अरुंधति रॉय ने ऐसा क्या लिखा जिससे वो 'देशद्रोही' हो गईं?
जिसकी वजह से आरएसएस-बीजेपी इनसे खार खाते हैं?
Advertisement

फोटो - thelallantop
ये आर्टिकल डेलीओ वेबसाइट पर पब्लिश हुआ था. वेबसाइट की इजाज़त से हम आपको इसका हिंदी अनुवाद पढ़वा रहे हैं.
भाजपा सांसद परेश रावल ने ट्विटर पर कहा था कि पत्थरबाज की जगह अरुंधति रॉय को जीप के आगे बांध देना चाहिए था. इससे पहले एक ट्वीट में उन्होंने कहा था, 'अरुंधति रॉय का ये कहना है कि 70 लाख भारतीय सैनिक मिलकर आजादी गैंग को हरा नहीं पाते, ये शर्मसार करने वाला है. अरुंधति का बर्थ सर्टिफिकेट असल में अस्पताल की ओर से खेद जताने वाला ख़त है.' अरुंधति ने हमेशा ही कश्मीर मसले पर सरकार के खिलाफ अपने विचार रखे हैं. वो सेंट्रिस्ट लिबरल और आम लोगों के इस विचार के खिलाफ हैं कि कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है. अरुंधति की दूसरी किताब 'मिनिस्ट्री ऑफ अटमोस्ट हैपिनेस' जल्द ही आने वाली है. इससे दो दशक पहले उनकी किताब 'द गॉड स्मॉल थिंग्स' आई थी जो तुरंत हिट हो गई थी और 1997 का मैन बुकर प्राइज जीता था. मगर यूं लगता है कि हालिया बवाल एक लेखिका के तौर पर उनकी छवि खराब कर ही दम लेंगे. सरकार के खिलाफ अपने कड़े बयानों के चलते अरुंधति हमेशा ही सुर्खियों में रही हैं. चाहे वो खुद को उदारवादी और सेकुलर दिखाने वाली कांग्रेस हो या फिर संघ परिवार ब्रिगेड के बीजेपी-मोदी समर्थक. दोनों ही अरुंधति को नापसंद करते हैं. भारत से जुड़ी कुछ गंभीर समस्याओं पर अरुंधति रॉय के दिए गए बयानों के बारे में आपको बताते हैं. जिनके कारण उनको सरकार और बुद्धिजीवी वर्गों द्वारा धमकी मिलती रही है.
कश्मीर
अरुंधति रॉय हमेशा से ये कहती है कि भारत ने हथियारों के बल पर कश्मीरियों को हथिया रखा है. 2010 में हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के नेता सैयद अली शाह गिलानी के साथ मिलकर सेमिनार रखने और कश्मीर मुद्दे का एकमात्र हल आजादी बताने के लिए एक कश्मीरी पंडित ने उनपर देशद्रोह का मुकदमा किया था. बाद में गृह मंत्रालय ने इस केस को ड्रॉप करने का फैसला लिया. एक तरफ भारत की आर्मी और दूसरी तरफ पाकिस्तान का समर्थन प्राप्त उग्रवादियों के बीच फंसे कश्मीरियों पर अरुंधति ने कई लेख लिखे हैं: 2011 में 'डेड बिगिन टू स्पीक अप इन इंडिया' शीर्षक से छपे एक लेख में उन्होंने लिखा था कि दो सरकारों की बॉर्डर पेट्रोल के गोले में फंसा कश्मीर जल्द ही बाहरी दुनिया से कट जाएगा. एक गोला दिल्ली से चलता है औऱ दूसरा श्रीनगर से. अपने बॉर्डर के अंदर कश्मीर की सरकार और आर्मी दोनों में ही एक खुला माहौल है. कश्मीरी पत्रकारों और लोगों को घूस, धमकी, ब्लैकमेल और न जाने किस तरह की क्रूरता से अपने वश में रखा जा रहा है.अफजल गुरु
अफजल गुरु, जिसे 2001 में संसद पर हमला करने के जुर्म में फांसी दी गई थी. अरुंधति हमेशा ही उनकी निष्ठावान सपोर्टर रही हैं. रॉय हमेशा कहती रहीं कि अफजल के केस में सबूत काफी नहीं थे और उसको सजा लोगों की भावनाओं को ध्यान में रखकर दी गई थी. और इस बात का समर्थन बुद्धिजीवी नंदिता हसकर, फिल्ममेकर संजय काक और पत्रकार सुनेत्रा चौधरी ने भी किया था. अफजल को 9 फरवरी 2013 को फांसी पर चढ़ाया गया. उस समय देश में मोदी और हिंदुत्व का मुद्दा मजबूत हो रहा था. तब अरुंधति ने एक लेख लिखा था. जो भारतीय और विदेशी मीडिया में छापा था. द गार्डियन में ये लेख 'स्टेन ऑन इंडियन डेमोक्रेसी' शीर्षक के साथ छपा था और द हिंदू में ये लेख यूजअल कॉकटेल ऑफ पेपल पैशन एंड डेलिकेट ग्रिप ऑन फैक्ट्स शीर्षक के साथ प्रकाशित हुआ था. जिसमें उन्होंने कहा था,माओवादियों के बारे में
अरुंधति ने माओवादियों पर एक काफी मशहूर लेख लिखा था. इसकी आलोचना देश के सभी कांग्रेसी, लिबरल और केंद्र में बैठे पत्रकारों ने की थी. 'गांधीयन विद गन' नाम के इस लेख से अरुंधति ने तत्कालीन गृहमंत्री पी.चिदंबरम पर सीधा हमला बोल दिया था. वॉकिंग विद द कॉमरेड में रॉय ने लिखा था,जाति और अंबडेकर पर
अंबेडकर की किताब 'एनहिलिएशन ऑफ कास्ट' पर अरुंधति ने 120 पन्ना लंबा इंट्रोडक्शन लिखा है जिसे ‘द डॉक्टर एंड दी सेंट’ नाम दिया है. इसमें भारत में जातिगत पक्षपात, पूंजीवाद, पक्षपात के प्रति आंख मूंद लेने की आदत, अंबेडकर की बात को गांधीवादी बुद्धिजीवियों द्वारा खंडन और संघ परिवार का हिंदू राष्ट्र तक लिखा है. रॉय के अनुसार अंबेडकर के सभी कामों में देखा जाए तो 'एनहिलिएशन ऑफ कास्ट' सबसे पूर्ण है. यह हिंदूवादी कट्टरपंथी के लिए नहीं पर ऐसे लोगों को जो खुद को उदार हिंदू मानते हैं. हिंदू शास्त्रों पर विश्वास करना और खुद को उदार मानना, दोनों ही एक दूसरे के उलट है.आजादी और देशद्रोह
2016 की शुरुआत में जेएनयू के छात्रों ने आजादी की मांग से पूरे देश को हिला दिया. एक मुहिम जो कि रोहित वेमुला के सुसाइड लेटर पर शुरू हुई थी. इस मुहिम ने देश की आजादी से शुरुआत कर संविधान के सभी प्रावधान आजादी, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक जैसे शब्द की मांग शुरू कर दी. जैसे ही जेएनयूएसयू के अध्यक्ष कन्हैया कुमार पर देशद्रोह का इल्जाम लगा, देश ने यह देखा कि कैसे कुछ छात्र मिलकर एक सरकार को भी हिला सकते हैं. पिछले साल मई में अरुंधति ने 'माई सेडिशियस हार्ट' नाम से लेख लिखा. जिसने संघ-आरएसएस की कट्टरता की पोल खोल दी. रॉय ने खुशी से अपना नाम भी बढ़ रहे देशद्रोहियों की सूची में जोड़ा, जिसे नरेंद्र मोदी सरकार और उसकी ट्रोल आर्मी लगातार परेशान करती रही है.न्यूक्लियर टेस्ट
1998 में जब अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने पोखरन में परमाणु परीक्षण किया था. तब अरुंधति ने द एंड ऑफ इमैजिनेशन नाम से लेख लिखा था. अरुंधति किसी भी प्रकार के न्यूक्लियर परीक्षण के खिलाफ थीं और उन्होंने इस परीक्षण को दिखावा करार दिया था.ये भी पढ़ें:
'दिल्ली के स्कूल में क्लासमेट मुल्ला कह चिढ़ाते और कहते अपना खतना दिखा'
दिल्ली की गलियों में नंगे घूमते फकीर का सच क्या है
वीडियो देखें:

.webp?width=60)

