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अमेरिका-ईरान भसड़ की वजह से भारत में तेल और महंगा होने वाला है!

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ईरान मुश्किल में है. और भारत चिंता में. वजह है, तेल. ईरान से भारत आने वाला कच्चा तेल. ईरान अब भारत को तेल सेल नहीं कर पाएगा. ऐसा ईरान पर लगे अमेरिका के प्रतिबंधों की वजह से है. बिगड़ते हालात का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि ईरान के विदेश मंत्री मोहम्मद जवाद जरीफ दौड़े-दौ़ड़े भारत आए हैं. विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के साथ उनकी बैठकों का दौर चल रहा है. दोनों इस कोशिश में हैं कि कोई नतीजा निकले. जल्दी कोई नतीजा नहीं निकला तो भारत को तेल की तगड़ी मार झेलनी होगी.

भारत का दौरा क्यों?
इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक जरीफ का दौरा एक अहम वक्त में हो रहा है. अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने ईरान से तेल आयात को लेकर भारत समेत 6 देशों को दी गई सीमित छूट को खत्म करने का ऐलान किया है. अमेरिका ने भारत को भी चेताया था. कहा था कि अगर भारत ईरान से तेल आयात बंद नहीं करेगा, तो उसे भी अमेरिकी प्रतिबंधों का सामना करना पड़ सकता है. विदेश मंत्रालय के मुताबिक, भारत और ईरान अमेरिका के प्रतिबंधों और उसके असर पर चर्चा करेंगे. दोनों देश इस बैठक में इस मुद्दे का समाधान निकालने की कोशिश करेंगे. जरीफ और सुषमा स्वराज चाबहार बंदरगाह के भविष्य पर भी बातचीत करेंगे. ट्रंप प्रशासन ने भारत को आश्वासन दिया है कि वह चाबहार बंदरगाह को लेकर दी गई छूट जारी रखेगा.

सूत्रों का कहना है कि जरीफ ईरान के परमाणु कार्यक्रम ज्वाइंट कॉम्प्रिहेंसिव प्लान ऑफ एक्शन (JCPOA) के बारे में भी सुषमा स्वराज को जानकारी देंगे. जरीफ का ये दूसरा भारत दौरा है. वे इसी साल जनवरी महीने में भारत आए थे. और भारतीय नेताओं से मुलाकात की थी. उन्होंने अमेरिका की शर्तों के बारे में भारत के नेताओं को बताया था.

अमेरिका की ईरान के लिए क्या शर्तें हैं?
डॉनल्ड ट्रंप ने पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के शासन के दौरान 2015 में हुए ईरान परमाणु समझौते को खराब समझौता बताया था. फिर मई, 2018 में इस समझौते से अमेरिका को अलग कर लिया था. अमेरिका इसके बाद से ही ईरान पर नई शर्तों के साथ समझौता करने का दबाव बना रहा है. अमेरिका का आरोप है कि ईरान आस-पास के देशों में अस्थिरता फैलाता है. सीरिया और यमन की अस्थिरता में ईरान की भूमिका है.

मई, 2018 में अमेरिका ने परमाणु डील से खुद को अलग कर लिया. और फिर ईरान  से तेल खरीदने वाले देशों से कहा कि वे ईरान से तेल आयात शून्य करें. इसके लिए अमेरिका ने 1 नवंबर, 2018 तक का वक्त दिया था. अमेरिका का मकसद ईरान के परमाणु कार्यक्रम को दबाव बनाकर बंद कराना है. अमेरिका ने ईरान के सामने 12 शर्तें रखी हैं.

1- अमेरिका ईरान के परमाणु कार्यक्रम का निरीक्षण करेगा.
2- ईरान में परिष्कृत यूरेनियम पर प्रतिबंध लगे.
3- परमाणु मिसाइल पर प्रतिबंध लगे.
4- ईरान सीरिया के मुद्दे पर दखल न दे.
5- ईरान इजराइल में हिजबुल्ला और हमास को समर्थन बंद करे. वगैरह-वगैरह.

ईरान भारत से क्या चाहता है?
ईरानी राजदूत अली चेगेनी ने बीते हफ्ते कहा था, ‘भारत तेल के आयात पर अपने ‘राष्ट्रीय हितों’ के हिसाब से फैसला लेगा. भारत से ऐसी उम्मीद नहीं है कि वो ईरान जैसे प्रमुख और ऊर्जा क्षेत्र के भरोसेमंद साझीदार को नजरअंदाज करेगा. अमेरिका के प्रमुख सहयोगी के तौर पर भारत को इस डील (ईरान से तेल खरीद) को बचाना चाहिए. अमेरिका से भी इस परमाणु समझौते को बचाने की जरूरत पर जोर देना चाहिए.’

भारत तेल का बड़ा खरीदार
#भारत चीन के बाद ईरान के तेल का सबसे बड़ा खरीदार है. अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद भारत का ईरान से तेल का आयात 4,52,000 बैरल रोजाना से घटकर 3,00,000 बैरल रोजाना हो गया था. बैरल कच्चे तेल को नापने की इकाई है. एक बैरल में करीब 59 लीटर होते हैं.

#पिछले साल भारत ने भारत-अमेरिका वार्ता के दौरान अर्थव्यवस्था पर बुरे असर और महंगाई का हवाला देते हुए प्रतिबंधों से छूट जारी रखने की मांग की थी. मगर अमेरिका ने भारत की चिंता को नजरअंदाज कर दिया था.

#इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक बीते हफ्ते अमेरिका के वाणिज्य सचिव विल्बर रॉस जब भारत के दौरे पर आए थे तो उनके सामने भी ईरान से तेल आयात के मुद्दे को उठाया गया था. अमेरिकी पक्ष की तरफ से किसी भी तरह की रियायत का संकेत नहीं मिला.

#अमेरिका के प्रतिबंधों की चेतावनी के साथ भारत को अमेरिका के दूसरे सहयोग पर भी गौर करना होगा. सूत्रों के मुताबिक, अप्रैल के महीने में अमेरिका ने भारत को संदेश दिया था कि वो आतंकवाद के मुद्दे पर भारत के साथ खड़ा है. वो भी ईरान के आतंकी नेटवर्क को ध्वस्त करने में भारत से वही सहयोग चाहता है. अमेरिका के नेतृत्व में 1 मई को मसूद अजहर को संयुक्त राष्ट्र ने ग्लोबल आतंकी घोषित कर दिया गया था.

अब आगे क्या होगा?
#यूरोप
समेत दूनिया भर के ज्यादातर देश इस समस्या का जल्द से जल्द हल चाहते हैं. ज्यादातर देश ईरान की समस्या के हल की आखिरी उम्मीद भारत और चीन में देख रहे हैं. पिछले हफ्ते एक यूरोपीय राजदूत ने कहा था कि ईरान की असली समस्या तेल का निर्यात है. ये सवाल ईरान को चीन और भारत के सामने उठाना होगा.

#चीन ईरान के तेल का सबसे बड़ा खरीदार है. अमेरिका के तेल आयात को लेकर दी गई छूट खत्म करने के ऐलान के बाद चीन ने भी ईरान से तेल खरीदना बंद कर दिया है. चीन ने ईरान पर प्रतिबंधों की आलोचना तो की है, लेकिन अमेरिका से पहले से ही चल रहे ट्रेड वॉर के बीच चीनी कंपनियां सावधानी के साथ कदम आगे बढ़ा रही हैं.

#चाइना पेट्रोकेमिकल कॉर्प और चाइना नेशनल पेट्रोलियम कॉर्प सरकारी रिफाइनरियों ने मई महीने से ईरान से तेल आयात करना छोड़ दिया है. ऐसे में ईरान की राह कठिन होती जा रही है.

अमेरिका ये सब क्यों कर रहा है?
#
माना जाता है कि अमेरिका का मकसद ईरान को आर्थिक रूप से बर्बाद करना है. वो चाहता है कि वो ईरान की इकॉनमी की रीढ़ तेल पर चोट पहुंचाए. इससे ईरान आतंकवाद और 2015 के परमाणु समझौते को मानने के लिए बाध्य होगा. अमेरिका ईरान पर आर्थिक के साथ-साथ सैन्य दबाव बनाने की भी कोशिश कर रहा है. अमेरिका ने खाड़ी क्षेत्र में एयरक्रॉफ्ट कैरियर और बी-52 बमवर्षक तैनात कर दिए हैं. इसके जवाब में ईरान ने परमाणु कार्यक्रम को फिर शुरू करने की धमकी दी है.

#अमेरिका ने वैसे तो नवंबर, 2018 तक का समय दिया था. मगर भारत समेत 6 देशों को 2 मई, 2019 तक का अतिरिक्त समय दिया गया था. इनमें चीन, जापान, इटली, तुर्की, दक्षिण कोरिया, ताईवान, यूनान शामिल थे. अब ये छूट की सीमा खत्म हो चुकी है. अब ये देश ईरान से तेल नहीं ले सकेंगे. अगर खरीदेंगे तो इन्हें भी अमेरिका की ओर से कुछ व्यापारिक प्रतिबंधों का सामना करना पड़ेगा.

#अमेरिका के गृह सचिव माइक पोम्पियो ने कहा कि ‘अब छूट एकदम खत्म की जा रही है, हम ईरान के तेल आयात को जीरो पर लाएंगे.’ ईरान की अर्थव्यवस्था तेल पर आधारित है.

ईरान को अमेरिका क्यों घेर रहा है?
1- ईरान पर इन प्रतिबंधों के पीछे सऊदी अरब शासन और इजरायल का बहुत बड़ा हाथ है.
2- फिलिस्तीन के मुद्दे पर ईरानी सरकार हमास और हिज्बुल्लाह जैसे संगठनों का समर्थन करती है. इसको लेकर इजरायल और ईरान में टकराव है.
3- ईरानी नेता अक्सर इजरायल को दुनिया के नक्शे से मिटाने की बात करते हैं. अमेरिका की इजरायल समर्थक लॉबी इससे नाराज है.
4- सऊदी अरब के साथ ईरान की दुश्मनी है. इसकी वजह साम्प्रदायिक और नस्ली है. दोनों देश इस्लाम के अलग-अलग संप्रदायों की रहनुमाई का दावा करते हैं. सऊदी अरब वहाबी सुन्नियों का और ईरान शिया सम्प्रदाय का नेता बनता है. सऊदी अरब, अरबों का देश है तो ईरान, आर्य नस्ल का.
5- अमेरिका ने ईरानी सेना के दस्ते इस्लामिक रेवोल्यूशनरी गार्ड्स को आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया है. इस घोषणा के बाद अब अमेरिका को ईरान पर हमला करने के लिए सीनेट में अनुमति नहीं लेनी पड़ेगी.
6– इस विवाद में सबसे ज्यादा फायदा सऊदी अरब को होगा. उसका तेल अब ज्यादा बिकेगा. सऊदी अरब, अमेरिका का भरोसेमंद सहयोगी है.
7- ईरान के चाबहार बंदरगाह में भारत ने अरबों रुपए का निवेश किया है. भारत ने इस बंदरगाह को पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह के मुकाबले विकसित किया है. भारत का मकसद अफगानिस्तान और मध्य एशियायी देशों में चाबहार के रास्ते माल भेजना है.


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