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रोहिंग्या मुसलमान कौन हैं और इन्हें लेकर भारत में इतना बवाल क्यों मचता है?

क्या वजह है कि शरणार्थियों को लेकर सॉफ्ट रहने वाली भारत सरकार रोहिंग्या मुसलमानों को अवैध घुसपैठिया मानती है?

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17 अगस्त 2022 (अपडेटेड: 17 अगस्त 2022, 11:38 PM IST)
Rohingya Refugees
रोहिंग्या एक ऐसा समुदाय बन गया है, जिसका अपना कोई देश नहीं | फाइल फोटो : आजतक
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रोहिंग्या शरणार्थियों (Rohingya Refugees) को लेकर केंद्र सरकार की तरफ से बुधवार, 17 अगस्त को विरोधाभास की स्थिति बन गई. एक तरफ जहां केंद्रीय शहरी विकास मंत्री हरदीप पुरी ने रोहिंग्या शरणार्थियों को राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में EWS फ्लैट देने के बारे में ट्वीट किया, वहीं दूसरी तरफ केंद्रीय गृह मंत्रालय की तरफ से इस बात का खंडन कर दिया गया. गृह मंत्रालय की तरफ से ये भी कहा गया कि रोहिंग्या शरणार्थियों को उनके देश वापस भेजने तक उन्हें डिटेंशन सेंटर में रखा जाएगा. इस पूरी उथल-पुथल के बीच हर तरफ से राजनीतिक बयानबाजी भी हुई. आम आदमी पार्टी और BJP ने रोहिंग्या शरणार्थियों को लेकर एक-दूसरे पर निशाना साधा. ऐसे में ये जान लेना जरूरी है कि आखिर रोहिंग्या शरणार्थियों का ये पूरा मामला है क्या?

रोहिंग्या मुसलमान कौन हैं?

ये मुस्लिमों का एक समुदाय है. सदियों से ये लोग म्यांमार में रहते आए हैं. वहां रखाइन नाम का प्रांत है. वहां की बहुमत आबादी रोहिंग्या हैं. रोहिंग्या कहते हैं कि वो लोग मुस्लिम व्यापारियों के वंशज हैं. करीब नौवीं सदी से रखाइन में रह रहे हैं. 1948 में म्यांमार को आजादी मिली, तब रोहिंग्या मुसलमानों ने पहचान पत्र के लिए अप्लाई किया. नए आजाद हुए देश में उन्हें नागरिकों के कुछ अधिकार भी मिले.

म्यांमार रोहिंग्या मुसलमानों को अपना क्यों नहीं मानता?

म्यांमार ज्यादातर रोहिंग्या को बांग्लादेशी घुसपैठिया कहता है. उसका कहना है कि रोहिंग्या असल में बांग्लादेशी किसानों की एक कौम है. अंग्रेजों के राज में ये लोग म्यांमार (तब का बर्मा) में आ बसे थे. उस समय म्यांमार पर भी अंग्रेजों का ही राज था. उन्होंने बड़ी तादाद में रोहिंग्या मुसलमानों को मजदूरी वगैरह के लिए म्यांमार भेजा. म्यांमार की बहुसंख्यक आबादी है बौद्ध. उनकी रोहिंग्या मुसलमानों से नहीं पटती. सरकार और सेना भी बहुसंख्यकों के साथ है. उधर बांग्लादेश कहता है कि रोहिंग्या उसके नहीं, म्यांमार के ही हैं. इस चक्कर में रोहिंग्या ऐसा समुदाय बन गया, जिसका अपना कोई देश नहीं.

रोहिंग्या मुसलमानों की हालत कब बिगड़ने लगी?

1962 का साल था. म्यांमार में एक सैनिक तख्तापलट हुआ. उसके बाद बहुत कट्टरपंथी माहौल बना. रोहिंग्या मुसलमानों से नागरिकों के अधिकार छीन लिए गए. कहा गया कि वो विदेशी हैं. उन्हें विदेशी होने का पहचान पत्र दिया गया. फिर 1982 में सरकार ने कहा कि रोहिंग्या चाहें, तो नागरिकता के लिए अप्लाई कर सकते हैं. मगर उन्हें कम से कम म्यांमार की एक आधिकारिक भाषा बोलनी आनी चाहिए. ये सबूत होना चाहिए कि उनका परिवार आजादी के पहले से म्यांमार में रह रहा था. मगर ज्यादातर रोहिंग्या मुसलमानों के पास ये सब साबित करने के लिए कागजात नहीं थे. कभी बनवाने की स्थिति ही नहीं आई थी. इसीलिए वो म्यांमार में रहकर भी म्यांमार के नहीं माने गए.

सबसे ज्यादा रोहिंग्या बांग्लादेश में रह रहे हैं. म्यांमार की सीमा मिलती है बांग्लादेश से. ऐमनेस्टी इंटरनेशनल का कहना है कि तकरीबन पांच लाख रोहिंग्या हैं, जो बिना कागज-पत्तर के बांग्लादेश में रह रहे हैं.

रोहिंग्या मुसलमानों पर जुल्म कब शुरू हुआ?

तकरीबन पिछले चार दशकों से म्यांमार की बहुसंख्यक आबादी रोहिंग्या मुसलमानों पर जुल्म करती आ रही है. 2010 के बाद ये काफी बढ़ गया. ये बड़ी अजीब बात है क्योंकि 2011 में म्यांमार के अंदर सेना की जगह नागरिक सरकार आई. लगा, स्थितियां सुधरेंगी. मगर हुआ उल्टा. रोहिंग्या के पास बौद्ध आबादी जैसे अधिकार नहीं. रखाइन में रहने वाले ज्यादातर रोहिंग्या बहुत बुरी हालत में रहते हैं. बहुत सारे रोहिंग्या ऐसी स्थितियों से बचने के लिए म्यांमार छोड़कर भाग गए.

नरसंहार का क्या मामला है?

2017 में दुनियाभर की मीडिया में रोहिंग्या मुसलमानों की बात हुई. म्यांमार में सैकड़ों रोहिंग्या मार डाले गए. उनके गांव के गांव जला डाले गए. सेना उन्हें चुन-चुनकर मार रही थी. पड़ोस में सटे बांग्लादेश के रास्ते हजारों रोहिंग्या म्यांमार से जान बचाकर भाग गए. UN, ऐमनिस्टी इंटरनेशनल, रेड क्रॉस सबने म्यांमार सरकार की थू-थू की. सबूत सामने आए कि किस तरह म्यांमार की सरकार, सेना और बहुसंख्यक बौद्ध आबादी ने एक होकर अल्पसंख्यक रोहिंग्या मुसलमानों का नरसंहार किया. ऐसे मामले सामने आए कि सेना ने रोहिंग्याओं के गांव में आग लगा दी. फिर जब लोग घरों से बाहर भागे, तो उन्हें घेरकर गोली मार दी. कई सामूहिक कब्रें भी मिलीं उनकी.

भारत में भी आए हजारों रोहिंग्या

गृह मंत्रालय ने बताया था कि तकरीबन 40 हजार रोहिंग्या भारत में रह रहे हैं. वो बांग्लादेश के रास्ते भारत आए. भारत इन्हें शरणार्थी नहीं, अवैध घुसपैठिया मानता है. केंद्र सरकार ने इन्हें वापस म्यांमार डिपोर्ट करने का फैसला किया. शरणार्थियों के मामले में भारत हमेशा से नर्म रहा है. मगर रोहिंग्या के केस में सरकार सख्त है.

भारत से UN की नाराजगी

रोहिंग्या मुसलमानों को वापस म्यांमार भेजने के भारत के फैसले से संयुक्त राष्ट्र नाराज है. उसका कहना है कि शरणार्थियों के प्रति भारत की एक अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारी बनती है. चूंकि रोहिंग्या सताई हुई कौम हैं और म्यांमार में जिस तरह उनके ऊपर जुल्म हुआ, जैसे उनका नरसंहार हुआ, उसे ध्यान में रखते हुए भारत को रोहिंग्याओं के साथ नर्मी दिखानी चाहिए. उनकी हिफाजत करनी चाहिए.

वीडियो- रोहिंग्या संकट को लेकर भारत के लिए UN की नई चेतावनी

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