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'पीरियड का खून बहाती' देवी से नहीं, मुझे उसे पूजने वालों से एक दिक्कत है

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गुवाहाटी शहर में कामाख्या मंदिर नीलाचल के पहाड़ों पर बना है. कामाख्या एक ऐसा मंदिर है जिसके गर्भगृह में मूर्ति नहीं, एक पत्थर की पूजा होती है, जिसे देवी की योनि माना जाता है. जिसके ऊपर से एक प्राकृतिक फव्वारा निकलता है.

kamakhya

कालिका पुराण में इस मंदिर के बारे में काफी कुछ लिखा है. इसके मुताबिक़ इस देवी को कामाख्या इसलिए कहा जाता है क्योंकि वो यहां अपनी शारीरिक कामनाओं को पूरा करने आईं थीं. किवदंतियों के मुताबिक एक दिन कोच वंश के राजा नरनारायण को मालूम पड़ा कि देवी कामाख्या मंदिर में अवतरित हुई हैं. उनके पीरियड्स चल रहे हैं और वो योनि से खून बहाते हुए नग्न अवस्था में मंदिर में नृत्य कर रही हैं. राजा ने मंदिर के पुजारी को निर्देश दिए कि वो देवी को नाचते हुए देखना चाहता है. पुजारी ने राजा को चेताया कि ऐसा कर उसे देवी के क्रोध का भागी बनना पड़ सकता है. पर राजा ने सुना नहीं और मंदिर की दीवार की दरार से झांककर देवी को नाचते हुए देखने लगा. देवी ने उसे देख लिया और श्राप दिया कि अगर उसने आगे से कभी इस मंदिर में कदम रखा, तो उसका पूरा परिवार नष्ट हो जाएगा. राजा को बहुत दुख हुआ. अपराधबोध से भरे राजा ने अपने राज्य की सभी औरतों को ये निर्देश दिए कि माहवारी यानी पीरियड्स के समय वो घर के अंदर ही रहेंगी, ताकि कोई उन्हें देखे नहीं.

An Indian Hindu devotee daubed in colour carries goat to sacrifice during annual Devadhanni festival at Kamakhya. An Indian Hindu devotee daubed in colour carries a goat to sacrifice during the annual Devadhanni festival at Kamakhya temple near Guwahati, the major city of India's northeastern state of Assam August 19, 2004. REUTERS/Utpal Baruah
A devotee daubed in colour carries goat to sacrifice during annual Devadhanni festival at Kamakhya near Guwahati in Assam  REUTERS/Utpal Baruah

ये कितनी दुखद, हास्यास्पद और इसके साथ-साथ क्रोध से भर देनी वाली बात है. नाचती हुई देवी को उनकी मर्जी के खिलाफ देखना राजा का दोष था. मगर सजा उसने अपने राज्य की सभी औरतों को दी, उन्हें घर में कैद कर. इस कहानी से औरत की ‘पवित्रता’ और पुरुष की सत्ता के बीच का रिश्ता स्पष्ट होता है. जब तक औरत पवित्र है, सबकी नजरों से दूर है, तब तक पुरुष की सत्ता सही चलती है. मगर जैसे ही औरत अपनी कामुकता की अभिव्यक्ति करती है, पुरुष का सिंहासन डोलने लगता है. लड़कियों और औरतों को चारदीवारी में बंद कर, उन पर ‘सुशील’ बने रहकर घर की ‘इज्जत’ का ध्यान रखने की जिम्मेदारी डालकर, पुरुष को इस सत्ता को मजबूत करने में मदद मिलती है. कितनी अजीब बात है, औरतों को घर में उनके भले के लिए नहीं बंद किया जाता. बल्कि इसलिए किया जाता है कि उन्हें देखकर पुरुष का विनाश हो सकता है.

इसी विचार के साथ नत्थी है औरत की कामुकता को काबू में रखना. कामाख्या देवी की असल कहानी से हमें ये पता चलता है कि देवी ने किस तरह नग्नावस्था में अपनी सेक्शुअलिटी को बयां किया था. मगर अंबूबाची के पर्व ने इसे धार्मिक, पवित्र बात बना दिया है. जब हम पीरियड में खून बहाती इस देवी की पूजा करने लगते हैं, हम कहानी का वो हिस्सा पूरे तरीके से भुला देते हैं जिसमें देवी ने अपने शारीरिक उन्माद को बाहर आने दिया था. इसे हम मातृत्व से जोड़ देते हैं. जो खून देवी की शारीरिक इच्छाओं का सिंबल है, उसे मातृत्व और फर्टिलिटी का सिंबल बना दिया जाता है. जिस वक़्त हम देवी के कथित खून में भीगे हुए कपड़े को ‘आशीर्वाद’ बना देते हैं, हम देवी से सेक्स का अधिकार छीन उसे एक ऐसे सिंहासन पर बैठा देते हैं, जहां से उसकी शारीरिक इच्छाओं का दमन मात्र ही हो सकता है. उसी वक़्त से देवी पवित्र हो जाती है. क्योंकि एक देवी के अंदर सेक्स की चाहत हो, ये बात हमसे पचती नहीं. इसलिए जो शारीरिक है, उसे हम देवी का आशीर्वाद बना देते हैं.

An Indian girl massage leg of a Hindu woman priest at the Kamakhya Temple in the northeastern Indian city of Guwahati June 22, 2003. Seers and pilgrims are arriving at the temple, which is famous for the teaching of black magic known traditionally as 'Tantra', for the annual four day 'Ambubachi Mela', which starts on June 22 when pilgrims and Seers believe their prayers will be answered during the festival. Pictures of the month June 2003. PP03060064 REUTERS/Jayanta Shaw JS/CP
A  girl massage leg of a Hindu woman priest at the Kamakhya Temple in
the northeastern Indian city of Guwahati  REUTERS/Jayanta Shaw

असम में जब किसी लड़की को पहली बार पीरियड होता है, उसे सैकड़ों नियम मानने पड़ते हैं. मुझे भी इन नियमों का पालन करना पड़ा था. जिस दिन मुझे मालूम पड़ा कि पीरियड शुरू हो गया है, मुझे एक कमरे में बंद कर दिया गया. चार दिनों तक वहीं रखा गया. अगले 4 दिन मुझे नहाने की इजाज़त नहीं थी. पड़ोस की औरतें आतीं और कहतीं, ‘ईश्वर तुम्हारा भला करे, तुमने भी कर दिखाया.’ मानो पीरियड कोई प्राकृतिक चीज नहीं, बल्कि कोई फैसला हो, जो लड़की ने अपने जीवन के बारे में लिया हो.

पुरुषों से बात करने की छूट नहीं होती, फिर भले ही वो परिवार के सदस्य ही क्यों न हों. एक पंडित आता है. वो लड़की के पीरियड होने का समय देखकर बताता है कि लड़की को कितने दिनों का उपवास रखना होगा. ये उपवास 7 दिनों से लेकर 3 महीने तक का भी हो सकता है. पंडित के मुताबिक़ ये सब तारे, ग्रह-नक्षत्र तय करते हैं. ये संघर्ष एक नकली शादी के साथ ख़त्म होता है, जिसे ‘तुलोनी बिया’ कहते हैं. इस पर्व पर सब खाना खा सकते हैं, एक बस उस लड़की को छोड़कर, जो कई दिनों से उपवास कर रही है. पर्व का मकसद इस बात को मनाना होता है कि अब लड़की गर्भवती होने के लायक हो गई है.

असम में पीरियड से जुड़े दकियानूसी नियम औरतों के पूरे शरीर पर एक तरह की सत्ता जमाते हैं. पीरियड के दौरान एक औरत का शरीर ये दिखा रहा होता है कि वो एक सेक्शुअल प्राणी है. ये सेक्स करने की शक्ति न सिर्फ उसे खूबसूरत बनाती है, बल्कि पितृसत्ता को तोड़ने का दम रखती है. ये खूबसूरती एक ही वक़्त पर आकर्षक और विनाशकारी होती है. उसके पीरियड के समय उसे पुरुषों, उसे उसकी ही उम्र के लड़कों से दूर रखना, लड़कों में मन में उसके प्रति मात्र घृणा नहीं पैदा करता. एक आकर्षण भी पैदा करता है. किसी छिपी हुई चीज को देखने का आकर्षण. ये तब तक चलता है जब तक औरत का मीनोपॉज नहीं हो जाता. यानी जब तक वो पीरियड की साइकल से मुक्त नहीं हो जाती.

अंबूबाची के दौरान भक्तों को देवी की योनि के ‘अंगढक’ या ‘अंगवस्त्र’ का टुकड़ा देते हैं. ये लाल रंग का कपड़ा लोग इसलिए लेते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे पीरियड से जुड़ी दिक्कतें ठीक हो जाएंगी और औरतों का ‘बांझपन’ मिट जाएगा. वही लोग जो इस अंगवस्त्र के टुकड़े को तावीज में बांधकर पहनते हैं, अपनी खून बहाती औरतों को उनके पीरियड के समय उनके कमरों से बाहर भी नहीं निकलने देते.

असम में अगर किसी औरत को उसी समय पीरियड हो रहे हैं, जिस समय अंबूबाची मेला चल रहा हो, तो उसे वही रस्में फिर से निभानी पड़ती हैं, जो उसने पहली बार पीरियड होने पर निभाई थीं. पीरियड की ख़ुशी मनाने वाले इस पर्व में वही औरतें नहीं आ पाती हैं, जिनके पीरियड चल रहे हों. क्योंकि इन दिनों में औरतें मंदिर नहीं जातीं. असमिया बोली में पीरियड के लिए प्रयोग होने वाला शब्द है ‘सुआ लोगा’, जिसका शाब्दिक अर्थ ही ‘अछूत’ है.

An Indian Hindu woman priest plays an instrument made from buffalo horn at the Kamakhya Temple in the northeastern Indian city of Guwahati June 22, 2003. Seers and pilgrims are arriving at the temple, which is famous for the teaching of black magic known traditionally as 'Tantra', for the annual four day 'Ambubachi Mela', which starts on June 22 when pilgrims and Seers believe their prayers will be answered during the festival.
A woman priest plays an instrument made from buffalo horn at the Kamakhya Temple 

लेकिन हमसे कहा जाता कि देवी के पीरियड को हम मनाएं. हां, पीरियड की ख़ुशी मनाना यकीनन कोई बुरी बात नहीं है. मगर दुख ये है कि सिर्फ देवी के पीरियड मनाए जाते हैं, आम औरतों के नहीं. मुझे इस पर्व से यही समस्या है- इसमें आम औरतें शामिल नहीं हैं. जहां एक ओर लोगों से कहा जाता है कि ‘देवी की योनि से निकले खून’ को माथे से लगाओ, उनकी भक्ति में झूमो, लेकिन दूसरी ओर असल जीवन में हम पीरियड और सेनेटरी नैपकिन पर बात नहीं करते. पर्व के दौरान गेस्ट बुलाए जाते हैं, वॉटर स्पोर्ट्स होते हैं, इस बात का ध्यान कोई नहीं रखता कि असल में दुनिया को आगे बढ़ाने वाली, बच्चे पैदा करने वाली औरतें इसमें आ ही नहीं पातीं. जैसे-जैसे इस पर्व की जानकारी देश भर में फैलती जा रही है, ऐसा लगता है कि हम औरतों और पीरियड के प्रति और चुप्पे होते जा रहे हैं.


दी लल्लनटॉप के लिए ये आर्टिकल टीना दास ने लिखा है.


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Ambubachi festival at kamakhya: how the sexual is appropriated into religious

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