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'काबुल का कसाई' लौट आया है, जिसे तालिबान भी मारने के लिए खोजता है

गुलबुद्दीन हिकमतयार करीब बीस साल बाद चार मई को काबुल लौट आया. सैकड़ों गाड़ियों के बड़े से काफिले के साथ वो काबुल में घुसा. गाड़ियों पर हथियार थे. मशीनगनें लगी थीं. काबुल में आकर वो राष्ट्रपति भवन में घुसा और राष्ट्रपति अशरफ गनी से मिला. 2016 के सितंबर में अफगान सरकार से उसका शांति समझौता हुआ है. अब वो पॉलिटिकल लाइफ में एक्टिव होना चाहता है.

तब अमेरिका और तालिबान से जूझ रहे अफगानिस्तान में वहां की नेशनल यूनिटी गवर्नमेंट ने एक शांति समझौता किया था. गुलबुद्दीन हिकमतियार के साथ. हिज्ब-ए-इस्लामी का नेता. तालिबान के बाद जो आतंकवाद में नंबर दो है अफगानिस्तान में. जिसे काबुल का कसाई कहते हैं. इस समझौते में तय हुआ कि हिकमतियार हिंसा का रास्ता छोड़ संविधान की बात मानेगा.

अफगानिस्तान के लिए ये एक बहुत ही भयावह मोड़ है. एक तरफ शांति के लिये ये खतरनाक आतंकवादी तैयार हो गया है. वहीं दूसरी तरफ इसका पुराना रिकॉर्ड ऐतबार लायक नहीं है. क्योंकि ये अकेला ऐसा आदमी है जिसने अमेरिका, रूस, पाकिस्तान, ईरान, सऊदी अरब सबसे अलग-अलग रिश्ते बनाये और सबको धोखा दिया. सिविलियन, दुश्मन, नेता किसी को मारने में ये नहीं हिचका. ये ऐसा आतंकवादी है, जिसे तालिबान भी मारने के लिए खोजता है.

ये अफगानिस्तान का प्रधानमंत्री रह चुका है. कभी ये इंजीनियरिंग भी पढ़ता था. आतंकवादियों के ग्रुप में इसे ‘इंजीनियर हिकमतियार’ कहा जाता है. एक आम भारतीय इंजीनियर की तरह इसे भी अपना करियर ऑब्जेक्टिव नहीं पता है. इसे भी वही बीमारी है. नहीं जानता, क्या कर रहा है. पर कर देता है. शियाओं के देश ईरान में भी 6 साल रहा है. सुन्नी सऊदी से पैसे मंगाए. नए सुन्नी-प्रेमी पाकिस्तान में भी रहा है. लेकिन इस इंजीनियर को अगर भारत ने हायर कर लिया, तो ये उड़ी का बदला भी दिला सकता है. इसको खाली समझाने की जरूरत है कि इसमें बहुत स्कोप है.

तब आया ये जब अफगानिस्तान का दुर्भाग्य परवान चढ़ा था

अफगानिस्तान के बहुत ही गाढ़े समय की पैदाइश है हिकमतियार. सोवियत रूस देश पर चढ़ाई कर रहा था. और अमेरिका हिकमतियार जैसे लोगों को उनसे लड़ा रहा था. लेकिन बाद में आतंकवाद से लड़ने के नाम पर अमेरिका ने अफगानिस्तान में एकदम धुंध फैला दी तब हिकमतियार इनसे भिड़ गया. अमेरिका ने इसे ग्लोबल टेररिस्ट घोषित कर दिया. आम तौर पर आतंकवादी खुद को आतंकवादी नहीं मानते. पर इसने ख़ुशी-ख़ुशी वो लेबल ले लिया अपने ऊपर.

सत्तर के दशक में ये स्टूडेंट हुआ करता था. 22 की उम्र में इसने एक स्टूडेंट का मर्डर कर दिया. एक और छात्र-नेता मसूद के मर्डर का भी प्लान किया पर फेल हो गया प्लान. मसूद बाद में अफगानिस्तान का बड़ा नेता बना था. दोनों के बीच की लड़ाई तब तक जारी रही. क्योंकि दोनों ही अफगानिस्तान के दो बड़े ग्रुप से जुड़े थे.

अफगानिस्तान में इस्लामिक आन्दोलन के दो तरीके चले थे: पहला था जमीअत-ए-इस्लामी मतलब इस्लामिक समाज. इसके नेता थे बुरहानुद्दीन रब्बानी जिनका मानना था कि समाज में धीरे-धीरे घुस के सबको बदल देना है. दूसरा था हिज्ब-ए-इस्लामी मतलब इस्लामिक पार्टी. हिकमतियार इसका नेता था. इसका मानना था कि सब कुछ अभी बदल देना है. प्यार से या मार से. दोनों ही ग्रुप देश को पुराने जमाने में ले जाना चाहते थे. ताकि इनकी ताकत बनी रहे. नए जमाने से तो सबको डर लगता है. क्योंकि लोग प्रश्न पूछना शुरू कर देते हैं. ऐसे लोगों को सिर्फ ऑर्डर देने की आदत होती है. जवाब देने की नहीं. लोकतंत्र से इसीलिए ये डरते हैं.

बुरहानुद्दीन रब्बानी
बुरहानुद्दीन रब्बानी

सत्तर और अस्सी के दशक में अफगानिस्तान राजनीतिक चक्रवात से गुजरा. बगल के देश पाकिस्तान में जिया-उल-हक़ तानाशाही फैला रहे थे. और अपने शासन को सही साबित करने के लिए वो अफगानिस्तान में भी सब कुछ हिला के रख देना चाहते थे. इसके लिए ISI ने हिकमतियार को सपोर्ट करना शुरू कर दिया. वहीं ईरान में इस्लामिक शासन आ गया था. वहां भी काफी मसाला था हिकमतियार के लिए.

पर ये कुछ अलग ही मिट्टी का बना था. सबको लगता कि ये मेरी तरफ है. पर ये सिर्फ अपनी तरफ था. कब किसको मरवा देगा किसी की मदद से, या किसकी मदद के लिए, ये किसी को नहीं पता था.

90 के दशक में बना ये काबुल का कसाई

अफगानिस्तान में कई तरह के आतंकवादी ग्रुप उभरे: तालिबान के दो अलग ग्रुप, इस्लामिक मूवमेंट ऑफ़ उज्बेकिस्तान, अल-कायदा और हक्कानी नेटवर्क. 

सोवियत रूस के जाने के बाद 90 के दशक में सारे आतंकवादी ग्रुप काबुल पर कब्जा करने की कोशिश कर रहे थे. उस वक़्त हिकमतियार ने अपने लोगों को ही मारना शुरू कर दिया. विरोधियों को मारने के लिए इसने सिविलियन जनता को भी नहीं छोड़ा. 50 हज़ार लोग मारे गए. काबुल के लोग दंग रह गए. आतंकवादी तो वो दूसरे देश के लिए थे ना. पर अपने ही लोगों को मारना? फिर ये 1996 में वहां का प्रधानमंत्री भी बन गया. पर जब तालिबान ने काबुल में अपनी ताकत बढ़ाई तो हिकमतियार को देश छोड़कर भागना पड़ा. क्योंकि सऊदी अरब और पाकिस्तान ने भी तालिबान को फुल सपोर्ट करना शुरू कर दिया.

फिर इसने ईरान में डेरा जमाया. पर धीरे-धीरे इसकी ताकत कम होने लगी. क्योंकि काबुल से कॉन्टैक्ट कम हो गया. तो इसने वहीं से अफगानिस्तान सरकार का विरोध करना शुरू कर दिया. ईरान के लिए ये बड़ा मुश्किल हो गया. क्योंकि अफगानिस्तान में शांति ईरान के लिए जरूरी है. ईरान ने इसको देश से बाहर कर दिया.

सुन्नी इस्लाम से चलकर अब बन रहा है शांति-दूत, जो भारत के लिए मौका है

इस्लाम को हर लड़ाई में खींच लाने वालों में इसका नाम सबसे ऊपर है. 90 के दशक में इसने सुन्नी इस्लाम को अपने पश्तून लड़ाकों की मदद से घर-घर में पहुंचाने की कोशिश की. नतीजन बाकी सभी आतंकवादियों ने यही तरीका अपनाया. जिससे पीछे लौटना नामुमकिन होते गया अफगानिस्तान के लिए.

2002 में ये वापस अफगानिस्तान पहुंचा. कहीं छुप के रहने लगा. फिर सरकार गिराने की कोशिश करता रहा. इसके बाद इसने अल-कायदा और तालिबान को भी अपना बताना शुरू कर दिया. 2006 में तो इसने इंटरव्यू देकर कहा कि तोरा-बोरा की पहाड़ियों से लादेन को भगाने में इसने ही मदद की थी. 2008 में प्रेसिडेंट हामिद करजई पर हमला भी करवाया. पर वो बच गए.

अब अफगानिस्तान में मुल्ला उमर और सिराजुद्दीन हक्कानी के बाद ये तीसरे नंबर का आतंकवादी-नेता बनना चाहता है. उमर भी काफी हो गई इसकी और हेल्थ काफी खराब हो गई है. तो ऐसे में इसे पॉलिटिकल आदमी बनना ज्यादा सोहा रहा है. हालांकि पॉजिटिव सोचने वालों के लिए इसका रुख मन बहलाने वाला है. पर साथ ही ये डर भी है कि कहीं ये छलावा ही ना हो. पर अगर भारत अपनी कूटनीति मजबूत करे तो इसका फायदा उठाया जा सकता है. अभी अफगानिस्तान भारत से बहुत अपेक्षा रखता है. अगर भारत ने भी अपनी अपेक्षाएं बढ़ा दीं तो पाकिस्तान से निपटने के लिए ये कारगर होगा. हिकमतियार को चाहिए सत्ता और भारत को चाहिए पाकिस्तान की गर्दन. जैसे-जैसे अफगानिस्तान में तालिबान की ताकत कम होगी, वैसे-वैसे पाकिस्तान में फ्रस्ट्रेशन बढ़ेगी. भारत तो वैसे ही इंजीनियर लोगों से खेलता रहता है. एक और सही. हालांकि ये बहुत दूर की कौड़ी है.


 

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