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मायावती ने गठबंधन क्या तोड़ा, खुद की लुटिया ही डुबो ली है

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सोमवार यानी 24 जून को मायावती ने सपा के साथ गठबंधन तोड़ने की औपचारिक घोषणा कर दी. लेकिन मायावती और अखिलेश में टूट की बात कुछ हफ़्तों पहले से ही सुनाई देने लगी थी. मायावती ने ही सबसे पहले सपा के साथ गठबंधन ख़त्म करने के संकेत दिए थे, और सारी शिकायतों के बीच मायावती की प्रमुख शिकायत थी सपा के कार्यकर्ताओं से. मायावती का कहना था कि सपा कार्यकर्ता सपा के वोट बसपा को ट्रांसफर नहीं करवा सके. अखिलेश ने भी पलटकर कहा कि “विचार करेंगे” और विचार हो गया. गठबंधन टूट गया.

लेकिन अब गठबंधन नहीं है. मायावती ने घोषणा की है कि बसपा अब सारे छोटे-बड़े चुनाव अकेले लड़ेगी. वह भी तब, जब मायावती को गठबंधन से हालिया लोकसभा चुनाव में सबसे ज्यादा फायदा मिला. 2014 में सांसदों की संख्या शून्य थी, अब है 10. राजनीतिक जानकार मानते हैं कि मायावती का दावा गलत है. सपा के परंपरागत वोट तो बसपा को मिले, लेकिन बसपा के ही वोट सपा को नहीं मिले. आलोचक तो ये भी कह रहे कि इस गठबंधन से मायावती का स्वार्थ सध गया है, इसलिए वे आरोप लगा रही हैं.

मायावती ने लोकसभा चुनाव के बाद सपा से किनारा कर लिया है.
मायावती ने लोकसभा चुनाव के बाद सपा से किनारा कर लिया है.

लेकिन विवादों से इतर, बहुजन समाज पार्टी के सामने अब हैं दो चुनाव. एक है प्रदेश की 11 विधानसभा सीटों पर होने वाले उपचुनाव और साल 2022 में होने वाले प्रदेश विधानसभा चुनाव. बसपा कैसे लड़ेगी? क्या लड़ेगी? और कैसे जीतेगी? और कितनी छोटी-बड़ी जीत होगी? 11 विधानसभा सीटों के बारे में हम पहले ही आपको बता चुके हैं. तो देखते हैं 2022 में होने वाले प्रदेश विधानसभा चुनाव की दृष्टि से.

अगर 2022 तक 2019 के लोकसभा चुनाव का वोटिंग पैटर्न बना रहता है और तीन साल बाद भी सपा और बसपा अलग-अलग राहें पकड़े रहते हैं, तो मायावती की स्थिति अच्छी नहीं है. इंडिया टुडे की डाटा इंटेलिजेंस यूनिट ने चुनाव के आंकड़ों के साथ थोड़ा काम किया है. कई तरीकों और कई पैमानों पर देखने की कोशिश की है. और परिणाम क्या निकलता है? परिणाम ये निकलता है कि अगर आगामी विधानसभा चुनाव मायावती बगैर गठबंधन के लड़ती हैं तो बसपा यूपी की 403 विधानसभा सीटों में से सिर्फ 4 सीटें ही जीत पाएंगी.

आंकड़ों का खेल है, कैसे समझें?

हमारे पास दो आंकड़े हैं. 2019 के लोकसभा चुनाव के आंकड़े, और 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव के आंकड़े. साथ ही हम यूपी ही हरेक लोकसभा को विधानसभाओं में बांटकर देखेंगे. ऐसा करना आसान भी है क्योंकि एक लोकसभा में अमूमन 4 से 6 विधानसभाएं होती हैं. और लोकसभा सीटों में शामिल विधानसभाओं का रुझान-परिणाम देखें तो बसपा को गठबंधन से अच्छा फायदा मिला है.

हालिया लोकसभा चुनाव में बसपा को प्रदेश की 65 विधानसभा सीटों पर सबसे ज्यादा वोट मिले हैं. जबकि सपा को यूपी की 40 विधानसभा सीटों पर सबसे ज्यादा वोट मिले हैं. इसके अलावा महागठबंधन के एक और घटक दल राष्ट्रीय लोकदल को महज़ 4 विधानसभा सीटों पर सबसे ज्यादा वोट मिले हैं.

आंकड़े हैं, नीला दिखा रहा कि बसपा को कहां बढ़त, लाल सपा को और नारंगी रंग दिखा रहा भाजपा को.
आंकड़े हैं, नीला दिखा रहा कि बसपा को कहां बढ़त, लाल सपा को और नारंगी रंग दिखा रहा भाजपा को.

ध्यान रहे कि किसी विधानसभा में सबसे ज्यादा वोट मिलने का मतलब ये नहीं कि वो लोकसभा सीट भी सपा, बसपा या रालोद ने जीती हो. कुछ तो सीटें जीती हैं, अब चूंकि लोकसभा कई विधानसभा सीटों से मिलकर बनती है, जैसा हमने पहले बताया है, तो अन्य विधानसभाओं पर भाजपा हावी होगी, इस वजह से ये सारी लोकसभा सीटें महागठबंधन के खाते में नहीं आ पायीं.

2017 के मुकाबिले देखें. उस साल हुए विधानसभा चुनाव में बसपा 19 सीटों पर ही बढ़त में थी, जो नए आंकड़ों के मुताबिक़ 65 विधानसभा सीट तक पहुंच गयी है. जबकि सपा को नुकसान हुआ है. 2017 में सपा 47 सीटों पर बढ़त में थी, अब आ गयी है 40 पर. यानी गठबंधन होने से बसपा को साफ़ फायदा हुआ, और सपा को साफ़ नुकसान हुआ.

अब बसपा को नुकसान कैसे है?

जिन सीटों पर बसपा को बढ़त है, उन सीटों पर दूसरे स्थान पर, ज़ाहिर है, भाजपा है. अब इन सीटों पर 2019 के आंकड़ों में से सपा को मिले 2017 के वोट घटा दें तो बसपा साफ़-साफ़ ये सीट हार जा रही है. वह भी सिर्फ चार सीटों को छोड़ दें.

गठबंधन बसपा की मजबूरी हो गयी है.
गठबंधन बसपा की मजबूरी हो गयी है.

सहारनपुर विधानसभा, फूलपुर पवई विधानसभा, पुरकाज़ी विधानसभा और अमरोहा विधानसभा. बसपा बस इन चार सीटों पर जीतती हुई दिख रही है. और जीत भी ऐसी कि जीत का अंतर बहुत बड़ा नहीं. जीत का अंतर महज़ 2 से 4 प्रतिशत का है. दूसरे स्थान पर आ रही है भाजपा. वोटिंग का पैटर्न थोड़ा भी बदलेगा तो बसपा की ये चार सीटें भी फंस सकती हैं.

और फिर सपा का क्या होगा?

बहुत अच्छी स्थिति तो सपा की भी नहीं होगी. 2017 के मुकाबिले तो अभी ही 7 विधानसभा सीटों का नुकसान दिख रहा है. अब इन 40 सीटों की बढ़त में से 2017 में बसपा के मिले वोट शेयर को काट दें तो सपा सिर्फ आठ सीटें जीत रही है.

अखिलेश भी अब अकेले ही लड़ेंगे.
अखिलेश भी अब अकेले ही लड़ेंगे.

यानी 2017 के मुकाबिले 2019 में सपा नुकसान तो झेल ही रही है. और चुनाव का गणित सही बैठा तो सपा रहा-सहा प्रोजेक्शन भी खो देगी और सिमट जाएगी महज़ आठ सीटों पर.

फायदा किसको होगा? ये भी कोई पूछने की बात है?

ज़ाहिर है कि भाजपा को. सपा और बसपा 2022 का चुनाव अलग-अलग लड़ती हैं तो एक दूसरे को मिलने वाला फायदा गायब हो जाएगा. और गायब क्या? नुकसान ही पहुंचेगा. दोनों एक दूसरे का वोट काटेंगे, जिसकी बात पत्रकार और राजनीतिक जानकार करते रहते हैं. और भाजपा 2017 के मुकाबिले लगभग 31 सीटों पर बढ़त बना रही है.

और बागी-दलबदलू कहां जाएंगे?

सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी, अपना दल और निषाद पार्टी जैसे छोटे दल, जो हमेशा गठबंधन में रहकर जीत दर्ज करते हैं, अक्सर इधर से उधर करते रहते हैं. कभी सपा के साथ तो कभी भाजपा के साथ. फिर भाजपा से अलग होकर फिर किसी के साथ, नहीं तो अलग. सुभासपा इसका सबसे क्लासिक उदाहरण है. 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के साथ थी, लेकिन अब अलग है. चुनाव होंगे और भाजपा के साथ नहीं जाती है तो सपा-बसपा के ही वोट काटेगी, तब भी सीट भाजपा के खाते में जाने का पूरे आसार हैं.


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