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अंग्रेज़ों ने पास देने से इन्कार क्या किया राजीव गांधी का मंत्री वर्ल्डकप टूर्नामेंट छीन लाया!

2024 से 2031 के बीच दो क्रिकेट विश्वकप और चार टी20 विश्वकप खेले जाएंगे. दुनियाभर के 17 क्रिकेटिंग देशों ने इसके लिए मेज़बानी की पेशकश की है. ICC क्रिकेट विश्वकप को होस्ट करने की बात कहने की हिमाकत शायद ही दुनियाभर के ये देश कर पाते, अगर 83 विश्वकप के बाद राजीव गांधी के एक मंत्री ने इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया को चुनौती देने की नहीं ठानी होती.

चलिए थोड़ा रिवाइंट मारते हैं. 1983 प्रूडेंशियल विश्वकप. इंग्लैंड की सरज़मीं पर भारत, वेस्टइंडीज़ के साथ विश्वकप के फाइनल में पहुंच गया था. इंग्लैंड बुरी तरह से जला बैठा था. सोचा होगा- भारत, जिसपर 90 साल राज किया वो हमसे आगे निकल गया.

खैर, 83 का विश्वकप फाइनल देखने के लिए भारत से कई लोगों को लॉर्ड्स आने का न्यौता भेजा गया. इन्हीं कई लोगों में एक थे नरेन्द्र कुमार साल्वे. उस वक्त के भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के अध्यक्ष, ICC मेंबर और भारत सरकार के यूनियन मिनिस्टर. वो अपने यहां तो होता है ना, कि अपना कोई आदमी ऊंचे पद पर हो तो कुछ ना कुछ काम निकलवाने की कोशिश शुरू हो जाती है. साल्वे के साथ भी यही हुआ. आखिर विश्वकप का सबसे बड़ा मैच, उसमें भी अपनी ही टीम. तो मैच के टिकट या पास मांगना तो बनता था.

साल्वे से BCCI के बाकी सदस्यों और कुछ अन्य लोगों ने मैच के कुछ टिकट-पास मांगे. साल्वे ने भी उम्मीद के साथ इंग्लैंड क्रिकेट बोर्ड से कुछ और टिकट की मांग कर दी. लेकिन इंग्लैंड क्रिकेट बोर्ड ने साफ-साफ साल्वे को एकस्ट्रा टिकट देने से इन्कार कर दिया. अब साल्वे चुपचाप बैठकर वो मैच तो देखते रहे लेकिन मन ही मन एक टीस थी. उनके मन में कुछ तो चल रहा था.

Kapil Dev Trophy
ट्रॉफी के साथ कपिल देव. फोटो: Getty Images

लंच की टेबल पर विश्वकप की प्लानिंग:

भारत विश्वकप जीत गया. कपिल देव ने लॉर्ड्स में ऐतिहासिक ट्रॉफी उठाई. इसके बाद BCCI प्रेसिडेंट साल्वे के ब्रदर इन लॉ ने लंच रखा. इसमें भारतीय क्रिकेट टीम, BCCI अधिकारी और पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड के प्रमुख एअर मार्शल नूर खान को भी न्योता भेजा गया. सब खाना खा रहे थे, लेकिन इस खुशी के पल में भी साल्वे को एक बात चुभ रही थी.

‘आखिर क्यों अंग्रेज़ों ने मुझे फाइनल मैच के पास देने से इन्कार कर दिया.’

लंच की टेबल पर साल्वे ने PCB प्रमुख से बात शुरू की. और नूर खान से कहा,

‘काश भारत में भी वर्ल्ड कप जैसे बड़े टूर्नामेंट होते.’

साल्वे की बात सुन नूर खान समझ गए कि साल्वे को ECB का रवैया बर्दाश नहीं हुआ है. उन्होंने भी साल्वे की बात पर ऐसा जवाब दिया जैसे वो भी मन ही मन इमरान खान को अपने देश में विश्वकप खेलते देखना चाहते हों. नूर खान ने कहा

‘हम वर्ल्ड कप अपने देश में क्यों नहीं खेल सकते?’

बस… साल्वे समझ गए. भले ही बंटवारा हो गया लेकिन इस लंच टेबल की तरह ही क्रिकेट में भी हम मिलकर दुनिया को अपने क्रिकेट की ताकत दिखा सकते हैं. साल्वे ने तुरंत नूर खान के सामने एक पेशकश रख दी. उन्होंने कहा,

“भारत और पाकिस्तान मिलकर अगर वर्ल्ड कप आयोजन करें तो कैसा रहेगा?”

Nur Khan
PCB प्रमुख नूर खान. फोटो: Getty Images

नूर खान सोच में पड़ गए. क्योंकि ये बात जितनी सुनने में अच्छी लगती है. उतनी आसान थी नहीं. सबसे पहले चीज़ तो ये कि ICC ने इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया वीटो पावर दिया हुआ था. ऐसे में इंग्लैंड से विश्वकप को बाहर लाना लगभग नामुमकिन था. लेकिन साल्वे भी जिद्दी थे. वे वर्ल्डकप भारत में आयोजित कराने के लिए कुछ भी करने के लिए तैयार थे.

फिर शुरू हुई तैयारी

साल्वे ने एक स्ट्रेटेजी बनाई. सबसे पहले उन्होंने भारत और पाकिस्तान के क्रिकेट बोर्डों की एक जॉइंट कमेटी बनाई. BCCI बड़ा भाई था तो साल्वे इसके अध्यक्ष चुने गए. उस वक्त BCCI के कोषाध्यक्ष जगमोहन डालमिया हुआ करते थे. उनके साथ मिलकर आईसीसी को अपने पक्ष में करने का एक शानदार तरीका निकाला गया. डालमिया ने पता लगाया कि ICC के कुल सदस्य देश 28 हैं. इनमें से सिर्फ 7 देश टेस्ट क्रिकेट खेलते हैं, जबकि 21 देशों को टेस्ट खेलने का दर्जा ही नहीं मिला हुआ.

बस, साल्वे और BCCI ने इन्हीं टेस्ट ना खेलने वाले देशों को अपने पक्ष में करने की तैयारी शुरू कर दी. प्लान बनाया कि वो टेस्ट खेलने तथा टेस्ट ना खेलने वाले देश को इंग्लैंड से अधिक राशि देंगे. अधिक राशि कुछ सिक्कों में नहीं होगी. BCCI ने तय किया कि टेस्ट खेलने वालों को इंग्लैंड से करीब 4 गुना ज्यादा, तो वहीं टेस्ट ना खेलने वाले देशों को 5 गुना ज़्यादा पैसे दिए जाएंगे.

ICC ये सुनते ही सोच में पड़ गया. वो BCCI की इस पेशकश से हैरान था. ICC ही नहीं BCCI के सामने भी उस वक्त सबसे बड़ा सवाल यही था, इतना पैसा कहां से आएगा?

Dhirubhai Ambani
धीरूभाई अंबानी फाइल फोटो.

साल्वे की प्लानिंग और धीरूभाई की मदद

भारत उस वक्त क्रिकेट का सुपर पावर नहीं था. ना ही हमारे पास इतना पैसा था कि विश्वकप स्तर के टूर्नामेंट को सिर्फ बोर्ड के दम पर करवाया जा सके. ऐसे में BCCI ने कई मल्टीनेशनल कंपनियों से बात शुरू की. इनमें हिन्दुजा ग्रुप, कोका-कोला, जिलेट, मित्सुबिशी जैसी कंपनियां शामिल थीं. बोली लगी 37 लाख के आसपास. लेकिन ये पैसे काफी नहीं थे, क्योंकि BCCI को तो लगभग चार करोड़ की ज़रूरत थी.

यहां एंट्री हुई धीरूभाई अंबानी की. उनकी टेक्सटाइल कंपनी रिलायंस ने BCCI की मदद की. धीरूभाई के छोटे बेटे अनिल अंबानी ने रिलायंस की तरफ से उस प्रोजेक्ट को लीड किया. साथ ही ये शर्त भी रखी,

‘अगर भारत में विश्वकप होता है तो रिलायंस उसे स्पॉन्सर करेगा.’

BCCI ये शर्त मान गया और अनिल अंबानी ने बोर्ड को 2.18 मिलियन पाउंड दे दिए. इसके बाद BCCI और PCB ने साथ आकर ICC को विश्वकप आयोजन के लिए ये प्रस्ताव पेश कर दिया. और विश्वकप आयोजन की वोटिंग को 16-12 से जीत लिया.

विश्वकप की भारत में एंट्री तय हो गई थी. जैसे ही ये विश्वकप बड़ा होने लगा. कई और स्पॉन्सर्स ने BCCI को अप्रोच किया. लेकिन उस वक्त साल्वे ने ये कहते हुए बाकी सभी स्पॉन्सर्स को इन्कार कर दिया,

‘जब हमें ज़रूरत थी तो रिलायंस ने हमारी मदद की, अब रिलायंस के अलावा हम किसी को स्पॉन्सरशिप नहीं देंगे.’

1987 में खेला गया ये विश्वकप इतना सफल हुआ कि इसके बाद दुनियाभर के सभी कॉन्टिनेन्ट्स में विश्वकप होने की संभावना को बढ़ा दिया.


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