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जब अटल ने कहा- मैं मोदी को हटाना चाहता था पर...

बात 2004 की है. मई का महीना था. लोकसभा चुनाव के नतीजे आ गए थे. अटलजी की सरकार जा चुकी थी. सोनिया गांधी के नेतृत्व में यूपीए चुनाव जीत चुका था. वाजपेयी जी चुनाव की हार के बाद छुट्टी मनाने के लिए मनाली पहुंचे. किसी ने पूछ डाला कि वाजपेयी जी 2004 की हार में 2002 को कारण मानते हैं क्या?

अब ये 2002 था क्या? 2002 में गुजरात में दो ऐसी बड़ी क्रिया-प्रतिक्रियाएं हुईं, जिन्होंने हिंदुस्तान की राजनीति में नया अध्याय जोड़ दिया. क्रिया थी गोधरा कांड, जिसमें कथित तौर पर मुस्लिमों ने अयोध्या से ट्रेन से लौटे हिंदू कारसेवकों के कोच में आग लगा दी. 59 लोग जिंदा जल गए. इसके बाद हुई प्रतिक्रिया, जिसे सब लोग गुजरात दंगे के नाम से जानते हैं. इन दोनों घटनाओं के बाद गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी पर पक्षपात के आरोप लगे. बीजेपी में भी इसमें दो राय हो गईं. एक धड़ा चाहता था कि नरेंद्र मोदी को सीएम पद से हटाया जाए. इस धड़े में अटल भी शामिल थे. दूसरा धड़ा चाहता था कि पार्टी के हिंदुत्व के एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए मोदी का पद पर रहना जरूरी है.

2004 में हार के बाद अटल का राजनीतिक अस्त होना शुरू हो गया.
2004 में हार के बाद अटल का राजनीतिक अस्त होना शुरू हो गया.

2002 और 2004 को लेकर पूछे सवाल के जवाब में अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा-कुछ लोग नरेंद्र मोदी को हटाना चाहते थे. मेरा भी यही विचार था. मैं मोदी को हटा देता, तो अच्छा रहता.

बड़ी बात ये थी कि यह बयान जिस टाइम पर आया, उसके कुछ दिन बाद बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक थी. पूरी पार्टी इस बयान से सकते में आ गई. तब पार्टी के अध्यक्ष थे वैंकया नायडू और आरएसएस चीफ के. सुदर्शन. सुदर्शन और वाजपेयी की पहले ही कम बनती थी. सुदर्शन ने तुरंत बयान दिया कि गुजरात दंगों और लोकसभा चुनाव की हार में कोई संबंध नहीं है. अगर ऐसा होता तो 2003 में राजस्थान, एमपी और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव में पार्टी नहीं जीतती. अगर ऐसा है तो क्या भाजपा ने इन राज्यों में गुजरात के कारण चुनाव नहीं जीता?

नायडू तब पार्टी अध्यक्ष थे और अटल-आडवा्णी पार्टी के सुपर बॉस थी.
नायडू तब पार्टी अध्यक्ष थे और अटल-आडवा्णी पार्टी के सुपर बॉस थी.

हालांकि, मोदी के बचाव में पूरी पार्टी उतर आई. पार्टी अध्यक्ष वेंकैया नायडू ने राष्ट्रीय कार्यकारिणी में गुजरात के ऊपर किसी तरह की भी चर्चा से इनकार कर दिया. यहां तक कि अटल के खास सहयोगी लालकृष्ण आडवाणी ने भी पल्ला झाड़ लिया. उस टाइम पर नैनीताल में छुट्टी मना रहे आडवाणी ने वेंकैया को फोन कर कहा कि वरिष्ठ नेताओं से बात कर अटल जी से बात करो. लेकिन मोदी के ऊपर कोई कार्रवाई नहीं हुई. मुंबई अधिवेशन में नरेंद्र मोदी के ऊपर कोई चर्चा नहीं हुई. मोदी का मुख्यमंत्री-काल चलता रहा और आगे चलकर वो पीएम बन गए.

लेकिन इस बयान से सबसे ज्यादा नुकसान हुआ खुद अटल को. पार्टी के नेताओं ने आरोप लगाया कि अपनी सेक्युलर छवि बचाए रखने के लिए अटल ने यह बयान दिया. किसी ने कहा कि यह पार्टी के नेता का बयान नहीं, एक कवि का चिंतन है. मोदी पर ऐसा बयान मुस्लिमों को लुभाने की कोशिश लगता है, जो पार्टी के एजेंडे से अलग है. खैर, इसी मुंबई अधिवेशन में अटलजी ने आडवाणी और प्रमोद महाजन को पार्टी संभालने के लिए आगे कर दिया और खुद सक्रिय राजनीति से दूर हो गए.

तब मोदी गुजरात के सीएम थे और अटल जी पीएम.
तब मोदी गुजरात के सीएम थे और अटल जी पीएम.

बात अब 2002 की है, तो गुजरात दंगों के बाद अटल जी का गुजरात दौरा तो याद ही होगा. वहां प्रेस कॉन्फ्रेंस में पत्रकारों ने पूछा कि मुख्यमंत्री के लिए क्या संदेश देना चाहते हैं? तो अटल ने कहा था कि मुख्यमंत्री को बस इतना कहना चाहते हैं कि वो राजधर्म का पालन करें. राजधर्म का मतलब जनता में जाति-धर्म के आधार पर भेदभाव न करें. हालांकि, जब मोदी बीच में बोले कि वही तो कर रहे हैं साहब तो अटल जी ने भी नरेंद्र मोदी के लिए कहा कि मुख्यमंत्री ऐसा कर भी रहे हैं. जब अटल जी का देहांत हुआ, तो मोदी प्रधानमंत्री हैं. मगर मोदी ने कभी सार्वजनिक तौर पर वाजपेयी के बारे में कोई ऐसा बयान नहीं दिया, जिससे अटलजी की छवि को धक्का लगे.


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