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मज़दूर के बेटे ने तीरंदाज़ी में भारत को सिल्वर मेडल दिला डाला

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प्रवीण जाधव, 71 वर्षीय दिहाड़ी मजदूर का बेटा. जो गंदी नालियों के पास बसी एक बस्ती में रहता है. गरीबी इतनी कि पिता चाहते थे कि पैसे कमाने के लिए वो कपड़े की दुकान पर काम करे. इसके बावजूद हर रूकावट को पार कर उसने दस्तोविना वर्ल्ड चैंपियनशिप में सिल्वर मैडल जीता. जानते हैं उनका बस्ती से लेकर आर्चरी तक का सफर.

# मैडल कैसे जीता?

14 साल बाद फिर भारत ने एक बार आर्चरी में कमाल दिखाया है. आखिरी बार 2005 में भी सिल्वर ही जीता था. प्रवीण जाधव, तरूणदीप राय और अतनू दास ने सिल्वर मैडल जीतकर 2020 के टोक्यो ओलंपिक्स में आपनी जगह बना ली है. डच सिटी ऑफ हरटोसनबुश दस्तोविना वर्ल्ड चैंपियनशिप में कनाडा को हराकर फाइनल्स में जगह बनाई. फाइनल मुकाबला चीन के साथ था. चीन ने भारत की टीम को 5-4 से हराकर गोल्ड अपने नाम किया.

# सूखाग्रस्त इलाके से लाइम लाइट तक

महाराष्ट्र के सारदे गांव से बाहर आने में प्रवीण को बहुत वक्त लग गया. उन्होंने स्पोर्ट्स को नहीं छोड़ा था. बस घर की जिम्मेदारी उठाने के लिए नौकरी करने लग गए थे. इनका गांव महाराष्ट्र का एक सूखाग्रस्त इलाका है. घर में गरीबी इतनी कि न बिजली, न पीने के लिए पानी. घर में दो वक्त का खाना मिल पाना भी मुश्किल था. ऐसे में अपनी डाइट का ख्याल भी नहीं रख पाते थे. पिता भी काफी बूढ़े हो चले थे. प्रवीण पर परिवार की जिम्मेदरियां बढ़ गई.

# टीचर ने संवारा प्रवीण का करियर

प्राइमरी स्कूल में जब पढ़ रहे थे. तो इनके टीचर बबन भुजबल से इनके घर की हालत छिपी नहीं थी. उन्होंने प्रवीण को स्पोर्ट्स में आने के लिए कहा. उन्हें लगता था कि सिर्फ यही एक ऐसी फिल्ड है, जो उसकी जिंदगी बदल देगा. अब प्रवीण को एक दिशा मिल गई थी. उसने एथलेटिक्स को चुना. जिन्होंने कभी स्कूल में स्पोर्ट्स में भाग लिया है, वो ये जानते हैं कि ये एथलेटिक्स में एक्स्ट्रा इक्विपमेंट्स की जरूरत नहीं पड़ती. यही वजह थी प्रवीण की एथलेटिक्स में आने की. प्रवीण सही डाइट न होने की वजह से एक दिन वार्म अप करते-करते जमीन पर गिर गए. बबन जानते थे कि ये कुपोषित है. इसलिए उसकी डाइट का खर्चा खुद उठाने लगे.

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प्रवीण ने मेहनत में कोई कसर नहीं छोड़ी. जिला स्तरीय औऱ राज्य स्तरीय 400, 800 मीटर रेसों में जीतते गए. इनकी अच्छी परफोर्मेंस के देखते हुए महाराष्ट्र सरकार की क्रीड़ा प्रबोधिनी स्कीम के तहत इन्हें खेल की फ्री कोचिंग के लिए शॉर्टलिस्ट किय़ा गया. इस स्कीम में गांव और दूर दराज के ऐसे बच्चों को लिया जाता है, जिन्हें स्पोर्ट्स के लिए अच्छी फैसिलिटी नहीं मिल पाती है. इन बच्चों की पढ़ाई, खाने-पीने, खेल कूद और रहने का सारा खर्चा सरकार उठाती है. लेकिन ये इतना आसान नहीं था. यहां एंट्री के लिए अभी एक एग्जाम क्लीयर करना बाक़ी था.

# एथलेटिक्स से आर्चरी में किया शिफ्ट

क्रीड़ा प्रबोधिनी स्कीम में प्रवीण का एडमिशन टेस्ट कोच प्रफुल्ल डांगे ले रहे थे. टेस्ट के दौरान उन्होंने नोटिस किया कि प्रवीण की बाहों की लंबाई और स्ट्रेंथ आर्चरी (तीर कमान) के लिए एकदम परफेक्ट है. प्रफुल्ल डांगे के कहने पर उन्हें एथलेटिक्स से आर्चरी में शिफ्ट कर दिया गया. लेकिन अब घर से नौकरी का दबाव बनने लगा. पिता को लगता था कि पैसा कमाना बहुत जरूरी है. इसलिए कपड़े की दुकान पर काम के लिए कहा. प्रवीण ने पैसे कमाने के लिए ये भी किया. और जो नहीं किया वो था सपनों के साथ कोम्प्रोमाइज. बांस का कमान लेकर प्रैक्टिस करते रहे, जब तक मॉर्डन टेक्नॉलजी से लैस कमान नहीं आ गया.

# वर्ल्ड चैंपियनशिप में कैसे बनाई जगह?

अपनी मेहनत से जूनियर लेवल पर डोमिनेट करने लगे. वर्ल्ड चैंपियनशिप के सिलेक्शन ट्रायल में ये अरूणदीप राय के बाद दूसरे नंबर पर आ गए. पिछले साल स्पोर्ट्स कोटे की वजह से इनकी आर्मी में नौकरी भी लग गई. ऐसे में घरवाले उनपर सिर्फ नौकरी पर ध्यान देने के लिए कहने लगे. लेकिन जाधव ने कमान का साथ नहीं छोड़ा. पुराने कोच भुजबल और डांगे ने उन्हें गेम पर ध्यान देने के लिए मोटीवेट किया. उन्हें भरोसा है कि अगले साल ओलंपिक में प्रवीण जरूर बेहतर परफॉर्म करेंगे.

इंडियन एक्सप्रेस से इंटरव्यू में प्रवीण ने बताया

ओलंपिक टीम में जगह बनाने के लिए मुझे कंपीट करना पड़ेगा. इसके लिए होना बाले सिलेक्शन ट्राइल में मुझे अच्छा प्रदर्शन दिखाना पड़ेगा.


(ये स्टोरी दी लल्लनटॉप के साथ इंटर्नशिप कर रहीं कामना ने की है.)


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