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मुनासिर ने प्रीति को छह बार चाकू भोंककर क्यों मारा?

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जब मुनासिर प्रीति को चाकू भोंक रहा था, शाम के साढ़े छह बजे थे. पीठ पर जब पहला वार हुआ तो वो भागी. कुछ लोग उसे बचाने भी आए. मगर मुनासिर के हाथ में चाकू था और वो बदहवास था. जबतक भीड़ उसपर काबू पाती, वो प्रीति को छह बार चाकू मार चुका था. दोनों को अस्पताल तो ले जाया गया. मगर प्रीति नहीं बची.

दिल्ली में सबके लिए जगह है. मुनासिर के लिए भी. सराय काले खां में दो बहनों के साथ रहता था. सफाईकर्मी था. प्रीति के घर के पास ही.

प्रीति के पिता कपड़े प्रेस करते थे. फिर दिल के मरीज हो गए. तो तुगलकाबाद शिफ्ट हो गए. मगर प्रीति भाई के साथ सराय काले खां में ही रहती थी. पापा प्रीति से कहते थे बेटी शादी कर ले. मगर प्रीति के अपने एम्बिशन थे, अपनी इच्छाएं थीं. जैसे हर बुरी लड़की की होती हैं. इन्हीं बुरी लड़कियों के पीछे ही तो लफंगे पड़ते हैं. नौकरी न करती, पढ़ाई न करती तो कोई मनचला उसके पीछे क्यों ही पड़ता.

कौन होते हैं ये ‘मनचले’?

मनचला, दीवाना, पागल, हद से ज्यादा प्यार करने वाला. रोमैंटिक लगता है सुनने में. बिलकुल फिल्मों की तरह. मगर कानूनी परिभाषा और इंडियन पीनल कोड के मुताबिक़ मुनासिर जैसे लड़कों को स्टॉकर कहते हैं. ये एक सच है जो हमारे फिल्मकारों को अब तक समझ नहीं आया है.

ऐसा नहीं है कि हमारे यहां स्टॉकिंग पर महज गाने बनते हों. लड़की का पीछा करना हमारे यहां एक प्रॉपर फॉर्म ऑफ़ फिल्म मेकिंग है. यानी पूरी-पूरी फ़िल्में इसी पर आधारित हैं, कि हीरो किस तरह लड़की का पीछा करता है और लास्ट में उसे पा लेता है. कितनी फिल्मों के नाम गिनेंगे आप: ‘रांझना’, ‘फना’, ‘तेरे नाम’, ‘सुल्तान’. छोड़िए थक जाएंगे.

'तेरा पीछा न छोड़ूंगा सोणिये, प्यार के इस खेल में, भेज दे चाहे जेल में.'
‘तेरा पीछा न छोड़ूंगा सोणिये, प्यार के इस खेल में, भेज दे चाहे जेल में.’

ये शायद वो लड़की ही ठीक-ठीक बता पाए जिसका पीछा किया जाता है. कि हर वक़्त कोई फॉलो करता रहे तो कैसा लगता है. मगर वो कैसे बता पाएगी. वो तो मर गई.

प्रीति के पिता बताते हैं कि मुनासिर से उसकी पहले से जान-पहचान थी. दोनों किसी तरह की रिलेशनशिप में थे या नहीं, इसके बारे में किसी को नहीं पता है. हालांकि इससे कोई फर्क भी नहीं पड़ता. क्योंकि किसी लड़की के साथ रिलेशनशिप में होना भी किसी लड़के को ये हक़ नहीं देता कि वो लड़की का पीछा करे.

प्रीति के पिता ने ये भी बताया कि मुनासिर ऐल्कोहॉलिक यानी शराबी था. जिसकी शिकायत प्रीति मुनासिर के मकानमालिक से कर चुकी थी. जिसके बाद मकानमालिक ने मुनासिर को घर से निकाल दिया था. मुनासिर के शराबी होने पर ख़ास ध्यान देना चाहिए. क्योंकि ये आम स्टॉकिंग बिहेवियर का एक हिस्सा है.

स्टॉकिंग किसे कहते हैं?

पॉल ई मुलेन, मिशेल पाथे, रोजमेरी पर्सेल और जेफरी स्टुअर्ट नाम के चार अमेरिकी साइकेट्रिस्ट्स ने स्टॉकिंग पर काफ़ी रिसर्च की. इन्होंने मिलकर ‘स्टडी ऑफ़ स्टॉकर्स’ नाम से पर्चा भी छापा. साल 1999 में.

पर्चे के मुताबिक़,

स्टॉकिंग ऐसे कई सारी हरकतों और व्यवहार का योग है, जिसके द्वारा किसी ऐसे व्यक्ति से जबरन बात करने की कोशिश की जाए, जिसे बात करने में इंटरेस्ट न हो. ये फोन, चिट्ठी, ईमेल, चित्रकारी या खुद अगले व्यक्ति का पीछा कर, या उनके घर के बाहर उनका इंतज़ार करके किया जा सकता है. उनको गिफ्ट भेजना या उनके लिए चीज़ें ऑर्डर कर देना. जैसे पीत्ज़ा या चॉकलेट, जब वो इसे पसंद न करे, ये सब स्टॉकिंग का हिस्सा है.

स्टॉकिंग ऐसे कई सारी हरकतों और व्यवहार का योग है, जिसके द्वारा किसी ऐसे व्यक्ति से जबरन बात करने की कोशिश की जाए, जिसे बात करने में इंटरेस्ट न हो.
स्टॉकिंग ऐसे कई सारी हरकतों और व्यवहार का योग है, जिसके द्वारा किसी ऐसे व्यक्ति से जबरन बात करने की कोशिश की जाए, जिसे बात करने में इंटरेस्ट न हो.

‘स्टडी ऑफ़ स्टॉकर्स’, ऐसे लोगों को पांच भाग में बांटता है:

रिजेक्ट हुए लोग: ब्रेकअप, सेपरेशन या तलाक के बाद लगातार अगले के पीछे पड़े रहना. कि क्या हम पहले की तरह साथ नहीं हो सकते. या फिर बदला लेने के मकसद से पीछा करते रहना.

शिकायती: डराने के लक्ष्य से किया गया पीछा. लगातार ये एहसास दिलाना कि मैं तुम्हें देख रहा हूं और कभी भी नुकसान पहुंचा सकता हूं.

एकतरफा ‘मोहब्बत’: ये स्टॉकर सबसे आम हैं. इन्हें लगता है कि लगातार किसी के पीछे पड़े रहने से रिश्ता बन जाएगा. ऐसे स्टॉकर को लगता है कि वो और जिसका वो पीछा कर रहे हैं, एक दूसरे के लिए ही बने हैं.

प्रेम व्यक्त न कर पाने वाले: कॉन्फिडेंस इशूज या अन्य वजहों से लोग अपने मन की बात नहीं कह पाते. उन्हें अगले का पीछा करते रहना, उन्हें छिप-छिपकर देखते रहना बेहतर लगता है. अक्सर जिसका पीछा वो करते हैं, वो किसी और के साथ रिलेशनशिप में होते हैं.

हिंसक स्टॉकर: जिनका एकमात्र लक्ष्य अगले को नुकसान पहुंचाना है. वो स्टॉक करते ही इसलिए हैं कि एक दिन अगले को रेप का शिकार बना लें या मौत के घाट उतार दें.

अमेरिकन जर्नल ऑफ़ साइकाइट्री में छपी एक स्टडी के मुताबिक़ ज़्यादातर स्टॉकर या तो भयानक नशेड़ी होते हैं. इतने, कि उन्हें किसी चीज की सुध नहीं होती. या फिर वे किसी न किसी मनोरोग के शिकार होते हैं. जैसे: स्कित्जोफ्रेनिया, लंबा डिप्रेशन, बाइपोलर डिसऑर्डर और एरोटोमैनिक डेल्यूजन यानी मन ही मन ये मानना कि किसी व्यक्ति को आपसे प्यार है, जबकि ऐसा नहीं हो.

स्टॉकर को लगता है कि वो और जिसका वो पीछा कर रहे हैं, एक दूसरे के लिए ही बने हैं.
स्टॉकर को लगता है कि वो और जिसका वो पीछा कर रहे हैं, एक दूसरे के लिए ही बने हैं. स्टिल फिल ‘रांझना’ से.

स्टॉकर कोई भी हो सकता है. लड़का या लड़की. मगर हम सभी जानते हैं कि हमारे समाज की बनावट कैसी है. स्टॉकर अक्सर लड़के ही होते हैं. और शिकार होने वाली लड़कियों की या तो हत्या हो जाती है, या उनपर तेज़ाब फेंका जाता है, या फिर रेप कर मरने के लिए छोड़ दिया जाता है.

कानूनी मायने क्या हैं?

कमाल की बात है कि स्टॉकिंग दुनिया के सबसे नए अपराधों में से एक है. विकसित देशों में भी इसे क्राइम माने लगभग 20-25 साल हुए हैं. इंडिया में इसे 2013 में क्राइम माना गया. दिसंबर 2012 में निर्भया रेप कांड हुआ, जिसने देश को हिलाया. जिसके बाद गठित हुई जस्टिस वर्मा कमिटी. ठीक एक महीने बाद कमिटी ने अपनी रिपोर्ट में महिलाओं और बच्चों के यौन शोषण से जुड़े कानूनों में कुछ बदलाव सुझाए. जिसके बाद अमेंडमेंट के तहत स्टॉकिंग अपराध हुआ.

भारतीय दंड संहिता के सेक्शन 354D के मुताबिक़ स्टॉकिंग है :

1. कोई पुरुष अगर किसी महिला को, महिला के मना करने के बावजूद बातचीत या किसी अन्य तरह का संपर्क स्थापित करने की कोशिश करता है

2. इंटरनेट, ईमेल, या किसी अन्य इलेक्ट्रॉनिक तरीके से जबरन औरत से संपर्क करने की कोशिश करे या उसपर नज़र रखे

पहली बार ऐसा करने पर इसकी सज़ा तीन साल तक हो सकती है. दूसरी बार ऐसा करने पर पांच साल तक की सजा हो सकती है. दोनों ही सूरतों में फाइन भी भरना पड़ सकता है.

मगर क्या होता है?

– होता ये है कि स्टॉकिंग लोगों को अपराध नहीं लगता. प्रेमी है, दीवाना है, मनचला है. ये कहकर चीजों को लाइट बना दिया जाता है. और फिल्मों में तो हिरोइन को ही निष्ठुर दिखा दिया जाता है कि इसे ही लड़के की आंखों में प्रेम नहीं दिख रहा है.

सिस्टम और समाज के इसी रवैये का शिकार बनी थी रिया गौतम. प्रीति की तरह वो भी 21 साल की थी. एक लड़का कई महीनों से रिया का पीछा कर रहा था. रिया ने पुलिस में शिकायत करी. उन्होंने कुछ भी नहीं किया. नतीजा ये हुआ कि 5 जुलाई 2017 को लड़के ने उसे चाकू भोंककर मार डाला.

– होता ये है कि लड़की से क्रॉस क्वेश्चन किए जाते हैं. कि क्या तुमने कभी पलटकर कुछ कहा. अक्सर लड़कियों को लगता है कि एक बार स्टॉकर से बात कर लेंगी, उन्हें समझा देंगी तो मुश्किल टल सकती है. बाद में उनकी यही मानवता उन्हें ले डूबती है.

– होता ये है कि लड़की अगर न डरे तो उसे सच्चा नहीं माना जाता. 2001 में ‘सिंबॉलिक इंटरेक्शन’ नाम के जर्नल में एक वाकया छपा है. विनी नाम की एक लड़की का कोर्ट में केस चल रहा था. विनी निडर थी और उसने अपने स्टॉकर को पास न आने की धमकी दी थी. फिर भी वो नहीं माना था तो उसने उसे बेसबॉल बैट से खदेड़ा था. वो अपनी सुरक्षा के लिए अपने पास चाकू रखती थी. डिफेंस के वकील ने इन सबको इस्तेमाल कर ये साबित कर दिया कि लड़की को ही एंगर इशूज हैं.

प्रीति के केस में क्या हो रहा है?

वही जो कठुआ रेप कांड में हुआ था. और बीते महीने अलीगढ़ के पास टप्पल में बच्ची की हत्या पर हुआ. पूरे मसले को सांप्रदायिक रंग दिया गया. ताकि नफरत फ़ैल सके. ऐसा लगता है धर्म के रक्षक घात लगाए बैठे रहते हैं कि कब किसी महिला के साथ हुए अन्याय को वो अपना उल्लू सीधा करने के लिए इस्तेमाल कर सकें.

मामले को सांप्रदायिक रंग देने की भरसक कोशिश जारी है.
मामले को सांप्रदायिक रंग देने की भरसक कोशिश जारी है.

मुनासिर ने प्रीति को इसलिए चाकू नहीं मारा कि वो हिंदू थी. मुनासिर ने प्रीति को चाकू मारा क्योंकि उसके पौरुष ने उसे इसकी इजाज़त दी. क्योंकि वो ये जानता था कि वो ताकतवर है और वो ऐसा कर सकता है. क्योंकि वो बीमार था. और क्योंकि सक्सेस की ओर बढ़ती निडर लड़की से नफरत यूं ही हो जाती है, चाहे वो किसी भी धर्म की हो.

*

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक़ प्रीति फ़ौज में जाना चाहती थी. वो पहली लड़की थी परिवार में, जिसका डीयू में एडमिशन हुआ था. डिस्टेंस से पढ़ाई करते हुए वो बेबीसिटिंग का काम करती थी. महीने के 7 हजार रुपये मिलते थे. 21 की उम्र में खुद को पढ़ा रही थी. कुछ ही दिनों पहले कजिन को फोन कर पूछा था CRPF और BSF की परीक्षा की तैयारी कैसे करे.

रिया गौतम एयर होस्टेस बनने की तैयारी में थी. उड़ने की तैयारी में थी.

नेशनल क्राइम रेकॉर्ड्स ब्यूरो के मुताबिक़ बीते साल 2018 में स्टॉकिंग के 7 हजार से ज्यादा मामले दर्ज हुए. ये मामले हैं जो दर्ज हुए. दर्ज हुए मामले हमेशा ‘टिप ऑफ़ दी आइसबर्ग’ होते हैं.

खैर वो सब छोड़िए.

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