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एक कविता रोज़: इसीलिए खड़ा रहा कि तुम मुझे पुकार लो

एक कविता रोज़: इसीलिए खड़ा रहा कि तुम मुझे पुकार लो

आज एक कविता रोज़ में बात हरिवंश राय बच्चन की. 27 नवंबर 1907 को इलाहाबाद में जन्मे और 18 जनवरी 2003 को मुंबई में गुजरे बच्चन अपनी लोकप्रिय कृति ‘मधुशाला’ के लिए भारतीय साहित्य में अमर हैं. बच्चन और ‘मधुशाला’ के दौर को हिंदी में ‘छायावाद’ कहकर पुकारा जाता है. 4 खंडों में प्रकाशित बच्चन … और पढ़ें एक कविता रोज़: इसीलिए खड़ा रहा कि तुम मुझे पुकार लो

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'मैं किले को जीतना नहीं, उसे ध्वस्त कर देना चाहता हूं'

'मैं किले को जीतना नहीं, उसे ध्वस्त कर देना चाहता हूं'

‘पुल पार करने से/ पुल पार होता है/ नदी पार नहीं होती’ यह कहने वाले नरेश सक्सेना की काव्य-संक्षिप्ति में अर्थ-बहुलता का जो वैभव है, वह शब्दों को मूल्यवान बनाता है और इसलिए जब कोई इस वैभव की व्याख्या करने का प्रयास करता है, यह विवश करता है चुप होने को. 16 जनवरी को नरेश … और पढ़ें ‘मैं किले को जीतना नहीं, उसे ध्वस्त कर देना चाहता हूं’

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'मेरी ये आंख तुम्हारे लिए भी भीगती है मेरे हमवतन !'

'मेरी ये आंख तुम्हारे लिए भी भीगती है मेरे हमवतन !'

अमितोष नागपाल हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री का हिस्सा हैं. नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा से पढ़ाई की है. एक्टिंग कैरियर की बात करें तो दबंग, रंगरेज़, आरक्षण, बेशरम जैसी फ़िल्में उनके खाते में हैं. हरियाणा के हिसार में पैदा हुए अमितोष एक्टिंग के उस्ताद तो हैं ही, उनकी कलम की धार भी कम नहीं. ओये लक्की लक्की … और पढ़ें ‘मेरी ये आंख तुम्हारे लिए भी भीगती है मेरे हमवतन !’

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'साजिद ओ साजिद, क्या आज स्कूल नहीं आओगे'

'साजिद ओ साजिद, क्या आज स्कूल नहीं आओगे'

एक कविता रोज़ में आज प्रज्ञा सिंह की एक कविता- स्कूल नहीं आओगे ? कौशल्या की सवारियां उतर जायें कौशल्या में अकौंधे की अकौंधे में नंगला वाले बैठे रहे आज यह बस नंगला भी जायेगी तुम कहां जाओगे साजिद क्या आज स्कूल नहीं आओगे बहुत खुरचा बच्चों ने ब्लेड से पर आज भी तुम्हारी बेंच पर … और पढ़ें ‘साजिद ओ साजिद, क्या आज स्कूल नहीं आओगे’

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'वो उनसे नहीं डरता था, बस मुसलमानों से डरता था'

'वो उनसे नहीं डरता था, बस मुसलमानों से डरता था'

निखिल सचान ने आईआईटी निकाला. आईआईएम भी. इन जैसे लड़कों के कारण ही जाने कितने रामबिहारी टेक्निकल कॉलेज में पढ़ने वालों को बाप घर से निकाल देते हैं. हम निखिल सचान को ऐसे जानते हैं कि वो किताबें लिखते हैं. हिंदी की किताबें, जिनके कवर की फोटो को फिल्टर लगाकर इंस्टाग्राम पर डालो तो कोई चूं … और पढ़ें ‘वो उनसे नहीं डरता था, बस मुसलमानों से डरता था’

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अली सरदार जाफ़री क्यों कहते हैं, नवंबर मेरा गहवारा है- ये मेरा महीना है

अली सरदार जाफ़री क्यों कहते हैं, नवंबर मेरा गहवारा है- ये मेरा महीना है

मैं सोता हूं और जागता हूं और जागकर फिर सो जाता हूं सदियों का पुराना खेल हूं मैं मैं मर के अमर हो जाता हूं… ये कहने वाले अली सरदार जाफ़री 29 नवंबर साल 1913 में यूपी के बलरामपुर में पैदा हुए. साल 2000 के अगस्त के पहले रोज़ यानी पहली अगस्त को उनका इंतक़ाल हुआ. … और पढ़ें अली सरदार जाफ़री क्यों कहते हैं, नवंबर मेरा गहवारा है- ये मेरा महीना है

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'एक गोरखा गुज़रा है सीटी बजाता हुआ गली से'

'एक गोरखा गुज़रा है सीटी बजाता हुआ गली से'

विनय सौरभ के शब्द कविता की दुनिया और उसके बाहर भी नगाड़े की तरह बजते हैं. 47 साल के विनय झारखंड के दुमका के छोटे से कस्बे नोनीहाट से आते हैं. एक कविता रोज़ में आज विनय सौरभ की एक कविता- रात घड़ी की टिक-टिक सुनाई पड़ रही है और एक नल जो ठीक से बंद नहीं … और पढ़ें ‘एक गोरखा गुज़रा है सीटी बजाता हुआ गली से’

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'थोड़ी-सी आवाज़ लेना, जितनी कि आंगन का जांता गेहूं के लिए लेता है'

'थोड़ी-सी आवाज़ लेना, जितनी कि आंगन का जांता गेहूं के लिए लेता है'

मैथिली भाषा के प्रसिद्ध कवि, कथाकार जीवकांत के कई कविता, कथा संग्रह के अलावा पांच उपन्‍यास प्रकाशित हैं. उन्‍हें उनके मैथिली कविता संग्रह ‘तकैत अछि चिड़ै’ के लिए 1998 में साहित्‍य अकादमी का पुरस्‍कार मिला था. 11 सितंबर 2013 को 77 की उम्र में उनका निधन हो गया था. एक कविता रोज़ में आज जीवकांत की एक कविता- जीवन … और पढ़ें ‘थोड़ी-सी आवाज़ लेना, जितनी कि आंगन का जांता गेहूं के लिए लेता है’

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एक कविता रोज़: बीन भी हूं मैं तुम्हारी रागिनी भी हूं

एक कविता रोज़: बीन भी हूं मैं तुम्हारी रागिनी भी हूं

प्रिय पाठको, आज एक कविता रोज़ में महादेवी वर्मा (26 मार्च 1907 – 11 सितंबर 1987). महादेवी हिंदी साहित्य के छायावादी युग की शान हैं. कथाकार दूधनाथ सिंह ने महादेवी पर लिखते हुए कहा कि वह अपने दौर की एक ऐसी आजाद और विद्रोही स्त्री थीं, जिनके सिर पर आंचल है. आधुनिक मीरा कह कर … और पढ़ें एक कविता रोज़: बीन भी हूं मैं तुम्हारी रागिनी भी हूं

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उदित नारायण, श्याम बेनेगल और धर्मवीर भारती को एक सूत्र में जोड़ती है यह कविता

उदित नारायण, श्याम बेनेगल और धर्मवीर भारती को एक सूत्र में जोड़ती है यह कविता

धर्मवीर भारती एक उपन्यासकार के रूप में बहुत ज़्यादा प्रसिद्ध हैं. उनके उपन्यास ‘गुनाहों का देवता’ ने सफलता के नए मानक गढ़े हैं. गुनाहों का देवता के बारे में कहा जाता है कि ये एक ऐसा टीन-एज साहित्य है जिसे आसुओं के समंदर में डूबे बिना आप पढ़ ही नहीं सकते. वर्तमान समय में ‘नई … और पढ़ें उदित नारायण, श्याम बेनेगल और धर्मवीर भारती को एक सूत्र में जोड़ती है यह कविता