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जब अटल बिहारी थाने में जाकर बोले- मेरे खिलाफ मुकदमा लिखो

बात 1984 के कुछ महीने बाद की है. अटल बिहारी वाजपेयी ग्वालियर में लोकसभा का चुनाव हार चुके थे. हालांकि वो बीच-बीच में अपने क्षेत्र में जाया करते थे. सो वो ऐसे ही एक दौरे पर दिल्ली से ग्वालियर जा रहे थे. अटलजी की कार उनके सहयोगी शिवकुमार चला रहे थे जबकि ड्राइवर बैठा हुआ था. कार मथुरा के पास फरे नाम के गांव से गुजर रही थी, तभी भैंसों का एक झुंड सामने आ गया. एक भैंस से कार टकरा गई. शिवकुमार के मुताबिक-

हमें चोट नहीं लगी, पर भैंस मर गई. मौके पर भीड़ जुट गई. लोग अटलजी को नहीं जानते थे. मैंने ड्राइवर से पूछा कि कार स्टार्ट हो सकती है? उसने कहा हां. मैंने कहा भगाओ. कार आगे बढ़ते देख गांव वाले सामने आ गए. मैं रिवॉल्वर रखता था. हवा में गोली चलाई तो लोग किनारे हो गए. हम सीधे थाने पहुंचे. पुलिस ने अटलजी को पहचान लिया और बैठने को कहा. अटलजी बोले- ‘मामला दर्ज कराने आया हूं. मेरी कार से एक भैंस टकराकर मर गई है. कार छोड़कर जा रहा हूं. भैंस के मालिक की पहचान कर मेरे पास भेज देना ताकि मुआवजा दे सकूं.

अटल चाहते तो इस एक्सिडेंड की घटना को छिपा सकते थे मगर नहीं. शायद इसीलिए अटल होना आसान नहीं.
अटल चाहते तो इस एक्सिडेंड की घटना को छिपा सकते थे मगर नहीं. शायद इसीलिए अटल होना आसान नहीं.

घटना के बाद अटल दिल्ली लौट आए मगर उस भैंस का मालिक नहीं आया. कुछ समय बाद एक नेत्रहीन कवि अटलजी से मिला और अपनी कविता सुनाई. अटलजी को पसंद आई. उससे पूछा कि कहां रहते हो? उसने बताया कि फरे में. अटलजी ने फरे का नाम सुना और उन्हें तपाक से ये एक्सीडेंट याद आ गया. बोले- फरे में मेरी कार की टक्कर से एक भैंस मर गई थी. मैंने पुलिस से भी कहा था मगर उसका मालिक आज तक मुआवजा लेने नहीं आया. इस पर उस कवि ने बताया कि वो आए भी तो कैसे, पुलिस वाले उसे घर से बाहर तक निकलने नहीं दे रहे हैं. अटलजी ने तुरंत उस कवि के सामने एक पेशकश कर दी. बोले –

अगर लालकिले पर कविता पाठ करना चाहते हो तो उसे मेरे पास लेकर आओ.

कवि वापस गांव गया और दो-तीन दिन बाद भैंस के मालिक को लेकर आ गया. अटल ने फिर अपने दोनों वादे पूरे किए. साबित किया कि वो जुबान के कितने पक्के हैं. उन्होंने पहले भैंस के मालिक को मुआवजे के रूप में 10 हजार रुपए दिए और दूसरी ओर नेत्रहीन कवि को लालकिले से कविता पाठ करने का मौका दिलाया.


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