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कावेरी के पानी पर विवाद क्यों है, क्या है: आसान ढंग से समझ लीजिए

दक्षिण भारत के चर्चित कावेरी जल विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने 16 फरवरी को फैसला सुना दिया. 1892 से चले आ रहे इस विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित राज्यों के बीच पानी का बंटवारा किया है. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुताबिक अब तमिलनाडु को 177.25 TMC पानी मिलेगा, जो पहले 192 TMC था. यानी तमिलनाडु के हिस्से में आने वाला पानी 14.75 TMC घटा दिया गया है. वहीं कर्नाटक को 192 TMC पानी देने का फैसला सुनाया गया है. यानी ये फैसला कर्नाटक को फायदा देने वाला है. वहीं केरल को 30 TMC और पुडुचेरी को 7 TMC पानी आवंटित किया गया है.

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ये फैसला चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर और न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ की पीठ ने सुनाया, जिसे पीठ ने 20 सितंबर को सुरक्षित कर लिया था. सुप्रीम कोर्ट का ये फैसला करीब-करीब कावेरी जल विवाद ट्रिब्यूनल के फैसले का ही फिल्टर्ड वर्जन है. सुप्रीम कोर्ट ने साल 1994 के समझौते को वैलिड बताया और उसी के आधार पर 22 पॉइंट्स में अपना फैसला सुनाया. चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया की अगुवाई वाली बेंच ने ये फैसला सुनाते हुए सबसे महत्वपूर्ण बात ये कही कि,

‘नदी का जल राष्ट्रीय संपत्ति है, जिस पर किसी एक राज्य का अधिकार नहीं है.’

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के साथ देश के चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा (दाएं)
राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के साथ देश के चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा (दाएं)

ये तो वो बातें हुईं, जिनका वास्ता 16 फरवरी को आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले से है. लेकिन ये विवाद तो 1892 से चल रहा है. तो आइए जानते हैं पूरा कावेरी विवाद.

सबसे पहले तो नदी का इतिहास समझिए

कावेरी दक्षिण भारत की एक नदी है. ये कर्नाटक के कोडागू जिले से निकलती है और तमिलनाडु से होती हुई बंगाल की खाड़ी में गिरती है. कावेरी घाटी में एक हिस्सा केरल का भी है और समंदर में मिलने से पहले ये नदी पॉन्डिचेरी के कराइकाल से होकर गुज़रती है. कावेरी नदी लगभग 750 किमी लंबी है, जो कुशालनगर, मैसूर, श्रीरंगापटना, त्रिरुचिरापल्ली, तंजावुर और मइलादुथुरई जैसे शहरों से गुज़रती हुई तमिलनाडु से बंगाल की खाड़ी में गिरती है.

कावेरी नदी का रूट
कावेरी नदी का रूट

कावेरी के बेसिन में कर्नाटक का 32 हज़ार वर्ग किमी और तमिलनाडु का 44 हज़ार वर्ग किमी का इलाका शामिल है. ये दोनों ही राज्य सिंचाई के पानी की ज़रूरत की वजह से कावेरी के मुद्दे पर दशकों से लड़ रहे हैं. दोनों ही राज्य अपने किसानों की बदहाली का हवाला देते हैं.

और अब विवाद का इतिहास समझिए

कर्नाटक और तमिलनाडु, दोनों ही राज्य इस नदी के ज़्यादा से ज़्यादा पानी पर अपना अधिकार जताते आए हैं. कई मौकों पर ये विवाद इतना गहरा हो गया कि कर्नाटक और तमिलनाडु के लोग हिंसा पर उतर आए. लोगों ने ट्रिब्यूनल से लेकर कोर्ट के फैसले तक को ठेंगे पर रखने में कोई कसर नहीं छोड़ी. चूंकि पानी देने का ट्रिगर कर्नाटक के हाथ में है, इसलिए कर्नाटक और तमिलनाडु के लोगों के बीच नूराकुश्ती होती आई है.

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कावेरी के पानी पर पहला कानूनी विवाद 1892 में हुआ. तब कर्नाटक और तमिलनाडु राज्य नहीं थे. भारत में रियासतें थीं और अंग्रेजों का राज था. तो एक तरफ मैसूर राजघराना था और दूसरी तरफ मद्रास प्रेसिडेंसी थी. विवाद यही था कि पानी सबको चाहिए और ज़्यादा से ज़्यादा चाहिए. लेकिन नदी निकलती मैसूर से है, तो वो ऑटोमेटिकली दादा बन जाता था.

1892 के बाद देश की आज़ादी तक क्या-क्या हुआ

1892 के पहले झगड़े के बाद मैसूर राजघराने और मद्रास प्रेसिडेंसी के बीच पानी के बंटवारे को लेकर एक समझौता हुआ. लेकिन 1924 में जनता एक बार फिर बिफर गई. एक बार फिर मामला कोर्ट में गया और इस मर्तबा सिर्फ दो पक्ष नहीं थे. केरल और पॉन्डिचेरी भी विवाद में शामिल थे. तब सभी पक्षों के बीच समझौता कराया गया और इस बार का समझौता अगले 50 सालों के लिए था. लेकिन अगले 50 सालों में देश आजाद हो गया, तो न मैसूर राजघराना बचा और न मद्रास प्रेसिडेंसी. पहला बन गया कर्नाटक और दूसरा बन गया तमिलनाडु. मैसूर 1399 से 1947 तक मैसूर राजघराने की राजधानी रहा है.

1700 के आसपास मैसूर रियासत
1700 के आसपास मैसूर रियासत

और फिर बनाया गया ट्रिब्यूनल

1924 के बाद से चीज़ें किसी तरह घिसट रही थीं. फिर 1972 में भारत सरकार की बनाई एक कमेटी की रिपोर्ट और एक्सपर्ट्स की सिफारिशों के बाद अगस्त 1976 में सभी चारों दावेदारों के बीच एक समझौता कराया गया. इस समझौते की घोषणा संसद में भी हुई थी, लेकिन इसका पालन किसी ने नहीं किया. विवाद चलता रहा.

फिर 1986 में तमिलनाडु ने केंद्र सरकार से गुजारिश की कि ये विवाद सुलझाने के लिए अंतरराज्यीय जल विवाद अधिनियम (1956) के तहत एक ऑफिशियल ट्रिब्यूनल बनाया जाए. सरकार ट्रिब्यूनल बनाने के बजाय बातचीत से विवाद सुलझाने के पक्ष में थी. पर इसी बीच तमिलनाडु के कुछ किसानों की याचिका पर हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार को एक ट्रिब्यूनल बनाने का निर्देश दिया.

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1990 में जब चीजें फिर भड़क रही थीं, तो केंद्र सरकार ने 2 जून 1990 को ट्रिब्यूनल बना दिया, जिसने आगे कई सालों तक ये विवाद सुलझाने की कोशिश की. इससे लोगों का तो नहीं, पर सुप्रीम कोर्ट का सिरदर्द कुछ कम हो गया. 1991 में ट्रिब्यूनल ने एक अंतरिम आदेश दिया था कि कर्नाटक कावेरी के पानी का एक हिस्सा तमिलनाडु को देगा और ये भी तय किया गया कि हर महीने कितना पानी छोड़ा जाएगा. हालांकि, इस पर कोई आखिरी फैसला नहीं हो पाया.

पर इन दोनों राज्यों को कावेरी के पानी से इतना लगाव क्यों है

कर्नाटक का तर्क ये है कि ब्रिटिश राज के समय वो एक रियासत था, जबकि तमिलनाडु सीधे-सीधे ब्रिटिश राज के अधीन था. ऐसे में 1924 में कावेरी विवाद पर जो समझौता हुआ था, उसमें उसके साथ न्याय नहीं हुआ. ऐसे में जब 1956 में नए राज्य बन गए, तो उन पुराने समझौतों को रद्द माना जाना चाहिए. कर्नाटक का दूसरा तर्क ये है कि वहां खेती का विकास तमिलनाडु की अपेक्षा देर से हुआ और नदी पहले उसके पास आती है, तो सारे पानी पर उसका अधिकार है.

कावेरी के पानी को लेकर प्रदर्शन करते लोग
कावेरी के पानी को लेकर प्रदर्शन करते लोग

तमिलनाडु की तरफ से ये तर्क दिया जाता है कि 1924 के समझौते के तहत उसे कावेरी का जितना पानी मिलना चाहिए था, उसे उतना दिया जाना चाहिए और इस पूरे मामले में पिछले समझौतों के आधार पर काम होना चाहिए. उसे हर बार पानी के लिए कोर्ट में गुहार लगानी पड़ती है.

ट्रिब्यूनल ने क्या फैसला सुनाया और इसका क्या असर हुआ

साल 2007 में इस ट्रिब्यूनल के सुनाए आखिरी फैसले के मुताबिक तमिलनाडु को 419 TMC पानी मिलना चाहिए था. ये फैसला आने से पहले तमिलनाडु 562 TMC पानी मांग रहा था, जो नदी के कुल पानी का दो-तिहाई हिस्सा था. दूसरी तरफ कर्नाटक 465 TMC पानी मांग रहा था, लेकिन ट्रिब्यूनल ने कहा कि कर्नाटक को 270 TMC पानी सालाना मिलेगा. ट्रिब्यूनल ने ये फैसला कावेरी बेसिन में 740 TMC पानी मानते हुए सुनाया था. फैसले के हिसाब से केरल के हिस्से में 30 TMC और पुडुचेरी को 7 TMC पानी मिलना था.

2007 में ट्राइब्यूनल का सुनाया फैसला. फोेटो सोर्स: thenewsminute
2007 में ट्राइब्यूनल का सुनाया फैसला. फोेटो सोर्स: thenewsminute

कर्नाटक इसलिए भड़का हुआ था, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के फैसले में उससे इतना ज़्यादा पानी देने के लिए नहीं कहा गया था. ट्रिब्यूनल का फैसला कर्नाटक पर भारी पड़ रहा था. ट्रिब्यूनल के फैसले से कोई भी राज्य खुश नहीं था. ज़ाहिर है, विवाद फिर होना था. हुआ भी. साल 2012 में. आखिरकार इस बार सुप्रीम कोर्ट को बीच में आना पड़ा और कर्नाटक को समझाइश देनी पड़ी कि वो तमिलनाडु को और पानी दे. कर्नाटक सरकार ने माफी मांगी और पानी देने की पेशकश की, लेकिन इससे राज्य में हिंसा फैल गई.

2012 के बाद इस लड़ाई ने 2016 में जोर पकड़ा था. अगस्त 2016 में तमिलनाडु ने कर्नाटक की शिकायत करते हुए कहा था कि इस साल फिर से कर्नाटक ने कम पानी दिया है. वहीं कर्नाटक में बचाव में तर्क दिया कि बारिश पर्याप्त नहीं हुई है, इसलिए पानी कम है. जब रिज़र्व में पानी है ही नहीं, तो कहां से दे दें.

कावेरी पर प्रदर्शन की एक सूरत
कावेरी पर प्रदर्शन की एक सूरत

अच्छा ये TMC क्या होता है

जब भी नदियों के पानी की बात होती है, तो उसे TMC में मापा जाता है. कोई कन्फ्यूज़न न हो, इसके लिए हम TMC भी बता देते हैं. TMC या Tmc ft एक हज़ार मिलियन क्यूबिक फीट (1,000,000,000 = 10^9) का शॉर्टफार्म है. एक Tmc ft यानी एक अरब क्यूबिक फीट यानी 28,31,68,46,592 लीटर पानी होता है.

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कावेरी नदी में पानी की इतनी किल्लत क्यों होती है

रिज़र्व का ज़िक्र आया है, तो ये भी जान लीजिए कि कावेरी नदी बारिश से भरती है. इसका हाल उत्तर-भारतीय नदियों जैसा नहीं है, जहां हिमालय पर बर्फ पिघलने से पानी आता है. कावेरी का हाल ये है कि जितनी बारिश होती है, उसी के हिसाब से पानी बंटता है. इन चारों राज्यों के बीच विवाद तभी जोर पकड़ता है, जिस साल बारिश कम होती है. ऐसे में पानी कम मिलता है और फिर मार-मरौव्वर की नौबत आ जाती है. 2016 में तो विवाद इतना बढ़ गया था कि बेंगलुरु की 20 बसों में आग लगा दी गई थी और पुलिस की फायरिंग में एक आदमी मार दिया गया था.

2016 में हुए प्रदर्शन की एक तस्वीर
2016 में हुए प्रदर्शन की एक तस्वीर

वैसे कावेरी को लेकर जब भी विवाद भड़कता है, तो कर्नाटक के लोग अपने राज्य में रहने वाले तमिलनाडु के लोगों को पीटने लगते हैं और तमिलनाडु वाले अपने राज्य में रह रहे कर्नाटक वालों के साथ यही सलूक करते हैं.

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद क्या माहौल है

जब से ये बात उठी थी कि सुप्रीम कोर्ट 16 फरवरी को कावेरी विवाद पर फैसला सुनाएगा, तभी से कयास लगाए जा रहे थे कि ट्रिब्यूनल के फैसलों में ज़्यादा बदलाव नहीं किया जाएगा और करीब-करीब ऐसा ही हुआ भी. सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर जहां कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने खुशी जताई है, वहीं तमिलनाडु में विपक्ष पार्टी डीएमके ने राज्य की पालनीसामी सरकार पर आरोप लगाया कि उन्होंने किसानों को धोखा दिया है. तमिलनाडु सरकार ने फैसले की समीक्षा की बात कही है.

कर्नाटक की कांग्रेस सरकार के मुख्यममंत्री सिद्धारमैय्या
कर्नाटक की कांग्रेस सरकार के मुख्यममंत्री सिद्धारमैय्या

दोनों ही राज्यों में हिंसा फिर से न भड़क जाए, इसके लिए तमिलनाडु ने कर्नाटक सीमा की सुरक्षा बढ़ा दी है और दोनों राज्यों के बीच बस सर्विस रोक दी गई है. फैसला सुप्रीम कोर्ट ने भले दे दिया हो, लेकिन आशंका यही जताई जा रही है कि कावेरी के पानी पर अभी और विवाद होगा.


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