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कश्मीर में इस बार जिस तरह जान गई है, वो बहुत तकलीफ देने वाला है

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कश्मीर. जहां हमारा राष्ट्रवाद एक दूसरे तरह के राष्ट्रवाद से टकराता है. हमारे यहां उस राष्ट्रवाद को ‘अलगाववाद’ कहा जाता है. बंदूक के दम पर चल रही ‘आज़ादी’ की लड़ाई को बंदूक के सहारे ही काबू करने की कोशिश चल रही है. और लोग पिस रहे हैं. इस पिसाई ने 10 जुलाई की सुबह एक और जान ले ली. इस बार कोई जवान या उग्रवादी नहीं मरा था. इस बार मरा था एक बाप. इस डर से कि उसका बेटा मरने वाला है.

कश्मीर में शोपियां ज़िला है. उग्रवाद के गढ़ों में से एक. यहां के कुंदलन गांव में सेना, पुलिस और उग्रवादियों के बीच 9-10 जुलाई की दरम्यानी रात मुठभेड़ शुरू हुई. उग्रवादी एक घर में घेर लिए गए. और दोनों तरफ से गोलीबारी होने लगी. गोलियों की आवाज़ें हर तरफ खबर बनकर दौड़ने लगी. इनमें से एक पहुंची शोपियां के ही गांव मेमेंढर. यहां मोहम्मद इशाक़ नाइकू का घर है. नाइकू सुबह उठे तो उन्होंने कहीं से सुन लिया कि कुंदलन में जिस घर को सेना और दूसरी सुरक्षा एजेंसियों ने घेर रखा है, उसमें उनका बेटा ज़ीनत उल इस्लाम भी शामिल है.

कश्मीर में नियमित रूप से सेना और दूसरी एजेंसियां ऑपरेशन चलाती रहती हैं. लेकिन उग्रवाद कम होने की जगह हाल के दिनों में बढ़ा है. (फोटोःपीटीआई)
कश्मीर में नियमित रूप से सेना और दूसरी एजेंसियां ऑपरेशन चलाती रहती हैं. लेकिन उग्रवाद कम होने की जगह हाल के दिनों में बढ़ा है. (फोटोःपीटीआई)

कश्मीर में जब ये मालूम चलता है कि किसी लड़के ने हथियार उठा लिया है तो सेना और पुलिस उसके घरवालों से संपर्क करती है. बताती है कि आपके बेटे-पति-भाई ने देश के खिलाफ लड़ाई छेड़ दी है. हो सकता है कि उसका सामना कभी सेना या दूसरी सुरक्षा एजेंसियों से हो जाए. तब आप चलिएगा और मनाइएगा कि सरेंडर कर दें. क्योंकि सरेंडर न करने वाले उग्रवादी मुठभेड़ खत्म होने तक ज़िंदा नहीं बचते. बच जाते हैं तो कभी न कभी किसी और मुठभेड़ में फंस जाते हैं. उग्रवादियों के घरवालों को हमेशा इस बात का डर लगा रहता है कि उन्हें सरेंडर कराने का बुलावा न आ जाए. बुलावे से भी ज़्यादा इस बात का डर कि अगर उनके बेटे, भाई या पति ने सरेंडर करने से इनकार कर दिया तो? क्योंकि पूर्व में ऐसा हो चुका है.

शायद इसीलिए जब नाइकू ने सुना कि उनका बेटा मौत से एक कदम दूर है, उनके दिल ने जवाब दे दिया. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक उन्हें ज़ोर का हार्ट अटैक आया. रिश्तेदार उन्हें ज़िला अस्पताल लेकर भागे. ज़िले के मेडिकल सुपरिटेंडेंट डॉ ज़हूर अहमद का बयान है. कि नाइकू अस्पताल लाए जाते तब तक उनके बदन में जान बाकी नहीं थी.

बुरहान वानी का जनाज़ा. बुरहान की कश्मीर में बहुत इज़्ज़त है. लेकिन मां-बाप डरते हैं कि उनके बच्चे उग्रवाद की ओर बढ़े तो उनका हश्र भी बुरहान जैसा न हो. (फोटोःरॉयटर्स)
बुरहान वानी का जनाज़ा. बुरहान की कश्मीर में बहुत इज़्ज़त है. लेकिन मां-बाप डरते हैं कि उनके बच्चे उग्रवाद की ओर बढ़े तो उनका हश्र भी बुरहान जैसा न हो. (फोटोःरॉयटर्स)

नाइकू के मरने के बाद भी कुंदलन में मुठभेड़ चलती रही. गांव की भीड़ उग्रवादियों को बचाने के लिए मुठभेड़ स्थल की ओर दौड़ी. पत्थर भी चले. इसे काबू करने के लिए सुरक्षा एजेंसियों को गोली चलानी पड़ी जिसमें एक आदमी की मौत हो गई. 50 के करीब लोग घायल भी हुए. एक जवान और एक अधिकारी ज़ख्मी हुए हैं जिन्हें इलाज के लिए श्रीनगर के बेस अस्पताल लाया गया है.

नाइकू अब इस दुनिया में नहीं हैं. खबर लिखे जाने तक ये तय नहीं हो पाया है कि उनका बेटा मुठभेड़ वाले घर में था कि नहीं. सुरक्षा एजेंसियों का कहना है कि उनकी ओर से नाइकू से संपर्क नहीं किया गया था. वो कार्रवाई में मारे गए उग्रवादियों की शिनाख्त होने का इंतज़ार कर रही हैं.

जुलाई 2016. कश्मीर. कर्फ्यू के दौरान एक आदमी सड़क पर पुलिस वाले को बाहर निकलने की वजह के तौर पर दवाई की शीशी दिखाते हुए. दवाई खरीदने निकलना उस आदमी की मजबूरी है. उसकी तलाशी लेना पुलिस वाले की. (फोटोःरॉयटर्स)
जुलाई 2016, कश्मीर. कर्फ्यू के दौरान एक आदमी सड़क पर पुलिस वाले को बाहर निकलने की वजह के तौर पर दवाई की शीशी दिखाते हुए. दवाई खरीदने निकलना उस आदमी की मजबूरी है. उसकी तलाशी लेना पुलिस वाले की. (फोटोःरॉयटर्स)

कार्रवाई में उग्रवादियों की मौत को ‘मिलिटेंट’ का ‘न्यूट्रलाइज़’ होना कहा जाता है. जब इस तरह की कार्रवाई में ऐसे किसी शख्स की मौत होती है जिसे मारना लक्ष्य नहीं था, तो उसे कोलैटरल डैमेज कहा जाता है. ऐसा कहकर से एक इंसान की मौत पर होने वाला अफसोस कम करने की कोशिश होती है. नाइकू की मौत इन दोनों खांचों में नहीं समाती.

अफवाह उन खबरों को कहते हैं जिनका पक्का आधार नहीं होता. लेकिन जिनके सच होने का डर बहुत लगता है. जब नाइकू ने जान छोड़ी, तब कोई पक्के से नहीं जानता था कि ज़ीनत मुठभेड़ वाले घर में था कि नहीं. तब तक वो एक अफवाह ही थी. और यही इस खबर का सबसे दुर्भाग्यपूर्ण हिस्सा है. कश्मीर में अब अफवाहें जान लेने लगी हैं. एक कौम के लिए इससे दुखद कुछ नहीं हो सकता.


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