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जब चुनाव हारने के बाद अटल जी ने आडवाणी से कहा, 'चलो फिल्म देखते हैं'

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अटल बिहारी वाजपेयी. हमारे बीच अब नहीं है. 16 अगस्त की शाम 05:05 बजे उनका दिल्ली में निधन हो गया. कई विशेषण यहां जोड़े जा सकते हैं, लेकिन दुनिया से आज़ाद हो जाने के बाद हम उन्हें इसमें बांधने की कोशिश नहीं करेंगे. अटल जी के बारे में एक किस्सा है, जो राजनीतिक जीवन में उनके साथ 60 साल गुज़ारने वाले लालकृष्ण आडवाणी ने सुनाया था.

कुछ सालों पहले एक प्राइवेट टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू के दौरान आडवाणी जी ने भाजपा, अटल बिहारी वाजपेयी और अपने भविष्य से जुड़ी कई चीज़ों के बारे में बात की थी. लेकिन इस इंटरव्यू में एक बात जो ध्यान आकर्षित करती है, वो है अटल जी से जुड़ा एक मजेदार किस्सा. किस्सा है अटल बिहारी वाजपेयी के चुनाव हारने के बाद सिनेमा देखने जाने का.

अटल बिहारी वाजपेयी तीन बार भारत के प्रधानमंत्री रह चुके हैं, वहीं लालकृष्ण आडवाणी देश के उप-प्रधानमंत्री और गृह मंत्री की कुर्सी संभाल चुके हैं.
अटल बिहारी वाजपेयी तीन बार भारत के प्रधानमंत्री रह चुके हैं, वहीं लालकृष्ण आडवाणी देश के उप-प्रधानमंत्री और गृह मंत्री की कुर्सी संभाल चुके हैं.

आज जो हमारी सत्ताधारी पार्टी है बीजेपी यानी भारतीय जनता पार्टी, इसकी जड़ें आज़ादी के चार साल बाद खड़ी हुई राजनीतिक पार्टी भारतीय जन संघ से जाकर जुड़ती हैं. 1951 में स्थापित हुई जन संघ की उम्र कुल 26 साल रही. 1977 में कांग्रेस का सामना करने के लिए जनसंघ समेत कई पार्टियों को मिलाकर बनी जनता पार्टी. 1980 में ये जनता पार्टी टूटी और बन गई ‘भारतीय जनता पार्टी’. ये किस्सा है जनसंघ के दिनों का.

आडवाणी जी ने बताया कि कैसे उपचुनाव हारने के बाद उन्हें अटल जी ने फिल्म देखने चलने को कहा. आडवाणी जी बताते हैं-

‘जनसंघ के दिनों में हम एक उपचुनाव हार गए थे. इससे हम सब बहुत दुखी थे. निराशा में शांत चुप-चाप बैठे थे. अचानक अटल जी ने ही कहा, चलो कोई फिल्म देखने चलते हैं. पहले तो मैं चौंका लेकिन झट से तैयार हो गया. हम दोनों दिल्ली में इम्पीरियल सिनेमा गए. वहां ‘फिर सुबह होगी’ नाम की फिल्म चल रही थी. हमने टिकट लिया और फिल्म देखने लगे.’

फिल्म 'फिर सुबह होगी' का पोस्टर और फिल्म के एक सीन में राज कपूर और माला सिन्हा.
फिल्म ‘फिर सुबह होगी’ का पोस्टर और फिल्म के एक सीन में राज कपूर और माला सिन्हा.

1958 में आई फिल्म ‘फिर सुबह होगी’ में राज कपूर और माला सिन्हा ने लीड रोल्स निभाए थे. साथ में रहमान और टुनटुन जैसे एक्टर्स भी थे. इसे डायरेक्ट किया था रमेश सहगल ने. ये फिल्म रशियन नॉवेलिस्ट फ्योडोर दोस्तोवोस्की की किताब ‘क्राइम एंड पनिशमेंट’ पर बेस्ड थी. इसकी कहानी एक लड़के की थी, जो किसी की मदद करने में अपनी सारी सेविंग खर्च कर देता है. लेकिन प्रेम के चक्कर में पड़कर वो कुछ गलतियां कर जाता है, जिसकी सज़ा किसी और मिलती है. वो अपनी गलती मान लेना चाहता है लेकिन उतनी हिम्मत नहीं जुटा पाता. आखिर में वो अपनी गलती स्वीकार लेता है, और इसके साथ फिल्म पॉजिटिव नोट पर खत्म होती है.


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