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गैर-हिंदू को असिस्टेंट प्रोफेसर नियुक्त किया तो धरने पर बैठ गए BHU के छात्र

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काशी हिंदू विश्वविद्यालय. आसान भाषा में कहें तो बीएचयू. यहां एक संकाय है संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय. इसकी स्थापना 1918 में हुई थी. इस संकाय में प्राचीन शास्त्रों, संस्कृत साहित्य, ज्योतिष और वेदों की पढ़ाई होती है. 5 नवंबर, 2019 को संकाय में एक असिस्टेंट प्रोफेसर की नियुक्ति हुई. नाम है फिरोज खान. दो दिन बाद यानी 7 नवंबर को कुछ छात्र इस नियुक्ति का विरोध करने लगे. क्यों करने लगे? इसलिए नहीं कि ये नियुक्ति यूजीसी या फिर यूनिवर्सिटी के नियमों की अनदेखी कर की गई है. या फिर सेलेक्शन कमेटी पर किसी धांधली का आरोप है. बल्कि विरोध इस बात का है कि जिस व्यक्ति को असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर नियुक्त किया गया वो गैर-हिंदू है. छात्रों का आरोप है कि एक गैर हिंदू की नियुक्ति महामना मदन मोहन मालवीय के द्वारा स्थापित परंपरा के खिलाफ है.

संकाय की बिल्डिंग पर लगा शिलापट, जिसका हवाला देकर छात्र प्रदर्शन कर रहे हैं.
संकाय की बिल्डिंग पर लगा शिलापट, जिसका हवाला देकर छात्र प्रदर्शन कर रहे हैं.

दीवार पर लिखा है, भवन केवल हिंदुओं के लिए

प्रदर्शन कर रहे छात्र ढोल-मजीरा लेकर कुलपति के आवास के बाहर बैठे हैं. भजन-कीर्तन करते हुए अपना विरोध प्रदर्शित जता रहे हैं. हमने छात्रों से बात की. उनसे पूछा कि आखिर क्यों एक योग्य गैर-हिंदू इस संकाय में अध्यापन नहीं कर सकता? उन्होंने इस विषय में पढ़ाई की है. सेलेक्शन कमेटी ने उनका टेस्ट लिया है. इंटरव्यू किया है और इस पद के लिए उन्हें योग्य पाया है. तो फिर दिक्कत क्या है? प्रदर्शन कर रहे चक्रपाणि ओझा ने बताया,

जबकि परंपरागत संस्कृत में गुरु-शिष्य परंपरा के अंतर्गत पढ़ाई होती है. महामना के विचार के रूप में यहां एक नियम अंकित है. जिसमें लिखा गया है कि इस भवन का निर्माण हिंदू सभ्यता, सनातनी सभ्यता, सिख, जैन, बौद्ध के सांस्कृतिक कथानकों, व्याख्यानों और देश विदेश के नेताओं के सांस्कृतिक आयोजन के लिए किया गया है. ये बात संकाय की इमारत में लगी एक शिलापट पर लिखा है.

चक्रपाणि का कहना है,

संकाय में हिंदू वांग्मय पढ़ाया जाता है. इस पद्धति को केवल हिंदू ही पढ़ा सकता है. कोई अन्य नहीं. ये नियुक्ति महामना के मूल्यों के खिलाफ है. जब महामना के मूल्यों का विरोध होता है तो हम हम विरोध करते हैं. संस्कृत की पढ़ाई इसी बीएचयू में दो जगहों से होती है. आधुनिक संस्कृत और परंपरागत संस्कृत. आधुनिक संस्कृत में बीए, एमए होता है. जो आधुनिक संस्कृत भाषा के विभाग हैं वहां गैर-हिंदू भी पढ़ाते हैं. उनसे हमें कोई दिक्कत नहीं. विरोध इस बात का है कि जो परंपरा है ये उसके विरुद्ध है. चूकिं ये ट्रेडिशनल कोर्स है और ट्रेडिशन के ही विरुद्ध है तो फिर तो ये गलत है.

यूनिवर्सिटी का क्या कहना है?

यूनिवर्सिटी ने एक लेटर जारी कर फिरोज खान की नियुक्ति को पूरी तरह से सही बताया है. इस लेटर में कहा गया है कि चयन समिति की बैठक कुलपति की अध्यक्षता में हुई थी. समिति में विषय विशेषज्ञों के अलावा विजिटर नॉमिनी, संकाय प्रमुख, विभागाध्यक्ष और ओबीसी पर्यवेक्षक भी मौजूद थे. चयन समिति ने पारदर्शी प्रक्रिया अपनाते हुए सर्वसम्मति से सबसे योग्य पाए गए अभ्यर्थी को नियुक्त किया. विश्वविद्यालय ने अपने बयान में ये भी कहा है कि काशी हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना का उद्देश्य ही धर्म, जाति, संप्रदाय, लिंग आदि के भेदभाव से ऊपर उठकर राष्ट्रनिर्माण करना था. जहां सभी को समान रूप से अध्ययन और अध्यापन का अवसर प्रदान किया जाएगा.

यूनिवर्सिटी ने फिरोज खान को पद के लिए पूरी तरह योग्य बताया है.
यूनिवर्सिटी ने फिरोज खान को पद के लिए पूरी तरह योग्य बताया है.

छात्र जिस जगह पर प्रदर्शन कर रहे हैं वहां प्रॉक्टोरियल बोर्ड की एक टीम मौजूद है. साथ में स्थानीय लंका थाना क्षेत्र की पुलिस टीम भी तैनात कर दी गई है. प्रॉक्टोरियल बोर्ड ने कुछ छात्रों को बातचीत के लिए बुलाया है. लेकिन छात्र गैर हिंदू धर्म के प्रोफेसर की नियुक्ति को निरस्त करने की मांग को लेकर धरने पर बैठे हुए हैं.

महामना के मूल्य क्या हैं? 

विरोध कर रहे छात्र यूजीसी के नियमों को नहीं मान रहे हैं. यूनिवर्सिटी के नियमों को नहीं मान रहे. और हवाला दे रहे हैं दीवार पर लगे एक पत्थर का. कह रहे हैं कि पत्थर पर लिखा नियम महामना का बनाया हुआ है. लेकिन न तो इस बात का कोई प्रमाण है और न ही कोई औचित्य. रही बात महामना के मूल्यों की तो विरोध कर रहे छात्रों को एक बार बीएचयू की वेबसाइट पर जाना चाहिए. होम पेज पर ही यूनिवर्सिटी के संस्थापक मदन मोहन मालवीय के ‘मूल्य’ दिखाई देते हैं. जिसमें लिखा है,

भारत केवल हिन्दुओं का देश नहीं है बल्कि यह मुस्लिम, ईसाई और पारसियों का भी देश है. देश तभी विकास और शक्ति प्राप्त कर सकता है जब विभिन्न समुदाय के लोग परस्पर प्रेम और भाईचारे के साथ जीवन व्यतीत करेंगे. यह मेरी इच्छा और प्रार्थना है कि प्रकाश और जीवन का यह केन्द्र (बीएचयू) जो अस्तित्व में आ रहा है वह ऐसे छात्र प्रदान करे जो न केवल अपने बौद्धिक रूप से संसार के दूसरे श्रेष्ठ छात्रों के बराबर होंगे बल्कि एक श्रेष्ठ जीवन व्यतीत करेंगे, अपने देश से प्यार करेंगे और परम पिता के प्रति ईमानदार रहेंगे.

बीएचयू की वेबसाइट के होम पेज पर महामना मदन मोहन मालवीय का संदेश
बीएचयू की वेबसाइट के होम पेज पर महामना मदन मोहन मालवीय का संदेश

देश का संविधान हर नागरिक को समान अधिकार देता है. उन्हें समान अवसर प्रदान करने की आजादी देता है. ऐसे में किसी व्यक्ति की नियुक्ति का केवल इसलिए विरोध करना कि वो किसी खास धर्म का है या नहीं है. निहायत ही बेवकूफी भरा कदम है.


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