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'तुम हिजड़े हो क्या जो लिपस्टिक लगाकर नाचोगे?'

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कुछ चीज़ें ज़िन्दगी में अचानक से सामने आ जाती हैं. और हम उनसे लड़ना, उनका सामना करना सीखते हैं. कुछ चीज़ें हर वक़्त हमारे साथ चलती हैं. फिर भी हर बार बिलकुल नए तरीके से हमको चौंकाती रहती है.

मेरा भाई है. ताऊजी का बेटा. मुझसे एक साल बड़ा. बचपन में हम लोग हर छुट्टी में ताऊजी के घर जाते थे. भाई से मेरी बहुत पटती थी. लगभग बराबर की उम्र के थे हम दोनों. वो बहुत शांत सा लड़का है. कम बोलता है. कम हंसता है. लेकिन जब मैं पहुंच जाती थी, वो बिलकुल ही अलग इंसान बन जाता था. ऐसा घर वाले कहते थे. पूरा दिन उधम मचाए रहते थे हम दोनों. उनका घर ऐसा था कि एक मेन गेट था. उसके अन्दर बहुत सारे रिश्तेदारों के अलग-अलग घर थे.

दशहरे की छुट्टियों का कोई दिन था. ताऊजी-ताईजी घर पर नहीं थे. मैं और भाई उसके घर पर बैठे ड्राइंग बना रहे थे. मैं शायद 11 साल की थी तब. भाई ने अचानक से कहा, अगर मैं तुमको कुछ बताऊं तो तुम किसी को बताओगी तो नहीं. मैंने ड्राइंग बुक में से सिर उठाए बिना ही कहा, ‘नहीं’. वो बिलकुल चुप हो गया. अब मुझे सिर उठाना ही पड़ा. मैंने देखा, उसकी आंखों में मोटे-मोटे आंसू भरे हुए थे. मैं थोड़ा सा घबरा गई थी. मैंने पूछा, क्या हुआ दादा, बताओ तो.

करीब 5 मिनट तक वो सिसकता रहा. फिर बोला, मुझे ये लड़कों के कपड़े पहनना बिलकुल अच्छा नहीं लगता.  मुझे उस वक़्त कुछ समझ नहीं आया था. मैंने पूछा, मतलब? वो बोला, मुझे भी मम्मी की तरह साड़ी पहनने का मन करता है. 

Image: Reuters
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मेरे लिए 11 साल की उम्र में ये समझ पाना बहुत मुश्किल था. लेकिन फिर भी अपने भाई के लिए मैंने समझने की कोशिश की. मैंने कहा, तो चलो आज तुमको साड़ी पहनाते हैं. हम लोगों को पता था कि ताऊजी-ताईजी इतनी जल्दी घर नहीं आएंगे. भाई ने अलमारी से ताईजी की एक साड़ी निकाली. वो साड़ी जो उसकी फेवरेट थी. वो साड़ी जो वो कई दिनों से पहनना चाहता था. बहुत देर की कोशिशों और ढेर सारी सेफ्टी पिंस के साथ फाइनली भाई को साड़ी पहना दी गई थी. पर अभी भी कुछ अधूरा था. इतनी देर में वो अपनी मम्मी की मेकअप किट उठा लाया. और मैं कुछ कर पाती. उससे पहले ही उसने बहुत सफाई से लिपस्टिक लगा ली. जब उसने खुद को शीशे के सामने देखा. उसके चेहरे पर जो ख़ुशी थी. वही समझ सकता है जिसने कभी खुद को बहुत घुटन के बाद आज़ाद महसूस किया हो.

उसको देख कर मैंने भी ताईजी का दुपट्टा लपेट लिया. लिपस्टिक और ‘रूज़’ लगा लिया. भाई ने टीवी ऑन किया. फुल वॉल्यूम पर गाना बजाया. और हम दोनों लगे डांस करने. पता ही नहीं चला कब ताईजी घर आ गईं. जैसे ही कमरे में घुसीं, भाई को ऐसे देखकर जोर से चिल्लाईं. उनके चेहरे पर इतना डर, इतनी घिन थी. जो मैंने उस उम्र तक पहली बार देखी थी. दौड़ती हुई आईं और भाई को कंधे से खींचते हुए दो थप्पड़ लगाए. मैं एक कोने में बिलकुल सन्न खड़ी थी. डर लग रहा था कि अगर भाई ने कहा उसको साड़ी मैंने पहनाई है, ताईजी मुझे भी थप्पड़ मार देंगी. लेकिन उस कमरे में उस दिन मैं अदृश्य थी. ताईजी चिल्लाए जा रही थीं. और भाई को पीटे जा रही थी.

औरतों वाले कपड़े पहनोगे तुम? लिपिस्टिक लगाओगे? लड़कियों की तरह डांस करोगे? छी. लड़के ऐसा करते हैं क्या? हिजड़े हो क्या तुम? छक्के हो? बोलो छक्के हो तुम? छोड़ आऊं तुमको नाचने वालों के पास? घर-घर जा कर डांस करना तुम. 

मैं सन्न थी. भाई रो रहा था. बार-बार एक ही बात कह रहा था. सॉरी मम्मी, सॉरी मम्मी. बहुत देर बाद जब ताईजी ने भाई को पेट भरकर मार लिया. वो रोने लगीं. शायद उनको भी इस बात का अंदाज़ा काफी पहले से था. उनका बेटा ‘नॉर्मल‘ नहीं था. वो लोग जानबूझ कर उसको सुपरमैन वाले खिलौने लाकर देते थे. लेकिन भाई को हमेशा गुड़िया और टेडीबियर पसंद आते थे.

हम साल में एक या दो बार ही मिल पाते थे. जैसे-जैसे पढ़ाई बढ़ी, छुट्टियां सिकुड़ती चली गईं. अब बस 4-5 दिनों की ही मुलाक़ात होती थी साल में दो बार. और हर साल मैंने उसको बदलते देखा. वो डरा-डरा सा रहता था. कमज़ोर हो रहा था. हर एग्जाम में फेल हो रहा था. हर वक़्त उसकी पिटाई होती. हर गलती पर उसको सजा दी जाती.

परिवार के बीच जाना उसके लिए सबसे मुश्किल था

जब हमारे कजिन्स कहीं मिलते. अक्सर कोई मज़ाक में कह देता, इसकी शादी कैसे होगी? इससे ‘कुछ’ हो भी पाएगा? आजकल मेहंदी लगाने लगा है. अपनी मम्मी के हाथ पर. कभी पड़ोस की आंटी लोगों के हाथ पर. लगता है उसके लिए दुल्हन नहीं दूल्हा लाना पड़ेगा. वो अपनी ही खोल के भीतर और छुपने लगा. 

फिर बोर्ड एग्जाम के बाद हम लोग मिले. उससे मिले हुए मुझे कुछ 3 साल हो चुके थे. अब उसका ‘कंठ’ भी फूट गया था. आवाज़ भारी हो गई थी. इस वजह से रिश्तेदारों को अब सुकून हो गया था कि वो ‘लड़का’ ही है. एक दोपहर जब सब लोग खाना खा कर आराम कर रहे थे. मैंने भाई से पूछा, क्या उस दिन के बाद कभी उसने साड़ी या मेकअप ट्राई किया? उसके चेहरे पर एक बहुत बेबस सी हंसी आ गई.

हां, एक-दो बार. लेकिन उसके बाद इतनी पिटाई हुई. कहा गया कि मैं खानदान को श्राप हूं. मम्मी-पापा को मेरे रहन-सहन से घिन आने लगी. इसलिए वो आइडिया ही छोड़ दिया. अब अपने पेरेंट्स को और दुखी नहीं कर सकता ना मैं. मुझे पैदा करके वो पहले ही इतने परेशान हैं. 

मुझे दिख रहा था, वो अंदर घुट रहा है. अब तो तुम कॉलेज में हो दादा, तो गर्लफ्रेंड? मेरी बात का उस पर कोई असर नहीं हुआ. वो सिर नीचे किए हुए अपने नाखून के किनारे कुतर रहा था. लेकिन मुझे पता था, वो सुन रहा है. ये फिर उसी तरह की दोपहर थी, जब वो मुझे कुछ बताने वाला था.

‘बॉयफ्रेंड?’ मुझे पता था इस बात के दो ही रिएक्शन होने थे. लेकिन मैं चाह रही थी कि भाई कोई तीसरा रिएक्शन दे.

उसने झटके से सिर उठाया, दो सेकंड रुका, बोला, ‘छी यार. तुम भी मेरे बारे में ऐसा सोचती हो? अभी कोई सुन लेगा तो क्या बोलेगा? मैं हिजड़ा नहीं हूं यार’ उसकी आंखें, उसका गला, सब भर आए थे. उसके चेहरे से साफ दिख रहा था कि उसको बचपन से बेमतलब हर वक़्त जो पिटाई झेलनी पड़ी है. उसकी वजह से वो कितने भीतर तक कांप गया है. मैं मदद करना चाहती थी. लेकिन उस वक़्त मैं चुप रह गई. हम दोनों चुपचाप टीवी देखने लगे. लेकिन मैं जानती थी, दोनों में से कोई भी टीवी में इंटरेस्टेड नहीं था. करीब 10 मिनट बाद  उसने कहा, ‘तुषार.’

मैं चाहती थी वो बोले. कम से कम मुझसे तो बोल ही ले.

मुझे पिछले एक साल से तुषार पसंद है. मुझे नहीं पता किस तरह से. क्यों. लेकिन जब तुमने मुझसे अभी मेरे गर्लफ्रेंड या बॉयफ्रेंड के बारे में पूछा, मुझे तुषार ही याद आया. मुझे घिन होती है खुद से. मैं हिजड़ा नहीं हूं यार. कॉलेज में भी सब मुझे बहुत टीज़ करते हैं. मैंने स्पोर्ट्स भी जॉइन कर लिया. बॉडी बिल्डिंग कर रहा हूं. फिर भी. कई बार पापा-मम्मी भी कह देते हैं. इससे अच्छा तो लड़की ही हो जाती. 

Symbolic Image: Reuters
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हम दोनों ने उस दिन बहुत सारी बातें कीं. उस वक़्त जितना मैं जानती थी. समझती थी. वो सब उसको बताया. आखिर में ये तय हुआ. वो अपने पापा-मम्मी से कहेगा कि वो किसी लड़की से कभी शादी नही करेगा. क्योंकि उसको लड़कियों में इंटरेस्ट नहीं है. उस दिन हम दोनों को बहुत रिलैक्स सा महसूस हो रहा था. उसने मुझे तुषार की फोटो भी दिखाई. उसकी ऑरकुट प्रोफाइल पर.

फैमिली ने कहा अब वो ‘नॉर्मल’ हो गया है

उसके बाद बहुत समय तक हम लोगों का कोई कॉन्टैक्ट नहीं रहा. हम दोनों शायद बहुत बिजी हो गए थे. मैं हॉस्टल चली गई थी. वो भी शायद अपना करिअर बनाने में लगा हुआ था. एक दिन मुझे मेरी मम्मी ने बताया. ताऊजी-ताईजी बहुत परेशान थे. भाई ने कह दिया कि वो कभी शादी नहीं करेगा. पता नहीं क्यों. उसको दुनिया भर के डॉक्टरों को दिखाया. झाड़-फूंक करवाई. अब वो ठीक हो गया है. कह रहा है जहां बोलोगे, जब बोलोगे, मैं कर लूंगा शादी. 

वहां क्या हुआ था. मुझे समझ आ रहा था. ताईजी बहुत बीमार हो गई थीं. हर वक़्त कहती रहती थीं. अगर मैं मर गई तो इस लड़के की ज़िम्मेदारी होगी. भाई झेल नहीं पाया होगा. तो उसने समझौता कर लिया. मैंने बहुत कोशिश की पता लगाने की. लेकिन भाई कुछ भी बोलने के लिए तैयार नहीं था. एकदम शांत हो गया था. फ़ोन पर भी बात नहीं करता था. सारे कॉन्टैक्ट्स ख़त्म कर लिए थे उसने. मुझसे, तुषार से, और अपने सारे दोस्तों से. सबने कहा अब वो ‘नॉर्मल’ हो गया है. मुझे दिख रहा था अब वो मेरा भाई बचा ही नहीं था.

पिछले साल एक ‘लड़की’ से उसकी शादी करवा दी गई. एकलौता लड़का है ना. बहुत दुलारा है हमारा. तो बहू भी तो चांद जैसी ही लाएंगे. यही कहा था ताईजी ने उसकी इंगेजमेंट पर. हर रिश्तेदार से. बाद में मैंने बहुत कोशिश की. एक बार भाई मुझसे बात कर ले. लेकिन जब भी मैंने कोशिश की. उसने बात बदल दी. कहा कि वो खुश है. ये उसकी नई ज़िन्दगी है.

बधाई हो. एक और मौत हो गई. सिर्फ इस कोशिश में कि लड़का बाकियों जैसा हो जाए. आपने उसको मार डाला. उसको इस कदर डरा दिया कि उसने एक झूठ के साथ जीना बेहतर समझा. और अपने भीतर के सच का गला बहुत नजाकत से रेत दिया. 


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