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रत्ना पाठक शाह ने मां दीना पाठक को याद कर जो लिखा, उसे पढ़कर आप अमीर हो जाएंगे

4 मार्च को दिग्गज एक्ट्रेस दीना पाठक का जन्मदिन होता है. उन्होंने थिएटर एक्टिंग से लेकर पैरलेल और मेनस्ट्रीम हर तरह के सिनेमा में काम किया. उन्हें गुलज़ार की ‘मीरा’, केतन मेहता की ‘मिर्च मसाला’, गोविंद निहलानी की ‘तमस’ जैसी फिल्मों के लिए याद किया जा सकता है. मेनस्ट्रीम की बात करें, तो ऋषिकेश मुखर्जी की ‘गोलमाल’ और ‘खूबसूरत’ जैसी फिल्मों में उन्हें देखा गया. सुभाष घई की ‘परदेस’ भी उनकी चर्चित फिल्मों में से एक है. दीना, रत्ना पाठक शाह और सुप्रिया पाठक कपूर की मां भी थीं. इस नाते वो नसीरुद्दीन शाह और पंकज कपूर की सास हुईं. अपनी मां की 100वीं बर्थ एनिवर्सरी पर रत्ना पाठक शाह ने उन्हें याद करते हुए स्क्रॉल डॉट इन के लिए एक पर्सनल सा राइट-अप लिखा है. रत्ना पाठक शाह की परमिशन से हम आपको उस राइट-अप का हिंदी तर्जुमा पढ़वा रहे हैं.


”ढेर सारी यादों के बीच मुझे एक किस्सा कभी नहीं भूलता.

30 एक्टर्स का झुंड मुंबई से ट्रेन पर चढ़ रहा था. उनमें सिर्फ 15 लोगों के पास टिकट थी. हम सब लोग अहमदाबाद जा रहे थे. ‘मिथ्या अभिमान’ नाम के नाटक का मंचन करने, जिसे दीना पाठक ने डायरेक्ट किया था. उस शो के लिए हमें वहां किसी तरह पहुंचना था. ऐसे में सब लोग घबराए हुए थे, सिवाय मेरी मां के. उन्होंने हमें ये आश्वासन देते हुए ट्रेन पर चढ़ा दिया कि मैनेज कर लेंगे. और हमने मैनेज कर भी लिया. या यूं कहें कि उन्होंने मैनेज कर लिया.

हम कुछ कहते, इससे पहले ही कंपार्टमेंट में ‘दीना पाठक दीना पाठक’ की फुसफुसाहट सुनाई देने लगी. मां की मुस्कुराहट पूरे कंपार्टमेंट में फैल गई. दूसरे यात्रियों ने हमें सीट और अटेंशन दोनों देनी शुरू कर दी. बहुत सारे लोगों ने उनका नाटक ‘मेना गुर्जरी’ देख रखा था. कुछ लोगों ने उनकी फिल्में देखी थी, जिसमें से ‘जल बिन मछली नृत्य बिन बिजली’ उनकी पसंदीदा फिल्म थी (तब तक गोलमाल नहीं आई थी). कुछ लोग अपने अंकल-आंटी के बारे में बता रहे थे, जो दीना पाठक को जूनागढ़, अहमदाबाद, पुणे या मुंबई से जानते थे.

बाकी लोग उनकी वाइब्रेंट पर्सनैलिटी देखकर हैरान थे. क्योंकि वो लोगों से गुजराती के तीन अलग-अलग डायलेक्ट में बात कर रही थीं. ज़रूरतानुसार उसमें ठेठ मराठी और बंगाली भाषा की मिलावट भी हो रही थी. लोग उनके साथ अपना नाश्ता शेयर कर रहे थे. वो तरह-तरह की कहानियां सुनाकर लोगों का मनोरंजन कर रही थीं. इससे पहले कि हम दहानु पहुंचते, 15 बेटिकट लोग कंपार्टमेंट में सेटल हो चुके थे. टिकट कलेक्टर को भी पैसे देकर खुश किया जा चुका था. अब पूरे कंपार्टमेंट में हम ही हम थे. कुछ मामले तो ऐसे थे कि जिन लोगों की बर्थ है, वो खुद एक कोने में दुबके हुए हैं. उनकी जगह हम पसरे हुए हैं.

ऐसी थी मेरी मां. या यूं कहें कि ये उनकी पर्सनैलिटी का सबसे ज़रूरी हिस्सा था. उन्हें लोगों से प्यार था. वही उनकी प्रयोगशाला थे. वही लोग उनका एक्टिंग ट्रेनिंग स्कूल थे. लोगों से ही उन्हें आइडिया मिलते थे. वो कवि, लेखक, संगीतकार, डांसर, विद्वान, साइटिंस्ट, नेता, ट्रेड यूनियन, किसान, दुकानदार, बार्बर और पत्रकार जैसे तमाम दिलचस्प लोगों की सोहबत में रहती थीं. मुझे नहीं लगता कि वो कभी पढ़ती या रिसर्च करती थीं. उन्हें जो कुछ भी आता था वो उन्हीं लोगों से पिक करती थीं.

वो स्पॉन्ज की तरह सारे आइडियाज़ सोखती रहतीं, फिर उन्हें अपनी एक्टिंग और लाइफ में इस्तेमाल करतीं. वो हर तरह के लोगों को करीब से जानती थीं. न्यूक्लीयर साइंटिस्ट से लेकर नर्स, सबकी कंपनी एंजॉय करती थीं. वो लोगों को देखकर नर्वस नहीं होती थीं. बड़ी खुशी से ये बात स्वीकार करतीं कि उन्हें दूसरे विषयों की ज़्यादा जानकारी नहीं है. चाहे वो उर्दू पोएट्री हो या दाल ढोकली बनाना. पहले वो सामने वाले को कंफर्टेबल करतीं, फिर देखतीं कि सामने वाले से क्या ले सकती हैं. अगर ये सारी बातें उन्हें लोगों को इस्तेमाल करने वाला व्यक्ति बनाती हैं, तो ये उनकी पर्सनैलिटी का गलत चित्रण नहीं है. वो अपनी ज़रूरत के लिए लोगों का इस्तेमाल करती थीं. मगर बदले में उन्हें बहुत कुछ देती भी थीं.

जो लोग उनके दोस्त बने, उन्हें वो अपना समय देती थीं. दुलार करती थीं. उन लोगों और उनके परिवार में जेन्यूइन इंट्रेस्ट रखती थीं. देशभर में उनके कई करीबी और लॉन्ग टाइम फ्रेंड्स थे. कई बार मैं और मेरी बहन सुप्रिया मज़ाक-मज़ाक में कहते थे कि इंडिया में ऐसा कोई शहर नहीं है, जहां लोग गर्मजोशी से अपने घरों में मां का स्वागत न करें. जिन लोगों ने उनके साथ काम किया, उन्हें कमिटमेंट देती थीं. उनकी उत्सुकता, बेहतर करने की भूख, निभाए गए किरदारों की मानवीय समझ और लोगों में सच्चा इंट्रेस्ट, मां को उन लोगों के परिवारों का हिस्सा बना देता था. वो जैसे किसी हेयरड्रेसर से बात करती थीं, डायरेक्टरों के प्रति भी उनका बर्ताव वैसा ही रहता था. जिनसे उनकी हल्की-फुल्की बात भी होती थी, जैसे ट्रेन के साथी यात्री या उन रोटरी मीटिंग में शामिल लोग, जिन्हें वो संबोधित करती थीं, वो उन लोगों और उनके परिवारों का भी खूब ख्याल रखती थीं.

एक बार वो शिरडी जा रही थीं. रास्ते में एक महिला और उनकी तीन बेटियों से उनकी दोस्ती हो गई. इसके कई सालों बाद तक वो ठाणे में उनके घर जातीं और साउथ इंडियन खाने का लुत्फ लेतीं. जब उनकी बेटियों की शादी की बात छिड़ी, तो वो उनके लिए लड़का ढूंढने में लग गईं. उनके इकलौते बेटे के लिए लड़की ढूंढी. शादी में आए मेहमानों को फिल्मी किस्से सुनाकर उनको खूब एंटरटेन किया. एक तरह से वो उस फैमिली का हिस्सा ही बन गईं. मैं या सुप्रिया मां से कभी नाराज़ या परेशान नहीं हुए. इससे ये पता चलता है कि वो हमारा भी बहुत ध्यान रखती थीं. उल्टे हमें ये देखकर खुशी और प्राउड फील होता था कि दूसरे लोग उन्हें कितना प्यार करते हैं. वो किसी के भी साथ घुल-मिल जाती थीं. उनकी मामी हमेशा कहती थीं-

”दीना नींबू के रस जैसी है. खट्टी और मीठी दोनों.”

उनकी मामी ये बात ज़ाहिर तौर पर उन्हें बचपन में कहा करती थीं. मगर मां उनकी इस कहावत को दिल से लगा बैठीं. उन्होंने अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा, लोगों के साथ फिट-इन होने में खर्च कर दिया. वो सौराष्ट्र के एक सिविल इंजीनियर की अच्छी बिटिया से ‘अगर मेरी बड़ी बहन कर सकती है, तो मैं भी क्रांति कर सकती हूं’ वाले जोन जा रही थीं. तभी उन्हें अपने भीतर के एक्टर के बारे में पता चला, जो कि उनके अस्तित्व की नींव साबित हुआ. वो एक आकर्षक, जिंदादिल और मल्टी-टैलेंटेड परफॉरमर बनीं. आगे चलकर मजबूत और स्थिर थिएटर पर्सनैलिटी में तब्दील हुईं. 1940-50 के दशक में जब देशभर के थिएटर नए और आधुनिक पहचान की तलाश में थे, तब उन्होंने ‘नट मंडल’ शुरू किया. ये नाटक कंपनी उन्होंने अहमदाबाद में शुरू की थी. इसके तहत ‘भवई’ जैसी लोक कथा पर बेस्ड ‘मेना गुर्जरी’ और ‘डॉल्स हाउस’ नाम के यूरोपियन नाटक पर बेस्ड ‘ढिंगली घर’ समेत तरह-तरह के नाटकों का मंचन किया जाता था.

वो देश की कुछ चुनिंदा फीमेल एक्टर मैनेजरों में से एक थीं. अपने ट्रूप को पूरे फोकस के साथ ट्रेनिंग देती थीं. उनका सपना था कि वो प्रोफेशनल गुजराती थिएटर कंपनी शुरू करें. ये वो गुण थे, जो उन्होंने इंडियन पीपल्स थिएटर असोसिएशन (IPTA) के साथ जुड़े रहने के दौरान सीखी थी. इसी समय उन्होंने बंगाल में पड़े सूखे के लिए फंड जुटाने के लिए देश के कोने-कोने में जाकर डांस शोज़ किए. ये वो अनुभव थे, जिन्होंने उन्हें बदलकर रख दिया. और इसका प्रभाव जीवनभर उन पर रहा. वो समाज में समानता की पुरजोर समर्थक थीं. अपने आखिरी दिनों तक वो वर्किंग क्लास के आंदोलनों में शामिल रहीं.

फिर उनके जीवन में बड़ा परिवर्तन आया. वो सिनेमा, घर-गृहस्थी और बच्चों को पालने में लग गईं. मेरा मानना है कि जीवन के इन अलग-अलग पड़ावों पर फिट-इन होने के लिए उन्होंने अपनी पर्सनैलिटी में कई बुनियादी और ज़रूरी बदलाव करने पड़े. वुडी ऐलन की फिल्म ‘ज़ेलिग’ के किरदार की तरह वो हर बार अलग इंसान बन जातीं. वो उन्हीं लोगों की तरह बन जातीं, जिनसे वो घिरी रहती थीं. मगर इस कहानी की असली जीत इस बात में है कि वो हमेशा अपने कई किरदारों के योग से ज़्यादा थीं. ये सारी अलग-अलग दीना एक साथ रहती थीं. एक-दूसरे से अलग मगर एक दूसरे से जुड़ी हुईं. तमाम दुखों और अधूरे वादों के बीच उनके जीवन के हर दौर में अलग-अलग दोस्त बने. वो अच्छे दोस्त बने रहे. मगर उन्हें खुद से या दुनिया से कोई शिकायत नहीं थी.

मां की एक और मेमरी है मेरी.

देर रात को लैंप की मद्धम रोशनी में मां एक बड़े से डबल बेड पर बैठी हुई थीं. चारों तरफ कार्ड बिखरे थे. वो जैपनीज़ रमी खेल रही थीं. ये खेल आमतौर पर दो या उससे ज़्यादा लोगों के बीच खेला जाता है. मगर मां दोनों के लिए खुद खेलने लगीं. दोनों के लिए चीटिंग करतीं. एक के जीतने पर खुश होतीं, तो दूसरे के हारने का ग़म मनातीं.

आखिर तक उनका ये बदलाव नहीं रुका. उनका आखिरी और मेरे पति के मुताबिक सबसे सफल अवतार रहा नानी का. वो हमारे बच्चों के साथ अद्भुत तरीके से पेश आती थीं. वो He-Man से लेकर GI Joe, क्रिकेट, WWF, स्टीरियो नेशन और बैकस्ट्रीट बॉयज़ के बारे में भी जानती थीं. ये उन्हें बच्चों ने सिखाया था. ‘कुछ कुछ होता है’, बार्बी डॉल और चनिया चोली के बारे में उन्हें लड़कियों ने बताया. वो हमारे बच्चों की कहानियां सुनतीं. अपनी कहानी उन्हें सुनातीं. जैसे कि मेरा बेटा कहता है-

”अगर बा आसपास रहती थीं, तो चीज़ें कभी बोरिंग नहीं होती थीं. वो सबका मन बहलाकर रखती थीं.”

इसमें हम सबके लिए एक सीख है. सीख ये कि हम सबको कैसे डिग्निटी और ग्रेस के साथ बूढ़े होना चाहिए. बिना शिकायत एकाकीपन को कैसे स्वीकार किया जाना चाहिए. वो चार पीढ़ियों से जुड़ी रहीं. अपने माता-पिता से लेकर हमारे बच्चों तक. वो हमारे जीवन का हिस्सा बने रहना चाहती थीं. ताकि हमारी खुशियों में शामिल हो सकें. अनजाने में उन्होंने मुझे बताया कि एक इंसान के लिए उसका परिवार या खासकर बच्चे क्या कर सकते हैं. वो सबसे नैचुरल तरीके से खुद से परे देखने के लिए प्रेरित कर सकते हैं. मैंने मां से कम अंहकारी इंसान नहीं देखा. अगर मैं किसी के जैसा बनना चाहूं, तो मैं उनसे बेहतर उदाहरण नहीं ढूंढ सकती.

अपनी इवेंटफुल लाइफ के 100 साल पूरे होने पर उनके पास दिखाने के लिए क्या है? कमाल का काम करने की यादें- मगर दुर्भाग्य से उनका कोई रिकॉर्ड नहीं है. कुछ ठीक-ठाक, मगर अधिकतर औसत फिल्में, जो दुर्भाग्य से रिकॉर्ड पर हैं. तेजी से घटते वो लोग, जो थिएटर में उनके योगदान की गवाही दे सकते हैं. कुछ अवॉर्ड्स. मगर उनके काम को आगे बढ़ाने वाला कोई थिएटर ग्रुप नहीं. बड़ी संख्या में वो लोग, जो उनके प्रति प्रेम और सम्मान का भाव रखते हैं. और फाइनली सुप्रिया और मैं.

आखिरी चीज़ मेरे लिए सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण है. हमने ऐसा क्या किया/सीखा, जिससे उन्हें हम पर गर्व हो? एक्ट्रेस के तौर पर हम उनसे बहुत अलग हो सकते हैं. मगर इंसान के तौर पर हमारे पास ढेरों ऐसी चीज़ें हैं, जिसके लिए हम उनके शुक्रगुज़ार हैं. हमने उनसे सीखा कि लोग अच्छे होते हैं. दिलचस्प होते हैं. जीवन का आधार होते हैं. उनसे डरने की ज़रूरत नहीं है. उन्हें प्रेम और स्वीकार्यता से ट्रीट करने की ज़रूरत है. वो हमारे जीवन के अन्य पहलुओं का महत्व कम किए बिना भी हमारे जीवन के केंद्र में रह सकते हैं.

कहा जाता है कि बरगद के साए में कोई दूसरा पौधा नहीं पनप सकता. मगर मेरी बरगद, मेरी मां ने मुझे वो सबकुछ हासिल करने में मदद की, जो मैं करना चाहती थी. उन्होंने मुझे सपोर्ट किया, प्रोत्साहित किया, सही राह दिखाई, आलोचना की. मैंने जो भी करना चाहा, उसमें उन्होंने मेरा साथ दिया. उन्होंने कभी बांधने की कोशिश नहीं की. मुझे निर्बाध रहने दिया. और सबसे ज़रूरी बात ये कि उन्होंने मुझे एक पल के लिए भी संदेह नहीं होने दिया कि वो मुझे प्यार और मुझे पर यकीन करती हैं.

उन्होंने जो कुछ मुझे दिया, उसे वापस करने का एक ही तरीका है- कि मैं उनकी सीख अपने बच्चों तक पहुंचाऊं. मैं उन्हें बताऊं कि खुद को नींबू जूस बनने दो. ताकि अपने जीवन का स्वाद चख सको. चाहे खट्टा या मीठा!”


वीडियो देखें: नसीरुद्दीन शाह और पंकज कपूर से भी बड़ी तोप एक्टर हैं उनकी सासू मां

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