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राहुल इस्तीफा न दें, ये मांग करते हुए कांग्रेसी कार्यकर्ता बिना रस्सी के फांसी लगाने पेड़ पर चढ़ा

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अगर लोगों का सुसाइड करने का मन है लेकिन वो मरना भी नहीं चाहते तो वो क्या करें? वो हनीफ भाई से प्रेरणा लें. सांप भी मर जाएगा और लाठी भी नहीं टूटेगी. नहीं सॉरी हम मरने की बातें नहीं करेंगे. खास तौर पर तब तो बिलकुल नहीं जब हमारी इस खबर का हीरो हनीफ खान जैसा जीवट इंसान हो. तो हम मुहावरे में आमूलचूल परिवर्तन करके कुछ यूं कहेंगे कि हनीफ भाई से प्रेरणा लें कि कैसे लाठी भी टूट जाए और सांप भी न मरे.

ज़्यादा कन्फ्यूज़न न हो इसलिए पहले स्टोरी बता देते हैं, फिर ज्ञान भरी बातें करेंगे, आराम से-

हाल ही में कांग्रेस वर्किंग की बैठक हुई थी. जिसमें राहुल गांधी, जो वर्तमान में कांग्रेस के अध्यक्ष हैं, ने अपने इस्तीफे की पेशकश की थी. इसके बाद इस्तीफा न देने के लिए मनाने वालों की भीड़ लग गई. सैकड़ों ऐसी भीड़ों में से एक भीड़ जिसमें सैकड़ों कार्यकर्ता हैं, अकबर रोड स्थित कांग्रेस मुख्यालय के बाहर धरने पर बैठी है. यहीं पर एक कार्यकर्ता पेड़ पर चढ़ गया. मतलब धरने में बैठा था. फिर पता नहीं क्या हुआ. अचानक. अचानक उठा और पेड़ पर चढ़ गया. रस्सी से लटक के आत्महत्या करने के लिए. बिना रस्सी के ही. रस्सी थी.

पीले रंग की. मगर ले नहीं गया. भूल गया शायद. या फिर ‘सुरक्षा कारणों’ से न ले गया हो. और पेड़ पर लटका भी तो ऐसे कि कोई चाह के भी इनको रस्सी न पकड़ा सके. यकीन न आए तो तस्वीर देख लीजिए. इस कार्यकर्ता का नाम- हनीफ खान. पेड़ पर लटक के बाद शुरू हुआ वो जो भारतीय राजनीति में हमेशा से होता आया है. ड्रामा. नहीं, रुकिए अखबारी भाषा में कहें तो- हाई वोल्टेज़ ड्रामा.

तो इस ड्रामे के स्क्रिप्ट लिखी जा चुकी थी. डायलॉग्स हनीफ भाई के खुद ही इम्प्रोवाइज़ करते हुए एट दी स्पॉट बोल डाले- ‘अगर कांग्रेस को उनकी (मने राहुल गांधी की) ज़रूरत नहीं तो मैं फांसी लगा लूंगा.’

Sucide---1

अब ज़रा इस तस्वीर को गौर से देखिए. ऊपर नहीं, नीचे की ट्वीट वाली. इस तस्वीर से हमें क्या प्रेरणा मिलती है? इस पूरी खबर से हमें क्या प्रेरणा मिलती है? वो ये कि हम दिल से चाहते हैं कि कोई भी, कोई भी सुसाइड का प्रयास न करे. किसी भी चीज़ से परेशान हैं तो पहले अपने दोस्तों, अपने रिश्तेदारों के बारे में सोचें. सोचें कि मरकर कोई जंग नहीं जीती जाती. जीकर, मगर हारी हुई जंग में भी जीतने की प्रायिकता बनी रहती है. आजकल कई ऐसी प्रफेशनल हेल्प उपलब्ध हैं, जो आपको आपके इस फेज़ से बाहर निकाल सकती हैं. ऐसा कुछ करने से पहले एक बार हनीफ भाई को ज़रूर सोच लें. अव्वल तो मूछें हों ही न, और हों तो नत्थूलाल जैसी. अव्वल तो सुसाइड एटेंप हों ही न, और हों तो हनीफ भाई जैसे. यही तो कांग्रेस के इस कार्यकर्ता के सुसाइड के प्रयास की सबसे खूबसूरत बात है, जिसमें हर कोई निश्चित था कि किसी को कुछ नहीं होना. सबसे हैप्पी एंडिंग वाला सुसाइड.

ओह हां, हमने एंडिंग तो बताई ही नहीं-

तो जब हनीफ भाई ऊपर चढ़ गए उसके बाद लोगों में भय का माहौल पसर गया, उनको वहां से नीचे उतारने की कवायद शुरू हो गई. पुलिस की हेल्प ली गई. जैसे तैसे उतारा गया. और फिर तुगलक रोड वाले पुलिस थाने ले जाया गया. उसके बाद क्या हुआ? उसके बाद हनीफ भाई फिर से भीड़ का हिस्सा बन गए होंगे. लोगों को मोटिवेशन का हिंदी वाला पाठ सिखा के और अंग्रेज़ी वाला पाथ दिखा के. 

तो चलिए फिर से वही सवाल पूछते हैं जो इनिश्यली पूछा था. अगर लोगों का सुसाइड करने का मन है लेकिन वो मरना भी नहीं चाहते तो वो क्या करें? तो वो ऐसी पटरी पर हिंदी वाला ‘लेट’ जाएं जिसमें आने वाली ट्रेन खुद अंग्रेज़ी वाली ‘लेट’ है. वो बीसवीं मंजिल की छत पर कूद जाएं. ‘पर’ कूदें, ‘से’ नहीं. वो ब्लेड से हाथ का सबसे सेंसेटिव पार्ट काट लें. नाख़ून ऑफ़ कोर्स. वो पेड़ पर चढ़ जाएं रस्सी से लटकने के लिए, लेकिन रस्सी ही न ले जाएं…

और ध्यान रखें कि ये सब किसी प्रफेशनल सुसाइड करने वाले के सामने ही ट्राई करें. प्रफेशनल बोले तो, वो जो अपने सुसाइड के सभी प्रयासों में सफल रहा हो. लेकिन अगर कोई ऐसे एक भी प्रयास में सफल हो गया तो वो गया. अस्तु…


वीडियो देखें:

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