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जब बाबरी मस्जिद गिरी और एक दिन के लिए तिहाड़ भेज दिए गए कल्याण सिंह

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कल्याण सिंह. राजस्थान के पूर्व राज्यपाल. जब तक खास थे, कोई भी संस्था उनपर हाथ नहीं डाल पा रही थी. इसलिए क्योंकि संविधान इजाजत नहीं देता था कि किसी राज्य के राज्यपाल से पूछताछ हो. संविधान का आर्टिकल 361 कहता है कि जब तक कोई भी व्यक्ति राज्यपाल के पद पर हो, उससे पूछताछ नहीं हो सकती है. लेकिन राज्यपाल के पद से हटने के साथ ही अब कल्याण सिंह आम हो गए. और जब वो एक आम नेता हो गए, तो सीबीआई पहुंच गई स्पेशल कोर्ट, लखनऊ. कोर्ट से कहा कि वो कल्याण सिंह के खिलाफ समन जारी करे. ताकि सीबीआई उनसे बाबरी मस्जिद विध्वंस के मामले में पूछताछ कर सके.

6 दिसंबर, 1992 को कारसेवकों ने बाबरी मस्जिद गिरा दी थी.
6 दिसंबर, 1992 को कारसेवकों ने बाबरी मस्जिद गिरा दी थी.

सीबीआई कल्याण सिंह से पूछताछ क्यों करेगी. क्योंकि जब 6 दिसंबर, 1992 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिराई गई थी, कल्याण सिंह ही उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे. मस्जिद गिराने के मामले में बीजेपी के कद्दावर नेताओं लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती और कल्याण सिंह के अलावा महंत नृत्य गोपालदास और साध्वी ऋतंभरा पर भी केस दर्ज हुआ था. लेकिन इस मामले में कल्याण सिंह की क्या भूमिका थी और सीबीआई कल्याण सिंह से क्या पूछताछ करना चाहती है, इसे जानने के लिए बाबरी विध्वंस के बाद दिए गए कल्याण सिंह के बयान को जानना होगा.

बाबरी विध्वंस से पहले कहा, मस्जिद को नुकसान नहीं होने देंगे

जून 1991 में जब कल्याण सिंह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने सितंबर में इंडिया टुडे को एक इंटरव्यू दिया. इसमें उन्होंने कहा था कि बीजेपी सरकार का मस्जिद गिराने का कोई इरादा नहीं है. हम चाहते हैं कि मस्जिद को बस वहां से शिफ्ट कर दिया जाए. उन्होंने इस बात से भी इन्कार किया था कि विश्व हिंदु परिषद या फिर बजरंग दल ने सरकार को मंदिर बनाने की कोई अंतिम तारीख बताई है. जब कारसेवा की इजाजत लेने के लिए बीजेपी सुप्रीम कोर्ट पहुंची तो सुप्रीम कोर्ट ने 28 नवंबर को कारसेवा करने का आदेश दे दिया. इस दौरान बतौर मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर कहा कि वह मस्जिद को कोई नुकसान नहीं होने देंगे.

कल्याण सिंह ने बाबरी गिरने से पहले कुछ और कहा था और बाबरी गिरने के बाद कुछ और कहने लगे थे.
कल्याण सिंह ने बाबरी गिरने से पहले कुछ और कहा था और बाबरी गिरने के बाद कुछ और कहने लगे थे.

बाबरी विध्वंस के बाद कहा, राम मंदिर के नाम पर बनी थी सरकार

6 दिसंबर, 1992 को कारसेवकों ने बाबरी मस्जिद ढहा दी. मस्जिद गिरने के तुरंत बाद कल्याण सिंह ने मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया. 7 दिसंबर, 1992 को केंद्र की नरसिम्हा राव सरकार ने उत्तर प्रदेश की सरकार को बर्खास्त कर दिया. इसके बाद कल्याण सिंह ने 8 दिसंबर को पत्रकारों से बात की. कहा-

‘बाबरी का विध्वंस भगवान की मर्जी थी. मुझे इसका कोई मलाल नहीं है, कोई दुख नहीं है, कोई पछतावा नहीं है. ये सरकार राममंदिर के नाम पर बनी थी और उसका मकसद पूरा हुआ. ऐसे में सरकार राममंदिर के नाम पर कुर्बान. राम मंदिर के लिए एक क्या सैकड़ों सत्ता को ठोकर मार सकता हूं. केंद्र कभी भी मुझे गिरफ्तार करवा सकता है, क्योंकि मैं ही हूं, जिसने अपनी पार्टी के बड़े उद्देश्य को पूरा किया है.’

बीजेपी कार्यकर्ताओं को संबोधित करने के दौरान कल्याण सिंह ने कहा था-

‘कोर्ट में केस करना है तो मेरे खिलाफ करो, जांच आयोग बैठाना है तो मेरे खिलाफ बैठाओ. किसी को दंड देना है तो मुझे दो. दोपहर 1 बजे केंद्रीय गृहमंत्री शंकरराव चह्वाण का मेरे पास फोन आया. मैंने उनसे कहा कि ये बात रिकॉर्ड कर लो चह्वाण साहब कि मैं गोली नहीं चलाऊंगा, गोली नहीं चलाऊंगा.’

जब एक दिन के लिए तिहाड़ जेल भेजे गए कल्याण सिंह

कल्याण सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर कहा था कि बाबरी ढांचे को कोई नुकसान नहीं होने देंगे. लेकिन 6 दिसंबर, 1992 को कारसेवकों ने ढांचा गिरा दिया. इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट में कल्याण सिंह के खिलाफ अवमानना की अर्जी दाखिल की गई. ये अर्जी दाखिल की थी मोहम्मद असलम नाम के आदमी ने. सुप्रीम कोर्ट ने अवमानना की सुनवाई की और फिर 24 अक्टूबर, 1994 को फैसला दिया. कोर्ट ने कहा-

‘अदालत की अवमानना ने देश के धर्मनिरपेक्ष तानेबाने को प्रभावित किया है, इसलिए मुख्यमंत्री कल्याण सिंह को सांकेतिक तौर पर एक दिन के लिए जेल भेजा जा रहा है. साथ ही 20,000 रुपये का जुर्माना लगाया जा रहा है.’

बाबरी मस्जिद गिरने के बाद कल्याण सिंह को सुप्रीम कोर्ट की अवमानना के मामले में एक दिन के लिए तिहाड़ जेल जाना पड़ा था.
बाबरी मस्जिद गिरने के बाद कल्याण सिंह को सुप्रीम कोर्ट की अवमानना के मामले में एक दिन के लिए तिहाड़ जेल जाना पड़ा था.

कोर्ट के इस आदेश के बाद कल्याण सिंह को एक दिन के लिए तिहाड़ जेल भेजा जाना था. इसके लिए सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार एलसी भादू ने दिल्ली पुलिस के एक डीसीपी एचपीएस वर्क को बुलाया और कोर्ट के आदेश की तामील करने को कहा. लेकिन ये डीसीपी एचपीएस वर्क के अधिकार क्षेत्र से बाहर का मामला था. फिर तिलक मार्ग थाने के एसएचओ को बुलाया गया और कोर्ट का आदेश तामील करने को कहा गया. तिलक मार्ग थाने के एसएचओ सुरक्षा के तामझाम के साथ कॉपरनिकस मार्ग पर बने यूपी भवन पहुंचे और वहां से कल्याण सिंह को लेकर तिहाड़ जेल के लिए निकले. उस वक्त तिहाड़ जेल की सुपरिटेंडेंट थीं किरण बेदी. किरण बेदी ये जानना चाहती थीं कि कल्याण सिंह को एक दिन की जेल का मतलब क्या है. यानी कि उन्हें किस वक्त से किस वक्त तक जेल में रखना है. किरण बेदी इस बात की पुष्टि सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से करना चाहती थीं. सुप्रीम कोर्ट ने जवाब दिया-

‘किरण बेदी, आपको अपने सवाल के जवाब के लिए जेल का मैन्युअल देखना चाहिए.’

और फिर कल्याण सिंह को एक दिन के लिए जेल में रखा गया, जो एक सांकेतिक सजा थी.

सीबीआई ने कहा, मुख्यमंत्री बनने के बाद कल्याण सिंह ने ली थी राम मंदिर बनाने की शपथ

बाबरी विध्वंस के बाद इस मामले की जांच सीबीआई को सौंपी गई. ये पता लगाने के लिए कि दोषी कौन था. और जब 1993 में सीबीआई ने स्पेशल कोर्ट में अपनी चार्जशीट दाखिल की, तो उसने कहा कि जून, 1991 में कल्याण सिंह ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, उसके ठीक बाद वो अपने साथियों को लेकर अयोध्या गए थे और वहां पर राम मंदिर बनाने की शपथ ली थी.

सीबीआई ने अपनी चार्जशीट में कहा था कि मुख्यमंत्री बनने के बाद कल्याण सिंह ने राम मंदिर बनाने की शपथ ली थी.
सीबीआई ने अपनी चार्जशीट में कहा था कि मुख्यमंत्री बनने के बाद कल्याण सिंह ने राम मंदिर बनाने की शपथ ली थी.

कल्याण सिंह मुख्यमंत्री बने और विधानसभा में लात-जूते चल गए

बाबरी विध्वंस के बाद कल्याण सिंह ने पद से इस्तीफा दे दिया था. 1993 के चुनाव में बीजेपी सरकार बनाने लायक सीटें नहीं ला पाई. सरकार बनी थी सपा-बसपा की. 1996 में फिर से चुनाव हुए. सपा और बसपा अलग थे. अलग क्यों थे, क्योंकि गेस्ट हाउस कांड हो चुका था. और जब चुनावी नतीजा आया तो बीजेपी 173 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी. लेकिन सरकार नहीं बनी. फिर लगा राष्ट्रपति शासन. और जब हटा तो मायावती मुख्यमंत्री बन गई थीं, बीजेपी के सहयोग से. समझौता हुआ था कि छह महीने बसपा और छह महीने भाजपा का मुख्यमंत्री. मायावती के छह महीने पूरे हुए तो कल्याण सिंह मुख्यमंत्री बने. तारीख थी 21 सितंबर, 1997. लेकिन एक महीना भी नहीं बीता कि मायावती ने समर्थन वापस ले लिया. तारीख थी 19 अक्टूबर, 1997. अब कल्याण सिंह का जाना तय था. इस बीच कुछ पार्टियों में तोड़फोड़ हुई. राज्यपाल रोमेश भंडारी बीजेपी के थे. तो उन्होंने कल्याण सिंह को दो दिन के अंदर बहुमत साबित करने को कहा. 21 अक्टूबर को कल्याण सिंह ने बहुमत साबित कर दिया. लेकिन इस दौरान विधानसभा में विधायकों ने एक दूसरे के ऊपर लात-जूते चलाए, कुर्सियां फेंकी और माइक फेंककर एक दूसरे को मारा. राज्यपाल रोमेश भंडारी ने चाहा कि राष्ट्रपति शासन लग जाए, लेकिन राष्ट्रपति के.आर नारायणन ने मंजूरी देने से इन्कार कर दिया.

कल्याण सिंह के मुख्यमंत्री बनने के बाद विधानसभा में लात-जूते कुर्सियां चलीं और राज्यपाल रोमेश भंडारी ने विधानसभा भंग करने की सिफारिश कर दी.
कल्याण सिंह के मुख्यमंत्री बनने के बाद विधानसभा में लात-जूते कुर्सियां चलीं और राज्यपाल रोमेश भंडारी ने विधानसभा भंग करने की सिफारिश कर दी.

एक कुर्सी पर दो-दो मुख्यमंत्री

जिस कल्याण सिंह को राज्यपाल रोमेश भंडारी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई थी, उन्हीं रोमेश भंडारी ने 21 फरवरी, 1998 को कल्याण सिंह को मुख्यमंत्री पद से बर्खास्त कर दिया. कल्याण सिंह की ही सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे जगदंबिका पाल को रात के साढे 10 बजे मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी. फैसले के विरोध में बीजेपी के बड़े नेता अटल बिहारी वाजपेयी समेत कई लोग धरने पर बैठ गए. रात को ही हाई कोर्ट में अपील की गई. 22 फरवरी के दिन जगदंबिका पाल मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे थे. इसी बीच हाई कोर्ट ने राज्यपाल के आदेश को खारिज कर दिया. कहा कि कल्याण सिंह ही मुख्यमंत्री हैं. अब कल्याण सिंह सचिवालय पहुंचे तो जगदंबिका पाल पहले से ही मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे थे. किसी तरह से हाई कोर्ट के आदेश का हवाला देकर उन्हें हटाया गया और फिर कल्याण अपनी जगह पर वापस आए. 26 फरवरी को फिर से बहुमत साबित करने को कहा गया. कल्याण सिंह ने बहुमत साबित कर दिया. जगदंबिका पाल कुछ घंटों के मुख्यमंत्री बनकर रह गए.


बाबरी विध्वंस का हिस्सा रहा बलबीर, जिसने इस्लाम अपनाकर मस्जिदें बनवाईं

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