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गावस्कर ने क्या वाकई कोलकाता में कभी न खेलने की कसम खा ली थी?

हम सब लोग बचपन से बहुत सारी किंवदंतियां सुनते हुए बड़े हुए हैं. देवानंद को काला कोट पहनने पर सरकार ने रोक लगा दी थी, जवाहरलाल नेहरू के कपड़े धुलने के लिए पेरिस जाते थे, 1984-85 के कोलकाता टेस्ट मैच में दर्शकों के व्यवहार से आजिज़ आकर सुनील गावस्कर ने कोलकाता में कभी नहीं खेलने की कसम खा ली थी, वगैरह-वगैरह.

आज हम इन्हीं में से एक किंवदंती (सुनील गावस्कर वाली) और उसके पीछे की वजहों को जानने की कोशिश करेंगे क्योंकि उसका एक सिरा आज की तारीख यानी 31 दिसंबर से जुड़ता है.

क्या हुआ था कोलकाता टेस्ट मैच में 31 दिसंबर 1984 को, और कैसे इस मनहूस दौरे की शुरूआत हुई थी, इसे समझने के लिए थोड़ा पीछे चलते हैं.

दिन 31 अक्टूबर 1984 का था. सुबह के लगभग 3 बज रहे थे, जब डेविड गाॅवर की कप्तानी में इंग्लैंड की क्रिकेट टीम 5 टेस्ट और 5 वनडे मैच खेलने इंडिया के दौरे पर दिल्ली पहुंची थी. लेकिन कुछ ही घंटों बाद इंग्लिश टीम को एक खौफनाक खबर मिली. ये खबर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या की थी. इसके बाद इंग्लिश टीम और उसके सपोर्ट स्टाफ़ बुरी तरह घबरा गए. इसी घबराहट में इंग्लिश टीम ने श्रीलंका की राजधानी कोलंबो में शरण मांगी. इंग्लैंड की टीम को कोलंबो में शरण मिल भी गई. इधर इंदिरा गांधी की हत्या के बाद भारत में सिख विरोधी दंगे शुरू हो गए. इससे इंग्लिश टीम और घबरा गई.

खैर, राजनयिक प्रयासों के द्वारा किसी तरह इस दौरे को बचाया गया. तीन सप्ताह बाद इंग्लैंड की टीम कोलंबो से मुंबई पहुंची, जहां पहला टेस्ट मैच खेला जाना था. मैच से पहले 26 नवंबर की रात मुंबई में ब्रिटेन के डिप्टी हाई कमिश्नर सर पर्सी नाॅरिस  ने इंग्लिश टीम को अपने आवास पर डिनर कराया. लेकिन अगले ही दिन सुबह के लगभग 8 बजे जब पर्सी नाॅरिस अपने दफ्तर जा रहे थे, तभी मुंबई के ऑल्टमाउंट रोड पर उन्हें गोलियों से भून दिया गया. इस हत्याकांड के बाद न सिर्फ इंग्लैंड की क्रिकेट टीम बल्कि पूरा देश एक बार फिर दहल गया. उसके बाद इंग्लिश टीम की सुरक्षा के इतने पुख्ता बंदोबस्त किए गए कि परिंदा भी पर न मार पाए.

खराब हालात के कारण इंग्लैंड टीम का भारत दौरा रद्द होते-होते बचा था.
खराब हालात के कारण इंग्लैंड की टीम का भारत दौरा रद्द होते-होते बचा था.

ऐसे हालात में भारी जद्दोजहद के बीच किसी तरह इंग्लैंड की टीम भारत दौरे की औपचारिक शुरूआत के लिए राजी हुई. 28 नवंबर से मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में पहला टेस्ट मैच खेला गया. इसे इंडिया ने बड़ी आसानी से 8 विकेट से जीतकर 1-0 की बढ़त अपने नाम कर ली.

अब चलते हैं सारे विवादों को जन्म देने वाले दूसरे टेस्ट मैच की तरफ. यह मैच दिल्ली में खेला गया. मैच के पांचवें दिन जब इंडियन बैट्समैन मैच को ड्रॉ की तरफ ले जाने की जी-तोड़ कोशिश में लगे थे, तभी अचानक से नजारा बदल गया. ड्रॉ की तरफ बढ़ रहा दिल्ली टेस्ट इंग्लैंड की गिरफ्त में चला गया, और इंग्लैंड ने सीरीज में 1-1 से बराबरी कर ली.

इसके बाद शुरू हुआ आरोप-प्रत्यारोप का दौर. उस दौर में तिल का ताड़ बनाने के लिए दुनिया भर के खबरिया चैनल भी मौजूद नहीं थे, लेकिन क्रिकेट को लेकर इंडियंस की दीवानगी शायद आज से भी ज्यादा थी. और जब ऐसी दीवानगी लोगों में हो, तो खबरों के लिए खबरिया चैनलों का न होना कोई मुद्दा नहीं रह जाता.

बहरहाल, दिल्ली टेस्ट में हार के कारणों पर बात करते हैं

12 दिसंबर से दिल्ली के फिरोजशाह कोटला स्टेडियम में दूसरा टेस्ट शुरू हुआ. इसमें मनोज प्रभाकर को डेब्यू कराया गया. इंडिया ने पहले खेलते हुए 307 रन बनाए. जवाब में इंग्लैंड ने भी 418 रन बनाए, और पहली पारी के आधार पर 111 रनों की बढ़त हासिल कर ली. लेकिन तब तक मैच चौथे दिन में पहुंच चुका था. चौथे दिन यानी 16 दिसंबर को जब अंपायरों ने बेल्स उठाईं यानी खेल खत्म हुआ, तब तक इंडिया इंग्लैंड की पहली पारी की बढ़त को खत्म कर चुका था. 2 विकेट के नुकसान पर 128 रन बना चुका था. सुनील गावस्कर 51 और मोहिंदर अमरनाथ 57 रन बनाकर खेल रहे थे. चौथे दिन की समाप्ति पर सबको ये मैच ड्रॉ की ओर जाता नजर आने लगा.

लेकिन यहीं से शुरू होती है सारे विवादों की जड़. मैच का पांचवां और अंतिम दिन. लंच तक टीम इंडिया ने 2 और विकेट गंवा दिए थे, लेकिन 200 रन भी बन गए थे. रवि शास्त्री और संदीप पाटिल ठीक-ठाक बैटिंग कर रहे थे. लग रहा था कि मैच ड्रॉ पर खत्म होगा. लंच के बाद दुबारा खेल शुरू हुआ. संदीप पाटिल खुद पर काबू नहीं रख सके. लेफ्ट ऑर्म स्पिनर फिल एडमंड्स को उड़ाने के चक्कर में एलन लैंब को कैच थमा बैठे. पाटिल के आउट होने के बाद पूर्व कप्तान कपिलदेव मैदान में उतरे. क्रिकेट प्रेमियों को उम्मीद थी कि वह विकेट पर रुकने की कोशिश करेंगे. लेकिन कपिलदेव ने आते ही आक्रामक अंदाज में बैटिंग शुरू की. कपिल ने शुरुआत ही सिक्सर के साथ की, लेकिन जल्दी ही संदीप पाटिल वाली गलती दोहरा बैठे. ऑफ स्पिनर पैट पोकाॅक को हिट करने के चक्कर में कपिल भी एलन लैंब को कैच थमा बैठे. इसके बाद टीम इंडिया का लोअर ऑर्डर ताश के पत्तों की तरह बिखर गया. 235 रनों पर पूरी टीम ऑल-आउट हो गई. इंग्लैंड को मैच जीतने के लिए 125 रन का टार्गेट मिला, जिसे इंग्लैंड ने वनडे की तरह खेलते हुए आखिरी सेशन में महज 23.4 ओवरों में केवल 2 विकेट खोकर हासिल कर लिया.

इसके बाद शुरू हुआ ब्लेम गेम.

हार के लिए बलि का बकरा ढूंढा जाने लगा. सिलेक्टर्स और मैनेजमेंट की मीटिंग्स शुरू हुई. चीफ सिलेक्टर बिशन सिंह बेदी से लेकर कप्तान सुनील गावस्कर तक और यहां तक कि पूरी टीम क्रिकेट फैंस के निशाने पर. इन सबको देखते हुए आखिरकार यह तय किया गया कि दिल्ली टेस्ट की दूसरी पारी में गैर-जिम्मेदाराना शाॅट खेलकर आउट हुए कपिलदेव और संदीप पाटिल को अगले यानी कोलकाता टेस्ट के लिए ड्राॅप कर दिया जाए.

कपिलदेव अग्रैसिव क्रिकेट खेलने के लिए जाने जाते थे.
कपिलदेव अग्रेसिव क्रिकेट खेलने के लिए जाने जाते रहे.

कपिल के बिना कोलकाता टेस्ट

उस दौर में कपिलदेव की लोकप्रियता इतनी थी कि उन्हें ड्राॅप किया जाना क्रिकेट फैंस पचा नहीं पा रहे थे. सबके निशाने पर आ गए थे कप्तान सुनील गावस्कर. दरअसल उस दौर में गावस्कर और कपिल के बीच अनबन की खबरें सुर्खियों में थीं. इसी वजह से लोग इस मामले को एक अलग एंगल से देख रहे थे. बहरहाल फैसला तो हो चुका था. ड्राॅप किए गए दोनों खिलाड़ियों की जगह मोहम्मद अजहरुद्दीन और चेतन शर्मा को मौका दिया गया. चेतन शर्मा पहले भी टेस्ट मैच खेल चुके थे जबकि अजहरुद्दीन का यह डेब्यू टेस्ट मैच था. 31 दिसंबर 1984 से टेस्ट मैच शुरू हुआ. 66 टेस्ट मैचों के बाद टीम इंडिया कपिलदेव के बिना मैदान में उतरी. सुनील गावस्कर ने टाॅस जीता. पहले बैटिंग करने का फैसला किया. गावस्कर और अंशुमन गायकवाड़ ओपनिंग के लिए उतरे, लेकिन गावस्कर महज 13 रन बनाकर आउट हो गए. ईडेन गार्डन का मैदान, 1 लाख के करीब दर्शक, कपिलदेव विवाद का साया और इन सबके बीच गावस्कर का सस्ते में आउट हो जाना- ये सब दर्शकों को भड़काने वाला काॅकटेल तैयार करने के लिए काफी था. गावस्कर जब आउट होकर पैवेलियन लौट रहे थे, तब उनकी खूब हूटिंग की गई. यहां तक कि उन पर टमाटर और अंडे भी फेंके गए. दर्शकों ने गावस्कर के खिलाफ नारे लगाने शुरू कर दिए,

गावस्कर दूर जाओ, कपिल को वापस लाओ.

दर्शकों के इस व्यवहार से गावस्कर इतने आहत हुए कि मैच के अंतिम दिन दूसरी पारी में, जब इंडिया को चंद ओवरों की बैटिंग के लिए मैदान में उतरना था, वो बैटिंग के लिए उतरे ही नही. अपनी जगह मनोज प्रभाकर को ओपनिंग के लिए भेज दिया. और यहीं से ये बात निकल पड़ी कि

‘गावस्कर ने कोलकाता में कभी भी क्रिकेट नहीं खेलने की कसम खा ली है.

गावस्कर कोलकाता के दर्शकों के व्यवहार से बेहद खफा थे.
गावस्कर कोलकाता के दर्शकों के व्यवहार से बेहद खफा हुए थे.

अब गावस्कर ने कसम खाई या नहीं खाई, कहां से इस किंवदंती ने जन्म लिया- इसकी चर्चा से पहले आपको इस टेस्ट मैच के बारे में बता दें. रवि शास्त्री और युवा खिलाड़ी मोहम्मद अजहरुद्दीन के शानदार शतकों के कारण यह मैच ड्रॉ हो गया. अजहरुद्दीन ने इस सीरीज में लगातार 3 टेस्ट मैचों में 3 शतक लगाए. उनके इस प्रदर्शन के बाद संदीप पाटिल का टीम इंडिया में वापसी का रास्ता हमेशा के लिए बंद हो गया. हां, कपिलदेव की अगले टेस्ट मैच में वापसी हो गई. और संन्यास लेने तक वह लगातार 65 टेस्ट मैच खेले. यानी अपने अंतर्राष्ट्रीय करियर के दौरान वह सिर्फ 1984-85 के कोलकाता टेस्ट में ही टीम इंडिया का हिस्सा नहीं रहे, वरना लगातार 132 टेस्ट मैच खेलने का विश्व रिकॉर्ड बनाते.

इस घटना के करीब तीन दशक बाद Sports Tak के एक कार्यक्रम में गावस्कर और कपिलदेव- दोनों ने आपसी अनशन की खबरों को नकारा था. गावस्कर ने कहा था कि

कपिलदेव को ड्राॅप करने का फैसला सिलेक्टर्स का था.

उनके साथ बैठे कपिलदेव ने भी स्वीकार किया-

दिल्ली टेस्ट में नाजुक मौके पर मेरी गैर-जिम्मेदाराना बैटिंग मुझे कोलकाता टेस्ट मैच से ड्राॅप किए जाने का कारण थी.

उस दौर में कपिलदेव और गावस्कर के बीच कथित अनबन की खबरें थीं.
उस दौर में कपिलदेव और गावस्कर के बीच कथित अनबन की खबरें खूब तैरती थीं.

चलिए. जब गावस्कर और कपिलदेव, दोनों ने इस कथित विवाद पर बर्फ डाल दी तो हम भी बर्फ डाल देते हैं. और बात करते हैं गावस्कर के कोलकाता में कभी न खेलने की कसम खाने की किंवदंती की.

इसका सच जानने के लिए हमें 1984-85 के बाद गावस्कर के बचे हुए अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट करियर के दौरान कोलकाता में हुए मैचों पर नजर डालने की जरूरत है. हमने इसकी पड़ताल की तो हमें 1987 में पाकिस्तानी टीम का भारत दौरा दिखा. वही दौरा, जिसके जयपुर टेस्ट में जनरल जियाउल हक आम दर्शकों की तरह ताली पीट रहे थे, लेकिन वह घटना हम फिर कभी अलग से बताएंगे. फिलहाल कोलकाता और गावस्कर पर लौटते हैं.

पांच टेस्ट मैचों की इस सीरीज का तीसरा टेस्ट और तीसरा वनडे मार्च 1987 में कोलकाता के ईडेन गार्डन में खेला गया था. इस सीरीज के सभी मैचों में सुनील गावस्कर टीम इंडिया का हिस्सा रहे थे, लेकिन कोलकाता वाले दोनों मैचों में वह नदारद थे. कोलकाता टेस्ट मैच में गावस्कर की गौरमौजूदगी में श्रीकांत के साथ अरुण लाल ने ओपनिंग की जिम्मेदारी संभाली थी, जबकि वनडे में, जो ईडेन गार्डन पर पहला वनडे था, लालचंद राजपूत को श्रीकांत का जोड़ीदार बनाया गया था. इन दोनों मौकों के अलावा गावस्कर के अंतर्राष्ट्रीय करियर में आगे कभी कोई ऐसा मौका नहीं आया, जब इंडिया को ईडेन गार्डन में खेलना पड़ा हो.

वैसे बताते चलें कि सुनील गावस्कर के बेटे रोहन गावस्कर लंबे समय तक बंगाल की तरफ से रणजी में खेलते रहे, और ईडन गार्डन बंगाल की रणजी टीम का होम ग्राउंड है.


विडियो : विव रिचर्ड्स ने ऐसा क्या कहा था कि गावस्कर ने डॉन ब्रैडमैन का रिकॉर्ड तोड़ दिया?

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