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मायावती का ऐसा हृदय परिवर्तन कैसे हुआ कि कश्मीर पर सरकार के साथ हो गयीं?

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आज यानी 5 अगस्त हो संसद में जो हुआ, वो आप कमोबेश समझ ही गए हैं. अमित शाह ने जम्मू-कश्मीर को लेकर अपना एजेंडा साफ़ किया. कहा कि धारा 370 के कुछ प्रावधान ख़त्म होंगे. जम्मू-कश्मीर को अलग राज्य और लद्दाख को अलग राज्य बनाया जाएगा. और ये दोनों राज्य केंद्रशासित प्रदेश के तौर पर शासित किए जाएंगे.

अमित शाह बोलकर शांत ही हुए थे. विपक्ष को अपनी बात रखनी थी. कांग्रेस के तेवर गर्म थे और ग़ुलाम नबी आज़ाद का गला भी. बहुत गहरे और तीखे वार होने थे. लगा कि सरकार का विरोध करने वाला विपक्ष इस पर भी एकजुटता, कम से कम संवाद के स्तर पर, दिखाएगा ही. लेकिन बात शुरू होती, उसके पहले ही बसपा के राज्यसभा सांसद सतीश चंद्र मिश्रा ने मुश्किल से 30 सेकण्ड का समय लिया. और कहा,

“हमारी पार्टी इसका पूरा समर्थन करती है. हम चाहते हैं कि ये बिल पास हो जाए. हमारी पार्टी धारा 370 से जुड़े बिल या किसी भी अन्य बिल का कोई विरोध नहीं करती है.”

बसपा नेता सतीश चंद्र मिध्रा
बसपा नेता सतीश चंद्र मिश्रा

सतीश चंद्र मिश्रा ने ये भी कहा कि इस बिल का समर्थन वे इसलिए करते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि इस बिल के बाद भारतीय मुसलमानों को उनका हक़ मिल सकता है.

ये कहने के साथ ही विपक्ष की इस बिल के विरोध में उपजी ‘एकता’ सामने ज़ाहिर हो गयी. सामने ही विपक्ष टूटा हुआ नज़र आया. साथ ही ये भी नज़र आया कि भाजपा और नरेंद्र मोदी के धुर विरोध में रही बसपा अब केंद्र सरकार के साथ है. नज़र आना ऐसे कि सरकार को अपने सभी महत्त्वपूर्ण बिलों पर बसपा की ओर से किसी किस्म के विरोध का सामना नहीं करना पड़ा है.

कहा जा रहा है कि मायावती का ह्रदय परिवर्तन हो गया है. इसके पहले भी कई महत्त्वपूर्ण बिलों पर उनकी पार्टी अप्रत्यक्ष रूप से सरकार के साथ नज़र आ रही है. तीन तलाक को ख़त्म करने के लिए बिल जब राज्यसभा में बीते हफ्ते पेश किया गया तो भाजपा के पास नंबर गेम नहीं था. बहुमत विपक्ष के पास था. और बसपा के पास चार राज्यसभा सांसद – सतीश चंद्र मिश्रा, राजा राम, वीर सिंह, और अशोक सिद्धार्थ.

सदन में वोटिंग शुरू हुई तो बसपा के चारों सांसद सदन में मौजूद ही नहीं मिले. गायब तो और भी बहुतेरे थे, लेकिन बसपा के सांसदों की गैर-मौजूदगी पर सवाल खड़े हुए. ऐसा इसलिए क्योंकि बसपा बीते कुछ समय में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मजबूत हुई है. लोकसभा में भी बसपा ने दस सीटें निकाली हैं. और दलितों के साथ-साथ मुस्लिम वोटरों का साथ भी बसपा को मिला है. ऐसे में कहा जा रहा है कि मुस्लिमों के साथ खड़ी बसपा कैसे तीन तलाक को ख़त्म करने वाले बिल की वोटिंग में ही मौजूद नहीं थी?

सांसदों की गैर-मौजूदगी को अब तक बसपा के मौन समर्थन की तरह देखा जा रहा था, लेकिन आज कश्मीर के मुद्दे पर सदन में सतीश चंद्र मिश्रा के सपाट बयान ने तस्वीर को थोड़ा साफ़ कर दिया है.

वही बसपा, जिसने भाजपा की सरकार गिरा दी थी

हां. 17 अप्रैल 1999 का दिन. अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश हो चुका था. और इस दिन वोटिंग होनी थी. इस वोटिंग में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार महज़ एक वोट की वजह से गिर गयी थी, और कहा जाता है कि अगर मायावती ने विश्वासघात न किया होता तो सरकार न गिरती.

अटल बिहारी की सरकार मायावती और बसपा के सांसदों ने गिराई थी, ऐसा कहा जाता है.
अटल बिहारी की सरकार मायावती और बसपा के सांसदों ने गिराई थी, ऐसा कहा जाता है.

हुआ यूं कि संसद में वोटिंग के पहले मायावती ने अटल बिहारी वाजपेयी को भरोसा दिलाया था कि बसपा के सांसद अविश्वास प्रस्ताव पर वोटिंग के समय सरकार का साथ देंगे. सरकार आश्वस्त थी.

सदन की कार्यवाही शुरू हुई. सांसद अपनी जगह पर बैठने लगे. मायावती और बसपा के बाकी सांसद भी सीट पर आ गए. वोटिंग के पहले बहस शुरू हुई और बहस में मायावती का नंबर आया. मायावती खड़ी हुईं और बिना किसी भूमिका के उन्होंने कहा कि वो सरकार का विरोध करेंगी. बसपा के दूसरे सांसद आरिफ़ खान और अकबर अहमद भी तैश में आ गए और सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. वोटिंग हुई. थोड़े ही वोटों से वाजपेयी की जो सरकार बच रही थी, एक वोट से गिर गयी.

पिछले महीने ही मायावती ने अपने भाई आनंद कुमार को एक बार फिर बीएसपी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया था.
पिछले महीने ही मायावती ने अपने भाई आनंद कुमार (बाएं) को एक बार फिर बीएसपी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया था.

अब मायावती भाजपा के साथ हैं. उनके भाई आनंद कुमार की संपत्ति कुछ ही दिनों पहले आयकर विभाग ने ज़ब्त की थी. कीमत बतायी जाती है लगभग 400 करोड़. और उसके बाद से संसद में बिल पर बिल पेश होते गए, और बसपा के सांसद या तो वाकआउट कर जाते, या ऐसा खुलकर समर्थन में सामने आने लगे. और सरकार के बिल कहीं नहीं रुके.


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