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मंदिर का दरवाजा खोलते ही केरल में इतिहास बन गया, वजह सुकून देने वाली है

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कर्नाटक का एक शहर है उडूपी. आज से लगभग 30 साल पहले 1986 में वहां एक धर्म संसद का आयोजन हुआ था. इसमें शामिल होने के लिए नाथ संप्रदाय के तत्कालीन महंत और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गुरु महंत अवैद्यनाथ भी पहुंचे थे. इस धर्मसंसद में महंत अवैद्यनाथ ने प्रस्ताव रखा कि छुआछूत शास्त्र सम्मत नहीं है. उनकी इस बात को सभी शंकराचार्यों ने स्वीकार किया. उन्होंने तर्क दिया कि अगर छुआछूत की परंपरा होती, तो वाल्मीकि और संत रविदास कैसे होते? ये दावा खुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने लखनऊ के लल्लनटॉप शो में किया था.

Dalit Priest kerla
येदु कृष्णन ने 9 अक्टूबर से विधिवत पूजा-अर्चना शुरू कर दी है.

मुख्यमंत्री योगी ने ये बातें केरल में छह दलित पुजारियों की नियुक्ति के संदर्भ में कही थीं. नियुक्ति के बाद 9 अक्टूबर को पहली बार केरल के किसी मंदिर का दरवाजा एक दलित पुजारी ने खोला. मंदिर था केरल के तिरुवल्ला स्थित मनप्पुरम भगवान शिव का मंदिर. इसके पुजारी के तौर पर 22 साल के येदु कृष्णन की नियुक्ति की गई है.

10 साल तक लिया तंत्र शास्त्र का प्रशिक्षण

Dalit Priest kerla profile
येदु इससे पहले एक देवी मंदिर में पुजारी थे.

कृष्णन के पिता का नाम पीके रवि और मां का नाम लीला है. वो अपने माता-पिता की छोटी संतान हैं. दलितों में पुलाया समुदाय से आने वाले कृष्णन ने 10 साल तक तंत्र शास्त्र का प्रशिक्षण लिया है. त्रिशूर जिले के कोराट्टी के रहने वाले कृष्णन संस्कृत में पोस्ट ग्रैजुएशन के अंतिम साल के छात्र हैं. उन्होंने पहली बार 15 साल की उम्र में ही घर के नजदीकी मंदिर में पूजा शुरू की थी. अखबार इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में कृष्णन ने बताया कि वो इससे पहले अर्नाकुलम जिले के वालियाकुलंगरा देवी मंदिर में पुजारी थे. जब वो मंदिर छोड़कर आ रहे थे, तो मंदिर में आने वाले श्रद्धालु भावुक हो गए थे.

बोर्ड ने की है नियुक्ति

केरल में मंदिरों का संचालन बोर्ड के जरिए होता है.
केरल में मंदिरों का संचालन बोर्ड के जरिए होता है.

केरल में मंदिरों के संचालन के लिए त्रावनकोर देवासोम बोर्ड है. इसकी स्थापना 1949 में हुई थी. यह बोर्ड 1248 मंदिरों का संचालन करता है. इन मंदिरों में विश्व प्रसिद्ध सबरीमाला का मंदिर है, जिसे भगवान अयप्पा का मंदिर माना जाता है. बोर्ड ने पिछले दिनों 36 गैर ब्राह्मणों को मंदिरों के लिए चुना था. इनमें छह दलित हैं, जिनमें कृष्णन भी शामिल हैं. बोर्ड के अध्यक्ष राजगोपालन नायर ने कहा कि यह पहला मौका है जब मंदिर में पुजारियों की नियुक्ति के लिए आरक्षण की प्रक्रिया को अपनाया गया है. उन्होंने बताया कि पिछले 40 साल से मंदिर के पुजारियों के लिए एससी और ओबीसी के चयन की मांग हो रही थी लेकिन विरोध की वजह से सफलता नहीं मिल पा रही थी.

लिखित परीक्षा और इंटरव्यू के जरिए हुआ था चयन

पुजारियों की नियुक्ति के लिए लोक सेवा आयोग (पीएससी) की तर्ज पर लिखित परीक्षा और इंटरव्यू का आयोजन किया गया था. इसमें राज्य सरकार की ओर से दिया गया आरक्षण भी लागू था. पुजारी के लिए कुल 62 पद थे, जिनमें सीटें सामान्य थीं. 5 अक्टूबर को इसके रिजल्ट घोषित हुए थे, जिसके बाद 9 अक्टूबर को पहले दलित पुजारी ने मंदिर में काम करना शुरू कर दिया. बोर्ड का यह फैसला वाम मोर्चा की सरकार के देवस्वम बोर्ड के मंत्री कदमपल्ली सुरेंद्रन के निर्देश पर आधारित था.

दोहराई जा रही 80 साल पुरानी परंपरा

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अपने गुरु का आशीर्वाद लेकर मंदिर पहुंचे येदु कृष्णन.

9 अक्टूबर की सुबह कृष्णन ने अपने गुरु के.के. अनिरुद्धन तांत्री का आशीर्वाद लिया और मंदिर के मुख्य पुजारी गोपाकुमार नंबूदरी की मौजूदगी में मंत्रोच्चार करते हुए मंदिर पहुंचे. इससे पहले 1936 में त्रावणकोर में हिंदुओं की कथित तौर पर निची जातियों को मंदिर में प्रवेश की इजाजत मिली थी. वायकोम आंदोलन के बाद त्रावणकोर के महाराज ने ये आदेश दिया था. केरल राज्य उसी घटनाक्रम की 81वीं वर्षगांठ मनाने जा रहा है, जो 12 नवंबर को है.

लेकिन सबरीमाला अयप्पा में सिर्फ ब्राह्मण पुजारी

sabrimala
सबरीमाला मंदिर की पूरी दुनिया में अपनी खास पहचान है.

सबरीमाला अयप्पा मंदिर में ब्राह्मण पुजारी की ही नियुक्ति होती है. ये हमेशा से होता आ रहा है. इसके खिलाफ हाई कोर्ट में एक याचिका दाखिल की गई है और गैर ब्राह्मण जातियों के लोगों की नियुक्ति के लिए भी आदेश देने को कहा गया है. इस पर फैसला हाई कोर्ट को लेना है.


दलित पुजारियों की नियुक्ति पर क्या बोले उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ

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