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CBI डायरेक्टर पर सुप्रीम कोर्ट में मोदी सरकार की हार

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सुप्रीम कोर्ट ने CBI Chief आलोक वर्मा को वापस उनके पद पर बहाल कर दिया है. उन्हें छुट्टी पर भेजे जाने के मोदी सरकार के फैसले को निरस्त कर दिया गया है. फिलहाल आलोक वर्मा किसी बड़े मामले में फैसला नहीं ले पाएंगे. आलोक वर्मा की सर्विस के कुछ ही दिन बचे हैं. वो जनवरी में रिटायर होने वाले हैं. सुप्रीम कोर्ट की जिस बेंच ने ये फैसला दिया है, उसमें थे चीफ जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस एस के कौल और के एम जोसफ.

फैसले की दो सबसे ज़रूरी बातें-

1. बेंच ने कहा कि सरकार को सिलेक्शन कमिटी के पास ये मामला भेजना चाहिए था. CBI का डायरेक्टर कोलेजियम सिस्टम से चुना जाता है. प्रधानमंत्री, सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस और नेता प्रतिपक्ष मिलकर उम्मीदवार के नाम पर मुहर लगाते हैं. हटाने का भी यही सिस्टम है. अदालत ने कहा कि सरकार को प्रक्रिया के मुताबिक चलकर ही काम करना चाहिए था.

2. इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट ने ये भी कहा कि एक उच्च-स्तरीय कमिटी इस मामले को शुरू से सुने. देखे कि वर्मा के खिलाफ क्या कोई कार्रवाई होनी चाहिए. इस कमिटी में PM के अलावा चीफ जस्टिस और नेता प्रतिपक्ष होंगे. कमिटी को इस केस पर सोच-विचार करने के लिए एक हफ़्ते का वक़्त दिया गया है. CBI बनी है दिल्ली स्पेशल पुलिस ऐस्टिब्लिशमेंट ऐक्ट के अंतर्गत बनी है. कागज़ों में ये एक स्वतंत्र जांच एजेंसी है, मगर इसकी आज़ादी इतनी कुख्यात है कि खुद सुप्रीम कोर्ट ने इसे पिंजड़े में बंद तोता कह दिया था. अदालत के इस ताज़ा फैसले में सबसे काम का संकेत यही है कि CBI सरकार के हाथों की कठपुतली नहीं है. सरकार मनमाना फैसला नहीं कर सकती. उसे नियमों और प्रक्रिया के मुताबिक ही चलना होगा.

आधी रात को अचानक ऐसा क्या हुआ कि CBI के दो सबसे बड़े अधिकारी छुट्टी पर भेज दिए गए?

कब हटाए गए थे आलोक वर्मा?
CBI के दो सबसे बड़े अधिकारी- डायरेक्टर आलोक वर्मा और स्पेशल डायरेक्टर राकेश अस्थाना सार्वजनिक तौर पर एक-दूसरे के खिलाफ आरोप लगा रहे थे. दोनों का कहना था कि सामने वाला भ्रष्ट है. इसी बैकग्राउंड में 23 अक्टूबर, 2018 को आधी रात के करीब केंद्र सरकार ने आलोक वर्मा और राकेश अस्थाना, दोनों को जबरन छुट्टी पर भेज दिया. सरकार के इस फैसले पर काफी सवाल उठे. एजेंसी की साख, उसकी विश्वसनीयता पर चिंता जताई गई. ये बातें भी हुईं कि मोदी सरकार ने चालाकी दिखाई है. आलोक वर्मा को पद से नहीं हटा सकते थे, इसलिए लीव पर भेज दिया. सरकार के इस फैसले को आलोक वर्मा के अलावा ‘कॉमन कॉज़’ NGO ने भी चुनौती दी थी.

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सरकार ने कहा था, दोनों अफसर बिल्लियों की तरह लड़ रहे हैं
सरकार ने आलोक वर्मा और राकेश अस्थाना को छुट्टी पर भेजकर जॉइंट डायरेक्टर एम नागेश्वर राव को अंतरिम प्रमुख बनाया. नागेश्वर राव के अंतरिम चीफ बनने के बाद CBI के 13 बड़े अफसरों का तबादला कर दिया गया. इनमें ए के बस्सी भी थे. बस्सी अस्थाना के ऊपर लगे रिश्वत के आरोपों की जांच कर रहे थे. उन्हें पोर्ट ब्लेयर भेज दिया गया. जिस तरह आधी रात को वर्मा को हटाने का फैसला लिया गया, उसपर सवाल उठे. आलोक वर्मा की याचिका सुनते हुए सुप्रीम कोर्ट ने भी इस जल्दबाजी पर सवाल किया था सरकार से. ये जल्दबाजी क्यों दिखाई गई और सिलेक्शन कमिटी से सलाह क्यों नहीं ली गई.

केंद्र की तरफ से कहा गया था कि दोनों अफसर बिल्लियों की तरह लड़ रहे थे. उन्हें छुट्टी पर भेजकर ही जांच ढंग से हो पाती. इसपर कोर्ट ने सवाल किया कि दोनों अफसरों के बीच रातोरात तो ऐसी स्थिति बनी नहीं होगी. तो फिर फैसला क्यों रातोरात लिया गया. विपक्ष ने भी इल्ज़ाम लगाया कि केंद्र सरकार CBI की साख ख़त्म करने पर तुली है. कि सरकार एजेंसी को स्वतंत्र होकर काम नहीं करने दे रही. कांग्रेस ने इस मामले को भी रफाएल की जांच से जोड़ने की कोशिश की.

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राकेश अस्थाना को पहले अंतरिम डायरेक्टर बनाया गया था
ये दिसंबर 2016 की बात है. उस समय एजेंसी के निदेशक थे अनिल सिन्हा. वो रिटायर होने वाले थे. उनके बाद सबसे सीनियर अफसर थे स्पेशल डायरेक्टर आर के दत्ता. सिनयॉरिटी के हिसाब से सिन्हा के बाद उनके ही डायरेक्टर बनने का चांस था. लेकिन सिन्हा के रिटायरमेंट से दो दिन पहले ही आर के दत्ता का तबादला कर दिया गया. इसके बाद दिसंबर 2016 में राकेश अस्थाना को CBI का अंतरिम डायरेक्टर बनाया गया. अस्थाना गुजरात कैडर के अधिकारी हैं. प्रशांत भूषण ने निदेशक के पद पर उनकी नियुक्ति को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी. इसपर सुनवाई करते हुए अदालत ने सरकार से कहा कि वो CBI निदेशक की नियुक्ति के लिए जरूरी नियमों का पालन करे. इसके बाद फरवरी 2017 में आलोक वर्मा को डायरेक्टर बनाया गया. अस्थाना को स्पेशल डायरेक्टर का पद दिया गया.

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आलोक वर्मा ने अस्थाना पर रिश्वत लेने का इल्ज़ाम लगाया
आलोक वर्मा और राकेश अस्थाना के बीच चीजें सही नहीं थीं. खबरों के मुताबिक, इस लड़ाई के बाहर आने के करीब छह महीने पहले से ही वर्मा और अस्थाना के बीच बोलचाल बंद थी. जबकि दिल्ली के CBI मुख्यालय में दोनों का केबिन अगल-बगल में है. अक्टूबर 2017 में आलोक वर्मा ने सेंट्रल विजिलेंस कमिशन (CVC) को एक गोपनीय चिट्ठी दी. इसमें अस्थाना को स्पेशल डायरेक्टर बनाने पर सवाल उठाया गया था. आलोक वर्मा ने अस्थाना पर रिश्वत लेने का इल्ज़ाम लगाया. कहा कि उन्होंने 3.88 करोड़ रुपये का घूस लिया था स्टेंरलिंग बायोटेक से.

मगर आलोक वर्मा की इस आपत्ति के बाद भी CVC ने अस्थाना के प्रमोशन को हरी झंडी दे दी. फिर ये हुआ कि जुलाई 2018 में वर्मा एक आधिकारिक दौरे पर उरुग्वे गए. उन्होंने एक आदेश निकाला कि CVC की बुलाई मीटिंग में अस्थाना नहीं जा सकते. वर्मा का कहना था कि स्टेरलिंग बायोटेक केस में चूंकि खुद अस्थाना जांच के घेरे में हैं, तो वो ऐसी मीटिंग अटेंड करने के लिए सही नहीं रहेंगे. ये चिट्ठी मीडिया में भी लीक हुई थी. इसके जवाब में अस्थाना की तरफ से भी वर्मा और उनके सहयोगियों पर करप्शन के आरोप लगाए गए.

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अस्थाना ने भी आलोक वर्मा की शिकायत की
राकेश अस्थाना ने कैबिनेट सेक्रटरी के पास आलोक वर्मा के खिलाफ शिकायत की. कहा कि आलोक उनके द्वारा जांच किए जा रहे कुछ मामलों में टांग अड़ा रहे हैं. अस्थाना का ये भी इल्ज़ाम था कि आलोक वर्मा ने IRCTC केस में लालू यादव के यहां छापेमारी रोकने की कोशिश की. ये शिकायत CVC को बढ़ाई गई. आलोक वर्मा पर लगे आरोपों की जांच शुरू की गई. 15 अक्टूबर को आलोक वर्मा ने अस्थाना पर भ्रष्टाचार का केस दर्ज़ करवाया. ये हैदराबाद के कारोबारी सतीश सना के खिलाफ मामला रफा-दफा करने के लिए कथित तौर पर रिश्वत लेने से जुड़ा था. दोनों अफसर खुलेआम एक-दूसरे पर उंगली उठा रहे थे. इसके बाद CVC ने फैसला लिया कि दोनों अधिकारियों को छुट्टी पर भेज दिया जाए. और फिर ठीक से मामले की जांच की जाए. CVC ने ये प्रस्ताव केंद्र को भेजा और केंद्र ने इसपर मुहर लगाई. राकेश अस्थाना चारा घोटाले और गोधरा कांड की जांच में शामिल रह चुके हैं. वो सूरत के पुलिस कमिश्नर भी रह चुके हैं. ऐसी भी बातें उठीं कि अस्थाना मोदी सरकार के करीबी हैं और सरकार उन्हें बचाने की कोशिश कर रही है.

CBI के बड़े अधिकारियों पर करप्शन के आरोप पहले भी लगते रहे हैं. 2017 में इसके दो पूर्व निदेशकों- रंजीत सिन्हा और ए पी सिंह के खिलाफ चार्जशीट दाखिल हुआ था. दोनों पर भ्रष्टाचार के इल्ज़ाम थे.


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