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पंजाबी गायकी का वो रॉकस्टार जिसके फैन्स दिलजीत दोसांझ और जैज़ी बी हैं

कुछ साल पहले की बात है.मैं अपने कुछ दोस्तों के साथ कनॉट प्लेस वाले पिंड बलूची रेस्टोरेंट गया. वहां पंजाबी गाने चल रहे थे. दिलजीत दोसांझ का गाना ‘पटियाला पेग’ बजने लगा तो सामने बैठी दोस्त बोली उसे दिलजीत बड़ा क्यूट लगता है. फिर कहा, “और आज कल वो ‘रेपर’ कहां है?” मैं चौंक गया! वो बोली, “अरे हनी सिंह! वो रैप का रेप ही तो करता है.” मैं मुस्कुरा दिया. कुछ देर बाद मुझे एक घटिया से पंजाबी गाने का उदाहरण देकर पूछा गया, “यार तुम्हारे पंजाब में कोई अच्छे गाने नहीं गाता क्या?”

जवाब वही था जो पिछले कई सालों से दे रहा हूं. देर-सवेर हर कोई ये सवाल पूछ ही लेता है. और मैं आगे से कहता हूं कि आप पहले गुरदास मान, कुलदीप मानक, सुरिंदर कौर, चमकीला, यमला जट, बिंदरखिया, हंस राज हंस, हरभजन मान को सुनिए. आप ये जो आज कल के कॉमर्शियलाइज़्ड पंजाबी सिंगर्स को सुनकर पंजाबी फोक और कल्चर के बारे में जो अपनी राय बनाते हैं वो असलियत से कोसों दूर है.

गलती उन लोगों की भी नहीं है जो ये सवाल करते हैं. गुरदास मान, दलेर मेहंदी, हनी सिंह, मिक्का, दिलजीत दोसांझ जैसे कई गायकों ने तो अपने अपने पैर पंजाब से निकालकर मुंबई तक पसार लिए. शायद इनकी लोकप्रियता का एक कारण ये भी है. लेकिन आप सोचिए एक ऐसे गायक के बारे में जिसने 17 की उम्र में अपनी गायकी से सबकी भौंए उठा दीं. जिनके आगे पंजाबी इंडस्ट्री के तमाम दिग्गज सिर झुकाते थे. जैज़ी बी जैसे अनेक सिंगर उन्हें अपना गुरु मानते थे. हाथ में तुम्बी लिए ये शख्स जब भी स्टेज से हुंगारा लगाता, लोगों के दिल झूम उठते और पैर थिरकने लगते.

ऐसे थे कुलदीप मानक. उनकी पैदाइश 15 नवम्बर, 1951 को बठिंडा के जलाल गांव की थी. असल नाम लतीफ मोहम्मद था. पिता को भी गायकी का शौक था. लेकिन लतीफ के लिए ये महज़ शौक न था. वो अपनी गायकी से लोगों के दिलों पर छाप छोड़ने को बेताब बैठा था, इसलिए अपना घर छोड़कर लुधियाना आ गाया. मौके की तलाश थी. इसी बीच दिल्ली से बुलावा आया. वहां पहुंचे तो पता चला कि पंजाब की धाकड़ सिंगर सीमा के साथ गाना है. बोल थे “जीजा अखियां ना मार वे, मैं कल दी कुड़ी’. कल दी कुड़ी और अज दे मुंडे ने मिलकर ऐसा गाया कि दिल्ली से उठी वो आवाज़ पूरे पंजाब में एक महक की तरह फैल गई. 17 की उम्र में पंजाब इस गायक के हुनर से वाकिफ हो चुका था.

इसी बीच एक प्रोग्राम में पंजाब के मुख्य मंत्री प्रताप सिंह कैरों ने लतीफ की आवाज़ सुनी. वो सुनकर बड़े हैरान हुए. उसी दिन से लतीफ मोहम्मद बन गए कुलदीप मानक. यानी कुलों का दीपक जो मान योग्य हो. मानक को वो स्टार्ट मिल चुका था जिसकी उन्हें दरकार थी. पंजाब से कई सारे ऑफर्स आने लगे. लाइव शो के लिए अलग से बुलावे आते. तुम्बी, ढोलकी, चिमटा के बीच ऊंची हेंक से आती इस आवाज़ के लोग दीवाने हो गए. आलम ये था कि स्टेज परफॉर्मेंस को दौरान लोग अपने फेवरेट गानों की रिक्वेस्ट करते और मानक भी चाव से हर फरमाइश पूरी करते.

कुछ गानों में मानक का साथ सुरिंदर कौर ने भी दिया. सुरिंदर कौर पंजाबियों में पहले ही काफी चर्चित नाम था. ऐसे में इस कॉम्बो ने देश के बाहर बैठे पंजाबियों तक भी अपनी पहुंच पुहंचाई. बाहर से न्यौते आने लगे. मानक का कद लगातार बढ़ता रहा. कद इतना बढ़ा कि मानक को एक और नाम से नवाज़ा गया. ‘कलियों का बादशाह‘. कली का हिंदी अर्थ छंद होता है.

मानक समाज के बुनियादी वर्ग के लिए गाने गाते. शादी ब्याह हो, जीजा साली का रिश्ता हो, सरदारी हो, जट सूरमों का ज़िक्र हो, अपनी वर्सेटैलिटी के कारण मानक अपने साथी सिंगर्स से काफी आगे निकल गए.

ये वो दौर था जब विदेश में रहने वाले ज़्यादातर पंजाबी ट्रक चलाने का काम करते थे. उस समय मानक ने एक ऐसा गाना गाया जो आज भी ट्रक ड्राइवर्स की पेनड्राइव में आपको मिल जाएगा.

कुलदीप मानक लगातार चार दशकों तक पंजाबियों को समाज का आइना दिखाते रहे. उनकी आखिरी एलबम ‘महाराजा’ पॉप सिंगर जैज़ी बी के साथ आई. काफी समय से बीमार रहे 62 वर्ष के मानक का 30 नवम्बर 2011 को देहांत हो गया. अपने पीछे वे पत्नी, दो बच्चे और अपने तमाम गाने छोड़ गए जिन्हें मेरी उम्र के तमाम नौजवान सुनकर फक्र महसूस कर सकते हैं.

अंतिम बिदाई देने के लिए उनके घर तमाम दिग्गज जुटे. सब रुआंसे थे, वैसे ही जैसे घर से कोई बड़ा बुजुर्ग जो आपका मार्ग दर्शक हो, एकाएक चला जाए.

जैज़ी बी भी अकसर मानक के साथ हुई पहली मुलाकात का ज़िक्र करते हैं. जैज़ी बी तब जसविंदर बैंस होते थे. चार साल का वो बच्चा अपने चाचा के कंधों पर चढ़ कर एक अखाड़े में पहुंचा. ये संगीत का अखाड़ा था. काफी भीड़ जुटी थी. जसविंदर, मानक साहब की थोड़ी सी झलक ही ले पाया. जैज़ी ने कहा कि उसी दिन उन्होंने सोच लिया था वो भी सिंगर बनेंगे. बाद में जाकर मानक उनके गुरु बने. जैज़ी बी ने भी जगह जगह पर लोगों के सामने कुलदीप मानक के लिए अपना आभार व्यक्त किया. उसी आभार और प्यार का उदाहरण है कि जैज़ी बी अब मानक साहब के बीमार बेटे युद्धवीर मानक का ख्याल रखते हैं.

कुछ साल पहले ‘पंजाब 1984’ फिल्म रिलीज़ हुई. थी पंजाबी लेकिन सराहना विश्वभर से मिली. इस फिल्म में दिलजीत दोसांझ को बार-बार एक गाना सुनते हुए दिखाया गया है. वो गाना था “मां हुंदी ए मां, ओ दुनिया वालेयो“. 84 में हुए ऑपरेशन ब्लू स्टार पर ये फिल्म बनी थी. उस फिल्म में इस गाने का बार-बार आना ये दर्शाता है कि कैसे उस मुश्किल घड़ी में भी मानक का ये गाना दिल-ओ-दिमाग को शांति देता रहा होगा.


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