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बैड लोन: पिछले 10 साल में जितना बट्टे खाते में गया, उसमें से 80% पिछले 5 साल में गया

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सरकारी बैंकों में गजब खेल चल रहा है! एक तरफ तो बैंक आर्थिक तंगी का हवाला दे रहे हैं और सरकार से पैसा ऐंठ रहे हैं, दूसरी ओर, शातिर कर्जदारों के कर्जे बट्टे खाते में डाल रहे हैं. बट्टे खाते में एनपीए कैटेगरी का वो कर्ज डाला जाता है, जिसकी वसूली संभव नहीं. बीते 10 में बैंकों ने 7,00,000 (सात लाख) करोड़ रुपए का कर्ज बट्टे खाते में डाला है. चालू साल में ही दिसंबर, 2018 तक बैंकों ने 1,56,702 करोड़ रुपए बट्टे खाते में डाले. इंडियन एक्सप्रेस की एक खबर के मुताबिक बट्टे खाते में करीब 80 फीसदी रकम बीते पांच साल के दौरान डाली गई. अप्रैल, 2014 से 5,55,603 करोड़ रुपए का कर्जा बट्टे खाते में डाला गया. ये खुलासा अखबार को मिले रिज़र्व बैंक के आंकड़ों से हुआ है.

किस तरह बढ़ता जा रहा है कर्ज डूबने का सिलसिला?

इंडियन एक्सप्रेस में छपी जॉर्ज मैथ्यू की रिपोर्ट के मुताबिक साल 2016-17 में 1,08,374 करोड़ रुपए. 2017-18 में 1,61,328 करोड़ और 2018-19 के पहले छह महीने के दौरान 82,799 करोड़ रुपए बट्टे खाते में डाले गए. अक्टूबर से दिसंबर 2018 के बीच यानी सिर्फ तीन महीने के दौरान 64,000 करोड़ रुपए बट्टे खाते यानी राइट ऑफ किए गए.

बैंकों का पैसा डूब रहा. सांकेतिक तस्वीर, इंडिया टुडे.
बैंकों का पैसा डूब रहा. सांकेतिक तस्वीर, इंडिया टुडे.

बैंक किसका कर्ज माफ कर रहे?
अखबार ने सूत्रों के हवाले से लिखा है कि बैंक किन कर्जदारों का कितना पैसा बट्टे खाते में डाल रहे हैं, इसका खुलासा नहीं हो पा रहा है. न तो बैंक और न ही रिज़र्व बैंक. इस मसले पर मुंह खोलने को तैयार नहीं हैं. और यही शक की बड़ी वजह बनता जा रहा है. बैंक ये दावे जरूर करते हैं कि वे फंसे हुए कर्ज की वसूली के लिए पूरी कोशिश कर रहे हैं. पर ऐसे कर्ज की वसूली साल में 15-20 फीसदी से ज्यादा नहीं है. इसकी तुलना में बट्टे खाते में डाले जाने वाला लोन बहुत ज्यादा है. इसकी भरपाई न तो लोन की वसूली से हो सकती है और न बैंकों को मिल रही सरकारी मदद से. रिज़र्व बैंक ने हाल में अपने एक सर्कुलर के जरिए कहा था कि,

किसी भी कर्ज को बट्टे खाते में डालने से पहले बैंकों को उस लोन की वसूली के लिए हरसंभव कोशिश करनी चाहिए. ऐसा देखा जा रहा है कि कुछ बैंक कुछ बट्टे खातों को तकनीकी राइट ऑफ कैटेगरी में डाल रहे हैं, इससे वसूली की संभावनाएं कम होती हैं.

यही रिज़र्व बैंक अपने एक दूसरे सर्कुलर में इस पूरी प्रक्रिया को सामान्य बताता है. रिजर्व बैंक के बयान के मुताबिक-

‘एनपीए यानी नॉन परफॉर्मिंग असेट्स को तकनीकी बट्टे खाते में डालना सामान्य है. इसे बैंकों की बैलेंस शीट दुरुस्त करने का तरीका माना जा सकता है. तकनीकी राइट ऑफ किए गए लोन के ब्योरे बैंकों के बही खातों से हटा दिए जाते हैं. इसका मतलब ये नहीं होता कि बैंक अब इस कर्ज की वसूली नहीं करेगा. जब इस लोन की वसूली हो जाती है, तो उसे फिर से प्रॉफिट और लॉस अकाउंट में दर्ज कर लिया जाता है.’

रिजर्व बैंक के एक पूर्व अधिकारी के मुताबिक बैंकों को बकाए को बट्टे खाते में डालने से पहले सौ बार सोचना चाहिए. इसके लिए एक नीति हो, जिसका बैंक पालन करें. लोन की वसूली के लिए पूरे प्रयास किए जाएं. राइट ऑफ किेए जाने वाले लोन की छंटनी जरूरी है.

बट्टे खाते पर बैंकों का बचाव करते रहे हैं वित्तमंत्री अरुण जेटली. फाइल फोटो.
बट्टे खाते पर बैंकों का बचाव करते रहे हैं वित्तमंत्री अरुण जेटली. फाइल फोटो.

भाजपा-कांग्रेस इस मुद्दे पर पहले भी टकराती रही हैं
इससे पहले बड़े पूंजीपतियों का पैसा बट्टा खाते में डालने को लेकर कांग्रेस और भाजपा के बीच आरोप-प्रत्यारोप चलते रहे हैं. अक्टूबर, 2018 में कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने आरोप लगाया था कि – नरेंद्र मोदी सरकार पर कर्ज की अदायगी नहीं करने वाले बैंक डिफाल्टर्स पर ‘कृपा’ कर रही है. इस सरकार ने गत चार वर्षों में तीन लाख करोड़ रुपए से अधिक का कर्ज बट्टे खाते में डाल दिया. सरकारी बैंकों में जमा जनता के पैसे से 3.16 लाख करोड़ रुपए का कर्ज बट्टे खाते में डाल दिया. जबकि 14 फीसदी कर की वसूली हो सकी और डिफाल्टर्स को बचने का अवसर मिला.

दूसरी ओर, वित्तमंत्री अरुण जेटली ने इन आरोपों पर बैंकों का बचाव करते हुए एक फेसबुक पोस्ट में लिखा था कि कर्ज को बट्टा खाते में डालने का मतलब ये नहीं है कि कर्ज की वसूली छोड़ दी गई है. ये बैंकिंग कारोबार में एक सामान्य प्रक्रिया है. इससे बैंकों का बही-खाता साफ-सुथरा होता है. जेटली ने लिखा कि बैंकों की ओर से ‘तकनीकी रूप से कर्ज को राइट ऑफ’ करने की कार्रवाई भारतीय रिजर्व बैंक के दिशानिर्देशों के अनुसार की जाती है. राइट ऑफ करने का मतलब कर्ज माफ करना नहीं होता है. बैंक पूरी तत्परता से कर्ज वसूली का काम करते रहते हैं.’ इससे पहले कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने भी एक रिपोर्ट के आधार पर सरकार को घेरते हुए कहा था कि नोटंबदी से काला धन सफेद हुआ. 3.16 लाख करोड़ रुपए का कर्ज राइट ऑफ हो गया.


वीडियोः सुप्रीम कोर्ट में इलेक्टोरल बॉन्ड पर मोदी सरकार के दिए तर्क गले नहीं उतरे |दी लल्लनटॉप शो| Episode 194

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