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एक कविता रोज़: बीन भी हूं मैं तुम्हारी रागिनी भी हूं

एक कविता रोज़: बीन भी हूं मैं तुम्हारी रागिनी भी हूं

प्रिय पाठको, आज एक कविता रोज़ में महादेवी वर्मा (26 मार्च 1907 – 11 सितंबर 1987). महादेवी हिंदी साहित्य के छायावादी युग की शान हैं. कथाकार दूधनाथ सिंह ने महादेवी पर लिखते हुए कहा कि वह अपने दौर की एक ऐसी आजाद और विद्रोही स्त्री थीं, जिनके सिर पर आंचल है. आधुनिक मीरा कह कर … और पढ़ें एक कविता रोज़: बीन भी हूं मैं तुम्हारी रागिनी भी हूं

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उदित नारायण, श्याम बेनेगल और धर्मवीर भारती को एक सूत्र में जोड़ती है यह कविता

उदित नारायण, श्याम बेनेगल और धर्मवीर भारती को एक सूत्र में जोड़ती है यह कविता

धर्मवीर भारती एक उपन्यासकार के रूप में बहुत ज़्यादा प्रसिद्ध हैं. उनके उपन्यास ‘गुनाहों का देवता’ ने सफलता के नए मानक गढ़े हैं. गुनाहों का देवता के बारे में कहा जाता है कि ये एक ऐसा टीन-एज साहित्य है जिसे आसुओं के समंदर में डूबे बिना आप पढ़ ही नहीं सकते. वर्तमान समय में ‘नई … और पढ़ें उदित नारायण, श्याम बेनेगल और धर्मवीर भारती को एक सूत्र में जोड़ती है यह कविता

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जवाहरलाल नेहरू का वो शायर दोस्त, जो कहता था कि नेहरू को आधी अंग्रेज़ी आती है

जवाहरलाल नेहरू का वो शायर दोस्त, जो कहता था कि नेहरू को आधी अंग्रेज़ी आती है

“आने वाली नस्लें तुम पर रश्क करेंगी हम असरों जब भी उनको ध्यान आएगा, तुमने फ़िराक़ को देखा है” ये शे’र शायर ने खुद के लिए लिखा है. आलोचक इसमें खुदपसंदी की इंतेहा खोज सकते हैं. आत्ममुग्धता के, घमंडीपन के इल्ज़ाम लगा सकते हैं. ऐसे इल्ज़ाम सच के कितने करीब होंगे हम नहीं जानते. हम … और पढ़ें जवाहरलाल नेहरू का वो शायर दोस्त, जो कहता था कि नेहरू को आधी अंग्रेज़ी आती है

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'स्लो सुसाइड यानी एक आराम की मौत मर रहे हैं लोग'

'स्लो सुसाइड यानी एक आराम की मौत मर रहे हैं लोग'

आज शिव कुमार बटालवी (23 जुलाई 1936 – 07 मई 1973) का जन्मदिन है. इन्हें आज भी पंजाब में सुपरस्टार का दर्जा मिला हुआ है. पहला और शायद एकमात्र सुपर स्टार शायर. जैसे बॉलीवुड के राजेश खन्ना. उस शायर के लिखे हुए गीत – अज्ज दिन चढ्या, इक कुड़ी जिद्दा नां मुहब्बत, मधानियां, लट्ठे दी चादर, … और पढ़ें ‘स्लो सुसाइड यानी एक आराम की मौत मर रहे हैं लोग’

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एक कविता रोज़: पानी मांगते हैं साले

एक कविता रोज़: पानी मांगते हैं साले

आधे देश में बाढ़ है और आधा देश सूखा पड़ा है. हम असम में बाढ़ और चेन्नई में पानी की किल्लत को एक साथ झेल रहे हैं. महाराष्ट्र में एक इलाका है, मराठवाड़ा. बीड, परभणी,औरंगाबाद, लातूर वाला इलाका. मराठवाड़ा हमारे दिमाग में सूखे के पर्याय के तौर पर नत्थी है. इंटेलेक्चुअल्स की दो जमात होती … और पढ़ें एक कविता रोज़: पानी मांगते हैं साले

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'भाषाओं के अपने-अपने अहंकार थे'

'भाषाओं के अपने-अपने अहंकार थे'

वक्त यों है कि भाषा के नाम पर सब ओर खूब शोर मच रहा है. हमारी भाषा और संवेदनात्मक समझ के नए सिरे खुल रहे हैं. कवि राजेश जोशी ने भाषा की इस अपर्याप्तता और विडंबना को कुछ बरस पहले अपनी एक कविता में पहचाना था. आज एक कविता रोज़ में पढ़िए  उनकी वही कविता. … और पढ़ें ‘भाषाओं के अपने-अपने अहंकार थे’

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एक कविता रोज: बच्चे काम पर जा रहे हैं

एक कविता रोज: बच्चे काम पर जा रहे हैं

‘लाफ्टर चैलेंज’ में कभी एक डॉक्टर आए थे. अभी गूगल किया तो नाम याद आया. डॉक्टर तुषार शाह. अपनी परफॉर्मेंस के दौरान उन्होंने एक बात कही थी, जो अब तक याद रह गई. बोले कि फलानी जगह पर एक कारखाने के सामने नया गोल्फ कोर्स बनाया जा रहा है. यानी अब काम करते हुए बच्चे, बड़ों … और पढ़ें एक कविता रोज: बच्चे काम पर जा रहे हैं

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'मैं तो दिल में तेरे कदमों के निशां तक देखूं'

'मैं तो दिल में तेरे कदमों के निशां तक देखूं'

आज एक कविता रोज़ में अहमद नदीम क़ासमी-  तुझे खोकर भी तुझे पाऊं जहां तक देखूं तुझे खोकर भी तुझे पाऊं जहां तक देखूं हुस्न-ए-यज़्दां से तुझे हुस्न-ए-बुतां तक देखूं तूने यूं देखा है जैसे कभी देखा ही न था मैं तो दिल में तेरे क़दमों के निशां तक देखूं सिर्फ़ इस शौक़ में पूछी … और पढ़ें ‘मैं तो दिल में तेरे कदमों के निशां तक देखूं’

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यकीन हो तो कोई रास्ता निकलता है

यकीन हो तो कोई रास्ता निकलता है

एक कविता रोज में आज पढ़िए गज़ल ‘यकीन हो तो रास्ता निकलता है’. 5 जुलाई, 2019 के रोज़ भारत में पहली बार किसी महिला वित्त मंत्री ने बजट पेश किया – निर्मला सीतारमण (इंदिरा गांधी ने भी किया था, लेकिन वो प्रधानमंत्री भी थीं). आमतौर पर अंग्रेज़ी में बात करने वालीं सीतारमण ने बजट में … और पढ़ें यकीन हो तो कोई रास्ता निकलता है

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'वे जब हंसती हैं फेनिल दूध-सी निश्छल हंसी'

'वे जब हंसती हैं फेनिल दूध-सी निश्छल हंसी'

निर्मला पुतुल के शब्द कविता की दुनिया और उसके बाहर भी नगाड़े की तरह बजते हैं. एक संताल आदिवासी परिवार में जन्मीं निर्मला झारखंड से आती हैं. हिंदी में कविताओं की दो और संताली में एक किताब प्रकाशित हो चुकी है. आदिवासी समाज के लिए अपनी जमीनी सेवाएं भी वह दे रही हैं. पेश है … और पढ़ें ‘वे जब हंसती हैं फेनिल दूध-सी निश्छल हंसी’