बीते दिनों अलीगढ़ में एक ढाई साल की बच्ची की हत्या हुई है. हत्या करने वाला अपनीही नाबालिग बच्ची के रेप का आरोपी था. उसने बच्ची को मारकर फ्रिज में रखा ताकिदुर्गंध न आए. रिपोर्ट्स के मुताबिक़ बच्ची के बाएं पैर में फ्रैक्चर और आंखों परचोट के निशान थे. सिर में चोट थी. उसका दायां हाथ शरीर से अलग हो गया था. पुलिस नेबताया कि बच्ची की मौत गला दबाने की वजह से हुई.ऐसा एक भी दिन नहीं होता, कि देश के किसी न किसी अख़बार में किसी बच्चे के साथ हिंसाया यौन हिंसा की खबर न छपे. कई बार रेप का शिकार नवजात बच्चियां भी होती हैं. मगरवे राष्ट्रीय हेडलाइंस में नहीं आतीं क्योंकि उनमें पर्याप्त मसाला नहीं होता.रेप में मसाला ढूंढनाये बात पढ़ने में बड़ी ही नीच लगती है. मगर न्यूज़ इंडस्ट्री में रेप की ऐसी ही भूमिकाहै. टीवी न्यूज़ हमारे बीच सबसे ज्यादा पॉपुलर है क्योंकि ये सबसे सहज साधन है. यहांहमें न्यूज़ पढ़नी नहीं पड़ती. हम टीवी के सामने बैठकर उसे कंज्यूम कर सकते हैं. घर केबाकी काम निपटाते हुए.इसलिए हमें इसमें कुछ अनैतिक नहीं लगना चाहिए कि तमाम ख़बरों के साथ हम रेप का भीउपभोग कर रहे हैं.देश में हो रहे तमाम बलात्कारों में से एक आप कैसे चुनेंगे, जिसे खबर बना सकें?न्यूज़ इंडस्ट्री का इतिहास गवाह है कि रेप की खबर टीवी और सोशल मीडिया के माध्यम सेघर-घर पहुंचने के लिए कम से कम ये क्वॉलिफिकेशन लगती हैं: 1. लड़की या रेपिस्ट मेंसे कोई एक दलित हो2. लड़की या रेपिस्ट में से कोई एक मुसलमान हो3. रेप मीडिया स्टैंडर्ड्स के मुताबिक़ पर्प्याप्त जघन्य हो4. रेप देश या उस राज्य में होने वाले अगले चुनाव के कितना निकट हैकठुआ गैंगरेप: 8 साल की बच्ची 17 जनवरी 2018 को कई दिन लापता रहने के बाद मृत पाईगई थी.रेप पत्रकारिता की पुरुष-प्रधान भाषाअक्सर नेता और पत्रकार कहते हुए पाए जाते हैं कि रेप पर राजनीति नहीं करनी चाहिए.इसके पीछे वो तर्क ये देते हैं कि रेप से असल में किसी की अस्मिता को ठेस पहुंचतीहै. किसी की जान जाती है. किसी का घर बर्बाद हो जाता है.विडंबना ये है कि जिस विक्टिम के दुख पर राजनीती करने का आरोप लगाया जाता है, वो तोतभी गौण हो जाती है, जब अखबारों में या न्यूज चैनल पर रेप की पहली खबर आती है.पत्रकारिता में गौण रेप विक्टिमहमारे देश में रेप विक्टिम के नाम, शक्ल या उसकी पहचान ज़ाहिर करती किसी भी चीज़ कोसार्वजनिक करना अपराध है. ऐसे में रेप की ख़बरों में न लड़की का नाम होता है, न शक्ल,न उसकी बाइट ली जाती है. हम लड़कियों को उनकी उम्र और शहर से आइडेंटीफाई करते हैं.हमारी सामूहिक परिकल्पना से रेप का डिस्क्रिप्शन मिसिंग है. हम रेप को उतना हीइमैजिन कर पाते हैं, जितना ख़बरों में बताया जाता है. नैतिकता के कीड़े हमारी भाषा कोइतना खा चुके हैं कि हम रेप को कभी चित्रित नहीं करते हैं. अगर चित्रित करते भीहैं, तो ये कभी 'प्रथम पुरुष' में नहीं होता. यानी कभी खुद पीड़िता के मुंह से नहींआता. ऐसे में रेप हमारी कल्पना में वैसे ही आते हैं, जैसे फिल्मों में दिखाए गए. यानिर्भया जैसे इक्के-दुक्के केसेज में मीडिया में उठाए गए.रेप की एक खबर का स्क्रीनशॉट, जिसमें पीड़िता एक FIR संख्या भर है.रेप की भयावहता की कल्पना न कर पाना हमें उससे इम्यून बना देता है. इसलिए जब हमअखबारों में रेप की ख़बरें देखते हैं तो ज्यादा विचलित नहीं होते. एक क्षण के लिएघृणित महसूस कर आगे बढ़ जाते हैं. टीवी बुलेटिन्स में रेप की ख़बरों को 100 या 50फटाफट ख़बरों के बीच डाल दिया जाता है. जहां एक लाइन में उन्हें पढ़ दिया जाता है.रेप को थर्ड पर्सन में लिखने वाले पत्रकार खुद रेप की कल्पना नहीं कर पाते. क्योंकिजिसे न आपने देखा, न महसूस किया, उसे आप कैसे लिखेंगे. जिस समय पत्रकारिता की भाषाऔर व्याकरण तय हुए, उस समय महिला पत्रकार होती ही नहीं थीं. इसलिए पत्रकारों कीकल्पना में रेप की भयावहता को स्थान मिले भी तो कैसे? आज न्यूज़रूम्स में महिलाएंहैं. लेकिन पत्रकारिता की पहले ही तय हो चुकी भाषा को बदला नहीं जा सका है.रेप और यौन शोषण को बयां करने की भाषा'छेड़छाड़' शब्द पर गौर कीजिए. कोई आपके फोन की सेटिंग्स बदल दे तो उसे कहते हैं फोनसे 'छेड़छाड़' करना. 'छेड़ने' का शाब्दिक अर्थ है, किसी चीज़ को बिना एक्सपर्टीज़ के हाथलगाना, जिससे वो बगड़ जाए.अब 'छेड़छाड़' और 'यौन शोषण' को अगल-बगल रखिए. 'यौन शोषण' एक भयानक शब्द लगता है.'छेड़छाड़' हल्का शब्द लगता है. जिस घूरने, कमेंटबाज़ी करने, हाथ लगाने, महसूस करने,चिकोटी काटने को हम पत्रकारीय भाषा में छेड़छाड़ कहते हैं, वो कानूनी रूप से यौन शोषणहोता है.छेड़छाड़ का क्या है. आज लड़की के साथ हुई, कल EVM के साथ होगी लेकिन हमारी भाषा नहींबदलेगी.मगर पत्रकारीय भाषा इंतज़ार करती है मामले के और संगीन होने का, इससे पहले कि वो उसेयौन शोषण बतला सके. हमारी ख़बरें हमसे कहेंगी, 'फलां लड़की के सामने आदमी ने कीअश्लील हरकत.' क्योंकि अगर न्यूज़ में बता दिया जाए कि एक युवा लड़की के सामने एकअधेड़ पुरुष ने पैंट खोलकर हस्तमैथुन किया, तो इससे आपकी कल्पना में किरकिरी पड़ सकतीहै.रेप की पुरुषवादी भाषा में महिला का ट्रॉमा कभी केंद्र में रहा ही नहीं. इसलिए रेपको आज भी बड़ी सहजता से 'दुष्कर्म' कहा जाता है. 'दुष्कर्म' का शाब्दिक अर्थ है बुराकाम. नैतिक रूप से बुरा काम तो चोरी भी है, गुंडई भी. पर वो दुष्कर्म नहीं कहे जातेक्योंकि उनको ऑडियंस की कल्पना में नरम कर परोसने की जरूरत नहीं पड़ती.धर्म और जाति की नंगईये बताना न होगा कि कठुआ में 8 साल की कश्मीरी बच्ची के रेप और हत्या नेशनल मुद्दान होते, अगर वो बच्ची मुसलमान न होती. ये सच है कि मुसलमान, दलित या गरीब होना किसीभी लड़की या औरत के लिए दोहरा पिछड़ापन लेकर आता है. उसे दूसरी महिलाओं की अपेक्षाज्यादा असुरक्षित करता है. इसलिए इसपर सवाल नहीं उठाया जाना चाहिए कि ऐसी बच्ची काबलात्कार खबर क्यों बना.पर रेप के बाद उपजा नैरेटिव निराशाजनक है. देश का लिबरल धड़ा प्लेकार्ड लेकर रेप काविरोध करता है. रेप के विरोध की पॉलिटिक्स अपने आप में सवालों के दायरे में है.क्योंकि सोशल मीडिया पर बड़े-बड़े संदेश लेकर खड़ा होना असल तो क्या, प्रतीकात्मक रूपसे भी कोई बदलाव नहीं ला सकता.प्लेकार्ड पॉलिटिक्स निरर्थक है, क्योंकि इसमें रेप पीड़िता गौण हो जाती है.एक रेप केस, जो तमाम और रेप केसेज की तरह खो सकता है. उसे मीडिया में हवा मिलती है.पर जिन्हें हवा नहीं मिली, क्या वे औरतें, लड़कियां, बच्चियां न्याय के लायक नहींहैं? सेलेब्रिटीज का रवैया सेलेक्टिव है. और जिस वक़्त हम एक रेप को दूसरे रेप सेअधिक 'आकर्षक', प्लेकार्ड लेकर फोटो लगाने लायक मानते हैं, ठीक उसी वक़्त हम रेप कोएक पुरुषवादी नैरेटिव दे देते हैं. क्योंकि ठीक इसी समय रेप विक्टिम का लड़की होनागौण होकर उसका मुसलमान होना अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है. इससे भी घृणित होता हैरेपिस्ट के सपोर्ट में खड़े हो जाना, उसके समर्थन में रैली निकालना. क्योंकि उसपरआरोप लगना नेताओं को धर्म विशेष पर हमला लगने लगता है.इस तरह देश के लेफ्ट और राइट, दोनों ही धड़े, रेप के नैरेटिव को बदलकर धर्म कानैरेटिव कर देते हैं. रेप की शिकार बच्ची पासा बन जाती है, जिसे बारी-बारी से दोनोंग्रुप्स की ओर से चला जाता है.अलीगढ़ में जिसकी हत्या हुई, उससे ज़रूरी इस समय उसके हत्यारे का धर्म हो चला है.अलीगढ़ में हुई बच्ची की हत्या को पहले रेप की झूठी इनफार्मेशन के साथ पोस्ट कियागया. ताकि कठुआ केस के बराबर राइट विंग का नैरेटिव तैयार ही सके. ये राइट धड़े केलिए दुखद ही रहा होगा कि बच्ची का रेप नहीं हुआ है. और पोस्टमॉर्टेम में इस बात कीपुष्टि हुई है.कठुआ और अलीगढ़, दोनों के ही नैरेटिव में बार-बार मुसलमान नाम ही लिखे गए. चाहे वोरेप पीड़िता का हो, या रेपिस्ट का. पत्रकारीय भाषा की प्रयॉरिटी ये नहीं दिखती कीलड़की को न्याय मिले. बल्कि ये दिखती है कि कैसे मुसलमान नामों का जिक्र बार-बार आतारहे.सामूहिक प्रतिक्रियावहशी, दरिंदा, क्रूर. टीवी की ख़बरें रेपिस्ट को इन्हीं विशेषणों से संबोधित करतीहैं. हम भी रेपिस्ट को टीवी पर देखकर कोसते हैं. गालियां देते हैं. फांसी की मांगकरते हैं. सोशल मीडिया पर लिखते हैं कि इनके लिंग काट लेने चाहिए. ये हमारीनैसर्गिक प्रतिक्रिया है.पर जब सोशल मीडिया पर कोई लड़की अपने साथ हुए यौन शोषण के बारे में लिखती है. तोसबसे पहले उसपर सवाल उठाते हैं. एक समाज के तौर पर हम यौन शोषण का विरोध करते हैं.पर उसकी कहानी फर्स्ट पर्सन में आए तो भरोसे के पहले हम सवाल करना चाहते हैं. भारतने मी टू मूवेमेंट देखा. सवाल उठाने आली अभिनेत्रियों, महिला पत्रकारों,स्टूडेंट्स, सभी के बारे में कहा गया कि वो पब्लिसिटी के लिए ऐसा कर रही हैं. याफिर एक बड़े नाम को नीचे गिराना चाहती हैं. बदला ले रही हैं, वगैरह. लड़की अपने रेपकी खबर खुद सार्वजनिक करे तो उससे प्रूफ़ मांगते हैं. जिसपर आरोप लग रहे हैं, उसकीबेगुनाही का प्रूफ मांगने के बजाय.निर्भया की मां, जिन्हें रेप विक्टिम की मां होने के लिए सम्मानित किया जाता है.ये लड़की जबतक हिंसा की शिकार न हो, मर न जाए, इसकी अंतड़ियां निकालकर ज़मीन पर न फेंकदी जाएं, तबतक कोई इसपर भरोसा नहीं करता.रेप की कहानियां हम पीड़िता के मुंह से नहीं, उसकी पोस्टमॉर्टेम रिपोर्ट से सुननाचाहते हैं.