दुर्गा सिंह के दोनों बेटों को ठाकुर दुर्जन सिंह ने मार डाला है. लेकिन दुर्गा काविश्वास अटल है. वो लगातार बीस सालों तक घोषणा करती रहती है कि मेरे करन-अर्जुनआएंगे. ऐसा होता भी है. बीस साल बाद करन-अर्जुन लौट आते हैं. तमाम गांववाले उनकेआने से अचंभित हैं. ऐसे में ठाकुर के मुंशी की उनपर नज़र पड़ती है. करन-अर्जुन कोपहचानते ही मुंशी जी के मुंह से बरबस एक फिकरा निकल पड़ता है. "ठाकुर तो गियो." आगेकी सारी फिल्म में मुंशी जी ये फिकरा बार-बार दोहराते हैं. तब तक, जब तक ठाकुर सचमें ही जहन्नुम की राह चला नहीं जाता. इस मुंशी का छोटा सा लेकिन फनी रोल पूरीतन्मयता से निभानेवाले कलाकार थे अशोक सराफ. वो अशोक सराफ जो मराठी सिनेमा की बहुतबड़ी हस्ती हैं. जिन्होंने लक्ष्मीकांत बेर्डे के साथ मिलकर लगभग डेढ़ दशक तक मराठीसिनेमा इंडस्ट्री अपने दम पर चलाई. जो लगभग 50 साल से काम किए जा रहे हैं. आज हमअशोक सराफ के करियर की थोड़ी सी झलक हासिल करने की कोशिश करेंगे. झलक छोटी सी इसलिएक्योंकि आधी सदी में बिखरे हुए असाधारण काम को महज़ एक आर्टिकल में समेट पाना असंभवहै.बैंककर्मी टू एक्टर वाया नाटककारअशोक सराफ का जन्म 4 जून 1947 को साउथ मुंबई के चिखलवाडी में हुआ. पिताइम्पोर्ट-एक्सपोर्ट के बिजनेस में थे. जब अशोक सराफ जवान हुए, उनके पिता को उनसेवही उम्मीद थी जो हर दौर के भारतीय माता-पिताओं को होती है. यही कि बेटा पढ़-लिखकरकोई नौकरी संभाल ले. लेकिन इस बेटे को तो एक्टिंग का कीड़ा था. बाप की उम्मीदों औरअपने सपनों के बीच झूलते अशोक ने एक बैंक में नौकरी करना कबूल कर लिया. न सिर्फकबूल किया बल्कि अगले दस सालों तक स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया में काम भी किया. ये बात औरहै कि नौकरी के साथ-साथ अपने शौक को भी ज़िंदा रखा. नाटक वगैरह करते रहें.ये भी एक विचित्र संयोग ही माना जाए कि कॉमेडी में एवरेस्ट जैसा बुलंद रुतबा पानेवाले अशोक सराफ का एक्टिंग करियर एक विदूषक की भूमिका से शुरू हुआ था. प्रसिद्धमराठी लेखक वि. स. खांडेकर की अद्भुत किताब 'ययाति' पर आधारित एक नाटक में वोविदूषक बने थे. ये नियति का इशारा था कि आगे चलकर ये व्यक्ति लोगों को हंसा-हंसाकरमार डालने वाला है. स्टेज पर उनकी प्रतिभा ने जब आंखें चौंधियाने वाली उपस्थितिदर्ज कराई, तो सिनेमा की राह प्रशस्त होनी ही थी. हुई. गजानन जागीरदार जैसे मराठीसिनेमा के बड़े डायरेक्टर ने उन्हें रोल दिया. रोल छोटा सा था और पैसे भीकाबिलेज़िक्र नहीं थे. लेकिन अगर कुछ ख़ास था तो वो ये कि बड़े परदे पर अशोक सराफ कीहाज़िरी लग गई थी. फिल्म का नाम था 'दोन्हीं घरचा पाहुणा' (दोनों घर का मेहमान), जो1971 में आई थी.'पांडू हवलदार' में दादा कोंडके और अशोक सराफ.फ़िल्मी सफ़र शुरू तो हुआ लेकिन कामयाबी का मुंह देखने में चार साल लग गए. 1975 मेंआई दादा कोंडके की आइकॉनिक फिल्म 'पांडू हवलदार' से उन्होंने पहली बार सफलता कास्वाद चखा. और ऐसा चखा कि मुडके दोबारा नहीं देखा. फिर तो सफलता के हाईवे पर वोफर्राटे भरे कि लक्ष्या (लक्ष्मीकांत बेर्डे) के अलावा कोई आसपास भी न फटक पाया.कॉमेडी का बेंचमार्कबेंचमार्क समझते हैं न? वो पैमाना जिसे आधार बनाकर किसी भी चीज़ का मूल्यांकन हो.अशोक सराफ की कॉमेडी ने मराठी सिनेमा की दुनिया में वही स्थान हासिल किया. वल्गरइशारों और थप्पड़मार सीन्स से परे एक गरिमामयी हास्य क्या होता है ये उन्होंनेबाखूबी दिखाया. 'अशी ही बनवा बनवी', 'गंमत-जंमत', 'धूम धड़ाका', 'एकापेक्षा एक' जैसीफिल्मों ने इस बात को साबित भी किया. 80 का दशक और 90 के दशक के कुछ साल मराठीसिनेमा पर सिर्फ दो लोगों का राज रहा. अशोक सराफ और लक्ष्मीकांत बेर्डे. इन दोनोंने खस्ताहाल मराठी सिनेमा को अपने दम पर जिलाए रखा. इन दोनों की मौजूदगी भर फिल्मके कामयाब होने की गारंटी हुआ करती थी.रंजना से लेकर निवेदिता तकमराठी एक्ट्रेस रंजना के साथ उनकी जोड़ी को बहुत पसंद किया गया. दोनों को मराठीसिनेमा में वैसी ही फैन फॉलोइंग मिली जैसी हिंदी में शाहरुख़-काजोल या अमिताभ-रेखाकी जोड़ी को हासिल थी. एक कॉमेडी अभिनेता के रूप में स्टीरियोटाइप होने के बावजूदउन्हें यूं रोमांटिक पहचान मिलना बहुत बड़ी बात थी. रोमांस की बात चली ही है तो उनकाये रोमांटिक गीत 'अश्विनी ये ना' भी सुन ही लीजिए. इसकी ख़ास बात ये है कि इसे अपनेकिशोर दा ने गाया है.https://www.youtube.com/watch?v=M2h0PTS2WCgएक्ट्रेस निवेदिता जोशी के साथ भी उनकी केमिस्ट्री खूब सराही गई. आगे चलकर इन दोनोंने शादी भी कर ली. दोनों का एक बेटा है अनिकेत, जिसने एक्टर बनने की जगह शेफ बननाचुना है.निवेदिता जोशी सराफ.हिंदी वालों ने नोटिस तो लिया लेकिन सीमित मात्रा मेंहिंदी सिनेमा की बात की जाए तो हिंदी वाले अशोक सराफ की प्रतिभा का ठीक से इस्तेमालकर ही नहीं पाए. उन्हें छोटे-छोटे रोल्स के दायरे में ही रखा. कॉमिक रिलीफ के तौरपर ही उनका इस्तेमाल हुआ. बावजूद इसके अशोक सराफ को जो भी मौक़ा मिला, उसे उन्होंनेसोना बना दिया. अपने विशिष्ट अंदाज़ से अपने हर एक रोल को उन्होंने इतना सामर्थ्यज़रूर दिया कि वो याद रह जाए. फिर चाहे वो 'करन अर्जुन' के मुंशी जी हो, 'यस बॉस'में शाहरुख का दोस्त हो, 'सिंघम' का हेड कांस्टेबल हो या 'जोरू का गुलाम' मेंगोविंदा का मामा.'जोरू का गुलाम' में अशोक सराफ.मामा तो खैर वो पूरी मराठी सिनेमा इंडस्ट्री के थेमामा के ज़िक्र से याद आया कि मराठी सिने जगत में हर कोई अशोक सराफ को मामा कहकर हीबुलाता है. इसके पीछे भी एक दिलचस्प किस्सा है. सत्तर के दशक में किसी वक़्त एकफिल्म की शूटिंग कोल्हापुर में चल रही थी. वहां एक प्रकाश शिंदे नाम का कैमरामैनथा. वो अपनी छोटी बिटिया को सेट पर लेकर आता. और अशोक सराफ की तरफ इशारा कहके कहताये अशोक मामा हैं. धीरे-धीरे वो खुद भी उन्हें मामा कहने लगा. उसकी देखा-देखी पूराक्रू उन्हें मामा बुलाने लगा. जल्द ही ये नाम इतना पॉपुलर हुआ कि अशोक सराफ पूरीइंडस्ट्री के मामा बन गए.टेलीविजन भी नहीं छूटाअशोक सराफ के टैलेंट की वर्षा छोटे परदे पर भी खूब हुई है. आइकॉनिक सीरियल 'हमपांच' के आनंद माथुर को कौन भुला सकता है? अपनी पांच बेटियों के सदके हमेशा मुश्किलमें फंसते बाप को उन्होंने बेहद असरदार तरीके से पेश किया. या फिर सहारा टीवी परआनेवाला 'डोंट वरी हो जाएगा' सीरियल हो. इस सीरियल को अशोक की पत्नी निवेदिता ने हीप्रोड्यूस किया था.लगभग पांच दशक पहले शुरू हुआ अशोक सराफ का सफ़र अब भी जारी है. पिछले साल आई'शेंटीमेंटल' फिल्म में एक बार फिर उन्होंने खाकी वर्दी पहनी. उनके फैन्स तो यहीदुआ करेंगे कि ये सफ़र चलता ही रहे. उन्हें परदे पर देखना भर चेहरे पर चौड़ी मुस्कानआने की गारंटी जो हुआ करती है.--------------------------------------------------------------------------------ये भी पढ़ें:इस एक्टर को जितना आप समझते हैं, उससे कहीं ज़्यादा बड़ी शख्सियत है येक्या दलित महिला के साथ हमबिस्तर होते वक़्त छुआछूत छुट्टी पर चला जाता है?जोगवा: वो मराठी फिल्म जो विचलित भी करती है और हिम्मत भी देती हैमहाराष्ट्र की लोककला ‘तमाशा’, जिसे अगर बच्चे देखने की ज़िद करें तो मांएं कूट देतीथींविडियो: इंडिया का वो ऐक्टर, जिसे देखकर इरफ़ान ख़ान और नवाज़ुद्दीन भी नर्वस हो जाएं