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इंटरनेशनल विमन्स डे पर सवाल उठाने की बेवकूफी करने से पहले इतिहास जान लो

आज सुबह जब उठी, तो मोबाइल पर कई सारे मैसेज देखे. सबके सब विमन्स डे से रिलेटेड थे. कोई शॉपिंग वेबसाइट कोई दिखावटी ऑफर दे रही थी, तो कोई रिश्तेदार मुझे महिला दिवस की बधाई दे रहा था, जिनमें से आधे से ज्यादा तो फॉर्वर्डेड मैसेज थे. कुछ का मैंने जवाब दिया, कुछ का नहीं दे पाई क्योंकि ऑफिस आना था, काम भी करना था.

खैर, तो मेन मुद्दा ये है कि आज है महिला दिवस. इसी वजह से इतने सारे मैसेज मुझे आए. हर बार की तरह इस बार भी मैंने कई पुरुषों को ये कहते हुए सुना कि यार बढ़िया है, औरतों के नाम पर तो एक अलग दिन ही कर दिया गया है, ये तो सही नहीं है, ये तो एक तरह का भेदभाव है. तो ऐसी बातें सुनकर हमने सोचा कि क्यों न आज की बड़ी खबर में हम सभी को बताएं कि आखिर इंटरनेशनल विमन्स डे की ज़रूरत ही क्यों पड़ी. इसे कब से मनाया जा रहा है? इसकी शुरुआत क्यों हुई थी? और अभी इसे सेलिब्रेट करने का क्या मकसद है.

क्यों मनाया जाता है Women’s Day?

सीधे मुद्दे पर आते हैं. सबसे पहला सवाल तो ये है कि इंटरनेशनल विमन्स डे मनाया क्यों जाता है? जवाब सुनिए- ताकि ये याद रखा जा सके कि मौजूदा समय में औरतों को जो अधिकार मिले हैं, वो लंबी जद्दोजहद से मिले हैं. अधिकारों और समानता पाने का आधा सफ़र भले ही तय हो गया है, लेकिन अभी भी कई मीलों का सफ़र तय करना बाकी है. और इसके लिए लगातार काम करते रहना ज़रूरी है.

आज के दिन की अहमियत महज़ गुलाबी रंग के पोस्टर में किसी औरत की कोई आकर्षक तस्वीर लगाने भर से पूरी नहीं होती, बल्कि लोगों को ये बताना ज़रूरी है कि एक समय ऐसा भी था जब दुनिया की आधी आबादी की अपनी कोई पहचान ही नहीं थी. लेकिन आप कब तक किसी को दबाकर रख सकते हैं, एक न एक दिन तो हर किसी को अपनी शक्ति का अहसास होता ही है. औरतों को भी अपनी ताकत और अहमियत का अहसास आज से करीब 150 साल पहले होना शुरू हो गया था. क्या है इस विमन्स डे की कहानी. बताते हैं.

19वीं सदी की बात है, तब अमेरिका और यूरोप के कुछ देशों में स्लेवरी की प्रथा थी. यानी कमज़ोर वर्ग के लोगों को गुलाम बनाकर उनसे घंटों-घंटे तक काम करवाया जाता था. खासतौर पर अफ्रीकन ब्लैक लोगों को. 19वीं सदी की शुरुआत में इस प्रथा का विरोध शुरू हुआ. इसमें शुरुआत करने की कवायद भी शुरू हुई. एंटी-स्लेवरी कन्वेंशन यानी सम्मेलन होने शुरू हुए. महिलाओं ने भी इसमें हिस्सा लिया. 1848 में अमेरिका में एक एंटी-स्लेवरी कन्वेंशन हुआ, इसमें महिलाओं को बोलने ही नहीं दिया गया.

इसके बाद दो अमेरिकन महिलाओं ने न्यू यॉर्क में पहला विमन्स राइट्स कन्वेंशन आयोजित किया. इसमें औरतों ने हर क्षेत्र में पुरुषों के बराबर अधिकारों की मांग रखी. साथ ही वोटिंग के अधिकार भी मांगे. और बस यहीं से विमन राइट्स के आंदोलन की शुरुआत हुई. इधर यूरोप के भी कुछ हिस्सों में औरतों ने अधिकारों के लिए आवाज़ उठानी शुरू कर दी. 1907 में जर्मनी की औरतों ने एक कॉन्फ्रेंस की. क्लारा ज़ेटकिन नाम की महिला की अगुवाई में. क्लारा कम्युनिस्ट एक्टिविस्ट थीं और सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ जर्मनी की मेंबर थीं. इस कॉन्फ्रेंस में महिलाओं को वर्कफोर्स का हिस्सा बनाने और पुरुषों के बराबर पैसे देने की मांग रखी गई.

क्लारा जेटकिन जर्मनी की कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्य थीं. महिलाओं और मजदूरों के अधिकारों के लिए उन्होंने ताउम्र संघर्ष किया. हिटलर के सत्ता में आने के बाद उन्हें जर्मनी छोड़कर जाना पड़ा.
क्लारा जेटकिन जर्मनी की कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्य थीं. महिलाओं और मजदूरों के अधिकारों के लिए उन्होंने ताउम्र संघर्ष किया. हिटलर के सत्ता में आने के बाद उन्हें जर्मनी छोड़कर जाना पड़ा.

आगे बढ़ने से पहले ये समझ लीजिए कि 20वीं सदी की शुरुआत में, केवल अमेरिका ही नहीं, बल्कि दुनिया के कई हिस्सों औरतें आंदोलन कर रही थीं. और ये सभी आंदोलन एक साथ मिलकर महिला दिवस की रूपरेखा तैयार कर रहे थे. जर्मनी में अलग आवाज़ उठ रही थी. और इधर अमेरिका में अलग. यहां 28 फरवरी 1908 के दिन करीब 15000  (पंद्रह हज़ार) औरतों ने, जिनमें से ज्यादातर औरतें गारमेंट वर्कर थीं, सबने न्यू यॉर्क सिटी में रैली निकाली. काम के घंटे कम करने, अच्छा वेतन और वोटिंग राइट्स की मांग रखी. साल 1909 में सोशलिस्ट पार्टी ऑफ अमेरिका ने एक ऐलान किया. 28 फरवरी को नेशनल वुमन्स डे करार दे दिया. यानी पहसा महिला दिवस 1909 में 28 फरवरी के दिन मनाया गया.

Second Socialist International

अब 1907 में जर्मनी में जो कॉन्फ्रेंस हुई थी, उसी का सेकेंड पार्ट यानी दूसरी दूसरी सोशलिस्ट इंटरनेशनल मीटिंग हुई 1910 में. डेनमार्क के कॉपनहेगन में. यहां क्लारा ज़ेटकिन ने वुमन्स डे को अंतरराष्ट्रीय पहचान देने की कोशिश की. कहा कि क्यों ना साल के किसी एक दिन को, दुनिया के सभी देश इंटरनेशनल विमन्स डे के तौर पर मनाएं. इस मीटिंग में 17 देशों की करीब 100 औरतों ने हिस्सा लिया था, ज्यादातर औरतों ने क्लारा के आइडिया को सपोर्ट किया. और फिर 19 मार्च को इंटरनेशनल विमन्स डे घोषित कर दिया गया. आंदोलनकारी औरतों की मांगें थीं कि सभी औरतों को काम करने के मौके पुरुषों की तरह मिले, वेतन में कोई भेदभाव न हो, बड़े पदों पर भी औरतों की उम्मीदवारी को कंसिडर किया जाए और सबसे अहम था वोटिंग का अधिकार. क्योंकि 1900 के पहले तक औरतों के पास ये सारे अधिकार थे ही नहीं.

इसके बाद एक बेहद अहम साल आया 1913. औरतों के आंदोलन की आवाज़ रशिया तक पहुंच गई. यहां औरतों ने पहले वर्ल्ड वॉर का विरोध करते हुए पहली बार इंटरनेशनल विमन्स डे मनाया. रशिया की औरतों ने जूलियन कैलेंडर के हिसाब से 23 फरवरी को इसे मनाया था. जूलियन कैलेंडर रशिया में चलने वाला एक पुराना कैलेंडर है. ये ग्रिगोरियन कैलेंडर से 13 दिन पीछे चलता है. ग्रिगोरियन कैलेंडर अभी इस वक्त पूरी दुनिया में लागू है. यानी जूलियन कैलेंडर की 23 फरवरी ग्रिगोरियन कैलेंडर की 8 मार्च की तारीख है. बस इसी वजह से 1913 के बाद से 8 मार्च के दिन ही इंटरनेशनल विमन्स डे मनाया जाने लगा.

अब 1914 में जब वर्ल्ड वॉर शुरू हुआ, तो ज्यादातर पुरुष चले गए युद्ध में. घर और बच्चों को पालने की ज़िम्मेदारी आ गई औरतों पर. वो घंटों-घंटे तक फैक्ट्री में काम करतीं. मुसीबत बढ़ती जा रही थी. ज़ाहिर है वर्ल्ड वॉर का फायदा एलीट क्लास के लोगों को हो रहा था, मिडिल और लोवर क्लास के लोगों की केवल जान जा रही थी और परिवार तबाह हो रहे थे. इसी वजह से रशिया के साथ-साथ यूरोपी की औरतों ने भी वर्ल्ड वॉर के खिलाफ आंदोलन जारी रखा. कई औरतें इस दौरान जेल भी गईं.

International Women's Day कोई धार्मिक त्योहार मनाने का दिन नहीं है. इसके पीछे लाखों महिलाओं का सचमुच का वो संघर्ष है, जिसके ऊपर उनकी जिंदगी और मौत टिकी थी.
International Women’s Day कोई धार्मिक त्योहार मनाने का दिन नहीं है. इसके पीछे लाखों महिलाओं का सचमुच का वो संघर्ष है, जिसके ऊपर उनकी जिंदगी और मौत टिकी थी.

रशिया की औरतें युद्ध खत्म करने के साथ-साथ देश से ज़ार (Czar) शासन हटाने की और वोटिंग का अधिकार पाने की भी मांग कर रही थीं. ज़ार रशिया के शासक को कहा जाता था. ‘इंटरनेशनल विमन्स डे’ वेबसाइट के मुताबिक, 1917 आते तक रशिया के करीब 2 मिलियन यानी 20 लाख जवान युद्ध में मारे जा चुके थे. इसके विरोध में औरतों ने ‘ब्रेड एंड पीस’ नाम का प्रोटेस्ट किया. ब्रेड यानी खाने के लिए रोटी और शांति मांगी.

राजनेताओं ने विरोध किया, लेकिन औरतें चार से सात दिन तक स्ट्राइक पर बैठी रहीं. नतीजा ये रहा कि ज़ार ने अपना पद त्याग दिया और रशिया की प्रोविज़नल सरकार ने औरतों को वोटिंग का अधिकार दिया. इस घटना को फरवरी रिवॉल्यूशन के नाम से जाना जाता है. इसके बाद अक्टूबर क्रांति हुई और सोवियत यूनियन में इंटरनेशनल विमन्स डे को हॉलिडे घोषित कर दिया गया. हालांकि तब भी औरतें काम करती ही थीं इस दिन. लेकिन 1965 में इस दिन को नॉन-वर्किंग डे करार घोषित कर दिया गया. सोवियत यूनियन में औरतों को 1917 में वोटिंग का अधिकार मिल गया था. 1920 में अमेरिका में औरतों को ये अधिकार दिया गया. तब जब अमेरिका 1776 में ही आज़ाद हो गया था.

‘यूनाइटेड नेशन्स’ की वेबसाइट के मुताबिक, दूसरे विश्व युद्ध के बाद कई सारे देशों में 8 मार्च को विमन्स डे के तौर पर मनाया जाने लगा. 1977 में युनाइटेड नेशन्स ने 8 मार्च को आधिकारिक तौर पर इंटरनेशनल विमन्स डे घोषित कर दिया. विमन्स डे की तारीख का सफर 28 फरवरी से शुरू हुआ था, 19 मार्च से होते हुए ये 8 मार्च पर पहुंचा. ये सफ़र केवल तारीख ने ही तय नहीं किया. विमेंस डे धीरे-धीरे एक ऐसा दिन बन गया जब हम अपने आस पास की औरतों के लिए  कुछ ख़ास करते हैं. दफ्तरों में महिला एम्प्लाइज को पैम्पर किया जाता है. कभी फ्री लंच तो कभी फुट मसाज कूपन. कभी शॉपिंग क्रेडिट तो कभी कॉस्मेटिक्स. वॉट्सऐप फॉरवर्ड्स और फेसबुक पोस्ट्स के तो क्या ही कहने.

Women’s Day का असली मतलब क्या है?

औरतों के बारे में एक बहुत बड़ा मिथक, एक झूठ प्रचलित है. कि उन्हें गिफ्ट देते रहो तो वो खुश रहती हैं. बाज़ार लगातार इस सोच को भुनाता रहता है. और विमेंस डे महज़ एक और शॉपिंग डे बनकर रह जाता है. अरे जनाब, अपने शौक की चीज़ें खरीदना किसे नहीं पसंद होता, इसमें क्या औरत क्या मर्द?

खैर, इस शो में आज हम बस एक ही अपील करना चाहते हैं. कि इस दिन को अगर आप सचमुच सार्थक बनाना चाहते हैं. तो बैठकर सोचें. कि 150 साल पहले शुरू हुई हक़ की ये लड़ाई ख़त्म क्यों नहीं होती? आज हमारे पास वोटिंग राईट तो है. मगर संसद में कितनी फ़ीसद औरतें हैं? महज़ 13 फ़ीसद. आधे के आधे की भी आधी. आज हमारे पास नौकरी करने का अधिकार है, मगर कितनी औरतें बॉस की पोजीशन पर हैं. जो उस पोजीशन पर हैं, क्या पुरुष उनसे ऑर्डर लेना पसंद करते हैं?

आज हमें मल्टीनेशनल कंपनियों से पिक और ड्रॉप की सुविधा ज़रूर मिलती है, मगर क्या हमारे सहकर्मी हमारे पीठ पीछे हमारी सेक्स लाइफ, हमारी शरीर की बनावट डिस्कस नहीं करते, हमारे बारे में अफवाह नहीं उड़ाते? हमें मां बनने की बायोलॉजिकल शक्ति के चलते महान बताया जाता है. मगर हमें मैटरनिटी लीव देते हुए बड़े बड़े संस्थानों और बॉसेज का मुंह क्यों बन जाता है? हम सैलरी तो पा रहे हैं, मगर क्या हमें इन्वेस्टमेंट, टैक्स सेविंग स्कीम्स की वैसी जानकारी होती है जैसी हमारे भाइयों को होती है? हममें से कितनी महिलाएं प्रॉपर्टी में मालिकाना हक रखती हैं?

घर के अंदर चलिए. आपके घर में आपकी मां आज भी सबसे आखिर में खा रही है. आपकी पत्नी आज भी दफ्तर ख़त्म कर, बच्चों को ऑनलाइन क्लास करवाकर कुकिंग, क्लीनिंग कर रही है. अगर आपके घर में सचमुच काम बराबरी से बंटा हुआ है. तो आपका घर अपवाद है.

महिलाओं के हक़ में बोलने वाले अक्सर ये कहते हैं कि अगर हम हर दिन बराबरी से जिएं तो शायद हमें इस एक दिन की ज़रुरत न पड़े. सचमुच अगर हम एक बराबर समाज हों तो इस दिन तो क्या, हमें महिलाओं के लिए अलग से बने एक यूट्यूब चैनल या इस शो जैसे किसी शो की भी ज़रुरत न पड़े. मगर अभी उस दुनिया के आने में समय है. तब तक हम हैं. यहां. औरतों से जुड़ा आपको वो सब बताने के लिए, जो आपको जानना ज़रूरी है.

जाते जाते एक चुटकुला याद आता है. शायद कभी सोशल मीडिया पर पढ़ा था. जिसमें एक लड़की पुरुषवाद को बढ़ावा देने वालों से कहती है कि अभी तो हम महज़ बराबरी मांग रहे हैं और तुम्हारा डर से ये हाल है. कभी बदला लेने पर उतर आएं तो क्या होगा?

लेकिन बदला एक बुरी भावना है. इसे मन से निकालना चाहिए.

वीडियो- दुधमुंहे बच्चे को लेकर ड्यूटी करने वाली महिला कॉन्स्टेबल के साथ क्या हुआ?

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