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भैरंट

'हमने उनसे किया इश्क़, जिन्हें हमेशा जल्दी रहती थी किताबें बदलकर लौट जाने की'

एक कविता रोज़ में आज पढ़िए गौरव सोलंकी की कविता, 'इश्क़'

'हमने उनसे किया इश्क़, जिन्हें हमेशा जल्दी रहती थी किताबें बदलकर लौट जाने की'

‘आर्टिकल 15’ फ़ेम गौरव सोलंकी IIT रुड़की से पढ़कर इंजीनियर हुए, लेकिन मन किस्सों-कहानियों और कविताओं में रमा रहा. हिंदी के चर्चित युवा कवियों और कहानीकारों में उनकी गिनती होती है. उनकी कविताओं का शिल्प खुरदुरा है और कलेवर तीखा. सोशल टैबूज पर उनका लिखा पढ़ने लायक है. पढ़िए उनकी कविता, ‘इश्क़’. इश्क़ हमने इश्क़ … और पढ़ें ‘हमने उनसे किया इश्क़, जिन्हें हमेशा जल्दी रहती थी किताबें बदलकर लौट जाने की’

भैरंट

एक कविता रोज़ में कात्यायनी की कविता - हॉकी खेलती लड़कियां

'लड़कियों को चेतावनी दी जा रही है और वे हंस रही हैं कि यह ज़िन्दगी नहीं है'

एक कविता रोज़ में कात्यायनी की कविता - हॉकी खेलती लड़कियां

दी लल्लनटॉप का कविताओं से जुड़ा कार्यक्रम जिसका नाम है ‘एक कविता रोज़’. अभी हाल ही में टोक्यो ओलंपिक्स में महिला स्पोर्ट्सपर्सन्स ने हमारे देश का सिर ऊंचा किया. चाहे वो पीवी सिंधु हों, लवलीना बोरगोहेन या महिला हॉकी टीम, सभी ने जी-जान से मेहनत की. इसी सिलसिले में आज पढ़िए एक कविता जिसका शीर्षक … और पढ़ें एक कविता रोज़ में कात्यायनी की कविता – हॉकी खेलती लड़कियां

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एक कविता रोज़ में सुनिए मनोज कुमार झा की कविता - सभ्यता

एक कविता रोज़. हम आज हिन्दी के कवि मनोज कुमार झा की कविता पढ़ने आए हैं. मनोज दरभंगा, बिहार में रहते हैं. दिल्ली की नितांत साहित्यिक चकाचौंध से दूर. हिन्दी के कवि विष्णु खरे ने मनोज कुमार झा के बारे में कहा था कि हिन्दी की युवा कविता को कुछ और नए लोगों ने हाथ लिया है. मनोज उनमें से एक हैं. मनोज की कविता की ख़ास बात है. वो हिन्दी के नवाचार को बरतती है. वरना कविताएं रस्मी कार्रवाईयों में उलझी हैं, ऐसे आरोप हिन्दी कविता पर लगते हैं. टिप्पणीकार कहते हैं कि मनोज कुमार झा की कविता “मैंने कितनी किताबें पढ़ी हैं” और “मैं कितना क़ाबिल राजनीतिक समीकरण बरतता हूं” के काव्य खांचे से बाहर बात करती हैं. यथार्थ का रियाज़ करती हैं. भाषा के स्तर पर भी हिन्दी को बेहद ज़रूरी तोड़फोड़ दरकार है. मनोज उसे बरतते हैं. उनकी कविता ‘सभ्यता’ आप सभी के लिए.

एक कविता रोज़ में सुनिए मनोज कुमार झा की कविता - सभ्यता

एक कविता रोज़. हम आज हिन्दी के कवि मनोज कुमार झा की कविता पढ़ने आए हैं. मनोज दरभंगा, बिहार में रहते हैं. दिल्ली की नितांत साहित्यिक चकाचौंध से दूर. हिन्दी के कवि विष्णु खरे ने मनोज कुमार झा के बारे में कहा था कि हिन्दी की युवा कविता को कुछ और नए लोगों ने हाथ लिया है. मनोज उनमें से एक हैं. मनोज की कविता की ख़ास बात है. वो हिन्दी के नवाचार को बरतती है. वरना कविताएं रस्मी कार्रवाईयों में उलझी हैं, ऐसे आरोप हिन्दी कविता पर लगते हैं. टिप्पणीकार कहते हैं कि मनोज कुमार झा की कविता “मैंने कितनी किताबें पढ़ी हैं” और “मैं कितना क़ाबिल राजनीतिक समीकरण बरतता हूं” के काव्य खांचे से बाहर बात करती हैं. यथार्थ का रियाज़ करती हैं. भाषा के स्तर पर भी हिन्दी को बेहद ज़रूरी तोड़फोड़ दरकार है. मनोज उसे बरतते हैं. उनकी कविता ‘सभ्यता’ आप सभी के लिए.

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एक कविता रोज़ में सुनिए वीरेन डंगवाल की कविता - प्रेम तुझे छोड़ेगा नहीं!

आज़ादी से 10 दिन पहले आ गए दुनिया में. 5 अगस्त 1947. जगह-गढ़वाल, उत्तराखंड. नाम-वीरेन डंगवाल. पाब्लो नेरूदा, बर्टोल्ट ब्रेख्त और वास्को पोपा की लिखी कालजयी रचनाओं का अनुवाद किया. ख़ुद इनकी रचनाओं का अनुवाद भी बांग्ला, मराठी, पंजाबी, अंग्रेज़ी, मलयालम और उड़िया में छपा. ख़ूब लिखा और बड़े अख़बार के संपादक भी रहे. ज़िंदगी को जिस बारीक नज़र से इन्होंने देखा वो इनकी रचनाओं में झलकता है. समोसे पर यूं लिखा कि मुंह में आलू का तीख़ापन आ जाए. जिस शहर से गुज़रे उसे निगाह और ज़ेहन दोनों में बसाए रखा. इनके शब्दों की रेल कानपुर, इलाहाबाद, फैज़ाबाद, अयोध्या, नैनीताल, नागपुर होते हुए न जाने कहां-कहां रुकती है. कभी प्रेम का स्टेशन आता है तो कभी 1857 की क्रांति हुंकार भरती है. एक कविता रोज़ में आज सुनिए वीरेन डंगवाल की कविता - प्रेम तुझे छोड़ेगा नहीं!

एक कविता रोज़ में सुनिए वीरेन डंगवाल की कविता - प्रेम तुझे छोड़ेगा नहीं!

आज़ादी से 10 दिन पहले आ गए दुनिया में. 5 अगस्त 1947. जगह-गढ़वाल, उत्तराखंड. नाम-वीरेन डंगवाल. पाब्लो नेरूदा, बर्टोल्ट ब्रेख्त और वास्को पोपा की लिखी कालजयी रचनाओं का अनुवाद किया. ख़ुद इनकी रचनाओं का अनुवाद भी बांग्ला, मराठी, पंजाबी, अंग्रेज़ी, मलयालम और उड़िया में छपा. ख़ूब लिखा और बड़े अख़बार के संपादक भी रहे. ज़िंदगी को जिस बारीक नज़र से इन्होंने देखा वो इनकी रचनाओं में झलकता है. समोसे पर यूं लिखा कि मुंह में आलू का तीख़ापन आ जाए. जिस शहर से गुज़रे उसे निगाह और ज़ेहन दोनों में बसाए रखा. इनके शब्दों की रेल कानपुर, इलाहाबाद, फैज़ाबाद, अयोध्या, नैनीताल, नागपुर होते हुए न जाने कहां-कहां रुकती है. कभी प्रेम का स्टेशन आता है तो कभी 1857 की क्रांति हुंकार भरती है. एक कविता रोज़ में आज सुनिए वीरेन डंगवाल की कविता - प्रेम तुझे छोड़ेगा नहीं!

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एक कविता रोज़ में सुनिए देवेश की कविता - ब्लैक शीप

दी लल्लनटॉप का कविताओं से जुड़ा कार्यक्रम 'एक कविता रोज़'. आज के एपिसोड में हम आपको सुनाएंगे देवेश पथ सारिया की कविता. देवेश राजस्थान के अलवर से ताल्लुक रखते हैं और फिलहाल ताइवान में पोस्ट डाक्टरल रिसर्चर हैं. हंस, कादम्बिनी, सदानीरा और जानकीपुल जैसे कई पत्रिकाओं में इनकी रचनाएं छप चुकी हैं. आज के एक कविता रोज़ में सुनिए देवेश की कविता जिसका शीर्षक है ब्लैक शीप. देखिए वीडियो.

एक कविता रोज़ में सुनिए देवेश की कविता - ब्लैक शीप

दी लल्लनटॉप का कविताओं से जुड़ा कार्यक्रम 'एक कविता रोज़'. आज के एपिसोड में हम आपको सुनाएंगे देवेश पथ सारिया की कविता. देवेश राजस्थान के अलवर से ताल्लुक रखते हैं और फिलहाल ताइवान में पोस्ट डाक्टरल रिसर्चर हैं. हंस, कादम्बिनी, सदानीरा और जानकीपुल जैसे कई पत्रिकाओं में इनकी रचनाएं छप चुकी हैं. आज के एक कविता रोज़ में सुनिए देवेश की कविता जिसका शीर्षक है ब्लैक शीप. देखिए वीडियो.

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एक कविता रोज़ में सुनिए विनोद कुमार शुक्ल की कविता - प्रेम की जगह अनिश्चित है

कविताओं से जुड़ा हमारा कार्यक्रम 'एक कविता रोज़'. आज आपको सुनाते हैं एक जादूगर की कविता. जादूगर का नाम - विनोद कुमार शुक्ल. जादू दिखाने के उन्हें किसी छड़ी की नहीं बल्कि अपनी कलम की ज़रूरत होती है. कागज़ पर वो कलम घुमाते हैं और कुछ ऐसा छप जाता है जो सदियों से वहीं था मगर हमें दिखा नहीं था. जैसे जब वो कहते हैं कि - 'कुछ भी नहीं में/सब कुछ होना बचा रहेगा', तो हमें वो सब कुछ, कुछ भी नहीं में दिखता है जिसे हम ना जाने कब से ढूंढ रहे थे. खैर आज की कविता पर आते हैं. आज विनोद कुमार शुक्ल की जो कविता हम पढ़ने जा रहे हैं उसका शीर्षक है - प्रेम की जगह अनिश्चित है. देखिए वीडियो.

एक कविता रोज़ में सुनिए विनोद कुमार शुक्ल की कविता - प्रेम की जगह अनिश्चित है

कविताओं से जुड़ा हमारा कार्यक्रम 'एक कविता रोज़'. आज आपको सुनाते हैं एक जादूगर की कविता. जादूगर का नाम - विनोद कुमार शुक्ल. जादू दिखाने के उन्हें किसी छड़ी की नहीं बल्कि अपनी कलम की ज़रूरत होती है. कागज़ पर वो कलम घुमाते हैं और कुछ ऐसा छप जाता है जो सदियों से वहीं था मगर हमें दिखा नहीं था. जैसे जब वो कहते हैं कि - 'कुछ भी नहीं में/सब कुछ होना बचा रहेगा', तो हमें वो सब कुछ, कुछ भी नहीं में दिखता है जिसे हम ना जाने कब से ढूंढ रहे थे. खैर आज की कविता पर आते हैं. आज विनोद कुमार शुक्ल की जो कविता हम पढ़ने जा रहे हैं उसका शीर्षक है - प्रेम की जगह अनिश्चित है. देखिए वीडियो.
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एक कविता रोज़ में सुनिए त्रिभुवन की कविता- मैं आपको बस सुरक्षित दिख रहा हूं

'दी लल्लनटॉप' का कविताओं से जुड़ा कार्यक्रम 'एक कविता रोज़'. एक कविता रोज़ में आज त्रिभुवन जी की कविताएं. भारत-पाकिस्तान बॉर्डर के एक छोटे से गांव चक 25 एमएल में एक अश्वपालक के घर पैदा हुए त्रिभुवन मूलत: रिपोर्टर हैं. जयपुर रहते हैं और इन दिनों हरिदेव जोशी पत्रकारिता और जनसंचार विश्वविद्यालय में शिक्षक की भूमिका में भी हैं. उनकी एक ताज़ा कविता जो हम आज आपको सुनाने जा रहे हैं उसका शीर्षक है -  मैं आपको बस सुरक्षित दिख रहा हूं. देखिए वीडियो.

एक कविता रोज़ में सुनिए त्रिभुवन की कविता- मैं आपको बस सुरक्षित दिख रहा हूं

'दी लल्लनटॉप' का कविताओं से जुड़ा कार्यक्रम 'एक कविता रोज़'. एक कविता रोज़ में आज त्रिभुवन जी की कविताएं. भारत-पाकिस्तान बॉर्डर के एक छोटे से गांव चक 25 एमएल में एक अश्वपालक के घर पैदा हुए त्रिभुवन मूलत: रिपोर्टर हैं. जयपुर रहते हैं और इन दिनों हरिदेव जोशी पत्रकारिता और जनसंचार विश्वविद्यालय में शिक्षक की भूमिका में भी हैं. उनकी एक ताज़ा कविता जो हम आज आपको सुनाने जा रहे हैं उसका शीर्षक है -  मैं आपको बस सुरक्षित दिख रहा हूं. देखिए वीडियो.

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एक कविता रोज़ में सुनिए नोमान शौक़ की कविता- जाने किस उम्मीद पे छोड़ आए थे घर-बार लोग

हमारा कार्यक्रम जिसका नाम है 'एक कविता रोज़'. आज के एपिसोड में बात एक शायर की. नाम - नोमान शौक़. बिहार के आरा की पैदाइश और पूरे देश के लिए महबूब शायर. शायरी गज़लें लिखने के अलावा नोमान साहब ने कई रचनाओं का अंग्रेज़ी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में अनुवाद भी किया है. कुछ दिनों पहले इनका जन्मदिन था. इसी मौके पर आपको सुनाते हैं उनकी एक गज़ल जिसका नाम है - जाने किस उम्मीद पे छोड़ आए थे घर-बार लोग. देखिए वीडियो.

एक कविता रोज़ में सुनिए नोमान शौक़ की कविता- जाने किस उम्मीद पे छोड़ आए थे घर-बार लोग

हमारा कार्यक्रम जिसका नाम है 'एक कविता रोज़'. आज के एपिसोड में बात एक शायर की. नाम - नोमान शौक़. बिहार के आरा की पैदाइश और पूरे देश के लिए महबूब शायर. शायरी गज़लें लिखने के अलावा नोमान साहब ने कई रचनाओं का अंग्रेज़ी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में अनुवाद भी किया है. कुछ दिनों पहले इनका जन्मदिन था. इसी मौके पर आपको सुनाते हैं उनकी एक गज़ल जिसका नाम है - जाने किस उम्मीद पे छोड़ आए थे घर-बार लोग. देखिए वीडियो.

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एक कविता रोज़ में सुनिए अनामिका अनु की कविता- क्षमा

कविताओं से जुड़ा हमारा कार्यक्रम - एक कविता रोज़. आज के एपिसोड में हम आपको अनामिका अनु की कविताएं सुनाएंगे. अनामिका केरल में रहती हैं, पोएट हैं और क्या खूब लिखती हैं. उन्हें 2020 में भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार से भी नवाज़ा जा चुका है. इसके अलावा अनामिका हंस, समकालीन भारतीय साहित्य, स्त्रीकाल, चौथी दुनिया, और न जाने कितनी जगह छप चुकी हैं. आज हम आपको उनकी दो कविताएँ सुनाने जा रहे हैं. पहली कविता का शीर्षक है - क्षमा. देखिए वीडियो.

एक कविता रोज़ में सुनिए अनामिका अनु की कविता- क्षमा

कविताओं से जुड़ा हमारा कार्यक्रम - एक कविता रोज़. आज के एपिसोड में हम आपको अनामिका अनु की कविताएं सुनाएंगे. अनामिका केरल में रहती हैं, पोएट हैं और क्या खूब लिखती हैं. उन्हें 2020 में भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार से भी नवाज़ा जा चुका है. इसके अलावा अनामिका हंस, समकालीन भारतीय साहित्य, स्त्रीकाल, चौथी दुनिया, और न जाने कितनी जगह छप चुकी हैं. आज हम आपको उनकी दो कविताएँ सुनाने जा रहे हैं. पहली कविता का शीर्षक है - क्षमा. देखिए वीडियो.

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एक कविता रोज़ में पढ़िए त्रिभुवन की कविताएं

बाघ का भय इतना है/कि डरा हुआ पिंजरा भी बाघ के भीतर छुपा हुआ है

एक कविता रोज़ में पढ़िए त्रिभुवन की कविताएं

एक कविता रोज़ में आज त्रिभुवन की कविताएं. भारत-पाकिस्तान बॉर्डर के एक छोटे से गांव चक 25 एमएल में एक अश्वपालक के घर पैदा हुए त्रिभुवन मूलत: रिपोर्टर हैं. भाषा के लाघव और अर्थ की गहनता वाली उनकी एक ताज़ा कविता  “मैं आपको बस सुरक्षित दिख रहा हूं” में लोकतंत्र और अभिव्यक्ति पर मंडराते ख़तरों … और पढ़ें एक कविता रोज़ में पढ़िए त्रिभुवन की कविताएं