे. जैसा कि चाणक्य कहा करता था. ज्ञान को सत्ता से दूर ही रहना चाहिए.

और अब बात नरेंद्र मोदी सरकार की. बड़ी उम्मीद थी. है. देश के बहुमत को. आपसे. अकसर तस्वीर देखता हूं. आप कुछ बच्चों के प्यार से कान खींच रहे होते हैं. पीएम सर. कुछ बच्चे कतई नालायक हैं. सरेआम मारपीट करते हैं. गुंडई करते हैं. भारत माता की जय और मां-बहन की गालियां एक स्वर में बोलते हैं. गोली मारने की बात करते हैं. उनके कान क्यों नहीं खींचते आप? फिर चाहे वह किसी भी कौम या दल के क्यों न हों. भेद मत करिए. एक्शन लीजिए. मुल्क आपके साथ है. मगर ध्यान रहे. भेद न होने पाए. ताकि भारत मां का कोई बेटा फिर यूं ही शहीद न हो जाए.

और सर जी. छोटे मुंह बड़ी बात. पर जेएनयू का हूं. तो फैल तो जाऊंगा ही. आपके सलाहकर गड़बड़ कर रहे हैं. और आप उनका फैलाया समेट नहीं पा रहे हैं.

स्मृति ईरानी बीजेपी की काबिल नेता हो सकती हैं. अच्छी प्रवक्ता भी. कैबिनेट चुनना आपका काम है. पर एचआरडी मिनिस्ट्री उनसे संभल नहीं रहा है. आपके एक सपोर्टर ने लल्लन को एक अच्छी बात बताई. अपन रिपीट मार रहे हैं.

नरेंद्र मोदी को मुल्क जीतने के बाद एक जंग और लड़नी थी. दिल्ली दरबार सजाने के बाद भी. उस इंटेलिजेंसिया के खिलाफ, जो उन्हें खतरनाक करार देता रहा है. जो उनका पीएम बनना हजम नहीं कर पाएगा. जो हर मुमकिन मौके पर विरोध करेगा. छाती पीटेगा. ये किताबों की बात करेगा. संविधान के भारी भरकम शब्दों के छाते तले खड़ा होगा. और इन्हें पछाड़ने के लिए किसी टक्कर वाले आदमी को ही ताल ठोंक उतरना होगा. और ऐसा आदमी एक ही हो सकता है. लेफ्ट का शाश्वत आलोचक. मगर उन्हीं की शैली में नपा तुला लिखा पढ़ा जवाब देने वाला. अरुण शौरी. सोचिए शौरी एचआरडी मिनिस्टर होते, तो टेंशन कितनी कम होती. एक आदमी जो खुद अच्छा मास्टर रहा हो, मास्टरों और स्टूडेंट्स की दुनिया को बेहतर समझ और हैंडल कर सकता है. या कि खेमे की जबान में कहें तो ढंग से नाथ देता. मगर उसके लिए लात न चलती. बात का ही खेल होता.

पर हुआ क्या. शौरी जी कॉलम लिख रहे हैं. किलस रहे हैं. महात्मा बने रहने को विवश हैं. और मिस्टर मोदी. आपकी पार्टी को पहला डैमेज इन्हीं शौरी जी की टिप्पणी से हुआ था. जो उन्होंने करण थापर को दिए इंटरव्यू में की थी. दिस गवर्नमेंट इज यूपीए प्लस काऊ.

काऊ मां भी कमाल हैं. नाम सब ले रहे हैं. सुध कोई नहीं. मुलुक सा हाल हो गया है. आपके मंत्रिपरिषद में एक महिला हैं. हमारी सुपर सीनियर. निर्मला सीतारमण. उनसे ही सलाह ले ली जाती. तो क्या जाता. बताइए जरा. वो बता देतीं. कि जेएनयू वाले सबसे ज्यादा जिस चीज से भड़कते हैं. वह है पुलिस की पहरेदारी. और जेएनयू में विरोधी विचारों को हराने के लिए उग्र होना जरूरी है. मगर विचारों की जमीन पर ही. कैसा रहता अगर शटडाउन जेएनयू के नारों की बत्ती बुझाने के लिए निर्मला टीवी पर आतीं. देश को बतातीं. कि जेएनयू का योगदान कितना है. और क्यों हर सूबे में, कम से कम एक जेएनयू होना चाहिए.

पर आपने क्या किया. भारत की बर्बादी के नारों वाले वीडियो के बाद बैक फुट पर आए लेफ्ट को चमका दिया. पकड़ना था उमर खालिद और उनके साथियों को. बाकियों को लेना था यूनिवर्सिटी जांच के लपेटे में. ताकि एक क्लियर मैसेज जा सके. लेकिन उठा लिया कन्हैया को. जो कि जमानत पर छूटेंगे. और फिर उनका नायकों सा स्वागत होगा. उनकी क्रेडिबिलिटी बढ़ेगी. हीरो बना दिया सर आपने. मगर दूसरे बैनर के लड़के को.

या कि मैं निरा मूर्ख हूं. फेसबुक की प्रगतिशीलों से भरी टाइमलाइन के भरम में आ गया. जो ये सोच रहा हूं कि मोदी सरकार ने तो अपने पैर में कुल्हाड़ी मार ली. जबकि इस जख्म से निकले रक्त का इस्तेमाल कहीं और ही जनज्वार जुटाने में किया जा रहा है. मेरे शहर उरई के दोस्तों का एक व्हाट्सएप ग्रुप है. उसमें कई मैसेज आ रहे हैं. राहुल गांधी और केजरीवाल की खाट खड़ी की जा रही है. अफजल गुरु का साथी बताया जा रहा है उन्हें. दी लल्लनटॉप पर भी कुछ नौजवानों के मैसेज आ रहे हैं. अनफ्रेंड अनलाइक कर रहा हूं, जैसी क्यूट बातें लिख रहे हैं.

देश नए सिरे से संगठित हो रहा है. कह रहा है कि गद्दारों को छोड़ेंगे नहीं. गीत गा रहा है. घर घर में अफजल मारेंगे. और उसे मारने का रियाज कोर्ट रूम में, सड़कों पर कर रहा है. और मैं हूं कि नीमबेहोशी में पागलों की तरह कुछ और ही बड़बड़ाए जा रहा हूं.

वैसे आपने एक जोक में भी एंजेल फंडिंग की. एक सीन याद आ रहा है. जिसमें राहुल गांधी जेएनयू की सीढ़ियों पर खड़े हैं. ज्ञान दे रहे हैं. पता नहीं किसी ने उनसे पूछा या नहीं. कि अफजल को फांसी तो आपकी ही सरकार ने दी थी. और ये रायता भी उसी मुद्दे से फैला. तो अब आप क्या कहेंगे. कहेंगे न भइया. हम आरटीआई लाए. हमने महिलाओं को अधिकार दिए…

खैर. राहुल कांग्रेस के सर्वेसर्वा हैं. सो आए. आजकल घूम रहे हैं खूब. विपश्यना का कमाल है. यूनिवर्सिटी वैसे भी उनके पापा के नाना के नाम पर बनी है. राहुल खुद तो कैंपस के मजे ले न पाए. और गुरु. सही बात कहूं. जेएनयू का एंट्रेस निकाल भी न पाते. बुद्धि हरहरा जाती है पेपर क्लियर करने में.

कलाकार तो केजरीवाल निकले. कानपुर वाली कहावत याद आ गई. चित्त भी मेरी, पट्ट भी मेरी. अंटा मेरे बाप का. हैदराबाद गए. जेएनयू नहीं. क्योंकि जानते हैं. जाते तो देशद्रोही करार दिए जाते. बस ट्वीट किए. चिट्ठी लिखी. तो उधर के लोग भी खुश.

अब लास्ट बात. जिस जिस को ये चिट्ठी मिले. उनसे.

अटल बिहारी वाजपेयी कहा करते थे. राजनीति में मतभेद होने चाहिए. मनभेद नहीं. तो जिनसे आपके मतभेद हैं. उनसे गुफ्तगू बंद न कीजे. लल्लन से सीखिए कुछ. बाल कटवाने हैं. डीजल डलवाना है. घर जाना है. मगर फिर भी यहां कीबोर्ड पर चंपा पड़ा है. ताकि बात बंद न हो. आप अपनी कहें. हम अपनी कहें. मगर एक दूसरे की मां बहन को गाली न दें. एक दूसरे को गद्दार न कहें. एक दूसरे की जान को जहन्नुम का तत्काल टिकट न थमाएं.

भारत मां का अगर एक भी लाल अब और रोया न. तो भारत कसम. कोई भी सच्चा देशभक्त सुकून से न सो पाएगा. न इस पाले का. न उस पाले का.

ये देश मेरी मां है. और मुझे उस पर गर्व है. बल्कि कहूं तो यूं कहूं कि प्यार है. गर्व में गुरूर आ जाता है. प्यार में ईगो बह जाता है. इसलिए लाल सलाम भी कह लेता हूं और जय श्री राम भी. न तो मेरा इंकलाब जिंदाबाद किसी को डराता है और न ही मेरा राम. मेरा राम तो निषादराज गुह को गले लगाता है. शबरी के बेर खाता है. और ज्ञान की बात आए तो लक्ष्मण को आदेश देता है. कि जाओ और अपने परमशत्रु महापंडित रावण के चरणों पर खड़े होकर उनसे शिक्षा देने की प्रार्थना करो.

विद्या विनम्रता देती है. विद्या वाद विवाद और संवाद का संस्कार भी देती है. जेएनयू मेरा विद्या मंदिर है. और अंत में प्रार्थना. कि प्रार्थना करने वाले, किसी भी पंथ के, हिंसक न हों.

पर जेएनयू के उन ढाबों पर जहां आधी रात के बाद भी लड़कियां मनचाहे कपड़े में बिना अचकचाए घूमती थीं, वहां पत्थरों पर पुलिस वाले बैठे हैं. फैज अहमद फैज याद आते हैं:

निसार मैं तेरी गलियों के अए वतन, कि जहां
चली है रस्म कि कोई न सर उठा के चले

जो कोई चाहने वाला तवाफ़ को निकले
नज़र चुरा के चले, जिस्म-ओ-जां बचा के चले

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पढ़िए फिल्म 'पिंक' से दर्जन भर धांसू डायलॉग.

मुनासिर ने प्रीति को छह बार चाकू भोंककर क्यों मारा?

ऐसा क्या हुआ, कि सरे राह दौड़ा-दौड़ाकर उसकी हत्या की?

हिमा दास, आदि

खचाखच भरे स्टेडियम में भागने वाली लड़कियां जो जीवित हैं और जो मर गईं.

अलग हाव-भाव के चलते हिजड़ा कहते थे लोग, समलैंगिक लड़के ने फेसबुक पोस्ट लिखकर सुसाइड कर लिया

'मैं लड़का हूं. सब जानते हैं ये. बस मेरा चलना और सोचना, भावनाएं, मेरा बोलना, सब लड़कियों जैसा है.'

ब्लॉग: शराब पीकर 'टाइट' लड़कियां

यानी आउट ऑफ़ कंट्रोल, यौन शोषण के लिए आमंत्रित करते शरीर.

औरतों को बिना इजाज़त नग्न करती टेक्नोलॉजी

महिला पत्रकारों से मशहूर एक्ट्रेसेज तक, कोई इससे नहीं बचा.

सौरभ से सवाल

दिव्या भारती की मौत कैसे हुई?

खिड़की पर बैठी दिव्या ने लिविंग रूम की तरफ मुड़कर देखा. और अपना एक हाथ खिड़की की चौखट को मजबूती से पकड़ने के लिए बढ़ाया.

कहां है 'सिर्फ तुम' की हीरोइन प्रिया गिल, जिसने स्वेटर पर दीपक बनाकर संजय कपूर को भेजा था?

'सिर्फ तुम' के बाद क्या-क्या किया उन्होंने?

बॉलीवुड में सबसे बड़ा खान कौन है?

सबसे बड़े खान का नाम सुनकर आपका फिल्मी ज्ञान जमीन पर लोटने लगेगा. और जो झटका लगेगा तो हमेशा के लिए बुद्धि खुल जाएगी आपकी.

'कसौटी ज़िंदगी की' वाली प्रेरणा, जो अनुराग और मिस्टर बजाज से बार-बार शादी करती रही

कहां है टेलीविज़न का वो आइकॉनिक किरदार निभाने वाली ऐक्ट्रेस श्वेता तिवारी?

एक्ट्रेस मंदाकिनी आज की डेट में कहां हैं?

मंदाकिनी जिन्हें 99 फीसदी भारतीय सिर्फ दो वजहों से याद करते हैं

सर, मेरा सवाल है कि एक्ट्रेस मीनाक्षी शेषाद्री आजकल कहां हैं. काफी सालों से उनका कोई पता नहीं.

‘दामिनी’ के जरिए नई ऊंचाई तक पहुंचा मीनाक्षी का करियर . फिर घातक के बाद 1996 में उन्होंने मुंबई फिल्म इंडस्ट्री को बाय बोल दिया.

ये KRK कौन है. हमेशा सुर्खियों में क्यों रहता है?

केआरके इंटरनेट एज का ऐसा प्रॉडक्ट हैं, जो हर दिन कुछ ऐसा नया गंधाता करना रचना चाहता है.

एक्ट्रेस किमी काटकर अब कहां हैं?

एडवेंचर ऑफ टॉर्जन की हिरोइन किमी काटकर अब ऑस्ट्रेलिया में हैं. सीधी सादी लाइफ बिना किसी एडवेंचर के

चाय बनाने को 'जैसे पापात्माओं को नर्क में उबाला जा रहा हो' कौन सी कहानी में कहा है?

बहुत समय पहले से बहुत समय बाद की बात है. इलाहाबाद में थे. जेब में थे रुपये 20. खरीदी हंस...

सर आजकल मुझे अजीब सा फील होता है क्या करूं?

खुड्डी पर बैठा था. ऊपर से हेलिकॉप्टर निकला. मुझे लगा. बाबा ने बांस गहरे बोए होते तो ऊंचे उगते.