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CBI के डायरेक्टर पद से एक बार फिर क्यों हटाए गए आलोक वर्मा?

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CBI के मुखिया आलोक वर्मा को एक बार फिर से उनके पद से हटा दिया गया है. उन्हें फायर सर्विस का डायरेक्टर जनरल बनाया गया है. आलोक वर्मा साल 1979 बैच के एजीएमयूटी कैडर के अधिकारी हैं. उन्हें हटाने का फैसला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली सलेक्ट कमिटी ने किया है. एक बार फिर से CBI के अंतरिम निदेशक बनाए गए हैं एम नागेश्वर राव. इस कमिटी में पीएम मोदी के अलावा सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अर्जन कुमार सीकरी और लोकसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे शामिल थे. पीएम मोदी और जस्टिस एके सीकरी ने आलोक वर्मा को पद से हटाने की सिफारिश की, जबकि कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खडगे आलोक वर्मा को CBI मुखिया के पद से हटाने के लिए राजी नहीं थे. ये बैठक 10 जनवरी की शाम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के घर पर हुई और करीब दो घंटे तक चली. इस फैसले के सामने आने से ठीक पहले आलोक वर्मा ने CBI में कई बड़े तबादले किए थे. इसके अलावा आलोक वर्मा ने CBI के स्पेशल डायरेक्टर राकेश अस्थाना के भ्रष्टाचार वाले मामले की जांच CBI के एसपी मोहित गुप्ता को सौंप दी थी.

8 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने किया था बहाल

आजादी के बाद सुप्रीम कोर्ट के सामने जितने केस आए, उनमें से सबसे अहम मामलों में गिनती होती है केशवानंद भारती बनाम केरल सरकार केस की.
सुप्रीम कोर्ट ने आलोक वर्मा को पद पर बहाल कर दिया था.

सीबीआई में नंबर एक और नंबर दो. यानि कि सीबीआई मुखिया आलोक वर्मा और दूसरे नंबर पर रहे राकेश अस्थाना के बीच विवाद सामने आया था. दोनों ने ही एक दूसरे पर घूस लेने के आरोप लगाए थे. इसके बाद 23 अक्टूबर, 2018 की आधी रात को केंद्र सरकार ने आलोक वर्मा और राकेश अस्थाना दोनों को ही छुट्टी पर भेज दिया था. एम नागेश्वर राव को सरकार की ओर से अंतरिम डायरेक्टर बना दिया गया. छुट्टी पर भेजे जाने के खिलाफ आलोक वर्मा सुप्रीम कोर्ट चले गए थे. 8 जनवरी, 2019 को सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस एसके कौल और जस्टिस केएम जोसेफ ने फैसला दिया कि आलोक वर्मा को छुट्टी पर भेजा जाना गलत है. सुप्रीम कोर्ट ने तुरंत ही आलोक वर्मा को सीबीआई डायरेक्टर काम देखने का आदेश दे दिया. इस फैसले को देते वक्त सुप्रीम कोर्ट ने दो बड़ी बातें कही थीं-

1. बेंच ने कहा कि सरकार को सिलेक्शन कमिटी के पास ये मामला भेजना चाहिए था. CBI का डायरेक्टर कोलेजियम सिस्टम से चुना जाता है. प्रधानमंत्री, सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस और नेता प्रतिपक्ष मिलकर उम्मीदवार के नाम पर मुहर लगाते हैं. हटाने का भी यही सिस्टम है. अदालत ने कहा कि सरकार को प्रक्रिया के मुताबिक चलकर ही काम करना चाहिए था.

2. इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट ने ये भी कहा कि एक उच्च-स्तरीय कमिटी इस मामले को शुरू से सुने और एक हफ्ते में रिपोर्ट दे. वो देखे कि वर्मा के खिलाफ क्या कोई कार्रवाई होनी चाहिए. इस कमिटी में PM के अलावा चीफ जस्टिस और नेता प्रतिपक्ष होंगे.

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद हुई सिलेक्शन कमिटी की बैठक

आलोक वर्मा को पद से हटाने वाली सेलेक्शन कमिटी में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एके सीकरी, पीएम नरेंद्र मोदी और लोकसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे शामिल थे.
आलोक वर्मा को पद से हटाने वाली सेलेक्शन कमिटी में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एके सीकरी, पीएम नरेंद्र मोदी और लोकसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे शामिल थे.

8 जनवरी, 2019 को सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद 9 जनवरी, 2019 को सिलेक्शन कमिटी की बैठक हुई. लेकिन इस बैठक में कोई फैसला नहीं हो सका. 10 जनवरी को एक बार फिर से बैठक हुई और फिर सिलेक्शन कमिटी ने 2-1 के मत से आलोक वर्मा को हटाने का फैसला कर लिया.

9 जनवरी को ही आलोक वर्मा ने किए थे कई तबादले

आलोक वर्मा (बाएं) और राकेश अस्थाना में लंबे समय से विवाद चल रहा है.

23 अक्टूबर, 2018 की आधी रात को आलोक वर्मा को हटाकर एम नागेश्वर राव को सीबीआई का अंतरिम डायरेक्टर बनाया गया. हाथ में सीबीआई की कमान आने के बाद एम नागेश्वर राव ने कई तबादले किए थे. 8 जनवरी, 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने आलोक वर्मा को पद पर बहाल कर दिया. 9 जनवरी को आलोक वर्मा ने फिर से कई तबादले किए. सीबीआई सूत्रों के मुताबिक आलोक वर्मा ने जॉइंट डायरेक्टर अजय भटनागर, डीआईजी एमके सिन्हा, डीआईजी तरुण गाबा, जॉइंट डायरेक्टर मुरुगेसन और असिस्टेंट डायरेक्टर एके शर्मा का ट्रांसफर कर दिया है. इन सभी की नियुक्ति एम नागेश्वर राव ने की थी. उनकी की गई सारी नियुक्तियों को आलोक वर्मा ने खारिज कर दिया. उनके इस फैसले के खिलाफ सीबीआई के डीएसपी देवेंद्र कुमार ने दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है.


 

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