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वो मौका, जब बेगम अख्तर ने कैफी आज़मी को शराब देकर कमरे में बंद कर दिया था

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डॉ. अजीत प्रधान
डॉ. अजीत प्रधान

आज आपको लल्लनटॉप के एक दोस्त से मिलवाते हैं. डॉ. अजीत प्रधान. ये जनाब मेलबर्न में रहते थे. 1998 में स्वदेश आ गए. बिहार-झारखंड में हॉस्पिटल्स की हालत देखी नहीं गई, तो बिहार का पहला हार्ट हॉस्पिटल शुरू किया. नाम है जीवक हॉस्पिटल, जिसके 20 साल पूरे होते-होते डॉक साब के हाथों 8000 ओपन हार्ट सर्जरी हो चुकी हैं. दूसरों के दिलों के साथ-साथ ये अपने दिल का भी ख्याल रखते हैं. उनके औजार हैं म्यूज़िक और आर्ट. 2009 में नवरस स्कूल ऑफ परफॉर्मिंग आर्ट्स शुरू किया और लंबे वक्त से बिहार में क्लासिकल म्यूज़िक और आर्ट से जुड़े इवेंट्स आयोजित करा रहे हैं. पटना लिट्रेचर फेस्टिवल भी इन्हीं की देन है. आइए, देखिए इन्होंने बेगम अख्तर पर क्या लिखा है…


‘किसका ख्याल कौन सी मंजिल नज़र में रहे,
सदियां गुज़र गईं कि ज़माना सफर में है.’

एक ऐसी हस्ती, जिसका ज़िक्र किए बगैर गज़ल का सफर मुकम्मल नहीं. एक ऐसी मखमली, जादुई और सेहरगेंज आवाज़ की मालिक रहीं बेगम अख्तर.

बीबी से अख़्तरी बाई फैज़ाबादी, फिर बेग़म इश्तिय़ाक अहमद अब्बासी से बेग़म अख़्तर का सफर फैज़ाबाद से शुरू होकर गया, पटना, भोपाल, रामपुर और मुंबई से होता हुआ वापस लखनऊ पहुंचा. उनका बचपन दुखों में बीता. उनकी ज़िंदगी में दुख बेपनाह रहे और ये दुख उनकी आवाज़ का हिस्सा बन गए. वो अक्सर कहा करती थीं…

‘रंज से ख़ूगर हुआ इंसा तो मिट जाता है रंज,
मुश्किलें मुझ पर पड़ीं इतनी कि आसां हो गई.’

बेगम अख्तर और इश्तिय़ाक अहमद अब्बासी
बेगम अख्तर और इश्तिय़ाक अहमद अब्बासी

बचपन से ही मौसिकी का बहुत शौक रहा और बड़े-बड़े उस्तादों से तालीम भी ली. इसलिए उनकी गायकी में ग्वालियर घराने की जादुई तानें, किराना घराने की बढ़त, पटियाला घराने की रूमानियत और पूरब अंग की खुश्बू थी उनके लखनऊ की.

मौसिकी पर उनकी पकड़ इतनी मज़बूत थी कि ज़्यादातर वो शायरी को संगीत में खुद पिरोना पसंद करती थीं. वो वक्त था, जब शायरी का, गज़ल का अलग अंदाज़ था और महफिल का रंग निराला. और बेग़म अख़्तर उस सुरीले सफर की दिलकश मुसाफिर थीं.

Navras

बेग़म अख़्तर ने जहां ग़ालिब, द़ाग और मोमिन को गाया, वहीं हमअसर शायरों को भी गाया. उस ज़माने में शायर हज़रात में होड़ लगी रहती थी कि कैसे बेग़म अख़्तर उनकी गज़ल गाएं, क्योंकि जिन शायरों को भी बेग़म ने गाया, वो बहुत मकबूल हुए. कुछ श़ायर तो सिर्फ बेग़म अख़्तर को ही ख्याल में रखकर गज़ल लिखते थे और सिर्फ बेग़म के लिए ही लिखते थे.

बेगम अख़्तर उस वक्त अख़्तरी बाई फैज़ाबादी के नाम से जानी जाती थीं. उनकी ज़िंदगी में शायराना तहज़ीब को अपनी कलम से रंग देने वाले जो पहले शायर आए, वो थे सरदार अहमद खां याने बहज़ाद लखनवी. बहज़ाद साहब की मकबूलियत में अख़्तरी का भी हिस्सा था.

बहज़ाद लखनवी: काफी बाद की तस्वीर
बहज़ाद लखनवी: काफी बाद की तस्वीर

बात उस वक्त की है, जब अख्तरी 11 साल की थीं. उनकी अम्मी मुस्तरी बेगम उनके मुस्तकबिल को लेकर, उनके भविष्य को लेकर काफी परेशान रहा करती थीं. इसलिए वो अख़्तरी को लेकर बरेली के पीर अज़ीज़ मियां के यहां गईं. पीर अज़ीज़ मियां ने अख़्तरी को देखा और कहा ‘आप तो मल्लिका हैं’ और अख़्तरी के हाथ से उनका वो नोटबुक ले लिया, जिसमें अख़्तरी ने गज़लें लिखी थीं. पीर साहब ने नोटबुक खोली और जिस पन्ने पर उन्होंने हाथ रखा, उस पन्ने पर बहज़ाद लखनवी की गज़ल लिखी थी-

‘दीवाना बनाना है, तो दीवाना बना दे,
वरना कहीं तकदीर तमाशा न बना दे.’

पीर साहब ने अख़्तरी से कहा, ‘अगली रिकॉर्डिंग में इसे सबसे पहले गाना, शोहरत तुम्हारे कदम चूमेगी और दौलत तुम्हारी बांदी होकर घूमेगी’. फिर कलकत्ता में दुर्गा पुजा के दौरान अख़्तरी ने ये गज़ल गाई. सारंगी पर साथ थे उस्ताद बड़े गुलाम अली खां. पूरे बंगाल में तहलका सा मच गया और ये तहलका जल्द ही सारे देश में फैल गया.

पीर मियां की बात सच निकली. अख़्तरी की गज़ल ‘दीवाना बनाना है तो…’ ने न जाने कितनों को ही दीवाना बना दिया. पंडित जसराज ने ये गज़ल 6 साल की उम्र में जब सुनी, तो इस तरह दीवाने हो गए कि उन्होंने गायक बनने की ठान ली. इस रिकॉर्ड की डिमांड इतनी थी कि मेगाफोन कंपनी को खास इस रिकॉर्ड के लिए कलकत्ते में रिकॉर्ड प्रेसिंग प्लांट बनवानी पड़ी. इस गज़ल ने बेग़म अख़तर और बहज़ाद लखनवी, दोनों को मशहूर कर दिया.

एक कॉन्सर्ट में पंडित जसराज
एक कॉन्सर्ट में पंडित जसराज

बहुत सालों बाद बेग़म अख़्तर ने पीर मियां की बात याद करते हुए कहा, ‘काश पीर साहब शोहरत और दौलत के बदले मुझे थोड़े चैन और सुकून की दुआ दिए होते, तो थोड़ी खुशियां मेरे भी दामन में होतीं…’

बात 1944-45 की है. इश्तिय़ाक अहमद अब्बासी साहब से शादी के बाद बेग़म ने सालों तक गाना छोड़ दिया. ये बात जब बहजाद लखनवी साहब तक पहुंची, तो बहज़ाद साहब ने लिखना ही छोड़ दिया. एक मुशायरे के दौरान बहजाद लखनवी से उनके एक दोस्त ने पुछा, ‘जनाब, क्या हाल बना रखा है, कहीं इश्क-विश्क तो नहीं कर बैठे हो?’ इस पर बहज़ाद ने मुस्कुराते हुए कहा…

‘ऐ देखने वाले, मुझे हंस-हंस के न देखो,
तुमको भी मोहब्बत कहीं मुझसा न बना दे.’

बहज़ाद उम्र में बेग़म से काफी बड़े थे.

बंटवारे के बाद बहज़ाद साहब पाकिस्तान जा बसे. वहां एक मुशायरे में किसी ने बहज़ाद साहब से एक कलाम पढ़ने की फ़रमाइश की. पर बहज़ाद साहब चुपचाप ही बैठे रहे. तब किसी ने छेड़ते हुए उनसे कहा, ‘आपको दीवाना तो बना ही दिया है बेग़म अख़्तर ने, अब संभल भी जाओ, अब तो ये दो मुल्कों की बात है.’ इस पर बहज़ाद साहब ने चुप्पी तोड़ी और कहा, ‘मियां बात दिलों की है, ये मुल्क को बीच में क्यों लाया जाए’ और फिर अपना एक शेर सुनाया,

‘दुनियां को इल्म क्या है, ज़माने को क्या खबर,
दुनियां भुला चुका हूं, तुम्हारे ख्याल में.’

बेगम अख्तर
बेगम अख्तर

कुछ अर्से बाद बेग़म अख़्तर से किसी ने यही सवाल पुछा, ‘क्या आप बहज़ाद लखनवी से प्यार करती हैं?’ बेग़म ने बिना किसी झिझक के जवाब दिया, ‘हां, मैं बहज़ाद से प्यार करती हूं. और क्यों न करूं… जिसने मेरे गाना छोड़ने पर लिखना ही छोड़ दिया, उसे प्यार न करूं तो किसे करूं.’

एक बार बेग़म अख़्तर मंच पर जिगर मुरादाबादी की गज़ल गा रही थीं…

‘तबीयत इन दिनों बेगना-ए-गम होती जाती है,
मिरे हिस्से की गोया हर खुशी कम होती जाती है.’

बेग़म ने बड़ी खूबसूरती से इसे काफी ठाठ की राग सिंधूरा में सजाया था और इस गज़ल का मक्ता फरमाइश पर जब तीसरी बार पेश कर रही थीं, तब पंजाब का एक शायर मंच पर जा पहुंचा और बेग़म साहिबा से गुज़ारिश की, ‘आप एक बार मेरी गज़ल गा दें, तो मेरी ज़िंदगी बन जाएगी.’ और बस वहीं अपनी लिखी हुई गज़ल बेग़म साहिबा को थमा दी. बेग़म अख़्तर ने उसी वक्त मंच पर उस शायर की गज़ल को संगीत से सजाकर सुर दिया और कहा, ‘बड़े अच्छे शायर हो, बड़े अच्छे ख्याल हैं और ज़ुबान, माशाअल्लाह़…’ वो शायर कोई और नहीं, सुदर्शन फाकिर थे, जो बेग़म के कारण ही मुशायरों की शान बन गए.

सुदर्शन फाकिर
सुदर्शन फाकिर

सुदर्शन फाकिर भी उन्ही शायरों में थे, जो बेग़म अख़्तर के लिए ही लिखते थे और बेग़म अख़्तर के कारण ही मशहूर हुए.

अगर कोई गज़ल बेग़म अख़्तर की कहानी सचमुच बताती है, तो वो गज़ल है सुदर्शन फ़ाकिर की. ये गज़ल, जो उन्होंने बेगम के लिए ही लिखी,

‘कुछ तो दुनिया की इनायात ने दिल तोड़ दिया,
और कुछ तिल्ख-ए-हायात ने दिल तोड़ दिया.
दिल तो रोता रहा और आंख से आंसू न बहे,
इश्क की ऐसी रिवायत ने दिल तोड़ दिया.’

और इस गजल के दो शेर… कहते हैं बेग़म के कहने पर ही फ़ाकिर ने लिखे थे. बेगम अख़्तर की तखय्युलात की तर्ज़ुमानी बहुत ही खूबसूरत लफ्ज़ों में फाकिर ने की…

‘हम तो समझे थे कि बरसात में बरसेगी शराब,
आई बरसात तो बरसात ने दिल तोड़ दिया.’

और

‘आपको प्यार है मुझसे कि नहीं है मुझसे,
जाने क्यों ऐसे सवालात ने दिल तोड़ दिया.’

बेगम अख़्तर ने क्लासिक अंदाज़ में राग भूप-कल्याण में इसे गाया. ये गज़ल बेगम अख़्तर की मशहूर गज़लों में से एक है. और इस बखूबी से बेगम अख़्तर इस ग़ज़ल की ‘रादिफ’ ‘दिल तोड़ दिया’ को पेश करती थीं कि हर महफिल में ‘दिल तोड़ दिया’ की फरमाइश होती थी.

बेगम अख्तर
बेगम अख्तर

सुदर्शन फाकिर को इस बात का एहसास था कि उनकी मकबूलियत के पीछे बेग़म अख़्तर का हाथ है, इसलिए वो उनके लिए अकसर ही लिखते रहते थे. जब दूसरी बार फाकिर साहब की मुलाकात हुई बेगम अख़्तर से, तब फाकिर साहब ने अपनी एक खूबसूरत गज़ल उन्हें भेंट में दी…

‘अपनों के सितम हमसे बताए नहीं जाते,
ये हादसे वो हैं जो सुनाए नहीं जाते.
कुछ कम ही ताल्लुक है मोहब्बत का जुनूं से,
दीवाने तो होते हैं बनाए नहीं जाते.
इक उम्र की कोशिश से भुला दी है तेरी याद,
लेकिन अभी तक याद के साये नहीं जाते.’

बेग़म ने इसे राग जोगिया में कम्पोज़ किया. बेग़म ने इस गज़ल के लिए राग जोगिया इसलिए चुना, क्योंकि राग जोगिया के सुर इस गज़ल के मिजाज़ की तर्जुमानी करते हैं.

शमीम जयपुरी, जिनकी गज़लों में ज़िगर मुरादाबादी की क्लासिक थी और तस्कीन कुरैशी का अंदाज़, उस जमाने में मुशायरों के बड़े लोकप्रिय शायर माने जाते थे. वो खुद ही तरन्नुम में अपनी गज़ल पढ़ते थे.

जिगर मुरादाबादी
जिगर मुरादाबादी

शमीम जाने-माने शायर तो थे, लेकिन आवाम तक इनका नाम पहुंचने मे बेग़म अख़्तर की गायकी का बहुत बड़ा दखल रहा.

‘काबे से बुतकदे से कभी बज़्म-ए-जाम से,
आवाज दे रहा हूं तुझे हर मकाम से.
दिल में फरेब, लब पे तब्बसुम, नज़र में प्यार,
लुट गए शमीम बड़े ऐहतमाम से.’

कहते हैं इस गज़ल का मक्ता शमीम जयपुरी ने बेग़म अख़्तर के लिए ही लिखा और बेग़म ने इस गज़ल को राग शुद्ध कल्याण में गाकर मशहूरो-मारूफ कर दिया.

इस गज़ल को सुनकर शमीम जयपुरी का कहना रहा, ‘गज़ल गायकी में बेग़म अख़्तर की कोई मिसाल नहीं. रूह से उठती हुई एक आवाज है वो, जो रूह को छूकर गुज़र जाती है.’

उसी दौरान शकील बदांयूनी काफी सालों बाद बेग़म अख़्तर को फिर से अपनी गज़लें भेजना शुरू किए थे. लेकिन बेग़म को शमीम जयपुरी की भेजी हुई वो गज़ल इतनी पंसद आई कि शकील की गज़लों पर ध्यान ही नहीं दिया. और वो जो गज़ल थी शमीम की, वो कुछ इस तरह है…

‘सुना है लूट लिया है किसी को रहबर ने,
ये वाकिआ तो मिरी दास्तां से मिलता है.
दर-ए-हबीब भी है, बुत-कदा भी, काबा भी,
ये देखना है, सकूं अब कहां से मिलता है.’

बहुत ही खूबसूरती से राग देश में बेग़म ने इसे सजाकर गाया और शमीम और भी मशहूर हो गए.

शमीम जयपुरी
शमीम जयपुरी

लेकिन जिस शायर से बेग़म अख्तर ने बेपनाह प्यार किया, जिसके दीवान को वो अपने तकिये के नीचे रखकर सोती थीं, जिसके दीवान को दिल से लगाकर रखा था, वो थे जिगर मुरादाबादी. वो इस कदर से उनकी गज़लों पर फिदा थीं कि एक वक्त था जब महफिलों में वो सिर्फ जिगर की ही गजलें गाती थीं. ये उस वक्त की बात है, जब बहुत लोग जिगर को जानते भी नहीं थे. ज़िगर को सही माने में हर दिल अजीज़ बनाने में बेग़म का बहुत बड़ा हाथ रहा.

‘यूं दिल के तड़पने का कुछ तो है शबब आखिर,
या दर्द ने करवट ली या तुमने इधर देखा.’

‘दुनियां के सितम याद न अपनी ही वफ़ा याद,
अब मुझको नहीं कुछ भी मोहब्बत के सिवा याद.’

या

‘कोई ये कह दे गुलशन गुलशन,
लाख बलाएं, एक नशेमन.
कातिल रहबर कातिल रहज़न,
दिल सा दोस्त न दिल सा दुश्मन.
आज न जाने राज ये क्या है,
हिज्र की रात और इतनी रौशन.’

जब जिगर मुरादाबादी की गज़लों को गाने के बाद भी ‘जिगर’ उनकी तरफ ध्यान नहीं दिए, तो बेग़म से नहीं रहा गया. उन्होंने जिगर को एक खत लिखा.

‘आप शायर हैं और मैं एक गायिका. हम दोनों शादी क्यों नही कर लेते…’

इस पर ‘जिगर’ ने जो जवाब दिया, उसने बेग़म का दिल तोड़ दिया. जिगर ने लिखा,

‘आप मेरा दीवान पढ़ती हैं, गाती हैं, सब सही है. लेकिन मुझसे मिलने की कोशिश न करें.’

जिगर मुरादाबादी
जिगर मुरादाबादी

ये बात जिगर ने इसलिए लिखी, क्योंकि जिगर दिखने में किसी ऐंगल से अच्छे नहीं थे और वो इसे स्वीकार करते थे. जिगर के जवाब ने बेग़म को बहुत ही दुखी कर दिया और उस शाम की महफिल में बेग़म अख्तर ने ज़िग़र को नहीं गाया. गालिब को गाया.

‘ये न थी हमारी किस्मत की विसाल-ए-यार होता,
अगर और जीते रहते, यही इंतज़ार होता.’

कुछ दिनों बाद जब एक पार्टी में जिगर की मुलाकत बेग़म साहिबा से हुई, तो जिगर ने बड़ी मज़ेदार बात कही, ‘जी आपका खत मिला. तो कुछ घबरा सा गया. सोचा अगर हमारे बच्चे हुए और उनकी सूरत हम पर गई और लिखने की काबिलयत आप पर, तो पता नहीं क्या होगा.’

लेकिन उसी वक्त फ्लर्ट करते हुए जिगर ने बेग़म साहिबा की तरफ इशारा करते हुए कहा,

‘मेरा कमाल-ए-शेर बस इतना ही है ‘जिग़र’,
आप हम पे छा गए और हम ज़माने पे छा गए.’

फिराक गोरखपुरी के साथ बेगम अख्तर की दोस्ती भी एक अलहदा कहानी है.

फिराक गोरखपुरी
फिराक गोरखपुरी

ये उस वक्त की बात है, ज़ब फिराक दिल्ली में थे. पहाड़गंज में. और उनकी तबीयत बहुत नाशाद थी. वो रह-रहकर बेग़म को याद कर रहे थे,

‘बुला दो उसे, कुछ उससे कहना है, एक गज़ल कहनी है उसे’.

बेग़म को खबर भेजी गई, ‘फिराक की तबीयत नासाज है, याद फरमाया है’. बेग़म परेशान भागते-भागते फिराक के पास जा पहुंची. फिराक़ गहरी सांसें ले रहे थे. आवाज़ भी ठीक से नही निकल रही थी, लेकिन बेग़म अख़्तर को देखते ही उनका चेहरा खिल सा उठा और बेग़म से कहा, ‘मेरा हालचाल मत पूछो… ये जो चंद लम्हे हैं न, चलो कुछ और ही बात करते हैं’. और फिराक ने अपनी नज़्म सुनाई…

‘शाम-ए-गम कुछ उस निगाह-ए-नाज़ की बातें करो,
बेखुदी बढ़ती चली है राज़ की बातें करो.
निकहत-ए-जुल्फ-ए-परेशां दास्तां-ए-शाम-ए-गम,
सुबह होने तक इसी अंदाज़ की बातें करो.’

ये नज़्म फिराक़ ने बेग़म साहिबा को तोहफे में दी और बेग़म से इसरार किया कि वो इसी वक्त इसे गाकर सुनाएं. बेग़म अख़्तर ने बस उसी वक्त इस गज़ल को राग शिवरंजनी मे तरतीब किया और इतनी खूबसूरती से गाया कि फिराक़ की आंखों से आंसू बह निकले.

शायरों में सबसे करीब अगर उनसे कोई था, तो वो थे कैफ़ी आज़मी. कैफ़ी आज़मी का कहना रहा बेग़म के बारे में, ‘गज़ल सिर्फ सुनने को नहीं, बल्कि देखने को भी मिलती है.’

एक बार बेग़म कैफ़ी से मिलना चाहती थीं, तो कैफी को झूठी ख़बर भिजवाई कि उनकी तबीयत बहुत नासाज है. पता नहीं फिर मिल पाएंगे या नहीं. कैफ़ी भागते-भागते आए, तो देखा बेग़म सिगरेट का धुंआ उड़ा रही हैं.

कैफी आज़मी
कैफी आज़मी

‘एक गज़ल पूरी करनी है. उसका मक्ता नहीं है. इसलिए बुलाया है तुम्हें.’ बेगम ने कैफ़ी साहब को एक बोतल शराब के साथ कमरे में बंद कर दिया और कहा लिखो, तभी दरवाज़ा खोलूगीं.

कैफ़ी ने तब वो मक्ता लिखा,

‘हुआ है हुक्म कि कैफी को संगसार करो,
मसीह बैठे है छुप के कहां खुदा जाने.’

और शेर का मतला है…

‘सुना करो मेरी जान, इनसे उनसे अफसाने,
सब अजनबी हैं यहां किसको कौन पहचाने.’

मक्ता पूरा होने पर जब दरवाज़ा खुला और कैफ़ी आज़मी जाने लगे, तो बेग़म ने जिस अंदाज़ में एक नज्म़ सुनाई,

‘पाया भी उनको, खो भी दिया,
चुप भी हो रहे…
इक मुख्तसर सी रात में सदियां गुज़र गईं.’

तो कैफ़ी मानो रो ही बैठे. बेग़म ने जब रोने की वजह पूछी, तो कैफ़ी ने अपनी वो पहली गज़ल, जो सिर्फ 11 साल की उम्र में लिखी थी, उसे पेश किया,

‘इतना तो ज़िंदगी में किसी के खलल पड़े,
हंसने से हो सुकून, न रोने से कल पड़े.
मुद्दत के बाद उसने जो की लुत्फ की निगाह,
जी खुश तो हो गया मगर आंसू निकल पड़े.’

खैर, बेग़म ने कैफी को मक्ता पूरा करने पर रिहा तो किया और शुक्रिया अदा करते हुए उनकी वो गज़ल के चंद शेर और मक्ता बहुत देर तक गुनगुनाती रहीं और फिर राग ‘मिश्र काफी’ में उसे गाया,

‘सुना कर मेरी जां इनसे उनसे अफसाने,
सब अजनबी हैं यहां कौन किसको पहचाने.
मिरे जुनून-ए-परस्तिश से तंग आ गए लोग,
सुना है बंद किए जा रहे हैं बुतखाने.
बहार आए तो मेरा सलाम कह देना,
मुझे तो आज तलब कर लिया है सहरा ने.
हुआ है हुक्म कि कैफी को संगसार करो,
मसीह बैठे है छुप के कहां खुदा जानें.’

कैफी बहुत शुक्रगुज़ार थे कि मक्ता पूरा करने के बहाने से उन्हें इतनी सुंदर गज़ल सुनने को मिली, देखने को मिली और फिर दोनों ने साथ ही इसे नेशनल चैनल पर पेश किया राग मिश्र काफी में.

***

बात 1951-1952 की होगी. बॉम्बे सेंट्रल रेलवे स्टेशन प्लेटफॉर्म से लखनऊ जाने वाली ट्रेन के फर्स्ट क्लास कूपे में मल्लिका-ए-गज़ल, हिन्दुस्तान की मायनाज़ गायिका बेग़म अख़्तर मौजूद थीं. अभी ट्रेन खुलने ही वाली थी कि एक काली शेरवानी और उजला पायजामा पहने शख्स दौड़ता हुआ उस डिब्बे में दाखिल हुआ. उसने कागज का एक पुर्जा बेग़म को दिया, साथ ही मिन्नत की, बऱाय मेहरबानी इसे ट्रेन खुलने पर ही पढ़ेंगी. वो शख़्स कोई और नहीं, जाने-माने शायर शकील बदांयूनी थे. बेग़म ने शकील की बात मान ली और उस कागज़ को तकिए के नीचे दबा दिया. रात जब गहराने लगी, तो बेग़म को उस कागज के टुकड़े की याद आई. कागज में लिखी इबारत कुछ इस तरह थी,

‘ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया,
जाने क्यों आज तेरे नाम पे रोना आया.
यूं तो हर शाम उम्मीदों में गुज़र जाती थी,
आज कुछ बात है जो शाम पे रोना आया.’

शकील बदांयूनी
शकील बदांयूनी

चलती ट्रेन में बेग़म ने अपना हारमोनियम निकाला और रातभर इस गज़ल पर काम करती रहीं. 4-5 बज रहे थे सुबह के, जब ट्रेन भोपाल पहुंची. राग भैरवी का वक्त था और ये गज़ल राग भैरवी में तैयार हो चुकी थी.

एक हफ्ते के अंदर ये गज़ल बेग़म ने लखनऊ रेडियो स्टेशन से पेश की और पूरे हिंदुस्तान ने इस गज़ल को हाथों-हाथ लिया. इस गज़ल जितनी मशहूर गज़ल शायद ही कोई हो. कहते हैं, गज़ल का मतलब ‘ऐ मोहब्बत’ और ‘ऐ मोहब्बत’ का मतलब बेगम अख़्तर. बेगम की ‘ऐ मोहब्बत’ सुनकर ऐसा लगता है मानो आधी रात को दूर किसी वीराने से आहिस्ता-आहिस्ता उनींदी सी कोई आवाज़ उठ रही हो. बेगम अख़्तर तो सिलेब्रिटी थी हीं, लेकिन इस गज़ल ने उन्हें लेजेंड बना दिया, बुलंदी की आखिरी मंजिल तक पहुंचा दिया.

अगर ‘दीवाना बनाना है तो दीवाना बना दे’ से उनकी पहचान हुई, तो ‘ऐ मोहब्बत’ ने उन्हें उस मकाम पर लाकर खड़ा किया, जहां तक आज भी कोई नहीं पहुंच पाया. हर महफिल में इस गज़ल की फरमाइश हुआ करती थी और कभी-कभी एक ही महफिल में 3-4 बार इस गज़ल को गाने की फरमाइश होती थी. और बेग़म हर बार इसे दूसरे अंदाज़ में गाकर सुनाती थीं.

इस गज़ल ने शकील को भी सिलेब्रिटी बना दिया. शकील की शख्सियत मोहताज-ए-तआरूफ नहीं थी, इस गज़ल ने शकील बदांयूनी को बहुत ऊंचे मुकाम तक पहुंचा दिया, जिसकी वजह से वो अदबी दुनिया में काफी शोहरत हासिल किए और फिल्मी दुनिया में उनकी मकबूलियत और भी बढ़ गई. उस ज़माने के सबसे बड़े गीतकार माने जाने लगे शकील.

बेगम अख्तर
बेगम अख्तर

‘ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे’ बेग़म का सिग्नेचर ट्यून हो गई, लेकिन कुछ विरोधाभासों के कारण बेग़म ने इसके बाद शकील को गाना छोड़ दिया और काफी अर्से तक शकील को नहीं गाया. पर जब दोबारा शकील की गज़ल गई, तो उसका कोई जवाब न था…

‘मेरे हम-नफस मेरे हम-नवा,
मुझे दोस्त बना के दगा न दे.
मैं हूं दर्द-ए-इश्क से जां-ब-लब,
मुझे जिंदगी की दुआ न दे.’

अगर बेग़म की दो सबसे मशहूर गज़लें हैं, तो वो हैं शकील की लिखी ये दोनों गजलें.

बेग़म अख्तर को इंतकाल से कुछ समय पहले से ही ये अहसास होने लगा था कि अब वो चंद दिनों की ही मेहमान हैं.

वो बेग़म अख़्तर की जिंदगी कि आखिरी रिकॉर्डिंग थी. बेग़म के साथ थे कैफ़ी आज़मी. रिकॉर्डिंग के दौरान जब कैफ़ी से पूछा गया कि उन्होंने गज़लें किस लिए लिखना शुरू किया, तो उनका जवाब आया, ‘मैंने गज़लें इसलिए लिखना शुरू कीं, जिसलिए ग़ालिब मुस्सवरी सीखना चाहते थे… सोचा अगर मैं गज़ल कहूंगा, तो मैं गज़ल के करीब हो जाऊंगा और सिर्फ इसलिए ही लिखना शुरू किया.’ और बेग़म अख़्तर की तरफ इशारा करते हुए कहा, ‘बेग़म साहिबा के सामने आकर सिर्फ गज़ल सुनने को नहीं, गज़ल देखने को मिलती है.’

कैफी आज़मी
कैफी आज़मी

फिर जब वो प्रोग्राम आयोजित करने वाले बेग़म अख़्तर की तरफ मुखातिब हुए, तब बेगम ने कहा, ‘अब मुझसे मत पूछ बैठना कि मैंने गाना क्यों शुरू किया. अब तो गाना अंत करने का समय आ गया है.’ और कैफ़ी से कहा, ‘अब मेरे जाने का समय आ गया है. शायद ये मेरी ज़िंदगी की आखरी रिकॉर्डिंग हो’. और इस मौके पर उन्होंने कैफ़ी की लिखी गज़ल जो राग भैरवी और कोमल असावरी में बेग़म ने तरतीब की थी, उसे पेश किया…

‘मैं ढूंढता हूं जिसे, वो जहां नही मिलता,
जो इक खुद़ा नही मिलता तो इतना मातम क्यों,
यहां तो कोई मिरा हम-जबां नहीं मिलता.’

और हम-जबां को खोजते-खोजते बेग़म चल बसीं. ये सच में बेग़म की आखिरी रिकॉर्डिंग थी.

उसी दौरान कि बात है. बहुत कहने पर बेग़म साहिबा एक प्राइवेट कॉन्सर्ट मे गाने को तैयार हुईं. पर गाना शुरू करने से पहले स्टेज पर उन्होंने ऐलान किया कि इसके बाद वो किसी प्राइवेट कॉन्सर्ट में नहीं गाएंगी…

‘चलो आज इस महफिल में, अपने दिल की बात कहती हूं…’ और अपने हमउम्र शायर हफीज़ होशियारपुरी की एक खूबसूरत गज़ल सुनाई…

‘मोहब्बत करने वाले कम न होंगे,
तेरी महफिल में लेकिन हम न होंगे.’

और ये इनकी ज़िंदगी की आखिरी प्राइवेट महफिल थी.

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कहते हैं हर महफिल भैरवी से समाप्त करते हैं. बेग़म अख्तर ने कभी कहा था कि मेरी पहचान हुई है स्टेज पर और चाहती हूं कि दम भी वहीं निकले. अहमदाबाद में अपनी ज़िंदगी का उन्होंने आखिरी पब्लिक कॉन्सर्ट किया, जहां उन्हें दिल का दौरा पड़ा. उन्होंने राग भैरवी में ‘ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया, जाने क्यों आज तेरे नाम पे रोना आया’ से ही अंत किया.

आगा शाहिद अली अंग्रेज़ी के बड़े काबिल पोएट माने जाते हैं और उन्हें अपने वक्त के, मॉर्डन वक्त के सबसे उम्दा कवियों में शुमार किया गया. आगा शाहिद अली बेगम के दीवाने थे. बेपनाह मोहब्बत करते थे उनसे और जब भी मौका मिलता, बेगम के इर्द-गिर्द ही रहते थे. वो बेगम के काफी करीब थे. आगा की गज़ल से पहचान बेगम ने ही कराई थी और फिर आगा ने अंग्रेज़ी में लिखना शुरू किया. बेगम के इंतकाल की खबर ने आगा को हिलाकर रख दिया. बेगम के जनाजे से वापस आकर उन्होंने बेगम को श्रद्धांजलि देते हुए लिखा…

‘In memory of Begum Akhtar’

‘Do your fingers still scale the hungry
Bhairavi, or simply the muddy shroud?

Ghazal, that death-sustaining widow,
sobs in dingy archives, hooked to you.
She wears her grief, a moon-soaked white,
corners the sky into disbelief.

You’ve finally polished catastrophe,
the note you seasoned with decades
of Ghalib, Mir, Faiz:
I innovate on a note-less raga.

आगा शाहिद अली
आगा शाहिद अली

और बेगम के ख्याल के एक और लम्हे में आगा लिखते हैं,

‘A night of ghazals has come to an end. The singer departs through her chosen mirror, her one diamond cut on her countless necks. I, as ever linger.’


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