हाईकोर्ट ने क्यों कहा हिजाब इस्लाम में अनिवार्य नहीं?
कर्नाटक हाईकोर्ट ने अम्बेडकर और क़ुरान के हवाले से बताया, इस्लाम में हिजाब ज़रूरी नहीं है
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कर्नाटक हाईकोर्ट ने अम्बेडकर और क़ुरान के हवाले से बताया, इस्लाम में हिजाब ज़रूरी नहीं है
शिक्षण संस्थानों में हिजाब को लेकर हुए विवाद पर आखिरकार कर्नाटक हाईकोर्ट ने अपना फैसला सुना दिया. अदालत ने कहा कि हिजाब पहनने को इस्लाम का अनिवार्य अंग नहीं माना जा सकता. अदालत ने कर्नाटक सरकार के उस आदेश को भी सही माना है, जिसके तहत उन शिक्षण संस्थानों में हिजाब की मनाही हो सकती है, जहां यूनिफॉर्म का प्रावधान है.
प्री यूनिवर्सिटी कॉलेज माने इंटर की कक्षाओं में हिजाब पहनने को लेकर विवाद हुआ. विवाद कर्नाटक हाईकोर्ट में पहुंचा. 11 बार की सुनवाई के बाद 25 फरवरी को फैसला सुरक्षित किया गया. और आज 129 पन्नों की शक्ल में ये फैसला कागज पर उतर आया. जब से फैसला आया है, बहसबाज़ इन दो बिंदुओं को लेकर उलझ गए हैं. इसीलिए ज़रूरी है कि इन बिंदुओं तक अदालत कैसे पहुंची, ये समझा जाए.
विवाद की शुरुआत हुई 1 जनवरी 2022 को. जब कर्नाटक के उडुपी ज़िले के प्री यूनिवर्सिटी कॉलेज की छह छात्राओं ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की. इन छात्राओं की शिकायत थी कि इन्हें हिजाब पहनकर क्लास अटेंड नहीं करने दी जा रही है. शुरुआत में ज़्यादा हंगामा नहीं हुआ. कॉलेज ने कहा कि छात्राएं यूनिफॉर्म के नियम जानती हैं. और उन्होंने पहले इनपर सहमति भी जताई थी. हिजाब कैंपस में पहना जा सकता है. लेकिन कक्षा के भीतर नहीं.
धीरे धीरे इस आंदोलन से और छात्राएं जुटती गईं. ये आंदोलन कर्नाटक के दूसरे इलाकों तक भी पहुंचा. और इस सब के पीछे नाम आया कैंपस फ्रंट ऑफ इंडिया का. अब तक ये मामला दो पक्षों के बीच था. सरकार और छात्र, जिन्हें कैंपस फ्रंट का समर्थन मिला हुआ था. कैंपस फ्रंट ऑफ इंडिया, पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया PFI का छात्र संगठन है.
लेकिन फिर इस आंदोलन के खिलाफ एक दूसरा आंदोलन शुरू हो गया. कि अगर मुस्लिम छात्राएं हिजाब पहन सकती हैं तो फिर हिंदू छात्र भी भगवा गमछा डालकर क्लास में बैठेंगे. इन छात्रों को हिंदू जागरण वेदिके जैसे संगठनों का समर्थन मिलने की बात सामने आई. यहां से मामला त्रिपक्षीय हो गया. प्रशासन, मुस्लिम छात्राएं और हिंदू छात्र. ढेर सारे वीडियो आए जिसमें दोनों पक्षों के बीच तनाव हुआ. और तटीय कर्नाटक का माहौल खराब हुआ.
31 जनवरी को ये मामला कर्नाटक हाईकोर्ट पहुंचा. जहां छात्राओं ने संविधान के अनुच्छेद 14, 19 एवं 25 के तहत कक्षा में हिजाब पहनने की अनुमति मांगी. अनुच्छेद 14 से कानून के समक्ष समानता का अधिकार मिलता है. अनुच्छेद 19 अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है. और अनुच्छेद 25 धार्मिक स्वतंत्रता से ताल्लुक रखता है. पहली याचिका मुस्लिम छात्राओं की तरफ से लगी और फिर याचिकाओं की लिस्ट लंबी होती गई.
5 फरवरी को कर्नाटक सरकार की तरफ से एक आदेश निकाला गया. इसमें सरकार ने कहा कि 1983 के कर्नाटक शिक्षा कानून की धारा 133 के तहत लोक व्यवस्था बनाए रखने के मकसद से सरकार स्कूल और कॉलेजों को निर्देश दे सकती है. साथ ही Karnataka Board of Pre-University Education के तहत आने वाले कॉलेजों के लिए College Development Committee ड्रेसकोड की अनुशंसा कर सकती है.
8 फरवरी तक तनाव इतना बढ़ गया कि कर्नाटक सरकार ने तीन दिन की छुट्टी का ऐलान कर दिया. सुरक्षा बलों ने फ्लैग मार्च निकालने शुरू कर दिए. 10 मार्च को हाईकोर्ट ने एक अंतरिम आदेश देकर यथास्थिति को बनाए रखने का आदेश दे दिया.
अदालत के अंतिम आदेश से दो चीज़ें तय होनी थीं - कि क्या संविधान में निहित अधिकारों के तहत हिजाब पहनने को भी एक अधिकार की तरह देखा जा सकता है. और ये, कि क्या कर्नाटक सरकार का 5 फरवरी वाला आदेश विधि सम्मत है?
इस मामले की सुनवाई की कर्नाटक हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रितु राज अवस्थी, न्यायमूर्ति कृष्णा एस दीक्षित और न्यायमूर्ति जेएम खाजी की पीठ ने. लंबी लंबी दलीलें हुईं, जिन्हें कर्नाटक हाईकोर्ट के आधिकारिक यूट्यूब चैनल पर लाइव प्रसारित भी किया गया. आज आए फैसले से पहले कर्नाटक सरकार ने लंबी चौड़ी तैयारी की थी. राजधानी बेंगलुरू में भारी पुलिस बंदोबस्त तैनात कर दिया गया था. स्कूल कॉलेज बंद कर दिये गए थे और लोगों के जुटने पर रोक लगा दी गई थी. आज सुबह फैसला आया, और फैसले के साथ ही आई एक तस्वीर.
कर्नाटक के यादगिर की सुरापुरा तालुका के केम्बावी शासकीय कॉलेज में परीक्षा चल रही है. न्यायालय के फैसले के विरोध में कई छात्राओं ने परीक्षा का बहिष्कार कर दिया. तस्वीर में गौर करने वाली बात ये है कि ज्यादातर छात्राएं बुर्के में थी, ऊपर से हिजाब डाल रखा था. कॉलेज की प्राचार्य शकुंतला ने इन छात्राओं से हाईकोर्ट के आदेश का पालन करने को कहा. छात्राएं नहीं मानीं और परीक्षा कक्ष से बाहर आ गईं. इससे आप अनुमान लगा सकते हैं कि यूनिफॉर्म से शुरू हुआ विवाद कहां तक पहुंच गया है. खैर, हम फैसले पर लौटते हैं. लेकिन उससे पहले एक राइडर.
न्यायालय का फैसला अंग्रेज़ी में होता है. और बहुत विस्तृत होता है. उसके पूरे विस्तार को बुलेटिन में समेटना संभव नहीं है. इसीलिए हमने अपनी समझ के आधार पर भाषा का अनुवाद भी किया है और बातें संक्षेप में बताई गई हैं. न्यायालय ने असल में जो कहा, उसे पढ़ने के लिए आपको फैसले की कॉपी को देखना होगा.
न्यायालय ने अपने फैसले में चार प्रश्नों के उत्तर पेश किए –
- क्या हिजाब पहनना इस्लाम में अनिवार्य धार्मिक प्रथा का हिस्सा है, जो भारत के संविधान अनुच्छेद 25 के तहत संरक्षित है?
- क्या स्कूल यूनिफॉर्म का निर्देश मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है?
- क्या उडुपी के पीयू कॉलेज के प्रिंसिपल और लेक्चर्स के खिलाफ मामला बनता है?

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