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तो बोलो ऑस्कर किसका?

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बचपन से ऑस्कर का हल्ला सुन रहे हैं. जागरण के विदेश पन्ने पर एक ढाई कॉलम की तस्वीर और सिंगल कॉलम की खबर. लड़के कुछ फिल्मों के नाम याद कर लेते. ताकि क्विज में सामने वाले को चित्त कर सकें. हमने भी याद कर लिया. भानु अथैया पहली भारतीय थीं, जिन्हें गांधी फिल्म की कॉस्ट्यूम के लिए ऑस्कर मिला. अफसोस भी हुआ. कि बताओ. गांधी जी अपने. मगर उनका रोल किया फिरंगी ने. एक ढंग का दिलीप कुमार, बच्चन या नसीर न मिला इनको. और तब सात समंदर पार बैठे एक इंसान ने सुन ली. आईएफएस अफसर विकास स्वरूप के नॉवेल पर पिक्चर बनाई. स्लमडॉग मिलियेनर. उसके लिए खूब ऑस्कर घर आए. गुलजार, रहमान…रसेल भी. देश को एक दम से साउंड रिकॉर्डिंग का दैवीय महत्व दिखने लगा.

इधर कुछ बरसों से जागरूकता बढ़ी है. अच्छी अंग्रेजी फिल्में खूब रिलीज होती हैं देश में. सिर्फ इंडिपेंडेंस डे, गॉडजिला और मैडागास्कर भर का मार्केट नहीं रह गया है. इंग्लिश के चैनल भी काम आते हैं. वहां देखने का एक फायदा ये भी रहता है कि सारा ध्यान डायलॉग समझने पर नहीं लगाना पड़ता. सबटाइटल्स जिंदाबाद. अच्छी क्वॉलिटी के. वर्ना लैपटॉप पर सही एसआरटी फाइल के लिए जगह बनाते रहो. उसके बाद वीएलसी पर सेकंड घटा-बढ़ाकर उनकी पटरी बैठाओ.

ऑस्कर फिर आ गया है. अमरीका में इतवार की शाम. हिंदुस्तान में सोमवार की पौ फटने का वक्त. अवॉर्ड बंटेंगे. आह और वाह होगी. कोई फक-वक बोलकर ऊप्स भी कर सकता है. ‘यो ऑस्कर सो व्हाइट’ पहले ही चल रहा है. हिंदी के न्यूज चैनल भी पैकेज काटेंगे. जिसमें सबसे ज्यादा फुटेज उस कैटिगरी के अवॉर्ड को मिलेगी, जिसे प्रियंका चोपड़ा देंगी. चाहे उसके नॉमिनेशन भी ठीक से पता न हों. प्रॉड्यूसर पांच पन्ने लिख मारेंगे. अच्छा है. किसी भी बहाने सही. फिल्मों पर बात तो हो. ध्यान तो जाए.

mihir pandya the lallantopहमारा ध्यान कई दिनों से लगा था. बार बार आता कि ‘दी लल्लनटॉप’ के रीडर्स को ऑस्कर पर कुछ अच्छा और अलग पढ़ने को मिले. इसके लिए हमने चिरौरी की. अपने दोस्त से. मिहिर पंड्या. डीयू के मास्टर साब. एमफिल पीएचडी सिनेमा पर. एक किताब भी. शहर और सिनेमा वाया दिल्ली. पर ये सब तो ब्लर्ब पर लिखे खातिर रहे तो ही अच्छा. आप यूं समझ लें. कि मिहिर जो है उसकी पहली महबूबा सनीमा ही है. दूसरी मेरी दोस्त सुमन है. इन दोनों पर अलग से किसी रोज और बात करेंगे. कमाल का जोड़ा है. इश्क से इश्क हो जाए. ऐसा कुछ.

आज आप मिहिर पंड्या के लिखे दो आर्टिकल पढ़ेंगे. पहला, ऑस्कर किसको मिलेगा. ये कौन तय करता है. और जो तय करते हैं, वो कौन होंगे. ये कौन तय करता है. दूसरा, ऑस्कर की रेस में शामिल तीन फिल्में. मनुष्य की जीने की चाह के तीन फलक दिखाती. बचे, बढ़ो और बनाओ. कि जीना, सिर्फ जीना भी जीवन का सबसे सुंदर मकसद और तरीका हो सकता है. पढ़िए. खोजकर इन फिल्मों को देखिए भी. सिनेमा हॉल में, डीवीडी पर, लैपटॉप पर. लल्लन तो पहले ही सब निपटा चुका है. शो ऑफ करता रहता है. आप भी इसे पढ़ शो के लिए गो हों.

– सादर, सौरभ


एक जा भिड़ा भालू से, दूजा बेचारा मंगल पर छूटा, तीजा कयामत के बाद की दुनिया में भटका पानी की तलाश में : तो बोलो ऑस्कर किसका?

इस साल जिन फ़िल्मों ने ऑस्कर में सबसे ज़्यादा नॉमिनेशन हासिल किए हैं, उनमें एक पैटर्न साफ दिखता है. ये ऐसे किरदारों की कहानियां हैं जिनके सामने अद्भुत असामान्य हालात आकर खड़े हो गए हैं. ‘लार्जर दैन लाइफ़’ सिनेमा बनाना सिर्फ़ बम्बइया मसाला सिनेमा का गुण नहीं रहा, ऑस्कर वाली हॉलिवुडीय जूरी भी इसे बहुत पसन्द करती है. यह आप ‘दि रेवेनेंट’, ‘मैड मैक्स : फ्यूरी रोड’ और ‘दि मार्शियन’ जैसी फ़िल्मों को मिले झोली भर नॉमिनेशन से जान सकते हैं. इन फिल्मों में कई पारंपरिक खूबियां हैं जो ऑस्कर जूरी को पसन्द आईं, लेकिन साथ ही कई नई बातें भी हैं जो ऑस्कर जूरी की और उस बहाने अमेरिकी समाज की बदलती पसन्द की आेर भी इशारा करती हैं.

वे कौन सी वजहें हैं जो इन्हें ऑस्कर का चहेता बनाती हैं. हम बताते हैं. ये भी बताते हैं कि क्या ‘नया’ इस ऑस्कर विमर्श के बहाने विश्व के मेनस्ट्रीम सिनेमा में जुड़ रहा है.


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दि रेवेनेंट : 12 नॉमिनेशन : एक जा भिड़ा भालू से

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इस साल की ऑस्कर फेवरेट और बारह ऑस्कर नॉमिनेशन बटोरने वाली ‘दि रेवेनेंट’ की कथा दो आधारों पर खड़ी है, सरवाइवल और बदला. फ़िल्म में कोई नायिका नहीं है और इस घोर मर्दाना फ़िल्म का रचनात्मक केन्द्रक इसके दो सितारे रचते हैं. पहले फ़िल्म के सिनेमैटोग्राफ़र इमैन्युअल लुबेज्की और दूसरे फ़िल्म के नायक लियोनार्डो डि कैप्रियो. मैक्सिकन निर्देशक एलेजांद्रो गोजांलेज़ इनारेट्टू की यह नई फ़िल्म दर्शक को उन्नीसवीं सदी के अमेरिका में ले जाती है जहां अभी तक मूल निवासियों और गोरे आक्रांताअों के मध्य खूनी संघर्ष जारी है. और इससे बड़ा संघर्ष है ठंडी और दुर्दम्य प्रकृति के विरुद्ध, जो ज़रा भी रहमदिल नहीं है. यहां ह्यू ग्लास के किरदार में लियोनार्डो जानवरों की खालों की तलाश में भटकते गोरे दल के अनुभवी रास्ता सुझानेवाले हैं, जिन्हें अपने ही दल के एक दुष्ट सदस्य का विश्वासघात सहना पड़ता है. लेकिन मरा समझकर लावारिस छोड़ दिए गए ग्लास अपनी ही राख़ से वापस उठ खड़े होते हैं और निकल पड़ते हैं मन में एकमात्र उद्देश्य लिए – बदला.

अमेरिका के साउथ डेकोटा इलाके में साल 1823 में ह्यू ग्लास पर जंगली भालू का भयानक हमला, उनकी मृत्युशैया से सलामती की बीहड़ अकेली यात्रा और उस यात्रा में ज़िन्दा बचे रहना, यह सब अमेरिकी लोककथाआें का हिस्सा बन चुका है और इस कथा पर हॉलीवुड में पहले भी फ़िल्में बनी हैं. इनारेट्टू की ‘दि रेवेनेंट’ अपनी पटकथा के लिए इसी घटना पर साल 2001 में लिखे गए माइकल पंक के उपन्यास को आधार बनाती है. ऐतिहासिक घटनाक्रम पर होते हुए भी ‘दि रेवेनेंट’ की कथा इतने हाथों से होती फ़िल्म तक पहुंची है कि इसमें कल्पित इतिहास को भी ‘पार्टनर इन क्राइम’ माना जाना चाहिए. परदे पर ग्लास का जीवट विकट है, उसका प्रकृति से संघर्ष इंसानी सहनशक्ति की अंतिम हद को छूता है. यह देखने में मुश्किल फ़िल्म है. कठिन,कठोर, कष्टप्रद. फ़िल्म में इंसानी हिंसा के और इंसान पर प्रकृति द्वारा हिंसा के कई ऐसे प्रसंग हैं जो वीभत्स रस को छूते हैं. ख़ासकर भालू का इंसान पर हमले वाला प्रसंग असंभव क्रूरता लिए है. लेकिन इस फ़िल्म की ख़ासियत यही है और इसे बड़े परदे पर देखे बिना छुटकारा नहीं.

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नहीं, ‘दि रेवेनेंट’ इस साल ऑस्कर में मेरी पसन्दीदा फ़िल्म नहीं है. बेस्ट पिक्चर में जहाँ मैं ‘स्पॉटलाइट’ के पक्ष में खड़ा हूँ वहीं बेस्ट एक्टर में माइकल फ़ासबेंडर को जीतता देखना चाहूंगा. लेकिन अंतिम विजेता सूची में ‘दि रेवेनेंट’ आगे निकल जाएगी इसकी पूरी संभावना है. गौर कीजिए, यह अकादमी के सदस्यों की पसन्द के कितने खांचों को टिक करती है −

1) यह अमेरिकी इतिहास से उठाई कथा है, 2) यह युद्धकथा है, 3) यह ऐतिहासिक नायकीय चरित्र की कथा है 4) यह मृत्यु के सामने खड़े और जूझते किरदार की कथा है, 5) यह ‘लार्जर देन लाइफ़’ महाकाव्यात्मक औदात्य लिए रची गई कथा है. निर्देशक इनारेट्टू वैसे भी पुरस्कारों के चहेते हैं. उन्हें व्यावसायिक और लोकप्रिय सिनेमा के समझे गए ऑस्कर पुरस्कार भी मिले हैं तो बर्लिन और कान जैसे कलावादी फ़िल्म समारोहों में भी उनकी रचनाआें को सराहा गया है. आज के सिनेमा में ऐसा डबल कॉम्बिनेशन मुश्किल से मिलता है.

नया क्या?

इसका असली चमत्कार फ़िल्म की दुर्गम लोकेशंस पर की गई शूटिंग से उपजता है जिसने लियोनार्डो के अभिनय के साथ मिलकर इस निर्जन ठंडे प्रदेश की काया को परदे पर जीवित कर दिया है. यहाँ असली चुनौती हत्यारी प्रकृति से है. यह दुनिया का सबसे आदिम संघर्ष है – इंसान vs प्रकृति का संघर्ष. इसमें ‘मैन vs वाइल्ड’ देखने सा मज़ा है. इमैनुअल लुबेज्की की चमत्कारिक सिनेमैटोग्राफ़ी इसका सबसे बड़ा आकर्षण है और उन्होंने कथा में असलियत का रंग भरने के लिए तक़रीबन पूरी फ़िल्म वास्तविक लोकेशंस पर बिना किसी कृत्रिम रौशनी के शूट की है. पूरी फ़िल्म में निरंतर वाइड एंगल कैमरा लेंस का उपयोग करते हुए इनारेट्टू और लुबेज्की ने परिवेश को किरदारों से ज़्यादा महत्वपूर्ण बना दिया है. लुबेज्की इससे पहले टेरेंस मलिक और अलफॉन्जों कूरॉन जैसे फ़िल्मकारों के सिनेमैटोग्राफ़र रहे हैं. वही मलिक अाैर कूरॉन जिनकी फ़िल्में अपने वातावरण की गढ़त के लिए दुनियाभर में जानी जाती हैं.

लुबेज्की की सिनेमैटोग्राफ़ी पर इनारेट्टू का निर्देशन किसी को अन्तोनियोनी की याद दिलाता है तो किसी को हरज़ॉग की. कहते हैं कि इस साल ‘इनारेट्टू को अगर कोई जीतने से रोक सकता है तो वो हैं खुद इनारेट्टू’, अर्थात पिछले साल उनका बेस्ट निर्देशक पुरस्कार जीतना इस साल के पुरस्कार के आड़े आ सकता है. वैसे इन्हीं तमाम वजहों से ‘दि रेवेनेंट’ तकनीकी पुरस्कारों में भी बड़ी दावेदार है. अगर लुबेज्की जीतेंगे तो यह उनका ‘ग्रैविटी’ और ‘बर्डमैन’ के बाद लगातार तीसरा अॉस्कर होगा. मज़ेदार बात यह है कि इनमें पहली दो फ़िल्मों में जहाँ सिनेमैटोग्राफ़ी तकनीक का चमत्कार हैं, जिसकी आलोचना भी उन्होंने झेली, वहीं ‘दि रेवेनेंट’ सिनेमा की पारंपरिक समझ से उपजा ख़्याल है जिसे सिनेमा के शुद्धतावादियों का भी आशीर्वाद मिला. साथ ही लियोनार्डो ने जैसे शरीर की तपस्या को अभिनेता की कसौटी मानकर इस फ़िल्म में काम किया है. हालांकि मैं पुरानी कई फ़िल्मों में उनके सहज अभिनय का कायल रहा हूँ, लेकिन यहाँ उन्होंने लगता है ख़ास अकादमी को ध्यान में रख घोर प्रदर्शनकारी परफॉरमेंस दी है. मृत पशुअों की देह में घुसकर सोना, भूख लगने पर जानवर का कच्चा लिवर तक खाना, बर्फ़ से जमी नदी में बाकायदा डूबना और निकलना. और फ़िल्म की पीआर मशीनरी ने इन ख़बरों को आगे बढ़ाने में ज़रा भी समय नहीं लगाया कि लियोनार्डो इनमें से हर अनुभव से खुद गुज़रे हैं. देखते हैं कि अकादमी की हामी मिलती है या नहीं.


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मैड मैक्स फ़्यूरी रोड : 10 नॉमिनेशन : दूजा कयामत के बाद की दुनिया में भटका पानी की तलाश में

Still from Mad Max: Fury Road
Still from Mad Max: Fury Road

पागल बंधु ‘मैड मैक्स : फ्यूरी रोड’ इस साल की ‘बाप’ फ़िल्म है. सत्तर साला आस्ट्रेलियाई निर्देशक जॉर्ज मिलर ने तीस साल के अन्तराल के बाद अपनी पुरानी एक्शन सीरीज़ का ऐसा बक्सा खोला है कि सारे चाहनेवाले चित्त देखें. कहते हैं कि इस बूढ़े निर्देशक के दिल में आज भी एक सोलह साल का लड़का छिपकर बैठा है. लड़के का जिगर उसकी हथेली में उछल रहा है और उसी निडर जिगरे से यह फ़िल्म निर्देशित की गई है. ऑस्कर में ऐसा कम होता है कि गर्मी की छुट्टी वाली मसाला एक्शन रिलीज़ ऑस्कर जूरी में बैठे बुढऊ निर्माता-निर्देशकों की भी पसन्द बन जाए. लेकिन यहाँ हुआ है. मैड मैक्स को झोली भर के नॉमिनेशन मिले हैं.

मैड मैक्स की कहानी कुछ यूं है कि दुनिया बस ख़तम है और तेल-पानी इतना कम कि उनके लिए विश्वयुद्ध लड़ा जा सकता है. जिनका पानी पर कब्ज़ा है, उनका राज है. बीहड़ रेगिस्तान में हमारे हीरो मैक्स (टॉम हार्डी) को सरदार इम्मोर्टन जो के युद्ध लड़ाकों ने पकड़ा है और उसे सरदार के लड़ाकों को खून सप्लाई करने की ज़िन्दा मशीन बना दिया है. इधर सरदार के चंगुल से उसकी लड़ाका फ्यूरिआेसा (चार्ली थेरॉन) सरदार की कैद में फंसी रानियों को ले भाग निकली है. मैक्स और फ्यूरियोसा मिलते हैं, दुश्मनों से लोहा लेते हैं और निकलते हैं उस हरियाली भरे स्वर्ग की तलाश में जिसे फ्यूरिआेसा ने आखिरी बार बचपन में देखा था. लेकिन इस तबाह पृथ्वी पर अब हरितिमा कहाँ, स्वर्ग कहाँ. ‘मैड मैक्स फ्यूरी रोड’ का दार्शनिक पहलू इसे हमारे द्वारा अपने ही हाथों की जा रही पृथ्वी की तबाही और आधुनिक पूंजीवाद के आत्महंता चरित्र पर कठोर टिप्पणी बना देता है. फिर सबसे ऊपर मैड मैक्स इंसानी इरादों और इच्छाशक्ति की कथा है, जिसमें ज़िन्दा बचे रहने की सबसे आदिम जद्दोज़हद के मध्य इंसानी साझेदारी और निडरता के सबसे उजले भाव नज़र आते हैं.

FURY ROAD

नया क्या?

वैसे ऑस्कर में और उससे बाहर भी, ‘मैड मैक्स’ जैसी आउट-एंड-आउट एक्शन फ़िल्म को आलोचकों का ऐसा प्यार मिलना अपूर्व है. दरअसल इस प्यार की वजह है ‘मैड मैक्स’ का साँस-रोकू चकाचक एक्शन अन्य समकालीन ब्लॉकबस्टर हॉलीवुड साइंस फिक्शन की तरह सारा का सारा कम्प्यूटर पर ‘पोस्ट प्रोडक्शन’ में नहीं रचा गया है. मिलर ने हॉलीवुड के वीएफ़एक्स, सीजीआई और मशीनी एनिमेशन में खोते जा रहे साइंस फ़िक्शन एक्शन सिनेमा को उसकी पुरानी हाड़-माँस-मज्जा वापस देकर उसे फ़िर ज़िन्दा कर दिया है. फ़िल्म देखते हुए हॉलीवुड की पुरानी क्लासिक वेस्टर्न फ़िल्में याद आती हैं.

पटकथा-संपादन ऐसा चुस्त है कि गति के भँवरजाल में जैसे साँस उखड़ने लगती है. मैड मैक्स की सबसे तगड़ी दावेदारी इस साल तकनीकी पुरस्कारों में होनेवाली है. साउंड डिज़ाइन और साउंड मिक्सिंग, जो इस फ़िल्म की आत्मा हैं, के ऑस्कर में इसे हराना मुश्किल होगा. ‘मैड मैक्स’ इसलिए भी ख़ास है कि यहाँ एक अविश्वस्नीय रूप से अमानवीय युद्ध के फोरफ्रंट पर स्त्रियाँ खड़ी हैं. माएं, बेटियाँ, गर्भवती महिलाएं. यह हमें फ्यूरिआोसा जैसी लड़ाका नायिका देती है और प्रतीकों में ही सही बताती है कि प्रलय के बाद भी इस धरती को स्त्रियाँ ही बचायेंगी.


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दि मार्शियन : 7 नॉमिनेशन : तीजा बेचारा मंगल पर छूटा

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आलोचकों की नज़र में ‘दि मार्शियन’ इस बार के ऑस्कर नॉमिनेशन की वो फ़िल्म है जिसे कोरम पूरा करने के लिए कतार में बिठाया जाता है. सात नॉमिनेशन होने के बावजूद उसके जीतने की संभावना कम ही पुरस्कारों में है और एक ‘अच्छी फ़िल्म’ से आगे उसकी तारीफ़ में लोग कुछ कहने से बच रहे हैं. यह भी इंसानी सरवाइवल की कथा है, लेकिन साइंश फिक्शन शैली में ढालकर. अंतरिक्षयात्री नायक मार्क वाट्नी को मंगल पर कार्यरत साथी टीम एक अचानक हुई दुर्घटना के बाद गफ़लत में मरा समझकर पीछे छोड़ आई है और अब उन्हें पृथ्वी द्वारा बचाए जाने तक इस लाल गृह पर स्वयं ज़िन्दा रहना है. मंगल पर रहने लायक वातावरण के लिए वे ‘हैबिस्फियर’ नामक एक ऑक्सिजन से भरे टेंट पर निर्भर हैं और मंगल के जानलेवा वातावारण में अंतरिक्षयात्री का सूट पहने बिना एक कदम भी बाहर निकालना संभव नहीं. समस्याएं और भी हैं. जल्दी ही वाट्नी समझ जाते हैं कि उनके पास बचा कुल भोजन अधिकतम एक साल से कुछ ज़्यादा अवधि तक चल सकता है, जबकि पृथ्वी से उनको बचाने के लिए टीम के मंगल आने में कम से कम चार साल की देरी है. यहाँ वाट्नी के किरदार में अभिनेता मैट डेमन हैं. अब तो चुटकुला चल पड़ा है कि डेमन हर दूसरी फ़िल्म में ‘अकेले छूट’ जाते हैं और उन्हें बचाने पर अरबों रुपए खर्च होते हैं. पुरानी क्लासिक ‘सेविंग प्राइवेट रेयन’ में दुश्मन देश में बचाए जाने से लेकर हालिया क्रिस्टोफ़र नोलन की साइंसफ़िक्शन ‘इंटरस्टेलर’ में किसी अंजान आकाशगंगा से बचाए जाने तक यह लिस्ट बहुत लम्बी है, जिसमें अब ‘दि मार्शियन’ का नाम भी जुड़ गया है.

मंगल पर ज़िन्दा बचे रहने का काम मुश्किल है. जहाँ हवा-पानी-मिट्टी सब आपके खिलाफ़ हो, वहाँ फ़कत ‘आलू उगाना’ भी कैसा द्वितीय विश्व युद्ध जीतने जैसा अहसास पैदा करता है, यह ‘दि मार्शियन’ की कथा बखूबी बताती है. मार्क वाट्नी के किरदार में मैट डेमन यहाँ गृह पर अकेले ऑक्सीजन में नाइट्रोजन मिलाकर पानी बनाते हैं और अपनी पॉटी से खाद बनाकर आलू उगाते हैं. और इस बीच पृथ्वी पर उन्हें बचाने का अभियान चलता रहता है. साइंस फ़िक्शन होते हुए भी ‘दि मार्शियन’ की ख़ास बात इसका तकनीकी यथार्थवाद है. यह मंगल से जुड़ी उन्हीं जानकारियों का उपयोग करती है जो सच हैं और आमतौर पर विज्ञान के बेसिक नियमों को तोड़ने से बचती है, जिससे दर्शक का कथा पर विश्वास बना रहे. फ़िल्म के कुछ सबसे मनोरंजक हिस्से पृथ्वी पर स्थित कंट्रोल रूम द्वारा दुर्घटना के बाद पहली बार वाट्नी से संवाद स्थापित करने से जुड़े हैं.

एक और बात, आजकल हॉलीवुड की समर ब्लॉकबस्टर्स का बड़ा बाज़ार एशियाई देशों में है और इसकी झलक उनकी कास्टिंग में दिखते लगी है. यहाँ भी मूल उपन्यास में नासा में बैठे मंगल ऑपरेशन के बॉस का नाम वेंकट कपूर था और अफ़वाह गरम थी कि अपने इरफ़ान ख़ान इस भूमिका में दिखेंगे. लेकिन इरफ़ान ने मंगल पर छूटे मार्क वाट्नी को बचाने के बजाए ‘पीकू’ में बच्चन साब की कब्ज़ संबंधी राष्ट्रीय समस्या को चुना. नतीजा, कहानी का चीनी-जापानी कनेक्शन तो बच गया लेकिन हिन्दुस्तानी कनेक्शन किताब से फ़िल्म तक पहुँचते पहुँचते गायब.

क्या नया?

एंडी वेयर के जिस उपन्यास पर यह फ़िल्म आधारित है, वो मैंने कुछ समय पहले अन्धाधुन्ध रफ़्तार से पढ़ा था. ख़ास बात यह है कि विज्ञान फंतासी और सरवाइवल कथा होते हुए भी इसके नायक की गढ़त में जो एक ख़ास किस्म के बेपरवाह सटायर का पुट मिला हुआ है, वो इसे एक नए स्वाद की कहानी बनाता है. यहाँ निर्जीव गृह पर अकेला छूटा नायक बैठकर रोता नहीं है बल्कि डिस्को गाने सुनता है. कभी आलू उगाकर खुद को कॉलोनाइज़र तो कभी अन्तरराष्ट्रीय कानूनों का हवाला दे खुद को समुद्री लुटेरा घोषित करता है. सरवाइवल कथाआें के आधारभूत मैलोड्रेमैटिक एंगल से ‘दि मार्शियन’ का नायक पूरी तरह मुक्त है और इसी नएपन में अभिनेता मैट डेमन की जीत छिपी है. खुद निर्देशक रिडली स्कॉट के लिए भी, जो साइंस फ़िक्शन के पुराने उस्ताद हैं और जिन्होंने ‘एलियन’ और ‘ब्लेड रनर’ जैसी बौद्धिक और डरावनी क्लासिक साइंस फ़िक्शन फ़िल्में बनाई हैं, यह लापरवाह नायक और इसका हल्का फुल्का अंदाज़ विज्ञान फंतासी के लिए नया स्वाद है. डेमन और स्कॉट ने मूल उपन्यास के किरदार की इस बेपरवाह गढ़त को किसी संजीवनी बूटी की तरह पकड़ा है और इसीलिए बाक़ी कई मामलों में पिछड़ती यह विज्ञान फंतासी उनके अभिनय के बल पर ऑस्कर में क्लास वन कैटेगरी वाली फ़िल्मों में आ जाती है.

और फिर साइंस फ़िक्शन होते हुए भी अन्तत: ‘दि मार्शियन’ का द्वंद्व नैतिक है, इंसानी है. द्वंद्व है कि क्या आप एक आदमी की जान बचाने के लिए पांच अन्य व्यक्तियों की जान खतरे में डालेंगे? और इसी मौलिक द्वंद्व से पैदा होता है इंसानी जीवट का सवाल, कि क्या निर्णायक मौका आने पर एक इंसान दूसरे की जान बचाने के लिए अपनी जान दांव पर लगाएगा? यह दरअसल इंसानियत से जुड़े मौलिक सवाल हैं जिनसे हमारी मानवीय सभ्यता के विकास का पता मिलता है. मंगल गृह पर होते भी ‘दि मार्शियन’ ठेठ पृथ्वी की कथा है जो इस नीले गृह के भविष्य का पता देती है, हमारे भविष्य का पता देती है.

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