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खराब फैक्स से आगे की कहानी: राज्यपाल ने बताया, कैसे BJP की मनमानी नहीं होने दी

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राज्यपाल माने क्या? केंद्र सरकार का आदमी! वो संवैधानिक पद, जो बस केंद्र का हुक्म बजाता है. आमतौर पर राज्यपाल की छवि ऐसी ही बन गई है. इस लिहाज से देखें, तो जम्मू-कश्मीर के गवर्नर सत्यपाल मलिक ने क्रांति कर दी है. मध्य प्रदेश के ग्वालियर में एक प्रोग्राम था. वहां सत्यपाल मलिक ने बताया कि उन्होंने जम्मू-कश्मीर विधानसभा को भंग क्यों किया.

उन्होंने जो कहा, उससे मोदी सरकार की भयंकर किरकिरी हुई है. न केवल केंद्र के स्तर पर, बल्कि पार्टी के स्तर पर भी. सत्यपाल मलिक ने बस केंद्र की ओर से अपने पक्ष में बेजा प्रेशर बनाने की तरफ इशारा नहीं किया. बल्कि बीजेपी जिस सज्जाद लोन को समर्थन देकर सरकार बनवा रही थी, उनके ऊपर विधायकों की खरीद-फरोख्त करके सरकार बनाने का जुगाड़ करने की भी बात कही. बोले-

अब मैं चीजों को ठीक करने के लिहाज से बता रहा हूं. कश्मीर में चार दिन पहले जो हुआ है, चूंकि उसकी सबसे ज्यादा जानकारी मेरे पास है, वो मैं बता रहा हूं. मैं दिल्ली में था. (21 नवंबर को) चार बजे कश्मीर पहुंचा. मेरे पास जो इंटेलिजेंस के लोग हैं, वो सब मेरे पास लेकर आए कि ये स्थिति है. दिल्ली से मैंने किसी से पूछने की जरूरत इसलिए नहीं समझी कि दो दिन पहले ही मैं सबसे मिला था. और अगर मैं पूछता, तो हो सकता था कि वो मुझसे कह देते कि सज्जाद लोन की शपथ करा दो.

सज्जाद लोन तो कह रहे थे कि अगर मुझे छह दिन दे दो, तो मैं मैजॉरिटी कर दूंगा. तो ये मेरा काम है क्या कि मैं आपकी शपथ कराऊं और आपसे कहूं कि आप MLA तोड़ो? मैंने बिना दिल्ली से पूछे, बिना दिल्ली से मशविरा लिए, बिना दिल्ली से कोई आदेश लिए, चूंकि आदेश लेने में बड़ा खतरा था कि फिर मुझे दूसरे की सरकार… मैंने दोनों से कश्मीर की जनता का पिंड छुड़ा दिया. 

कुल मिलाकर सत्यपाल मलिक का ये भाषण आपको सुनना ही चाहिए. काफी दिलचस्प है ये स्पीच.

राज्यपाल होकर आप इससे साफ क्या ही बोलेंगे?
सत्यपाल मलिक के शब्दों को छीलिए, तो मतलब साफ है. जून महीने में जम्मू-कश्मीर के अंदर पीडीपी-बीजेपी का गठबंधन टूट गया. सरकार गिर गई. पिछले पांच महीनों से वहां गवर्नर रूल था. 21 नवंबर को खबर आई कि पीडीपी, नैशनल कॉन्फ्रेंस और कांग्रेस के बीच गठबंधन सरकार बनाने की सहमति बन गई है. इसके पीछे एक और खबर आई. कि पीपल्स कॉन्फ्रेंस के सज्जाद लोन को बीजेपी समर्थन दे रही है. वही बीजेपी, जो केंद्र की सत्ता में है. सत्यपाल मलिक के मुताबिक, तो उन्होंने बीच का रास्ता निकाला. न पीडीपी गठबंधन को सरकार बनाने का मौका दिया, न लोन-बीजेपी को. फटाफट विधानसभा ही भंग कर दी. मलिक के कहे का मतलब है कि वो उस समय की स्थितियों में सज्जाद लोन को सरकार बनाने का न्योता देना गलत होता. मगर उन पर ये गलत काम करने का दबाव आ सकता था, जाहिर है कि किसकी तरफ से. खैर उन्होंने कश्मीर के संविधान का भी जिक्र किया. कि वहां राज्यपाल अगर विधानसभा भंग करना चाहे, तो उसे किसी से परमिशन लेने की जरूरत नहीं. सत्यपाल मलिक ने ये बात ऐसे कही मानो इस प्रावधान पर राहत जता रहे हों. उनके शब्द थे-

हमलोग कई बार कहते हैं कि कश्मीर का अलग संविधान क्यों है. वो अलग संविधान नहीं होता, तो मुझे राष्ट्रपति से (विधानसभा भंग करने के लिए) पूछना पड़ता. मुझे संसद में भेजना पड़ता पास कराने के लिए. कश्मीर के संविधान में लिखा है कि गवर्नर को किसी से पूछने की जरूरत नहीं. वो असेंबली को बर्खास्त कर सकता है. 

राज्यपाल का बयान ब्रेकिंग न्यूज बना, तो राजभवन ने सफाई दी
27 नवंबर को सत्यपाल मलिक की कही ये बात ब्रेकिंग न्यूज बनने लगी. सब जगह खबरें चलने लगीं कि सत्यपाल मलिक ने कैसे केंद्र सरकार की पोल खोली है. शायद इससे बीजेपी में भी हंगामा मचा हो. शाम होते-होते जम्मू-कश्मीर राजभवन ने बयान जारी कर दिया. सफाई देते हुए कहा कि राज्यपाल पर कोई प्रेशर नहीं था. न ही केंद्र ने इस पूरे मामले में कोई दखलंदाजी की. बल्कि राज्यपाल ने जो भी फैसला लिया, वो निष्पक्ष होकर लिया. ये सफाई सच में सफाई है कि मजबूरी, हम नहीं जानते. मगर सत्यपाल मलिक ने ग्वालियर वाले प्रोग्राम में अपने मुंह से जो भी बोला, वो बात भूली तो नहीं जा सकती.

उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती की देशभक्ति पर भी बोले
इस प्रोग्राम में सत्यपाल मलिक पूरे फॉर्म में थे. उन्होंने पॉलिटिकली करेक्ट होने की मजबूरी भी नहीं दिखाई. बीजेपी ने कहा था कि पीडीपी और नैशनल कॉन्फ्रेंस ने पाकिस्तान के इशारों पर गठबंधन करने का मन बनाया है. प्रोग्राम में सत्यपाल मलिक से इस बयान पर बात की. उन्होंने कहा कि वो फार्रुख अब्दुल्ला और उनके बेटे उमर अब्दुल्ला पर पाकिस्तान का हुक्म बजाने का इल्जाम नहीं लगा सकते. क्योंकि वो शेख अब्दुल्ला के परिवार से हैं. वही शेख अब्दुल्ला, जिन्होंने पाकिस्तान को नहीं, बल्कि हिंदुस्तान को चुना था. उन्होंने महबूबा मुफ्ती में भी भरोसा जताया. कहा-

मुफ्ती मुहम्मद सईद हिंदुस्तानी थे. कोई भी शख्स उनकी देशभक्ति पर शक नहीं कर सकता. न ही कोई इंसान उनकी बेटी महबूबा मुफ्ती की देशभक्ति पर शक करता है.

सत्यपाल मलिक ने साफ कहा. कि दोनों में से किसी भी पक्ष के पास सरकार बनाने लायक नंबर नहीं थे. विधायकों को तोड़ने, उन्हें खरीदने की कोशिश हो रही थी. एक भी पक्ष को सरकार बनाने का न्योता देने का मतलब था पूरे कश्मीर को डिस्टर्ब करना (फोटो: ITMI यूनिवर्सिटी, यूट्यूब)
सत्यपाल मलिक ने साफ कहा. कि दोनों में से किसी भी पक्ष के पास सरकार बनाने लायक नंबर नहीं थे. विधायकों को तोड़ने, उन्हें खरीदने की कोशिश हो रही थी. एक भी पक्ष को सरकार बनाने का न्योता देने का मतलब था पूरे कश्मीर को डिस्टर्ब करना (फोटो: ITMI यूनिवर्सिटी ग्वालियर, यूट्यूब)

सत्यपाल मलिक ने जो कहा, उसकी अहमियत क्या है?
ये परंपरा आज की नहीं है. किसी को गवर्नर बनाना पूरी तरह से केंद्र सरकार की मर्जी होती है. अपनी पसंद के लोगों को राज्यपाल के पद पर नियुक्त किया जाता है. ताकि जरूरत पड़ने पर वो मनमुताबिक फैसला ले सकें. कई बार ऐसा भी होता है कि पार्टी से जुड़े पुराने लोगों-वफादारों को उनके किए ‘अच्छे’ कामों का इनाम देने के लिए राज्यपाल बना देते हैं. जैसे बताशे बंट रहे हों. इन्हीं सब वजहों से राज्यपाल बस केंद्र का ‘आदमी’ बनकर रह जाता है. ऐसे में सत्यपाल मलिक का ये बयान काफी चौंकाने वाला है. न केवल ये बात कि उन्होंने केंद्र के इशारों पर चलना नामंजूर किया, बल्कि पब्लिक फोरम में ये बात भी बताई. ऐसा नहीं कि केंद्र और गवर्नर के बीच के इक्वेशन को लेकर किसी को कोई गलतफहमी हो. मगर चीजों का परदे के पीछे होना एक बात है और परदा उठ जाना एक बात. सत्यपाल मलिक ने परदा तो बेशक उठाया है.


राजीव गांधी ने सरकार गिराई और जम्मू-कश्मीर में 1987 के चुनाव में जमकर धांधली हुई

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Jammu-Kashmir: Satya Pal Malik said taking advice from the Center would have led to Sajad Lone forming government

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