जेल में कैदियों की यूनिफॉर्म में अब कालिया की तरह ऐसी काली-सफेद धारियां नहीं होती. साधारण सा सफेद कुर्ता-पायजामा होता है. लेकिन ये यूनिफॉर्म आई कहां से? नीचे स्क्रॉल करिए, स्टोरी पढ़िए. (फोटो- Shemaroo के यूट्यूब चैनल से स्क्रीनशॉट)
पोषम पा खेला है बचपन में? “अब तो जेल में जाना पड़ेगा, जेल की रोटी खानी पड़ेगी, जेल का पानी पीना पड़ेगा.” याद आया न!
पोषम पा के इस खेल में एक चीज़ मिसिंग थी– “जेल की पोशाक पहननी पड़ेगी”. जेल की पोशाक.. काली-सफेद धारी वाली वो यूनिफॉर्म, जो कैदी पहनते हैं. Prisoner’s Uniform. आज बात कैदियों की इसी यूनिफॉर्म पर. कहां से आई, क्यों आई, काली-सफेद धारी ही क्यों. और क्या अब भी कैदी यही पहनते हैं? सब.
कैदियों की रहाइश का ऑबर्न सिस्टम
18वीं सदी की बात है. रामराज्य कबका जा चुका था. घरों में ताले लगने शुरू हो गए थे. जेलें भरी जाने लगी थीं. लेकिन अभी तक कैदियों के लिए किसी यूनिफॉर्म का चयन नहीं हुआ था. कैदी अपने एक-दो जोड़ी कपड़ों में सजा काटते थे. लेकिन अगली सदी की शुरुआत से ही अमेरिका में आया
ऑबर्न प्रिज़न सिस्टम (Auburn Prison System).
Handwoven और Ranker वेबसाइट्स से मिली जानकारियों के अनुसार, ऑबर्न प्रिज़न सिस्टम को कैदियों की ऑलटाइम सबसे कड़ी सज़ा में से माना जाता है. इसमें दिन में तो कैदियों से काम कराया जाता था. कुछ-कुछ वैसा ही श्रम, जैसा आजकल की जेलों में कराया जाता है. लेकिन शाम को जैसे ही कैदी अपनी-अपनी बैरकों में लौटते थे, तो किसी भी कैदी के लिए बोलना मना होता था. कम्प्लीट साइलेंस. चूं भी करने पर सख़्त सज़ा. कैदी, जेलर से आंख नहीं मिला सकता था. उसकी तरफ देख नहीं सकता था. कहा जाता है कि कैदियों के अंदर से Sense of Self को ख़त्म करने के लिए इतना सख़्त सुलूक किया जाता था. जब Sense of Self ख़त्म हो जाएगा, तो कैदी वही करेगा, जो जेलर या वॉर्डन कहेगा.
इस ऑबर्न प्रिज़न सिस्टम ने कैदियों के रख-रखाव में एक और बड़ा बदलाव किया. माना जाता है कि यहीं से पहली बार जेल के कैदियों की एक पोशाक तय की गई. सभी कैदी ग्रे-ब्लैक कलर की धारीदार पोशाक में दिखने लगे. जेल की सलाखों की थीम पर ये पोशाक तय की गई थी.
अ सिंबल ऑफ शेम
कैदी तो बिना यूनिफॉर्म के भी कैदी थे. फिर ये ज़रूरत क्यों आन पड़ी कि साब, एक जैसे कपड़े पहनाओ. इसके कारण थे –
19वीं सदी, कैदियों के मानवाधिकार
19वीं सदी आधी बीत चुकी थी. अब तक कैदियों को एक ऐसी प्रजाति माना जाता था, जिनके कोई मानवाधिकार नहीं. जो क्राइम करके आया है, उसके कैसे अधिकार? धीरे-धीरे ये सोच बदली. लोगों के दिल-दिमाग में जेल का कॉन्सेप्ट बदलना शुरू हुआ. अब इसे सज़ा से पहले सुधार की जगह के तौर पर लिया जाने लगा. ऐसी जगह, जहां किसी अपराधी को लाया जाता है. इस कोशिश में कि वो यहां के अनुशासन में रहकर सुधरेगा. ऐसी सुधार प्रक्रिया में ‘सिंबल ऑफ शेम’ के लिए जगह नहीं थी. लेकिन कैदियों की पहचान के लिए यूनिफॉर्म भी ज़रूरी ही थी.
तो बात ये तय हुई कि यूनिफॉर्म तो रहेगी, लेकिन रंग हल्का किया जाएगा. 19वीं सदी के मिड से पहली बार काली-सफेद धारी वाली पोशाक कैदियों के साथ जुड़ी. ‘सिंबल ऑफ शेम’ को छोड़कर यूनिफॉर्म के बाकी कॉन्सेप्ट वही, पुराने वाले. कई लोग आज भी इस यूनिफॉर्म की थीम जेल की सलाखों को ही मानते हैं.
अब बात भारत की
स्टोरी में अभी तक हम वैश्विक थे. अब ‘वोकल फॉर लोकल’ होने का समय है. बात भारत की. काली-सफेद धारी को कई देशों में कैदियों की यूनिफॉर्म के तौर पर स्वीकार किया जा चुका था. लेकिन कई देशों में अपना अलग ड्रेस कोड भी था. जैसे नारंगी जंपसूट, जींस-शर्ट वगैरह. लेकिन ब्रो, व्हॉट अबाउट भारत? Parliamentlibraryindia.nic.in से मिली जानकारियों को टाइमलाइन से समझते हैं.
आज तक भारत में थोड़े-बहुत सुधारों के साथ कैदियों के रख-रखाव का कमोबेश यही कायदा चल रहा है. इस Prison Act पर कभी अलग से बात करेंगे. इसमें कैदियों की यूनिफॉर्म का अलग से कोई ज़िक्र तो नहीं किया गया. लेकिन चूंकि ब्रिटेन में काली-सफेद धारी वाली यूनिफॉर्म थी तो भारत में भी इसे अंडरस्टुड यूनिफॉर्म के तौर पर स्वीकार कर लिया गया. तब से लेकर ब्रिटिश शासन रहने तक और इसके भी काफी समय बाद तक इसे ही जेल में कैदियों की यूनिफॉर्म रखा गया. महिला कैदियों के लिए सफेद साड़ी. कई जेलों में नीली साड़ी भी रहती है.
यहां मैं आपको करेक्ट करना चाहूंगा
हम में से कई लोगों को लगता होगा कि अभी भी जेल में कैदी यही काली-सफेद धारी वाली यूनिफॉर्म पहनते हैं. ऐसा नहीं है. The Lallantop ने बात की तिहाड़ जेल के जेलर रहे सुनील गुप्ता से. उन्होंने ‘ब्लैक वॉरेंट-कन्फेशंस ऑफ अ तिहाड़ जेलर’ नाम की किताब भी लिखी है. उन्होंने बताया –
जहां एक ओर ये तर्क है कि यूनिफॉर्म से अनुशासन का भाव आता है. और इसकी ज़रूरत एक अपराधी से ज़्यादा किसे ही होगी! इसलिए कैदियों की यूनिफॉर्म ज़रूरी है. वहीं दूसरी तरफ ये बहस भी रहती है कि कैदियों को बरसों तक एक ही यूनिफॉर्म में रखना ठीक नहीं. The Guardian वेबसाइट पर एक स्टोरी है-
Why prison uniforms are a bad idea. इस स्टोरी में पत्रकार होमा खलीली को Dress behind bars किताब की राइटर जूलियट ऐश ने बताया है कि –
ये एक दीगर बहस है कि कैदियों की यूनिफॉर्म रहनी चाहिए या नहीं. लेकिन नो यूनिफॉर्म से लेकर सिंबल ऑफ शेम और फिर काली-सफेद धारी तक Prison Uniform का ये सफर लंबा रहा है. और अपने आप में कैदियों के मानव अधिकारों की एक लंबी कहानी समेटे है. कभी फिर साथ बैठेंगे, तो कपड़ों से इतर कैदियों के अन्य अधिकारों पर भी बात करेंगे.