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बिना शादी के लड़का-लड़की साथ रहें तो क्या मां-बाप उन्हें जेल भिजवा सकते हैं?

हम तुम एक कमरे में बंद हों और चाबी खो जाए. जोराजोरी चने के खेत में. चलती है क्या नौ से बारह. बॉलीवुड में ऐसे गीतों की कमी नहीं है, जो प्रेमी जोड़ों के बीच होने वाली कूची कू को दिखाते हों. मगर ध्यान से सोचिए तो ये गाने हमारे समाज के बारे में भी कुछ कहते हैं. ये कि प्रेमियों के पास प्रेम करने की जगह नहीं है. कभी खेत तो कभी मूवी थिएटर के सहारा ले रहे हैं प्रेमी. हालांकि ये बात और है कि प्रेम के कई गुरु मानते हैं कि इससे युवा प्रेम का रोमांच बना रहता है.

खैर. आज हम ये बातें क्यों कर रहे हैं. क्योंकि आज हम बात करने वाले हैं प्रेमियों के साथ में रहने की. जिसे अंग्रेजी में कहते हैं लिव इन रिलेशनशिप. और किताबों में कहते हैं-कोहैबिटेशन. यानी साथ में रहना. कुल मिलाकर मतलब ये होता है कि लिव इन रिलेशनशिप में दो लोग, बिना शादी किए हुए एक दूसरे के साथ रहते हैं. जिसके बाद लोग हाय तौबा करते हैं. और शायद यही वजह होती है कि ज्यादातर कपल्स लिव इन रिलेशनशिप की बात को अपने पैरेंट्स और दूसरे रिलेटिव्स से शेयर नहीं करते.

मगर अच्छी बात है कि कानून इसे हमारे पड़ोसी या रिश्तेदार की तरह नहीं देखता. कानून लिव इन रिलेशनशिप को अधिकार मानता है. इसको लेकर भारत में कानूनी पहलू क्या हैं? ऐसे कौन से मामले रहे हैं, जिनमें अलग-अलग कोर्ट ने लिव इन रिलेशनशिप को लेकर लैंडमार्क जजमेंट सुनाए हैं. लिव इन रिलेशनशिप में रहने वालों को किस तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है? इन सभी सवालों के जवाब विस्तार से जानते हैं.

Live In Relationship में क्या दिक्कतें आती हैं?

बाएं से दाएं. अलाना और उनके पार्टनर आइवर.
बाएं से दाएं. अलाना और उनके पार्टनर आइवर.

आप ऊपर एक फोटो देख रहे हैं. इस फोटो में एक कपल है. बाईं तरफ जो महिला हैं, उनका नाम अलाना पांडे है. अलाना बॉलीवुड एक्ट्रेस अनन्या पांडे की कजिन हैं. मशहूर अभिनेता चंकी पांडे के भाई चिक्की पांडे की बेटी हैं. दाईं तरफ उनके ब्यायफ्रेंड आइवर मैकरे हैं. दोनों लॉस एंजेलेस में रहते हैं. लिव इन रिलेशनशिप में. इसके बारे में दोनों के घरवालों को भी पता है. यह फोटो अलाना के एक वीडियो से लिया गया है, जिसमें वो लिव इन रिलेशनशिप की बात कर रही थीं.

अलाना ने बताया कि जब उन्होंने अपने लिव इन रिलेशनशिप के बारे में पैरेंट्स को बताया तो वे बेहद खुश हुए. खासकर उनकी मां को यह जानकर बहुत खुशी हुई कि अलाना और उनके ब्यॉयफ्रेंड मिलकर घर खरीद रहे हैं. उन्होंने बताया कि उनके पैरेंट्स काफी ओपेन माइंडेड हैं.

दरअसल, अलाना तो सोसाइटी के ऊंचे तबके से आती हैं. हम अनुमान लगा सकते हैं कि उनकी परवरिश एक लिबरल माहौल में हुई होगी. जहां रिलेशनशिप्स को देखने का तरीका एक आम मिडिल क्लास फैमिली की तुलना में काफ़ी अलग है. अब जब अलाना को इस तरह की परवरिश मिली तो जाहिर है कि उनके पैरेंट्स और बाकी के लोग भी इसी सोच के होंगे. उनके लिए लिव इन रिलेशनशिप या फिर इसी तरह के दूसरे कॉम्पलिकेटेड इश्यूज पर बात करना, सहजता से स्वीकार करना, दूसरे लोगों के मुकाबले आसान है.

लेकिन अलाना के बहाने हम बात कर रहे हैं मिडिल और लोवर मिडिल क्लास से आने वाले, सेंकेंड, थर्ड टायर सिटी और कस्बों से आने वाले कपल्स की, जो महानगरों में आकर लिव इन रिलेशनशिप में रहते हैं. उनके लिए ऐसा करना टेढ़ी खीर होता है. उन्हें तरह-तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. किराए पर मकान मिलने में कठिनाई से लेकर आसपास के लोगों की मोरल पोलिसिंग और यहां तक की हरासमेंट उन्हें सहना पड़ता है. लोग ये भी मान लेते हैं कि अगर कोई कपल लिव इन रिलेशनशिप में रह रहा है, तो इसका मतलब तो यही है कि वो भविष्य में शादी ही करेगा. इस तरह के अनुभवों के बारे में हमने लिव इन रिलेशनशिप में रह रहे कुछ लोगों से बात की.

25 साल की सुनिधि (बदला हुआ नाम) पेशे से मीडियाकर्मी हैं. बिहार से ताल्लुक रखती हैं. पिछले कुछ सालों से दिल्ली में रह रही हैं. यहीं काम करती हैं. सुनिधि ने हमें बताया कि वे पिछले दो साल से लिव इन रिलेशनशिप में रह रही हैं और उन्हें काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा है. उन्होंने बताया-

“मैं शुरुआत में मुनिरिका में रही. मुनिरिका में किराए पर मकान मिलने में तो उतनी दिक्कत नहीं हुई. क्योंकि वहां सारा मामला किराए का है. अगर आप रेंट दे सकते हैं तो इतनी दिक्कत नहीं होती. लेकिन मोरल पोलिसिंग होती है. दूसरा, ये कि लिव इन रिलेशनशिप में रहने वाले कपल्स से ज्यादा किराया लिया जाता है. मकानमालिक एक तरह से उनकी मजबूरी को एक्सप्लोइट करते हैं. मुनिरिका के हाई स्टेटस वाले इलाकों में तो किराए पर फ्लैट मिलना बहुत मुश्किल है. एक तो कोई कपल्स को फ्लैट देना नहीं चाहता. दूसरा, वहां मोरल पोलिसिंग बहुत ज्यादा है. एक विशेष धर्म के लोगों को फ्लैट नहीं मिलता. और भी तरह-तरह की बंदिशें होती हैं.”

सुनिधि ने हमें मोरल पोलिसिंग के बारे में और विस्तार से बताया-

“मोरल पोलिसिंग अलग ही लेवल पर पहुंच जाती है. आसपास के लोग ये मानने लगते हैं कि फलाने लड़का-लड़की कभी ना कभी तो शादी करेंगे ही. इसलिए ही तो साथ रह रहे हैं. इस तरह का दबाव इतना ज्याद बढ़ जाता है कि एक बार तो मुझे कहना पड़ा कि हमारी इंगेजमेंट हो चुकी है. फिर एक बार एक आंटी आईं. करवाचौथ वाले दिन. कहने लगीं कि कम से आज के दिन तो तुलसी पर जल चढ़ा दो. एक बार मेरे पार्टनर को काम से बाहर जाना था. उसी वक्त हमारा एक कॉमन फ्रैंड फ्लैट पर आ गया. वो कुछ दिन रुका. इससे भी लोगों को प्रॉब्लम हो गई. मतलब लोग यही चाहते हैं कि कोई और दूसरा लड़का आपके यहां ना आए.”

सुनिधि ये भी बताती हैं कि लिव इन रिलेशनशिप में रहने वाले कपल्स में महिलाओं और लड़कियों को उनके मेल पार्टनर के मुकाबले ज्यादा मुश्किलों का सामना करना पड़ता है. उनकी मोरल पोलिसिंग भी मेल पार्टनर के मुकाबले ज्यादा होती है. सुनिधि बताती हैं कि लिव इन रिलेशनशिप में रहना एक महिला के लिए एक हद तक लिबरेंटिंग है, यानी तमाम तरह के बंधनों से थोड़ी सी ही सही लेकिन आजादी तो मिलती है. और इस थोड़ी बहुत आजादी को भी कंट्रोल करने की कोशिश लगातार होती रहती है. और शायद इसलिए लड़के भले ही अपनी लिव इन रिलेशनशिप के बारे में घरवालों को बता दें, लेकिन लड़कियों के लिए ऐसा करना बहुत मुश्किल होता है.

कानून क्या कहता है?

लिव इन रिलेशनशिप्स को लेकर हमारे देश में समय-समय पर कानूनी लड़ाइयां भी लड़ी गई हैं. अलग-अलग अदालतों ने इस संबंध में ऐतिहासिक फैसले सुनाए हैं. कुछ ऐसे ही फैसलों के बारे में हमें जानकारी दी सुप्रीम कोर्ट की वकील देविका ने. उन्होंने बताया-

“सबसे पहले बद्री प्रसाद बनाम डॉयरेक्ट ऑफ कन्सोलिडेशन केस की बात बताती हूं. इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने 50 साल से साथ रह रहे कपल के संदर्भ में लिव इन रिलेशनशिप को इंट्रोड्यूस किया था. दोनों बिना शादी के साथ रह रहे थे. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने 2010 में एक और फैसला सुनाया था. इसमें कोर्ट ने कहा था कि अगर दो बालिग लोग बिना शादी के अपनी मर्जी से काफी लंबे समय तक साथ रह रहे हैं, तो उनकी रिलेशनशिप को लिव इन रिलेशनशिप कंसीडर किया जाएगा. 2010 में सुप्रीम कोर्ट ने एक और जजमेंट दिया. एस खुशबू बनाम कन्हैया अम्बल के नाम से इसे जाना गया. इसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि लिव इन रिलेशनशिप आर्टिकल 21 के तहत राइट टू लाइफ में कवर होता है. सबसे बड़ा जजमेंट 2013 में आया. इंद्रा शर्मा बनाम वीके वी शर्मा. इसमें सुप्रीम कोर्ट लिव इन रिलेशनशिप को डोमेस्टिक वायलेंस की एम्बिट में लाया.”

इन फैसलों के बाद अब हम इस बात पर आते हैं कि हमारा संविधान लिव इन रिलेशनशिप को किस तरह से देखता है. संविधान में एक अनुच्छेद है. आर्टिकल 21. यह भारत के नागरिकों को पूरी आजादी से जीवन जीने का अधिकार देता है. और इस नजरिए से लिव इन रिलेशशिप को एक अधिकार के तौर पर देखता है. संविधान कहता है कि अगर दो लोग शांतिपूर्ण तरीके से सहमति के साथ रह रहे हैं, तो दूसरे लोगों को उनके बीच दखल देने का अधिकार नहीं है. दखल होने पर कानूनी सहायता भी ली जा सकती है.

एडवोकेट देविका.
एडवोकेट देविका.

लिव इन रिलेशनशिप को संविधान और कानून में किस तरह से डिफाइन किया गया है और यह किस तरह से कपल्स को बाहरी दखल से सुरक्षा देता है. इसे और विस्तार में बताया एडवोकेट देविका ने-

“लिव इन रिलेशनशिप को कानून में किसी विशेष तरीके से डिफाइन नहीं किया गया है. कानून इसे इन द नेचर ऑफ मैरिज के तौर पर देखता है. इसके अलग-अलग पैरामीटर्स हैं. रिलेशनशिप का टाइम बहुत मैटर करता है. ये नहीं हो सकता कि आप दो दिन साथ रहे फिर अलग हो गए. फिर दोबारा 6 महीने के बाद साथ रहने लगे. ये नहीं हो सकता. आप समाज के साथ किस तरह का संबंध बनाकर रखते हैं. एक साथ एक ही घर में रहना जरूरी है. एक दूसरे के प्रति जो जिम्मेदारियां हैं, उन्हें निभाना जरूरी है. समाज में तो लिव इन रिलेशनशिप को अनैतिक समझा जाता है लेकिन कानून इसे हमारा अधिकार मानता है. और अगर कपल्स को लगता है कि उन्हें किसी से खतरा है तो वे कानूनी मदद ले सकते हैं. पुलिस से प्रोटेक्शन मांग सकते हैं.”

लिव इन रिलेशनशिप में कुछ और पहलू भी हैं. मसलन, लिव इन रिलेशनशिप में रह रहे कपल्स की अगर कोई संतान हो जाती है, तो उसका क्या स्टेटस होगा, उसके क्या अधिकार होंगे? और क्या एक महिला अपने मेल पार्टनर की संपत्ति में हिस्सा मांग सकती है? इन सवालों के जवाब भी हमें एडवोकेट देविका ने दिए-

“2008 के तुलसा एंड अदर्स बनाम दुर्गत्या एंड अदर्स के केस में कोर्ट ने इस बारे में चीजें साफ की हैं. इसमें कोर्ट ने वॉक इन और वॉक ऑउट टर्म को इंट्रोड्यूस किया. इसमें कोर्ट ने कहा कि लिव इन रिलेशनशिप में पैदा हुए बच्चों को अवैध नहीं कहा जा सकता. और उनके भी अधिकार उतने ही हैं, जितने किसी दूसरे बच्चे के. वे भी अपने पैरेंट्स की संपत्ति में अधिकार मांग सकते हैं. दूसरी तरफ अगर महिलाओं को लग रहा है कि वे प्रताड़ना का शिकार हो रही हैं लिव इन रिलेशनशिप में तो वे भी प्रॉपर्टी और मेंटेनेंस क्लेम कर सकती हैं.”

बात प्रेम की हो तो बात समलैंगिक प्रेमियों की भी हो, ये ज़रूरी है. हमारे देश में समलैंगिकता अब अपराध के दायरे से बाहर है. मगर शादी का अधिकार अब भी नहीं है. ऐसे में समलैंगिक प्रेमियों के पास लिव इन का ही ऑप्शन है. इसके कानूनी पहलू क्या हैं. ये भी बताया हमें एडवोकेट देविका ने.

“इंद्रा शर्मा वाले फैसले में ही सुप्रीम कोर्ट ने गे और लेस्बियन को लिव इन रिलेशनशिप में रहने के वही समान अधिकार दिए हैं, जो बाकी कपल्स को. ट्रांसजेंडर के लिए बिल अभी आया है. इस संबंध में कानून पूरी तरह से साफ नहीं है. लेकिन मुझे लगता है कि धीरे-धीरे चीजें साफ हो जाएंगी.”

तो ये थी बात लिव इन रिश्तों की. लिव इन रिलेशनशिप में रहना किसी भी औरत, पुरुष का अन्य जेंडर के लिए उनका अधिकार होना चाहिए. कानूनी रूप से अधिकार है भी, लेकिन ये अधिकार क्या उन्हें मिलता है? बात सिर्फ इतनी होती कि आपको अपने घर में किसी गैर-शादीशुदा कपल को कमरा देते अजीब लगता. तो भी उसे पचाया जा सकता था. लेकिन हम तो दूसरों के फ्लैट्स, अपार्टमेंट, कमरों में झांकने वाले लोग हैं. जो हमसे बात तक नहीं करता, उनको भी जाकर जज कर लेते हैं. पता है, फलाने के घर में जो लड़का रहता है. उससे मिलने एक लड़की आती है. अरे भाई, शांति से रह रहे किसी कपल के जीवन में घुसकर आपको क्या मिलेगा. दुनिया में और भी बुरे लोग हैं. जो सार्वजनिक मंचों से दो गुटों में लड़ाई लगवाते देखे जाते हैं. अपनी नफरतें उनके लिए बचाकर रखें.

वीडियो- सुसाइड के लिए मजबूर हुईं दीपाली चह्वाण की मौत में SC/ST एक्ट का एंगल क्या है?

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