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'हम पर बोलते हो तो उन पर क्यों नहीं' पूछने वालों को एक देशभक्त का जवाब

एक साल का हुआ लल्लनटॉप अभी तक इतने पदों पर आसीन हो चुका है जिन पर लोगों की उम्र बीत जाती है, नहीं बैठ पाते. हर आर्टिकल में नीचे कमेंट संलग्न रहते हैं उपाधियों वाले. खानग्रेसी, आपिया, खाजपाई, सिकुलर, वामपंथी, मुल्ला वगैरह अनगिनत उपाधियों से हमको अनुग्रहीत किया जाता है. खैर ये बहुत अच्छी बात है कि गालियों के माध्यम से ही सही, हमसे जुड़े तो हैं. और हमसे सवाल भी करते हैं. वैसे ही सवाल जैसे हर सवाल उठाने वाले से किए जाते हैं. याद करो जब दिवाली पर पटाखे कम फोड़ने की दरख्वास्त किसी ने की तो उससे क्या सवाल किया गया. “बकरीद पर क्यों चुप हो जाते हो?” बकरीद में बांग्लादेश की नालियों में बहा खून दिखाया गया तो उधर वाले बिफर गए. “ये तो फोटोशॉप है, नेपाल में होने वाली जानवारों की कुर्बानी पर क्यों नहीं बोलते?” एक तरफ के बुरके पर बोलो, तीन तलाक पर बोलो तो उबल जाते हैं, वृंदावन की विधवाओं पर भी कुछ लिखो. मतलब जलीकट्टू पर बोलो तो तीतरों की लड़ाई पर भी उसी वक्त बोल दो और मगरमच्छों की लड़ाई के बारे में भी और जहां जहां ऐसे खेल होते हों उन सबको गूगल करके खोजो, उन पर बात करो फिर मुद्दे पर आओ.

बकरीद में बांग्लादेश की गलियां कुछ ऐसी हो गई थीं
बकरीद में बांग्लादेश की गलियां कुछ ऐसी हो गई थीं

जब धर्म की चरम व्याख्या करने वाले कुछ मानवों ने राजधानी ढाका के होली आर्टीसन कैफे में 20 विदेशियों को क़त्ल कर दिया. कथित तौर पर उन्होंने बंधकों को पहले कुरान की आयतें सुनाने को कहा, जो नहीं सुना पाए, उन्हें मार दिया गया. इरफान खान ने उस मौके पर जो कहा था उस पर ये कमेंट उनको मिले.

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इस वक्त भी वही माहौल चल रहा है. संजय लीला भंसाली पिट गए. पता नहीं वो कौन सी पद्मावती की कैसी प्रेमकहानी दिखाने वाले थे. वो कहानी छोड़ दो. संजय और करणी सेना में प्रेमकहानी जन्म ले चुकी है. समझौता हो चुका है. उससे पहले इस मुद्दे पर बॉलीवुड से लेकर हिंसा और मार पीट के खिलाफ हर आदमी ने अपना स्टैंड क्लियर किया. उन पर ऑनलाइन देश और जाति भक्तों की गालियों का सिलसिला शुरू हो गया. एक भारी सवाल था “जब विश्वरूपम आई थी और बैंगलोर में मुस्लिम संगठनों ने फिल्म बंद करा दी थी, कमल हासन की सारी पूंजी डूबी जा रही थी उस वक्त क्यों चुप थे?”

ऐसे यही दो सवाल नहीं हैं. अगर सोशल मीडिया और असली सोसाइटी में एक्टिव हो तो ऐसे अनगिनत सवाल रोज सामने आते होंगे. जैसे 84 में कहां थे? हाशिमपुरा के टाइम कहां थे? कैराना के टाइम कहां थे? गोधरा के टाइम कहां थे? दादरी के वक्त कहां छिप गए थे? कश्मीरी पंडितों के वक्त जबान का लकवा मार गया था? तब कहां चली गई थी असहिष्णुता?

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ये सिर्फ सवाल नहीं हैं. कभी न खत्म होने वाले सवाल हैं. जिनका मतलब है कि अगर तुमने पहले किसी गलती के विरोध में सवाल नहीं उठाया है तो कभी नहीं उठा सकते. वस्तु स्थिति और परिस्थितियों से इन सवालों का कोई लेना देना नहीं है. इन्हें ये बताने का कोई फायदा नहीं है कि विश्वरूपम जब 2013 में आई थी तो सोशल मीडिया का जाल इतना नहीं फैला था. गिने चुने लोग फेसबुक ट्विटर इस्तेमाल करते थे. टीवी पर खबर देखते थे और मन में गाली देकर रह जाते थे कि क्या उलटबांसी चल रही है इस देश में. जितना पीछे जाओगे, छोटी बड़ी घटनाओं पर उतना ही विरोध कम देखने में आता जाएगा. सोचो जो हाल ट्रंप का अभी कर रखा है दुनिया ने विरोध करके वो क्या पचास साल पहले संभव था? हुआ तो था एक हिटलर, कितने लोगों ने उसका विरोध करके कत्लेआम रोक लिया था? लेकिन अब विरोध होता है. जर्मनी में खुलकर विरोध होता है हिटलर का. क्योंकि लोगों के पास साधन हैं अपनी बात फैलाने के, हर आम खास तक पहुंचाने के.

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अगर आज किसी उपद्रवी पर सवाल उठाने वाले को ही कठघरे में खड़ा कर देते हो तो कोई क्यों किसी की लड़ाई लड़ेगा. क्यों कोई किसी के लिए खड़ा होगा. आज किसी करणी सेना ने किसी भंसाली को पीटा है इतिहास से कथित छेड़छाड़ के लिए, कल आपको पीटेगा उसका जबरदस्ती का इतिहास न रटने के लिए. कोई क्यों खड़ा होगा ऐसी सेनाओं के खिलाफ. सबसे अच्छा रास्ता निकाला सवाल उठाने वालों को ही मुजरिम बनाने वालों ने. अनुराग कश्यप ने ट्वीट किया कि हिंदू आतंकवाद ट्विटर से निकलकर बाहर आ गया है बस उसकी ले दे शुरू हो गई. मतलब थप्पड़ मारने वाले की कोई गलती ही नहीं है. सारा गुनाह उसका है जो उस थप्पड़ के खिलाफ बोल रहा है. और फिर ये भी कहते जाते हैं कि कहां हिंदू आतंकवाद? कहां है असहिष्णुता? आतंकवाद खाली बम और सुसाइड स्क्वॉड वाला थोड़ी होता है. तुमने एक कलाकार को थप्पड़ मार दिया. वहीं उसकी हत्या हो गई. वो अच्छा कलाकार था या बुरा, लेकिन लट्ठमारों से सही था. उसकी हत्या करने के बाद पूछते हो कहां है आतंकवाद? अगर सीरिया अलेप्पो लेवल का सपना पालकर बैठे हो तो आमीन. वो दिन भी देख जाओ भई. आखिर हमारी इतनी प्राचीन संस्कृति है. उनसे कम थोड़ी हैं हम किसी काम में.

 

कुछ महानुभावों को “डबल स्टैंडर्ड से डर लगा.” वो खुद इस्लामिक आतंकवाद पर बल्लियों उछलते हैं लेकिन ऐसी मारपीट की नकारा हरकत को जस्टिफाई करने में कोई कसर नहीं छोड़ते. शिकायत है डबल स्टैंडर्ड की. ऐसे डबल स्टैंडर्ड वालों की क्लास बीते अक्टूबर में रेणुका शहाणे ने लगाई थी. ऐसे ही विराट विचारों और गौरवशाली इतिहास भूगोल वाले लोग बंबई में पाए जाते हैं. महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना वाले. उनको पुराने महाराष्ट्र से प्रेम है. पता नहीं किस जमाने के. लेकिन उनको उसका नवनिर्माण करना है. नॉर्थ इंडियन्स को वहां से भगाते हैं. रेणुका ने फेसबुक पोस्ट लिखी थी. जिसके मुताबिक 2008 में मनसे वालों ने नॉर्थ इंडियन्स को निशाना बनाया. तो जया बच्चन ने कहा “कौन है ये राज ठाकरे?”

2008 सितंबर में यूपी के ब्रांड अंबेसडर बने अमिताभ तो फिर मनसे के निशाने पर आ गए. तो एक म्यूजिक लॉन्च के मौके पर अमिताभ ने राज ठाकरे की मौज ले ली. मनसे ने अमिताभ की “द लास्ट लियर” के खिलाफ आंदोलन छेड़ दिया. अमिताभ ने अपने कहे पर माफी मांग ली. फिर 2016 में राज ठाकरे ने अपने हाथ से बनाया अमिताभ का पोर्ट्रेट उन्हें भेंट किया और राज ठाकरे के बेटे के बड्डे पर अमिताभ ने घड़ी गिफ्ट की. उसके बाद अमिताभ गुजरात के ब्रांड अंबेसडर बने तो झगड़ा नहीं हुआ क्योंकि गुजराती-मराठी भाई भाई. दुश्मनी तो सिर्फ नॉर्थ वालों से है.

2009 में करण जौहर ने वेक अप सिड नाम की फिल्म बनाई थी तो ठाकरे ने बवाल काट दिया था. क्योंकि उसके एक सीन में मुंबई नहीं बॉम्बे बोला गया था. करण जौहर ने माफी मांगी और मुंबई बदल दिया गया. फिल्म रिलीज हुई. लेकिन उधर अखबार बॉम्बे टाइम्स हमेशा से निकलता रहा है, उसके लिए कोई प्रोटेस्ट नहीं हुआ कभी. फिर सितंबर 2016 में उड़ी अटैक के बाद करण जौहर की “ऐ दिल है मुश्किल” अटक गई. क्योंकि उसमें पाकिस्तानी आर्टिस्ट था. और पाकिस्तानी हमारे दुश्मन हैं इसलिए उनकी फिल्म यहां रिलीज नहीं हो सकती. इसी तरह 26/11 हमले के बाद पाकिस्तानी कलाकारों को यहां से धक्के मारकर बाहर निकाला गया. लेकिन जनवरी 2016 में पठानकोट हमला हुआ था. उसके बाद ऋषि कपूर की “कपूर एंड सन्स” रिलीज हुई. उसमें फवाद खान ने काम किया था. तब किसी ने प्रोटेस्ट नहीं किया.

ये डबल स्टैंडर्ड नहीं है. ये किसी किस्म की कूटनीति होगी जो आंख वालों को भी नहीं दिख रही. ये कोई स्टैंडर्ड है ही नहीं दोस्त. ये पॉलिटिक्स है. हर तरह की सेना और उनके चम्मचों की पॉलिटिक्स. वो खुद सेलेक्टिव मामलों में बोलते हैं. जिनमें उनका फायदा हो. नहीं तो महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना आज कह रही है कि हिंदू राजा रानियों के इतिहास से छेड़छाड़ बर्दाश्त नहीं की जाएगी. इन्होंने ही पाकिस्तानी कलाकारों को मार भगाया था. लेकिन सरकार पाकिस्तानियों को वर्क परमिट देती है. वीजा देती है, उसके खिलाफ प्रोटेस्ट नहीं करती. वो डबल स्टैंडर्ड नहीं है. वो पॉलिटिक्स है. इनकी विचारधारा के वाहक उल्टे उपद्रवियों के खिलाफ आवाज उठाने वालों को डबल स्टैंडर्ड वाला बता देते हैं. हाऊ क्यूट.

अगर कोई आज भंसाली के थप्पड़ के खिलाफ बोल रहा है, ट्रंप के पागलपन के खिलाफ बोल रहा है और कुछ लोग बोलने वालों पर ही सवाल कर दे रहे हैं तो वो कल को ये भी सवाल कर सकते हैं कि तब कहां थे जब द्रौपदी का चीरहरण हुआ था? तब कहां थे जब राजा हरिश्चंद्र को मुर्दा जलाने की जॉब करनी पड़ी थी? तब कहां थे जब मोहम्मद साहब के परिवार को रेगिस्तान में बेरहमी से मार दिया गया था? तब कहां थे गब्बर सिंह को बीस साल के लिए जेल में डाल दिया गया था? तब कहां थे जब कहा जा रहा था हाईस्कूल पास कर लो, जिंदगी आसान हो जाएगी?


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