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एक रोटी के दान की रुला देने वाली कहानी

कुछ दिनों पहले लल्लनटॉप के खास शो ‘बरगद’ में एडिटर सौरभ द्विवेदी के साथ ‘अक्स’, ‘शूल’ और ‘लापतागंज’ जैसी फिल्मों और टीवी शोज़ से फेम हासिल कर चुके एक्टर विनीत कुमार ने बैठक जमाई. जहां विनीत कुमार ने अपने बचपन से लेकर जवानी, राजनीति से लेकर अभिनय और हिंदी सिनेमा से लेकर तमिल सिनेमा तक सब पर खूब तफसील से बात की. बातों के दौरान उन्होंने कई रोचक किस्से साझा किए. उन्हीं किस्सों में एक आपके साथ साझा कर रहे हैं. 


4 जून 1974. जयप्रकाश नारायण के आंदोलन से जुड़ने देश भर से लाखों लोग बिहार में इक्कट्ठा होने वाले थे. आने वाले लोगों की रहने-खाने की जिम्मेदारियां बांट दी गयीं. विनीत कुमार बाकरगंज में रहते थे. तो उन्हें 15000 लोगों के खाने-रहने की व्यवस्था का काम सौंपा गया. हर घर को खाना दान करने को बोला गया. विनीत और मंडली ने घर-घर जाकर खाना इक्कट्ठा किया. विनीत ने उस दिन कई सौ रोटियां इकट्ठी कीं. लेकिन उन कई सौ रोटियों में से एक रोटी का दान ऐसा था, जो उन्हें आज तक याद  है. विनीत बताते हैं,

“जेपी का आंदोलन होने वाला था. लाख-डेढ़ लाख लोग आने वाले थे. बाकरगंज में रहते थे, तो हमें 15000 लोगों के खाने-रहने की व्यवस्था करनी थी. तो सब घरों में बोल दिया बना-बनाया दाल रोटी दीजिए. हमारी गली में पोस्टमैन रहते थे. उनसे कहा वो चिट्ठियों वाला झोला निकालिए. उसी में रोटी रखेंगे. तो सब ने झोला उठाया और रोटी मांगने चल दिए. तो हमने अपनी गली से थोड़ी ही दूर पर एक घर का दरवाज़ा खटखटाया. वो पासी था. उसने जब दरवाज़ा खोला तो हमने देखा, थाली रखी हुई थी और वो खा रहा था. हम बोले, रोटी बोले थे ना देने को. और घुस गए घर में. उसको बोले रोटी कहां है रोटी दो. तो वो बोला, वो तो हम झुठार दिए हैं. हम बोले झुठार का दिए हो. और एक रोटी जो उसने नहीं खाया था, उठाया और अपने झोले में रख दिया. ये देख वो रोने लगा. ये है आंदोलन. ऐसे जुड़े हैं लोग. नारा लगाने से थोड़ी आंदोलन होता है. जब शब्द समाप्त होते हैं, तब आंदोलन की शुरुआत होती है.”

जय प्रकाश नारायण भाषण देते हुए.
जय प्रकाश नारायण भाषण देते हुए.

#साहित्यकारों से मुलाक़ात

रामधारी सिंह दिनकर .
रामधारी सिंह दिनकर .

आंदोलन के दौरान फणीश्वर नाथ ‘रेणु’, दिनकर, बाबा नागार्जुन जैसे कई दिग्गज साहित्यकारों से भी विनीत की मुलाकात हुई. इन आइकन्स से मिलने का रोचक किस्सा विनीत ने हमें बातचीत में बताया:

“जब जेपी आंदोलन में सम्मलित हुए तो बाबा नागार्जुन, रेणु जी सब से मुलाकात हुई. दिनकर साब को तो कार्ड देने जाते थे, एक दिन उनके यहां कार्ड देने गए तो रश्मिरथी पड़ी हुई थी. तो हमने उनसे कहा सुना दीजिए ना. तो उन्होंने फिर सुनाया. बंबई ने तो बर्बाद कर दिया है. बौद्धिक रूप से तो बंबई का लेना-देना ही नहीं है ना. कॉफ़ी हाउस पर रेणु जी, दिनकर साब, बाबा नागार्जुन सब अपनी-अपनी कविता सुनाते थे. ऐसा नहीं था के हमें कुछ समझ में आता था. हम बस हैं, ये लोग हैं तो हम हैं. ये मेरी समझदारी थी.”

#बाबा नागार्जुन का पाठ

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बाबा नागार्जुन.

“हम स्कूटर से जा रहे थे कॉफ़ी हाउस के बाहर से. तो बाबा दिख गए हमको पान की दुकान के पास. तो स्कूटर रोक के हमने कहा बाबा प्रणाम. तो बोले ‘ए कहां जा रहा है?.’ हम बोले बताइए कहां जाना है. तो स्कूटर पर बैठे और चल दिए. बीच रास्ते में उन्होंने कुछ गरारा किया, तो हमने स्कूटर साइड में लगाया कि थूक लें. वो बोले, अरे कहां रोक रहे हो. हम बोले थूक लीजिए. वो बोले थूकने की भी जगह होती है. मेरी बुद्धि खुली, के बेटा जीवन में कोई भी चीज़ व्यर्थ नहीं जाती. अगर विचार करोगे तो हर चीज़ की जगह है. तो ऐसी-ऐसी चीज़ें जीवन में हुईं है, जो बहुत बाद में समझ आईं हैं.”


ये स्टोरी दी लल्लनटॉप में इंटर्नशिप कर रहे शुभम ने लिखी है.


विडियो: एक रोटी के दान की रुला देने वाली कहानी

 

 

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