Submit your post

Follow Us

कभी पंचर बनाते थे, अब राज्यसभा में NDA की कमान संभालेंगे

1.41 K
शेयर्स

अफवाहें और अटकलें, अच्छी खबरें भी लाती हैं. मगर कभी कभी ही. लेकिन इनसे सियासी तापमान और भविष्य की संभावनाएं भी समझ आती हैं. और खतरे भी.

2017 का साल था. पहली दफा, भाजपा को अपने कैंडिडेट को राष्ट्रपति बनवाने के लिए सहयोगी दलों का, विपक्षी दलों का मुंह नहीं देखना पड़ रहा था. कई नाम चल रहे थे. झारखंड की राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू, मोदी सरकार में मंत्री थावरचंद गहलोत जैसे. फिर नाम आया कानपुर देहात के रहने वाले और उस वक्त बिहार के राज्यपाल रामनाथ कोविंद का. तो क्या कोविंद सबकी पसंद थे. संघ के जानकार कहते हैं कि केशव भवन गहलोत के लिए ज्यादा इच्छुक था. फिर यह भी कहते हैं कि मोहन भागवत के दौर में संघ अपना वीटो बचाकर रखता है. और राजनीतिक मामलों में आखिरी फैसले के लिए मोदी या शाह की बांह नहीं मरोड़ता. मसलन, 2017 के यूपी चुनाव. तैयारी के दौरान अमित शाह, भागवत से मिलने पहुंचे. रणनीति पर बात के बाद बात हुई संघ की सुझाई सूची पर. भागवत संकेत समझ गए. वो भाजपा में किसी को किसी पैरवी के चलते खुद पर हावी नहीं होने देना चाहते. उन्होंने सूची किनारे रखवा दी. और उसी वक्त यूपी में संघ के कर्ता धर्ताओं को फोन कर कह दिया. टिकट देने का काम भाजपा का है, उन्हें ही करने दीजिए.

ये शाह और मोदी के लिए भी संकेत था. कि उपकृत करने और मान मनव्वल वाली चीज नहीं चलेगी. परस्पर भरोसा रखें और एक दूसरे को ऊर्जा दें. इसीलिए जब थावरचंद की जगह कोविंद बने, तो भागवत ने ज्यादा प्रतिक्रिया नहीं दी. अंतःपुर की जानकारी रखने वाले इस बारे में भी एक  किस्सा बतियाते हैं. रामजाने कितना सही गलत. नरेंद्र मोदी ने नागपुर फोन किया. भागवत को कोविंद के बारे में जानकारी देने के लिए. और भागवत ने जवाब दिया. हां, मुझे भी टीवी से पता चला.

नरेंद्र मोदी और संघ के बीच का रिश्ता बेहद नाजुक संतुलन पर टिका हुआ है. मोदी के दौर में संघ बीजेपी की बांह मरोड़ने की बजाए एक सामंजस्य बनाते हुए दिखाई देता है.
नरेंद्र मोदी और संघ के बीच का रिश्ता बेहद नाजुक संतुलन पर टिका हुआ है. मोदी के दौर में संघ बीजेपी की बांह मरोड़ने की बजाए एक सामंजस्य बनाते हुए दिखाई देता है.

मगर हर बार सब टीवी से ही पता नहीं चलता. इस बार संघ ने कहा तो मोदी माने. ये मानना मोदी की रणनीति को भी सूट कर रहा था. और इसीलिए थावरचंद गहलोत, मोदी की दूसरी सरकार में भी काबीना मंत्री थावरचंद गहलोत, राज्यसभा में पार्टी के नेता बना दिए गए. इस पद का वजन समझिए. अब से पहले इस पद पर अरुण जेटली थे. जेटली के पलिटिकल और मीडिया मैनेजमेंट पर महाकाव्य रचा जा सकता है. मगर गहलोत को फिलहाल इतिहास की नहीं, वर्तमान की परवाह करनी होगी. क्योंकि राज्यसभा का अंकगणित 2020 तक ही भाजपा के  लिए पूरी तरह मुफीद होगा. तब तक जब तब बुलबुले ही उठेंगे, कि कौन सी पार्टी किस बिल पर साथ आई या दूर गई.

बुलबुलों से गहलोत का पुराना नाता है. एक दौर था. जब उनकी मिल की बंधी बधाई नौकरी चली गई थी. और तब घर चलाने के लिए उन्होंने पंक्चर की दुकान खोल ली थी. लड़का पंक्चर बनाता, गहलोत कभी बुलबुले निहारते, कभी उसे बताते कि कितने पंक्चर हैं टायर में और कभी जिंदगी का अपना चक्का घुमाते. चक्का जिसकी शुरुआत मध्यप्रदेश के नागदा से हुई थी.

मजदूर एकता जिंदाबाद, संघ संस्करण

एमपी का नागदा कस्बा औद्योगिक है. आसपास के कई गावों को रोजगार देता. ऐसा ही एक गांव रूपेटा. वहां रहते थे रामलाल जी गहलोत. नागदा की ग्रैसिम कपड़ा फैक्ट्री में काम करते.

थावरचंद गहलोत की पैदाइश उज्जैन के नागदा तहसील के गांव रुपेटा की है. उनेक पिता नागदा की ग्रेसिम इंडस्ट्रीज में बतौर मजदूर काम किया करते थे. थावरचंद को अपने साथ ले आए. थावर की पढ़ाई-लिखाई नागदा में ही हुई. मालवा के इलाके में शुरुआत से ही संघ की पकड़ मजबूत हुआ करती थी. उस समय नागदा मंडी के पास एक संघ की शाखा चलती थी और मोहन लाल शर्मा इस शाखा के कार्यवाह (शाखा का प्रमुख) हुआ करते थे. उनके कहने से थावर ने शाखा जाना शुरू किया. उस समय वो 7 वीं क्लास में पढ़ा करते थे. इसके बाद से लगातार संघ से जुड़े रहे.

1967 में उज्जैन की विक्रमादित्य यूनिवर्सिटी से उन्होंने बीए पूरी की और अपने पिता की तरह ग्रेसिम इंडस्ट्रीज में काम करने लगे. संघ उस समय अपने पैर पसार ही रहा था. थावर पहले से संघ से जुड़े हुए थे, लिजाहा उन्हें ग्रेसिम इंडस्ट्रीज में भारतीय मजदूर संघ का प्रमुख बना दिया गया. 1968 में ग्रेसिम इंडस्ट्रीज में मजदूरों का आंदोलन शुरू हुआ. थावर इसको लीड कर रहे थे. उन्हें गिरफ्तार करके जेल भेज दिया गया. जेल से बाहर आकर उन्होंने फिर से आंदोलन जारी रखा. 1970 आते- आते आंदोलन ने उग्र रूप ले लिया. मजदूरों के प्रदर्शन पर पुलिस ने गोली चलाई. तीन मजदूर मारे गए. थावर गिरफ्तार हो गए. चार महीने जेल में रहने के बाद बाहर आए तो नौकरी जा चुकी थी. पेट भरने का कोई जरिया नहीं था. संघ के अपने साथियों की मदद से नागदा मंडी के पास पंचर बनाने की दुकान खोल ली.

 

कभी बेरोजगारी के दौर में थावरचंद गहलोत को रोजी-रोटी चलाने के लिए पंचर बनाने पड़े थे.
कभी बेरोजगारी के दौर में थावरचंद गहलोत को रोजी-रोटी चलाने के लिए पंचर बनाने पड़े थे.

कुशाभाऊ की नर्सरी में विकसित हुई पौध

मध्य प्रदेश देश में जनसंघ के शुरूआती गढ़ में से एक था. इसकी वजह थे कुशाभाऊ ठाकरे. संगठन खड़ा करने माहिर आदमी. 1922 में मध्य प्रदेश के धार में पैदा हुए. संघ के प्रचारक बन गए. फिर जनसंघ से जुड़े. रतलाम डिविजन में संगठन खड़ा करने की जिम्मेदारी मिली. रतलाम डिविजन माने मध्य प्रदेश, राजस्थान और गुजरात का सीमावर्ती इलाका. दाहोद से झालावाड़ डूंगरपुर तक. मध्य प्रदेश में झाबुआ, अलीराजपुर, रतलाम, उज्जैन और देवास का इलाका. 1956 में सूबे में जनसंघ के सचिव बने. अपने दौर में कई सारे युवा नेताओं को खड़ा किया. यह कुशाभाऊ की मेहनत है कि आज भी मालवा बीजेपी का सबसे मजबूत गढ़ है. मध्य प्रदेश की राजनीति के आज के ज्यादातर बड़े नेता कुशाभाऊ की नर्सरी से निकले हैं.

इधर थावरचंद का मजदूर संघ के साथ काम जारी था. इस बीच लगा आपातकाल. 1975 से 1977 के बीच. थावर को भी हजारों दूसरे राजनीतिक कार्यकर्ताओं की तरह गिरफ्तार कर लिया गया. मिसा कानून के तहत एक साल जेल में रहे. बाहर आए और संगठन के काम में जुट गए. कुशाभाऊ की नजर में पहले थे. संघ के स्थानीय नेतृत्व ने भी उनकी जमकर पैरवी की. नतीजा यह हुआ कि 1980 के विधानसभा चुनाव नई बनी बीजेपी का टिकट थमा दिया गया. रतलाम की आलोट सुरक्षित सीट से.  7,742 वोट से कांग्रेस के रामचंद्र सूर्यवंशी को चुनाव हराने में कामयाब रहे. यह थावरचंद गहलोत के राजनीतिक करियर की शुरुआत थी.

कुशाभाऊ उन लोगों में थे जो बीजेपी को शून्य से शिखर तक लेकर गए.
कुशाभाऊ उन लोगों में थे जो बीजेपी को शून्य से शिखर तक लेकर गए. आज मध्य प्रदेश की राजनीति के ज्यादातर बड़े नेताओं को उन्होंने तैयार किया था.

मध्य प्रदेश के मालवा इलाके में दलित वोट ठीक-ठाक तादाद में है. यहां बीजेपी को एक मजबूत दलित चहरे की जरुरत थी. लिहाजा थावरचंद को संगठन में आगे बढ़ाया जाने लगा. 1985 में फिर से एक बार विधानसभा का चुनाव लड़े. अलोत सीट से. महज 2399 वोट से चुनाव हार गए. मगर 1990 में फिर जीत गए. और पहली दफा राज्य में भाजपा सरकार बनी. हालांकि जनसंघ कोटे से कैलाश जोशी और वीरेंद्र सखलेचा 1977 के दौर में मुख्यमंत्री बन चुके थे. मगर तब समाजवादी धड़ों का दबाव भी था. ये कुशाभाऊ के देखे सपने की सरकार थी. पूरी तरह अपने दम पर.

सुंदरलाल पटवा ने सीएम की शपथ ली और उनके मंत्रीमंडल में एक नाम हुआ थावरचंद का. 1992 में बाबरी गिरी तो भाजपा सरकारें भी गिरीं. एमपी, राजस्थान और हिमाचल की. 1993 में चुनाव हुए तो पटवा वापसी नहीं कर पाए. बतौर सीएम. लेकिन गहलोत फिर चुनाव जीत गए.

1996 में आए लोकसभा चुनाव. नारा गूंजा अबकी बारी अटल बिहारी. कुशाभाऊ भी अब दिल्ली में ज्यादा रहते थे. राज्य में दिग्गी राज था और बीजेपी में झमककर अंतर्कलह. गहलोत को समझ आ गया कि भोपाल से दिल्ली की ट्रेन पकड़ने का वक्त आ गया है. संगठन ने उन्हें लोकसभा चुनाव में शाजापुर की सुरक्षित सीट से उतारा तो इसे उनका प्रमोशन ही माना गया. तब से लेकर 2009 तक वह लगातार इस सीट से सांसद रहे. 2007 के परिसीमन में सीट खत्म हो गई. नई सीट बनी देवास. अनुसूचित जाती के लिए सुरक्षित. 2009 के लोकसभा चुनाव में गहलोत यहां से चुनाव लड़े और कांग्रेस के सज्जन सिंह वर्मा के हाथों महज 16,084 वोटी से चुनाव हार गए.

थावरचंद गहलोत को बीजेपी अपने दलित चहरे के तौर पर स्थापित करने में लगी हुई है.
थावरचंद गहलोत को बीजेपी अपने दलित चहरे के तौर पर स्थापित करने में लगी हुई है.

 

मोदी बोले, अंबेडकर हमारे. 

2012 में थावरचंद गहलोत को मध्य प्रदेश के कोटे से राज्यसभा भेज दिया गया. 2014 का लोकसभा चुनाव जीतने के बाद नरेंद्र मोदी को समझ में आने लगा कि अगर पैर मजबूत करने हैं तो दलितों में पैठ जमानी पड़ेगी. रणनीति के तहत बीजेपी के में दलित चहरों को तरजीह दी जाने लगी. थावरचंद गहलोत को नरेंद्र मोदी सरकार में सामाजिक न्याय मंत्रालय सौंपा गया. 2019 के नए मंत्रिमंडल में उनका मंत्रालय जस का तस रखा गया है.कई राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि थावरचंद गहलोत का अब कोई मजबूत जनाधार बचा नहीं है. 2018 के विधानसभा चुनाव में वो अपने बेटे जितेंद्र गहलोत को आलोट सीट से चुनाव नहीं जीता पाए. मंत्री के तौर पर भी उनका काम-काज बहुत अच्छा नहीं कहा जा सकता. लेकिन दलितों के बीच अपनी पकड़ को मजबूत करने की रणनीति के तहत थावरचंद गहलोत को राज्य सभा बीजेपी की कमान सौंपी गई है.

 

लगातार लल्लनटॉप खबरों की सप्लाई के लिए फेसबुक पर लाइक करें

टॉप खबर

इमरान खान की भयानक बेज्ज़ती बिजली विभाग के क्लर्क ने कर दी है

सोचा होगा, 'हमरा एक्के मकसद है, बदला!'

जज साहब ने भ्रष्टाचार पर जजों का धागा खोला, मगर फिर जो हुआ वो बहुत बुरा है

कहानी पटना हाईकोर्ट के जज राकेश कुमार की, जो चारा घोटाले के हीरो हैं.

अयोध्या में बाबरी मस्जिद को बाबर ने बनवाया ही नहीं?

ये बात सुनकर मुग़लों की बीच मार हो गयी होती.

पेरू में लगभग 250 बच्चों की बलि चढ़ा दी गयी और लाशें अब जाकर मिली हैं

खुदाई करने वालों ने जो कहा वो तो बहुत भयानक है

देश के आधे पुलिसवाले मानकर बैठे हैं कि मुसलमान अपराधी होते ही हैं

पुलिसवाले और क्या सोचते हैं, ये सर्वे पढ़ लो

वो आदमी, जिसने पद्म श्री, पद्म भूषण और पद्म विभूषण ठुकरा दिया था

उस्ताद विलायत ख़ान का सितार और उनकी बातें.

विधानसभा में पॉर्न देखते पकड़ाए थे, BJP ने उपमुख्यमंत्री बना दिया

और BJP ने देश में पॉर्न पर प्रतिबंध लगाया हुआ है.

आईफोन होने से इतनी बड़ी दिक्कत आएगी, ब्रिटेन में रहने वालों ने नहीं सोचा होगा

मामला ब्रेग्जिट से जुड़ा है. लोग फॉर्म नहीं भर पा रहे.

पूर्व CBI जज ने कहा, ज़मानत के लिए भाजपा नेता ने की थी 40 करोड़ की पेशकश

और अब भाजपा के "कुबेर" गहरा फंस चुके हैं.

आशीर्वाद मांगने पहुंचे खट्टर, आदमी ने खुद को आग लगा ली

दो बार मुख्यमंत्री से मिला, फिर भी नहीं लगी नौकरी.