Submit your post

Follow Us

उस दिन इतने गुस्से में क्यों थे अटल बिहारी वाजपेयी कि 'अतिथि देवो भव' की रवायत तक भूल गए!

596
शेयर्स

14 जुलाई, 2001. मुशर्रफ और वाजपेयी हाथ मिला रहे हैं. दोनों के चेहरे पर मुस्कुराहट.

16 जुलाई, 2001. मीटिंग हॉल में वाजपेयी और मुशर्रफ आमने-सामने. दोनों के चेहरे पर भन्नाहट.

वाजपेयी का चेहरा कसा-तमतमाया हुआ. वाजपेयी ने मुशर्रफ से हाथ मिलाया और हॉल से निकल गए. मुशर्रफ अकेले मुंह देखते खड़े रह गए. पाकिस्तान का राष्ट्रपति भारत के दौरे पर आया था. ये उसके लौटने की घड़ी थी. कायदा यही था कि वाजपेयी खुद उन्हें छोड़ने बाहर कार तक आते. यही रस्म है. मगर वाजपेयी ने रस्म नहीं निभाई. मुशर्रफ अकेले ही बाहर निकले. सीढ़ियां नापी. फिर अपनी कार तक पहुंचे. इससे ज्यादा और क्या बेइज्जती हो सकती थी किसी राष्ट्रपति की.

वाजपेयी हंसोड़ थे. दोस्ताना. मन में नाराजगी होती, तो भी मुंह से चाशनी ही टपकता था. आपा न खोना, लोकाचार का खयाल. वाजपेयी के शिष्टाचार निभाने की मिसाल दी जाती थी. ऐसी तमीज वाले वाजपेयी मुशर्रफ के साथ ऐसी बदतमीजी से क्यों पेश आए?

रात के अंधेरे में मुशर्रफ का कारवां निकल गया. जसवंत सिंह मीडिया के सामने हाजिर हुए. बोले, दोनों पक्षों के बीच कोई सहमति नहीं बन पाई. वार्ता चाहे जितनी बेरुखी पर खत्म हुई हो, लेकिन मुशर्रफ ने वाजपेयी को पाकिस्तान आने का न्योता दिया. जसवंत सिंह बोले, समझौता भले न हुआ हो मगर न्योता को मंजूर कर लिया है वाजपेयी जी ने (फोटो: AP)
रात के अंधेरे में मुशर्रफ का कारवां निकल गया. जसवंत सिंह मीडिया के सामने हाजिर हुए. बोले, दोनों पक्षों के बीच कोई सहमति नहीं बन पाई. वार्ता चाहे जितनी बेरुखी पर खत्म हुई हो, लेकिन मुशर्रफ ने वाजपेयी को पाकिस्तान आने का न्योता दिया. जसवंत सिंह बोले, समझौता भले न हुआ हो मगर न्योता को मंजूर कर लिया है वाजपेयी जी ने (फोटो: AP)

आगरा का ये सम्मेलन ऐतिहासिक था. समझिए कि यहां पर भारत और पाकिस्तान बस दोस्त बनते-बनते रह गए थे. अंग्रेजी में एक टर्म होता है- फॉर गुड. इसका मतलब ‘भले के लिए’ मत समझ बैठिएगा. इसका मतलब होता है- परमानेंट. मतलब, हमेशा के लिए. तो उस साल आगरा में कश्मीर विवाद ‘फॉर गुड’ सुलझने वाला था.

…जब मुशर्रफ से हाथ मिलाने से हिचक रहे थे वाजपेयी
हिंदुस्तान की तरफ से थे वाजपेयी. पाकिस्तान की तरफ से थे जनरल परवेज मुशर्रफ. वही मुशर्रफ, जिन्होंने भारत को कारगिल दिया था. वाजपेयी हिंदुस्तान से बस लेकर लाहौर गए. इधर वाजपेयी और नवाज शरीफ गले मिल रहे थे. उधर आर्मी चीफ मुशर्रफ कारगिल की तैयारी कर रहे थे. बाद में इन्हीं मुशर्रफ ने नवाज का तख्तापलट करके गद्दी हथिया ली. वाजपेयी के मन में मुशर्रफ के लिए अविश्वास तो रहा ही होगा. शायद चिढ़ भी रही हो. एक बार सार्क सम्मेलन में जब मुशर्रफ और वाजपेयी आमने-सामने हुए, तो मुशर्रफ ने वाजपेयी की तरफ हाथ आगे बढ़ा दिया. आमतौर पर खुशमिजाज और दोस्ताना वाजपेयी के चेहरे की मांसपेशियां खिंच गईं जैसे. उनका चेहरा मानो आईना हो गया. साफ दिख रहा था कि वो मुशर्रफ से हाथ नहीं मिलाना चाहते.

आप पूछें कि वाजपेयी सरकार के पांच सालों के कामकाज के हाई पॉइंट्स क्या थे, तो उनमें दो चीजें जरूर होंगी. एक, लाहौर समझौता. दूसरा, आगरा सम्मेलन. लाहौर समझौता बाद में असफल रहा. भारत को कारगिल दिया पाकिस्तान ने. मगर वो बस यात्रा, उसे कौन भूल सकता है.
आप पूछें कि वाजपेयी सरकार के पांच सालों के कामकाज के हाई पॉइंट्स क्या थे, तो उनमें दो चीजें जरूर होंगी. एक, लाहौर समझौता. दूसरा, आगरा सम्मेलन. लाहौर समझौता बाद में असफल रहा. भारत को कारगिल दिया पाकिस्तान ने. मगर वो बस यात्रा, उसे कौन भूल सकता है.

वाजपेयी ने बड़ी शिद्दत से कश्मीर विवाद सुलझाने की कोशिश की थी
वक्त गुजरा. आडवाणी की पहल पर आगरा सम्मेलन की जमीन तैयार हुई. इन्हीं आडवाणी की वजह से सम्मेलन बेनतीजा खत्म भी हो गया. पहले लाहौर समझौते की नाकामयाबी. फिर कारगिल युद्ध. और फिर आगरा समझौते की असफलता. वाजपेयी बहुत मायूस थे. जैसे पाकिस्तान के हुक्मरान कश्मीर फतह का सपना देखते हैं. वैसे ही भारत के प्रधानमंत्री कश्मीर विवाद सुलझाने की चाहना रखते हैं. वाजपेयी ने कश्मीर समस्या को सुलझाने की बड़ी कोशिश की. बार-बार कोशिश की. धोखा खाने के बाद भी लगातार हाथ बढ़ाते रहे. आगरा सम्मेलन में वो कश्मीर सुलझाते-सुलझाते रह गए थे. वो जानते थे कि ऐसे मौके रोज-रोज नहीं आते. इस वाकये का जिक्र करते हुए ISI के पूर्व प्रमुख असद दुर्रानी ने ‘द स्पाई क्रॉनिकल्स’ में लिखा है-

वाजपेयी अनुभवी इंसान थे. उनकी बड़ी इज्जत थी. लेकिन वो मुशर्रफ को विदा करने नहीं आए. वो उन्हें बाहर कार तक छोड़ने भी नहीं आए. हमारी संस्कृति में ऐसा नहीं होता. ये बड़ा अजीब था. ज़िया उल हक (पाकिस्तान के सैनिक तानाशाह) भले लाख किसी से छुटकारा पाना चाहते रहे हों, लेकिन वो उसको विदा करने बाहर तक जरूर आते थे. खुद उसकी कार का दरवाजा खोलते थे. ये उनका स्टाइल था. यहां भारत का प्रधानमंत्री (वाजपेयी) अपने वतन आए पाकिस्तानी राष्ट्रपति के साथ इतनी बुनियादी औपचारिकता भी न निभाएं, ये बड़ी अजीब सी बात थी. मैं उस दिन मुशर्रफ को अकेले उनकी कार की तरफ बढ़ते देख रहा था. कुछ कदमों का वो रास्ता इतना लंबा लग रहा था मानो खत्म ही नहीं होगा. वो चाह रहे होंगे कि उस वक्त उन्हें कोई न देखे. कोई उनकी तस्वीर तक न खींचे.


ये भी पढ़ें: 

जब केमिकल बम लिए हाईजैकर से 48 लोगों को बचाने प्लेन में घुस गए थे वाजपेयी

क्या इंदिरा गांधी को ‘दुर्गा’ कहकर पलट गए थे अटल बिहारी?

उमा भारती-गोविंदाचार्य प्रसंग और वाजपेयी की नाराजगी की पूरी कहानी

कुंभकरण के जागते ही वाजपेयी के गले लग गए आडवाणी

अटल बिहारी ने सुनाया मौलवी साब का अजीब किस्सा

नरसिम्हा राव और अटल के बीच ये बात न हुई होती, तो भारत परमाणु राष्ट्र न बन पाता

जब पोखरण में परमाणु बम फट रहे थे, तब अटल बिहारी वाजपेयी क्या कर रहे थे

क्यों एम्स में भर्ती किए गए अटल बिहारी वाजपेयी?

वीडियो में देखिए वो कहानी, जब अटल ने आडवाणी को प्रधानमंत्री नहीं बनने दिया

लगातार लल्लनटॉप खबरों की सप्लाई के लिए फेसबुक पर लाइक करें
Vajpayee Kashmir Policy: After the failure of Agra summit, Vajpayee did not see off Parvez Musharraf

क्रिकेट के किस्से

जब शराब के नशे में हर्शेल गिब्स ने ऑस्ट्रेलिया को धूल चटा दी

उस मैच में 8 घंटे के भीतर दुनिया के दो सबसे बड़े स्कोर बने. किस्सा 13 साल पुराना.

वो इंडियन क्रिकेटर जो इंग्लैंड में जीतने के बाद कप्तान की सारी शराब पी गया

देश के लिए खेलने वाला आख़िरी पारसी क्रिकेटर.

जब तेज बुखार के बावजूद गावस्कर ने पहला वनडे शतक जड़ा और वो आखिरी साबित हुआ

मानों 107 वनडे मैचों से सुनील गावस्कर इसी एक दिन का इंतजार कर रहे थे.

जब श्रीनाथ-कुंबले के बल्लों ने दशहरे की रात को ही दीपावली मनवा दी थी

इंडिया 164/8 थी, 52 रन जीत के लिए चाहिए थे और फिर दोनों ने कमाल कर दिया.

श्रीसंत ने बताया वो किस्सा जब पूरी दुनिया के साथ छोड़ देने के बाद सचिन ने उनकी मदद की थी

सचिन और वर्ल्ड कप से जुड़ा ये किस्सा सुनाने के बाद फूट-फूटकर रोए श्रीसंत.

कैलिस का ज़िक्र आते ही हम इंडियंस को श्रीसंत याद आ जाते हैं, वजह है वो अद्भुत गेंद

आप अगर सच्चे क्रिकेट प्रेमी हैं तो इस वीडियो को बार-बार देखेंगे.

चेहरे पर गेंद लगी, छह टांके लगे, लौटकर उसी बॉलर को पहली बॉल पर छक्का मार दिया

इन्होंने 1983 वर्ल्ड कप फाइनल और सेमी-फाइनल दोनों ही मैचों में मैन ऑफ द मैच का अवॉर्ड जीता था.

टीम इंडिया 245 नहीं बना पाई चौथी पारी में, 1979 में गावस्कर ने अकेले 221 बना दिए थे

आज के दिन ही ये कारनामा हुआ था इंग्लैंड में. 438 का टार्गेट था और गजब का मैच हुआ.

जब 1 गेंद पर 286 रन बन गए, 6 किलोमीटर दौड़ते रहे बल्लेबाज

खुद सोचिए, ऐसा कैसे हुआ होगा.

जब अकेले माइकल होल्डिंग ने इंग्लैंड से बेइज्जती का बदला ले लिया था

आज ही के दिन लिए थे 14 विकेट.