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एग्जाम के प्लेटफॉर्म पर भी फर्स्ट डिवीज़न पास हुईं हिमा दास

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हिमा दास. एथलीट. चैंपियन रनर. जिन्होंने इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता में 18वें एशियन गेम्स में गोल्ड मेडल जीता था. साथ ही नेशनल रिकॉर्ड भी बनाया. अब एक और रेस जीत ली है. एग्जाम की रेस. हिमा ने असम हायर सेकेंडरी एजुकेशन काउंसिल यानी असम बोर्ड की 12वीं की परीक्षा में फर्स्ट डिवीज़न हासिल किया है. मैदान के साथ-साथ क्लासरूम में भी चैंपियन बन गई हैं. इस साल कुल 2 लाख 40 हजार स्टूडेंट्स ने असम बोर्ड की 12वीं की परीक्षा दी थी. इसमे से करीब 60 फीसदी स्टूडेंट ही पास हो पाए. 62 फीसदी लड़कियां पास हुईं और 58 फीसदी लड़के. ‘धींग एक्सप्रेस’ के नाम से मशहूर हिमा‘ की कहानी जानने लायक है. पीटीआई को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था-

मैं 2019 में बड़े टूर्नामेंट्स के साथ-साथ ट्रेनिंग और परीक्षा पर भी ध्यान दे रही हूं.

हिमा ने ध्यान दिया और खुद को साबित कर दिया. ज्यादातर एथलीट पढ़ाई और खेल में से एक को चुन लेते हैं लेकिन ये अच्छा है कि हिमा पढ़ाई पर बराबर ध्यान दे रही हैं. असम ने नोगांव की रहने वाली रनर पिछले साल उस वक़्त चर्चा में आईं थी जब उन्होंने 400 मीटर का नेशनल रिकॉर्ड तोडा. इसके बाद उन्होंने एशियाई खेलों में सिल्वर मेडल जीता और लगातार आगे बढ़ती चली गईं.

हिमा ने अपने एग्जाम के दौरान घर पर रहने  की बजाय प्रैक्टिस करना जारी रखा. वो अपने होमटाउन धींग में  एग्जाम दे रही थीं  जबकि स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया का हॉस्टल गुवाहाटी में है. इन दोनों के बीच के 120 किलोमीटर का फासला है. हिमा अप-फिर भी डाउन करती रहीं. खेल पर असर पड़ा लेकिन इसके बावजूद उन्होंने 500 में से 349 नंबर हासिल किए. एग्जाम में इस कामयाबी के बाद उनके पिता रंजीत दस का कहना है

हम एग्जाम में उसके प्रदर्शन से खुद हैं. लेकिन अब वक़्त है कि वो ट्रैक पर लौट जाए. 

कैसे शुरू हुआ करियर

हर बड़े स्टार की कहानी की शुरुआत जैसे होती है, हिमा की भी कमोबेश वैसे ही हुई. हिमा के हुनर को सबसे पहले 2014 में एक इंटर स्कूल दौड़ प्रतियोगिता के दौरान नवोदय स्कूल के ट्रेनर शम्स-उल-हक ने पहचाना. शम्स ने उन्हें ट्रेनर गौरीशंकर रॉय से मिलवाया जिन्होंने बाद में हिमा को खेल और युवा कल्याण निदेशालय के कोच निपोन दास और नबोजीत कौर से मिलवाया. हिमा पर इन दोनों का इतना भरोसा था कि 2017 में नैरोबी में हुई यूथ वर्ल्ड चैंपियनशिप के लिए उन्होंने क़र्ज़ तक ले लिया. ताकि हिमा वहां दौड़ने जा सके.

उपलब्धि से घरवाले रहे अनजान

हिमा ने टेम्पेरे में अपनी जीत के बाद घरवालों को फोन किया तो उन्हें कोई आभास ही नहीं था कि उनकी बेटी ने क्या कर दिया है. जब उनकी आपस में बात हुई तो घरवालों के सोने का वक़्त हो चुका था. इसपर हिमा ने कहा ‘ठीक है! सो जाओ! मैंने दुनिया में हंगामा मचा दिया है और तुम लोग सोते रहो.’ ये पूछने पर कि ‘हुआ क्या है?’ हिमा ने कहा कि सुबह पता चलेगा. सुबह हुई तो बाज़ार में ककड़ी बेचने जा रहे उनके पिता ने मीडिया की कारों का काफिला उनके घर की तरफ बढ़ते देखा और ख़ुशी से चिल्ला दिए. हिमा कहती हैं कि ये उनके लिए बेहद गौरवशाली पल था.

असमिया गौरव है सबसे ऊपर

हिमा दास केवल अपने खेल को लेकर ही जुनूनी नहीं हैं बल्कि असम में हो रहे अपराध और अन्य समस्याओं के लिए भी उतनी ही बेचैन रहती हैं. 2013 में उन्होंने एक एक्टिविस्ट ग्रुप बनाया जिसका नाम है ‘मोन जई’ (मेरी चाहत) है. असम में रेल के टॉयलेट में हुई हत्याएं हो, बाढ़ पीड़ितों की बदतर हालत या शराब की अवैध दुकानों के खिलाफ मुहिम चलानी हो, हिमा हमेशा आगे रहती हैं.


वीडियो:हिमा दास को उनकी जाति की वजह से कम पुरस्कार मिलने वाले मैसेज की सच्चाई

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