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भैरंट

‘आज पेड़ मांग रहा है, कल को मेरी जान मांग लेगा. परसों कुछ और मांग लेगा.’

‘आज पेड़ मांग रहा है, कल को मेरी जान मांग लेगा. परसों कुछ और मांग लेगा.’

रामकुमार सिंह. राजस्थान के फतेहपुर से हैं. मौजूदा वक्त में मुंबई रहते हैं. फिल्मों में काम करते हैं. सरकार 3, जेड प्लस, भोभर जैसी फिल्मों की कहानी लिख चुके हैं. अनारकली ऑफ आरा में पत्रकार का रोल किए थे. कास्टिंग, म्यूजिक, प्रोडूसर वाले काम करते रहते हैं. इन दिनों लोककथाओं को दिलचस्‍प अंदाज में पुनर्पाठ … और पढ़ें ‘आज पेड़ मांग रहा है, कल को मेरी जान मांग लेगा. परसों कुछ और मांग लेगा.’

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प्रेमचंद की सबसे धांसू कहानियां, एक जगह पर एक साथ

प्रेमचंद की सबसे धांसू कहानियां, एक जगह पर एक साथ

प्रेमचंद भारत के सबसे महान राइटर माने जाते हैं. हम कहते हैं वो सबसे नए और कूल राइटर थे. आज होते तो दर ऑफेंड होते लोग उनसे. ट्विटर पर उनको बहुत कोसा जाता और वेबसाइट्स उनकी कहानियों के बीच से लाइन निकाल-निकाल कोट्स बनाती.  31 जुलाई को प्रेमचंद का जन्मदिन होता है. उनकी कई सारी … और पढ़ें प्रेमचंद की सबसे धांसू कहानियां, एक जगह पर एक साथ

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पियक्कड़ ने तारीफ़ सुनने के लिए सबको मरवा दिया!

पियक्कड़ ने तारीफ़ सुनने के लिए सबको मरवा दिया!

एक कहानी रोज़ में आज पढ़िए पार्वती शर्मा की कहानी एक पिय्यकड़ और एक रोग. ये कहानी अंग्रेज़ी में मुंबई मिरर में प्रकाशित हुई थी. बच्चों के लिए लिखे जा रहे उपन्यास का अंश है. ये उसी कहानी का हिंदी अनुवाद है जिसे कार्तिकेय जैन ने किया हैं. कार्तिकेय फ़्रीलांस अनुवादक हैं. पार्वती शर्मा ने … और पढ़ें पियक्कड़ ने तारीफ़ सुनने के लिए सबको मरवा दिया!

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'मरने के लिए आत्महत्या बहुत जरूरी नहीं है!'

'मरने के लिए आत्महत्या बहुत जरूरी नहीं है!'

निर्मल वर्मा ने अपनी ज़िन्दगी में खूब लिखा. साहित्य अकादमी से लेकर ज्ञानपीठ जैसे पुरस्कार उनको मिले. आज पढ़िए उनकी कहानी जलती झाड़ी. मैं उस शहर में पहली बार आया था. सोचा था, चंद दिन यहां रहकर आगे चला जाऊंगा; किंतु कुछ अप्रत्याशित कारणों से रुक जाना पड़ा. दिन-भर होटल में रहता और जब ऊब … और पढ़ें ‘मरने के लिए आत्महत्या बहुत जरूरी नहीं है!’

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हफ्ते के लिए घर आए हो और पत्नी को मार रहे हो?

हफ्ते के लिए घर आए हो और पत्नी को मार रहे हो?

काशी जाकर दशाश्वमेध घाट पर बेतकल्लुफ होकर बैठो. सांझ होते ही घंटियों की अनवरत आवाज आती है कानों में. फिर थोड़ी देर में गंगा आरती शुरू होती है. आंखें जगमग से थक गई हों तो मूंद लो. मुंदी आंखों में जो शक्लें घूमती हैं उनमें एक होंगे काशीनाथ सिंह. वही काशीनाथ सिंह जिनके उपन्यास ‘काशी … और पढ़ें हफ्ते के लिए घर आए हो और पत्नी को मार रहे हो?

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अतीत जब पलटकर आता है तो सब ठहर ही जाता है

अतीत जब पलटकर आता है तो सब ठहर ही जाता है

36 साल के अनघ शर्मा हिंदी के युवा कहानीकार हैं. लिखने-पढ़ने और मिलने-बतियाने में बहुत यकीन और काम से काम रखते हैं. ‘धूप की मुंडेर’ नाम की कहानी संग्रह लिख चुके हैं. एक कहानी रोज़ में इसी कहानी संग्रह से एक कहानी ‘वह उससे मिला था’ पढ़िए. अनघ से से उनके ई मेल anaghsharma@hotmail.com पर … और पढ़ें अतीत जब पलटकर आता है तो सब ठहर ही जाता है

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इस ज़मीन का इस्तेमाल इतिहास लिखने के लिए भी नहीं हो सकता

इस ज़मीन का इस्तेमाल इतिहास लिखने के लिए भी नहीं हो सकता

राजकमल चौधरी ने जितनी जरूरी कविताएं लिखीं उतनी ही जरूरी कहानियां भी. मैथिली और हिंदी के चर्चित लेखक हैं, हिंदी सहित्य के सबसे खतरनाक दौर में एक नायक की तरह उभरे और जितना नाम कमाया उतनी ही बदनामी भी. जो भी किया जमकर किया. सिर्फ 38 साल जिए, लेकिन इतना सार्थक लेखन किया कि कोई … और पढ़ें इस ज़मीन का इस्तेमाल इतिहास लिखने के लिए भी नहीं हो सकता

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अटना का साहब और पटना की मेम, रात खाए मुरगी और सुबह करे नेम

अटना का साहब और पटना की मेम, रात खाए मुरगी और सुबह करे नेम

एक कहानी रोज़ में आज पढ़िए फणीश्वरनाथ रेणु को- नैना जोगिन रतनी ने मुझे देखा तो घुटने से ऊपर खोंसी हुई साड़ी को ‘कोंचा’ की जल्दी से नीचे गिरा लिया. सदा साइरेन की तरह गूंजनेवाली उसकी आवाज कंठनली में ही अटक गई. साड़ी की कोंचा नीचे गिराने की हड़बड़ी में उसका ‘आंचर’ भी उड़ गया. … और पढ़ें अटना का साहब और पटना की मेम, रात खाए मुरगी और सुबह करे नेम

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'ऐसा लगता है हमारे घरों की जड़ें उग आई हों'

'ऐसा लगता है हमारे घरों की जड़ें उग आई हों'

तेनजिन त्सुंदे न तिब्बत में पैदा हुए, न कभी तिब्बत गए लेकिन मरना चाहते हैं तिब्बत में. तेनजिन हजारों शरणार्थी तिब्बतियों की आवाज़ हैं. तेनजिन त्सुंदे की कविताएं किसी तिब्बती से पूछिए कैसी होती हैं! एक कविता रोज़ में आज तेनजिन त्सुंदे की एक कविता. निर्वासन का घर चू रही थी हमारी खपरैलों वाली छत और चार … और पढ़ें ‘ऐसा लगता है हमारे घरों की जड़ें उग आई हों’

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'मरेगा नहीं, घीसू का बेटा है, कभी-न-कभी तुझे मिलने आ जाएगा'

'मरेगा नहीं, घीसू का बेटा है, कभी-न-कभी तुझे मिलने आ जाएगा'

साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित भीष्म साहनी का जन्म रावलपिंडी में 8 अगस्त, 1915 को हुआ था. उनके उपन्यास,’तमस’ पर गोविंद निहलानी ने ओम पुरी को लेकर एक फ़िल्म भी बनाई थी. यह उपन्यास भारत पाकिस्तान बंटवारे को लेकर था. उनकी प्रस्तुत कहानी  ‘गंगो का जाया’ बाल श्रम, मज़दूरी और और परिस्थिति-जन्य दुःख  पर केंद्रित एक … और पढ़ें ‘मरेगा नहीं, घीसू का बेटा है, कभी-न-कभी तुझे मिलने आ जाएगा’