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'हिंदी द्रविड़ हुई तो बोरिंग होगी, सहवाग हुई तो सेंचुरी से चूकेगी, उसे तेंदुलकर होना होगा'

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14 सितंबर यानी हिंदी दिवस. इस मौके पर तमाम सरकारी-प्राइवेट संस्थानों में कार्यक्रम रखे जाते हैं. हिंदी पखवाड़ा मनाया जाता है. 2 साल पहले 14 सितंबर 2016 को दी लल्लनटॉप ने हिंदी दिवस के बारे में अपनी बात रखने और आपकी बात सुनने के लिए एक फेसबुक लाइव वीडियो किया था. इस पर आप लोगों ने दिल खोलकर अपनी राय रखी थी. देखिए ये वीडियो, फिर हम आगे की बात करेंगे.

हम हिंदी की खाते हैं. पर दिवस क्यों नहीं मना रहे??

Posted by The Lallantop on Wednesday, September 14, 2016

हर साल की तरह उस साल भी हिंदी दिवस मनाया गया. रोंधू लोगों ने अंग्रेज़ी को जी भरके गालियां दीं और कई साउथ इंडियंस ट्विटर पर अपनी भाषाओं को ऑफीशियल घोषित करने की मांग करते रहे. लेकिन हिंदी की खाने वाले दी लल्लनटॉप ने हिंदी दिवस नहीं मनाया. आप पूछेंगे क्यों. तो दोस्त जवाब ये है कि हम साल 365 दिन हिंदी दिवस मनाते हैं. इस जश्न के लिए हमें 14 सितंबर या किसी एक तारीख की ज़रूरत नहीं है. इस बारे में बात करने के लिए हमने जो वीडियो बनाया, उस पर लोगों ने खूब रिऐक्शन दिए.

शुभम दुबे लिखते हैं, ‘बड़ा गर्व होता है कोई ऐसा पेज चला रहा है, जो खासतौर पर हिंदी और देसी भाषा को इतना बढ़ावा दे रहा है.’ शुभम ने तो हमसे ये डिमांड की कि हम रोज़ आधे घंटे का लाइव वीडियो करें.

रजत लिखते हैं कि सारी भाषाएं सम्मानीय होती हैं. नितिन कहते हैं कि हिंदी और इंग्लिश में कोई कॉम्पिटीशन नहीं है. वीरेंद्र ऐसा मानते हैं कि हिंदी पढ़कर कोई अच्छी नौकरी नहीं मिलती है. वहीं सरकारी नौकरी कर रहीं राजिंदर बताती हैं कि हिंदी दिवस के नाम पर हर साल सिर्फ पैसा बर्बाद किया जाता है. योगेश्वर सुझाव देते हैं कि हिंदी दिवस मनाने के बजाय हिंदी के शब्दों का सही इस्तेमाल किया जाए, तो ज़्यादा अच्छा रहेगा.

गौरव नाम के एक व्यूअर बड़ी मज़ेदार बात लिखते हैं, ‘हिंदी सिर्फ राहुल द्रविड़ होगी, तो बोरिंग हो जाएगी और सिर्फ वीरेंद्र सहवाग होगी, तो सेंचुरी से चूक जाएगी. उसे तेंदुलकर और कोहली होना पड़ेगा.’

एक व्यूअर सौरभ कहते हैं कि हमें भाषा को लेकर सेक्युलर होना चाहिए. रजत महिलाओं को सुझाव देते हैं कि वो सब्ज़ीवालों से अंग्रेज़ी में बात न किया करें. बेंगलुरु में रह रहे लखनऊ के पीयूष अपनी परेशानी बताते हैं कि बेंगलुरु में रिक्वेस्ट करने पर भी कोई उनसे हिंदी में बात नहीं करता. नितिन मानते हैं कि हिंदी को मज़बूत करने के लिए अवधी और भोजपुरी को ताकतवर बनाना होगा.

विकास का मानना है कि ऑफिस संबंधी मेल इंग्लिश के बजाय हिंदी में लिखने चाहिए. रजनीश हिंदी को राजभाषा बनाने की मांग को नाटक बताते हैं. उनके मुताबिक शासकों की भाषा खत्म हो  जाती है, लेकिन शासितों की नहीं.

सीमा हिंदी दिवस को महिला दिवस जैसा मामला बताती हैं.

ये तो हुई हमारे व्यूअर्स की बातें. अब ये भी जान लीजिए कि हिंदी दिवस के बारे में लल्लनटॉप का क्या मानना है. दी लल्लनटॉप हिंदी की वजह से है. लेकिन, हम सरकारी हिंदी में यकीन नहीं रखते हैं. हम उस हिंदी में यकीन नहीं रखते, जो बड़ी मुश्किल से सरकारी फाइलों में लिखी जाती है और फिर उसकी खिल्ली उड़ाई जाती है. हम उस हिंदी में यकीन नहीं रखते, जिसे कुछ लोग दूसरी भाषाओं से बेहतर और ताकतवर कहते हैं.

हम उस हिंदी में यकीन रखते हैं, जो दूसरी भाषाओं के घर जाती है और उन्हें अपने घर बुलाती है. हम उस हिंदी में यकीन रखते हैं, जो हमारी ज़ुबान से और आपके दिल से निकलती है.

वो हिंदी, जो सिनेमा हॉल में गूंजती है. वो हिंदी, जो किसी गांव में खाट पर लेटे दादाजी बोलते हैं. वो हिंदी, जो हममें घुल चुकी है. और इस हिंदी को किसी और से नहीं, बल्कि ‘हिंदीवालों’ से ही बचाने की ज़रूरत है.

हिंदी दिवस को लेकर आपके क्या ख्याल हैं, हमें कॉमेंट बॉक्स में ज़रूर बताइएगा. :)

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