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नरेंद्र मोदी का ये ड्रीम प्रोजेक्ट बिकने की कगार पर पहुंच गया है

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दिसंबर, 2017 में गुजरात विधानसभा के चुनाव होने वाले थे. दो चरणों में. नरेंद्र मोदी चुनाव प्रचार में जुटे थे, ताबड़तोड़ दौरे कर रहे थे. 22 अक्टूबर, 2017 को मोदी भावनगर के घोघा पहुंचे थे. जनसभा में बोले,

एक नए भविष्य का दरवाजा खुल रहा है. इससे कोस्टल शिपिंग का नया अध्याय शुरू होने वाला है.

नरेंद्र मोदी किस भविष्य का दरवाजा खोल रहे थे? वो दरवाजा था, घोघा से भरूच के दहेज के बीच चलने वाली रो-रो (Ro-Ro) फेरी सर्विस का. Ro-Ro का फुल फॉर्म है Roll on-Roll off. इसका शाब्दिक अर्थ होता है, किसी सामान को लादना और उतारना.

घोघा और दहेज के बीच का सफर 8 घंटे से घटकर 1 घंटे का हो गया था.
घोघा और दहेज के बीच का सफर 8 घंटे से घटकर 1 घंटे का हो गया था.

ये रो-रो फेरी सर्विस घोघा से दहेज के बीच सफर की दूरी को कम करने वाली थी. सड़क के रास्ते से ये दूरी 360 किलोमीटर है. नॉर्मल स्पीड से 8-10 घंटे का सफर. अगर इसी सफर को समुद्र के रास्ते से तय किया जाए तो दूरी होगी 31 किलोमीटर. 1 घंटे का सफर. 8-9 घंटे की बचत.

उद्घाटन से एक दिन पहले नरेंद्र मोदी ने ट्वीट किया था,

घोघा-दहेज फेरी सर्विस गुजरात में कनेक्टिविटी और इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत बनाएगी.

इस तारीख से पांच साल पीछे लौटते हैं. 25 जनवरी 2012. इस प्रोजेक्ट के लिए आधारशिला रखी जा रही थी. नरेंद्र मोदी उस वक्त गुजरात के मुख्यमंत्री हुआ करते थे. इस प्रोजेक्ट को 15 महीने के भीतर पूरा किया जाना था. लेकिन समय पर ये प्रोजेक्ट पूरा नहीं हो पाया. मोदी 2014 में देश के प्रधानमंत्री बने. गुजरात से दिल्ली आ गए. लेकिन इस प्रोजेक्ट में उनका दिल लगा रहा. जब इस प्रोजेक्ट का उद्घाटन हुआ तो मोदी वहां मौजूद थे.

सर्विस सस्पेंड

लेकिन अब हालात बदल चुके हैं. भविष्य का वो दरवाजा बंद होने की कगार पर पहुंच गया है जिसे पीएम मोदी ने शुरू किया था. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, आइलैंड जेड और वॉयज सिम्फनी वो दो जहाज़ें हैं जो घोघा और दहेज के बीच चल रही थीं. इनकी सर्विस सितंबर, 2019 से बंद है.

रो-रो फेरी सर्विस चलाने वाली कंपनी इंडिगो सीवेज की वेबसाइट पर लिखा है.

दहेज में पानी की पर्याप्त गहराई न होने की वजह से, फेरी सर्विस 7 दिसंबर, 2019 तक बंद रहेंगी. 

बिक्री का इश्तेहार

इंडिगो सीवेज के मुखिया चेतन कॉन्ट्रैक्टर कहते हैं,

अब ये सर्विस चलाने का कोई तुक नहीं है. हम अपने नुकसान का आंकलन कर रहे हैं. किसी भी वक्त हम दीवालिया हो सकते हैं. हम एक महीने के अंदर आइलैंड जेड को बेच देंगे.

आइलैंड जेड की बिक्री का इश्तेहार चस्पा कर दिया गया है. वजह ये है कि इस जहाज को सवारी नहीं मिल रही है. रोरो सर्विस शुरू हुए दो साल से ऊपर हो चुके हैं. फिर भी सरकार पोर्ट तक पहुंचने के लिए लोगों को साधन उपलब्ध नहीं करवा सकी है. लोग अपनी गाड़ी से पोर्ट तक पहुंचते हैं. लेकिन आइलैंड जेड पर अपनी गाड़ियां नहीं ढो सकते हैं. इस वजह से उन्हें वॉयज सिम्फनी पर सफर करना पड़ता है. ऐसे में आइलैंड जेड काफी टाइम से ठप पड़ा हुआ है.

पहला फेज

आइलैंड जेड ही वो जहाज़ है जिसपर चढ़कर प्रधानमंत्री मोदी ने घोघा-दहेज फेरी सर्विस की शुरूआत की थी. इसको सिंगापुर से मंगाया गया था. इसमें सिर्फ मुसाफिरों को लाने-ले जाने की व्यवस्था थी. ये इस रो-रो सर्विस का पहला चरण था.

पहले फेज में आइलैंड जेड नामक जलयान को चलाया गया था. इसपर सिर्फ मुसाफिरों को लाने-ले जाने की व्यवस्था थी. फोटो : (ट्विटर)
पहले फेज में आइलैंड जेड नामक जलयान को चलाया गया था. इसपर सिर्फ मुसाफिरों को लाने-ले जाने की व्यवस्था थी. फोटो : (ट्विटर)

वॉयज सिम्फनी का परिचालन भी दो महीने से बंद है. ये घोघा पोर्ट पर खड़ा है. कहा जा रहा है कि इस जहाज को चलाने के लिए पानी में जितनी गहराई चाहिए, उतनी उपलब्ध नहीं है. इतनी गहराई के लिए समंदर से लगातार गाद हटाने की ज़रूरत होती है, जो नहीं हो रही है. ये जिम्मेदारी गुजरात मेरीटाइम बोर्ड की है. मेरीटाइम बोर्ड ने गाद हटाने के लिए अडानी पोर्ट एंड स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन लिमिटेड (APCEZ) को काम सौंपा है. इसके लिए सालाना बजट 20 करोड़ रुपये है. अभी तक 49 करोड़ की राशि खर्च हो चुकी है, लेकिन काम होता दिख नहीं रहा है.

गुजरात मेरीटाइम बोर्ड के वाइस-चेयरमैन और चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर मुकेश कुमार बताते हैं,

फेरी का टर्निंग सर्कल सबसे बड़ी चुनौती है क्योंकि सिल्ट (गाद) लगातार जमा हो रहा है.  

इन जलयानों के रख-रखाव में हर महीने 18 लाख रुपये का खर्च आ रहा है. लेकिन कमाई नहीं हो रही है.

दूसरा फेज

2017 में रो-रो फेरी सर्विस के पहले फेज में इंसानों को लाने-ले जाने की सर्विस शुरू हुई. दूसरे फेज में गाड़ियों को ढोने की व्यवस्था होनी थी. ये शुरू हुआ 27 अक्टूबर, 2018 को. दूसरे फेज की शुरुआत मुख्यमंत्री विजय रूपाणी ने की.

दूसरे फेज में वॉयज सिम्फनी की शुरुआत की गई. इसमें गाड़ियों को ढोने की व्यवस्था थी. साभार : ट्विटर
दूसरे फेज में वॉयज सिम्फनी की शुरुआत की गई. इसमें गाड़ियों को ढोने की व्यवस्था थी. (साभार : ट्विटर)

गाड़ियों की ढुलाई के लिए मंगाया गया वॉयज सिम्फनी. ये कोरिया में बना है. इसकी लंबाई लगभग 110 मीटर है. वॉयज सिम्फनी में सफर करने के लिये एक ट्रक और बस का किराया 4500 रुपए है, जबकि 800 रुपये कार के लिये और 150 रुपये दो पहिया वाहनों के लिये तय किया गया. वहीं, पैसेंजर के लिए सीट की क्लास के अनुसार किराया 200 और 400 रुपए रखा गया.

दूसरे फेज की शुरुआत के दो महीने बाद. दिसंबर, 2018 में इंडिगो सी वेज ने सीएम ऑफिस और पीएम ऑफिस को एक चिट्ठी लिखी. चिट्ठी में जिक्र था कि वॉयज सिम्फनी को चलाने के लिए लगातार ड्रेजिंग (गाद निकालने) की जरूरत है. पानी की गहराई कम से कम 5 मीटर होनी चाहिए. लेकिन वहां पर 2.5-3 मीटर की गहराई ही उपलब्ध थी. नवंबर में कम पानी में जहाज चलाने की वजह से जहाज़ का एक पुर्ज़ा टूट गया था. इसे ठीक कराने में 1.5 करोड़ का खर्चा आया था. 21 दिन तक रो-रो सर्विस बंद रखनी पड़ी थी.

प्रधानमंत्री मोदी का ये ड्रीम प्रोजेक्ट अब बंद होने की कगार पर पहुंच चुका है. रो-रो फेरी सर्विस का एक अहम हिस्सा बिकने के लिए तैयार है. दूसरा हिस्सा लंबे समय से बंद पड़ा है. देखना दिलचस्प होगा कि सरकार इस सर्विस को फिर से ज़िंदा करने की कोशिश करती है या नहीं!


वीडियो : मोदी सरकार सार्वजनिक कंपनियों में विनिवेश से कितना पैसा बना पाएगी?

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